Maa Vindhyavasini : जानें कौन हैं मां विंध्यवासिनी और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

विंध्यवासिनी कौन है? ( Who was goddess Vindhyavasini? )

मां विंध्यवासिनी ( Maa Vindhyavasini ) देवी दुर्गा के पराशक्ति रूपों में से एक है। देवी को यह नाम विंध्य पर्वत से मिला है। इस तरह विंध्यवासिनी का शाब्दिक अर्थ है विंध्य में निवास करने वाली देवी। ऐसी मान्यता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे थे वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए। जबकि विंध्य पर्वत वह स्थान है जहाँ देवी ने अपने जन्म लेने के बाद निवास करना चुना।

मां विंध्यवासिनी की उत्पत्ति कैसे हुई? ( What is the story of Maa Vindhyavasini? )

मार्कंडेय पुराण में इस बात का वर्णन मिलता है कि विंध्यवासिनी ( Vindhyavasini ) ने यशोदा और नन्द के घर जन्म लिया था। इस बात की जानकारी देवी दुर्गा ने अपने जन्म से पहले ही सभी देवी-देवताओं को दी थी। देवी विंध्यवासिनी ने ठीक उसी दिन जन्म लिया जिस दिन श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। आकाश से हुई भविष्यवाणी ने कंस की मृत्यु देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के हाथों तय की थी इससे भयभीत कंस ने अपनी ही बहन की संतानों को मारने के लिए उतारू कर दिया।

कंस बस उस आठवीं संतान के जन्म के इन्तजार में राह तक रहा था, पर भगवान की माया ने सारा खेल ही पलट दिया। श्री कृष्ण को कंस के चंगुल से बचाने के लिए माया ने यशोदा और नन्द के घर जन्म लेने वाली पुत्री Vindhyavasini Devi को देवकी की गोद में डाल दिया। वहीँ कृष्ण ने यशोदा और नंद के घर में जन्म लिया।

देवकी की आठवीं संतान की खबर सुनते ही कंस कारागार पहुंचा क्योंकि इस संतान की मृत्यु कंस की मौत पर पूर्ण विराम लगा सकती थी।  जब कंस को यह बात पता चली कि पुत्र ने नहीं पुत्री ने जन्म लिया है तो कंस को थोड़ा आश्चर्य हुआ पर उसे लगा कि है तो आठवीं संतान ही फिर चाहे वह पुत्र हो पुत्री। फिर जैसे ही कंस ने उस कन्या को मारने का प्रयास किया वह कन्या दुर्गा का विकराल रूप धारण कर कंस के सामने आ खड़ी हुई। इस तरह से कंस को गुमराह करने के लिए Vindhyachal Devi ने देवकी और वासुदेव के घर जन्म लिया।  

विंध्याचल पार करने वाले पहले ऋषि कौन थे? ( Vindhyachal par karne wale pahle rishi kaun the? )

सप्तऋषियों में से एक अगस्त्य ( Agastya ) ऋषि ही सर्वप्रथम विंध्याचल पर्वत ( Vindhyachal Mountain ) को पार कर दक्षिण दिशा की ओर आर्य संस्कृति का प्रचार करने गए थे।  पौराणिक कथाओ में इस बात का ज़िक्र है कि अगस्त्य ने ही विंध्य पर्वत के मध्य में से दक्षिण भारत जाने का मार्ग निकाला था। कहा तो यह भी जाता है कि विंध्याचल पर्वत ने ऋषि के चरणों में झुकते हुएा प्रणाम किया था। 

विंध्याचल पर्वत ( Vindhyachal Mountain ) को प्रणाम करते हुए देख ऋषि अगस्त्य ने पर्वत को आशीर्वाद दिया कि जब तक वे दक्षिण क्षेत्र से लौटकर वापस नहीं आते तब तक वह ऐसे ही सिर झुकाकर खड़ा रहे। यही कारण है की यह पर्वत आज तक सिर झुकाकर खड़ा है और अगस्त्य ऋषि का इन्तजार कर रहा है। 

विंध्याचल में माता का कौन सा अंग गिरा था? ( Vindhyanchal me mata ka kaun sa ang gira tha? )

पौराणिक मान्यताएं कहती है कि शक्तिपीठ वह स्थान है जहाँ सती के अंग गिरे थे लेकिन विंध्याचल में Vindhyachal Mata के शरीर का कोई अंग नहीं गिरा था। यहाँ देवी सशरीर के साथ निवास करती हैं क्योंकि उन्होंने यह स्थान अपने रहने के लिए चुना था।

मां विंध्यवासिनी मंदिर कहाँ स्थित है? ( Where is Maa Vindhyanchal Temple? )

मां विंध्यवासिनी मंदिर ( Vindhyavasini Mandir ) यूपी के मिर्ज़ापुर ( Mirzapur ) में गंगा नदी के बिल्कुल समीप विंध्य की पहाड़ियों में अवस्थित है। कहा जाता है कि देवी के 51 पीठों में शामिल यह शक्तिपीठ सृष्टि के निर्माण से पहले ही इस स्थान पर स्थापित हो गया था। Vindhyachal Mandir ( Vindhyachal Temple ) आने वाले भक्तों को देवी के तीन रूपों देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती और महाकाली के दर्शन एक साथ मिल जाते है। सिद्धि प्राप्ति के लिए भी यह स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

विंध्यवासिनी की कृपा पाने के लिए क्या करें? ( Vindhyanchal ki kripa pane ke liye kya kare? )

इस बात की जानकारी पहले ही दी जा चुकी है कि देवी विंध्यवासिनी में तीन रूपों देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती और महाकाली वास करती हैं। इन तीनों ही देवियों की अपनी अलग शक्तियां हैं जिनके आधार पर लोग इन्हें पूजते हैं।

यदि आप किसी आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और उसके समाधान की तलाश कर रहे हैं तो इसके लिए आप Laxmi Kavach को धारण कर सकते हैं।

यदि आप काल और मृत्यु से भय खाते हैं, काले जादू और भूत प्रेत की बाधा से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आप Kali Kavach का प्रयोग कर सकते हैं। वहीँ बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने, कला-संगीत-साहित्य के क्षेत्र में तरक्की हासिल करने के लिए Saraswati Kavach का प्रयोग किया जाता है।   

विंध्याचल क्यों प्रसिद्ध है? ( What is special in Vindhyachal? )

विध्यांचल के प्रसिद्ध होने की वजह है यहाँ देवी दुर्गा के अवतार मां विंध्यवासिनी का निवास है। यहाँ त्रिकोणी यन्त्र में स्थित Vindhyachal में लोकहिताय विंध्यवासिनी, देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी और महाकाली का रूप धारण करती हैं।

विंध्यवासिनी का मतलब क्या होता है? ( What is the meaning of Vindhyavasini? )

विंध्यवासिनी का शाब्दिक अर्थ है विंध्याचल में निवास करने वाली Maa Vindhyavasini। शिव पुराण के अनुसार विंध्य पर्वत पर निवास करने वाली विंध्यवासिनी को सती भी कहा गया है।    

विंध्याचल कौन सा राज्य में है? ( Where is Vindhyachal in which state? )

विंध्याचल उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित एक नगर है। यह गंगा नदी के निकट वाराणसी से कुल 70 किलोमीटर और मिर्ज़ापुर से 8 किमी की दूरी पर प्रयाग और काशी के ठीक मध्य में स्थित है।

विंध्याचल कौन सा पर्वत है? ( Which mountain is in Vindhyachal? )

विंध्यांचल सप्तकुल पर्वतों में से एक है। विंध्य शब्द का अर्थ धातु है, यह पर्वत भूमि को बेधते हुए भारत के मध्य में अवस्थित है। यह उत्तर और दक्षिण भारत को अलग करने वाला पर्वत है।    

विंध्य पर्वत से कौन सी नदी निकलती है? ( Which river flows in Vindhyachal? )

विंध्य पर्वत से निकलने वाली गंगा-यमुना की कई सहायक नदियाँ हैं। इन सहायक नदियों में चंबल, धसान, केन, तमसा, काली सिंध, पारबती और बेतवा शामिल हैं।

भव्य कोर्णाक मंदिर का इतिहास और सूर्य देव की उत्पत्ति की कहानी

कोर्णाक मंदिर का निर्माण किसने और कब करवाया? ( Who built Konark Surya Temple? )


सूर्य मंदिर का इतिहास बहुत दिलचस्प है। कोर्णाक के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का निर्माण वर्ष 1236-1264 ईसा पूर्व में गंगवंश के राजा नरसिंहदेव ने करवाया था। यह लाल रंग के बलुआ पत्थरों और काले रंग के ग्रेनाइट से बनाया गया है। इस मंदिर की निर्माण शैली कलिंग है साथ ही यह भी बताते चलें कि यहाँ सूर्य देवता को रथ पर विराजमान दिखाया गया है। फिलहाल इसमें एक घोड़ा है लेकिन पूरे मन्दिर स्थल को कुल 12 जोड़ी चक्रों के साथ 7 घोड़ों से खींचते हुए निर्मितं किया गया है।

कोणार्क के सूर्य मंदिर को ब्लैक पैगोडा क्यों कहा जाता है? ( Why is the Sun Temple called the Black Pagoda? )


समंदर में सफर करने वाले लोग इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा के नाम से बुलाया करते थे क्योंकि यह मंदिर जहाजों को किनारे की ओर आकर्षित कर उनका भारी नाश कर दिया करता था। इस मंदिर के शिखर पर लगी चुम्बक कोर्णाक से गुजरने वाले सभी जहाजों को अपनी ओर खींचती थी।

यह आकर्षण इतना अधिक होता था कि सभी जहाज खुद ब खुद मंदिर की तरफ खींचे चले आते थे। सभी जहाज को सभी भारी क्षति होती थी लेकिन मंदिर का बाल भी बांका न हुआ। इस पत्थर के कारण सभी जहाजों का दिशा यंत्र सही ढंग से काम नहीं करता था। इस समस्या का समाधान यह निकला कि नाविक मंदिर में लगे इस पत्थर को ही निकाल कर अपने साथ ले गए।

सूर्य मंदिर में सूर्य भगवान की कितनी मूर्तियां है? ( Surya Mandir me Surya Bhagwan ki kitni murtiyan? )


कोर्णाक में अवस्थित भव्य सूर्य मंदिर में भगवान सूर्य देव की तीन मूर्तियों को स्थापित किया गया है।

सूर्य मंदिर कौन से राज्य में है? ( Surya Mandir kaun se rajya me hai? )


सूर्य का सर्वप्रसिद्ध कोर्णाक मंदिर उड़ीसा राज्य, पुरी में अवस्थित है।

कोणार्क क्यों प्रसिद्ध है? ( What is special about Sun Temple? )


कोर्णाक इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ पर भव्य और ऐतिहासिक सूर्य मंदिर मौजूद है। यह स्थान अपने साथ कई रहस्यों को समेटे हुए है। इस मंदिर की प्रसिद्धता के कारण ही इसे UNESCO ने अपनी विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है।

कोणार्क सूर्य मंदिर के रथ मे कितने घोड़े है? ( Kornak Surya Mandir ke rath me kitne ghode hai? )


भव्य सूर्य मन्दिर को कुल 12 जोड़ी चक्रों के साथ 7 घोड़ों से खींचते हुये निर्मित किया गया है जिसमें सूर्य देवता विराजमान हैं।

कोणार्क मंदिर में पूजा क्यों नहीं होती? ( Kornak Mandir me puja kyon nahi hoti? )


कोर्णाक शहर में स्थित सूर्य मंदिर में पूजा नहीं होती है। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर के प्रमुख वास्तुकार के बेटे ने इस मंदिर के अंदर आत्महत्या कर ली थी। इसी घटना के बाद से ही इस मंदिर में हर प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यही वजह है आज तक इस मंदिर में पूजा अर्चना नहीं की गई।

सूर्य किसका प्रतीक है? ( What does Surya represent? )


सूर्य ऊर्जा का प्रतीक है क्योंकि सूर्य के भीतर इतना तेज मौजूद है जो पूरी सृष्टि का नाश कर सकता है। वहीँ इसका सकारात्मक पहलु यह कि यह हमें बहुत सारी बिमारियों से रक्षा करता है। वैज्ञानिक तकनीकों में इसका प्रयोग किया जाता है। सौर ऊर्जा इसका सबसे बड़ा उदहारण है।

ऋग्वेद में सूर्य देवता किसका पुत्र माना गया है? ( Rigveda me Surya devta kiska putra mana gaya hai? )


ऋग्वेद में सूर्य देव के पिता महर्षि कश्यप है और माता अदिति हैं जिसके कारण इन्हें आदित्य भी कहा गया है।

सूर्य देव की उत्पत्ति कैसे हुई? ( How was Lord Surya Born? )


जब ब्रह्मा के मुख से ॐ शब्द का प्राकट्य हुआ तब सूर्य सूक्ष्म रूप निर्मित हुआ इसके बाद भूः भुव तथा स्व शब्द निकले। इस तरह से सूर्य देव की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से हुई है।

सूर्य देव का मंत्र क्या है? ( Surya Dev ka mantra kya hai? )


Surya Mantra : ”ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।”

उदय होते हुए सूर्य को देखने का क्या लाभ है? ( Uday hote hue Surya ko dekhne ka kya laabh hai? )


सूर्य अकेले ऐसे देवता हैं जो संसार में प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है। सूर्य देवता को उदित होते हुए देखने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। आँखों से संबंधित रोग समाप्त होते हैं, अवसाद से जुड़ी समस्या से मुक्ति मिलती है, हड्डियों से जुड़े रोग नहीं होते।

सूर्यदेव के रथ के सारथी का नाम क्या है? ( Suryadev ke rath ke saarthi ka naam kya hai? )


सूर्य देव के रथ के सारथी का नाम अरुण है। बताते चलें कि अरुण भगवान विष्णु की सवारी गरुड़ के बड़े भाई हैं।

सूर्य भगवान की कितनी पत्नियां थीं? ( Surya Bhagwan ki kitni patniyan thi? )


वैसे तो सूर्य देव की पत्नी का नाम संज्ञा है जो राजा विश्वकर्मा की पुत्री थीं लेकिन संज्ञा सूर्य के तेज से भय खाने के चलते अपनी छाया को छोड़कर चली गईं थी। इस प्रकार सूर्य देव की 2 पत्नियां थीं संज्ञा और छाया।

सूर्य में कितनी पृथ्वी समा सकती है? ( Surya me kitni prithvi sama sakti hai? )


सूर्य पृथ्वी से इतना दूर है कि लोग इसकी शक्ति का अंदाज़ा ही नहीं लगा पाते। एक अध्ययन की मानें तो सूर्य पृथ्वी से इतना बड़ा है कि इसके जैसी 110 पृथ्वी समा जाएं।

सूर्य भगवान को नारायण क्यों कहते हैं? ( Surya Bhagwan ko Narayan kyon kehate hai? )


जगत को प्रकाशमय बनाने के लिए भगवान नारायण ने सूर्य के रूप में अवतार लिया था इसलिए सूर्य भगवान को सूर्य नारायण कहा जाता है। 

सूर्य देव की कृपा कैसे पाएं? ( How to get blessings of Lord Surya? )


सूर्य भगवान की महिमा के बारे में तो सभी भली भांति परिचित हैं। उनके होने से ही इस संसार में प्रकाश विद्यमान है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि सूर्य देव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो प्रत्यक्ष रूप से सभी के बीच मौजूद है। उनकी कृपा से न जानें कितनी ही बिमारियों पर पूर्ण विराम लग जाया करता है। सूर्य देव के वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों ही तरह के लाभ हैं।

जहाँ एक तरफ सूर्य की किरणें व्यक्ति को हड्डियों और आँखों और त्वचा से संबंधित रोगों से मुक्ति दिलाती हैं वहीँ सूर्य कवच या कवच रूपी लॉकेट में कई ऐसी अलौकिक शक्तियां समाहित है जो भीतर के सभी आंतरिक कलह को दूर करती है। सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाती है। साथ ही व्यक्ति की कुंडली में मौजूद विभिन्न प्रकार के वास्तु दोष की समाप्ति भी होती है।

यदि आप सूर्य कवच या सूर्य कवच लॉकेट को खरीदने के इच्छुक है तो आप हमारी वेबसाइट prabhubhakti.in पर जाकर Surya Kavach Locket Online buy कर सकते हैं।

जानिये संसार के न्यायधीश शनिदेव की उत्त्पति कैसे हुई?

शनि देव कौन है? ( Who is Shani Dev? )
जानिये Shanidev Story in hindi :

शनि देव के बारे में पौराणिक कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि वे सूर्य देव के पुत्र थे। कहानी कुछ इस प्रकार है कि राजा विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य देव से विवाह तो हो गया परन्तु संज्ञा में सूर्य के तेज का भय बन गया। हालाँकि सूर्य देव और संज्ञा की तीन संताने हुई – वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना। तीन संताने होने के बावजूद संज्ञा का डर कम नहीं हुआ। 
 
संज्ञा के इसी डर के कारण उन्होंने अपनी छाया को जन्म दिया और अपने बच्चों की देखभाल के लिए छाया को छोड़कर चली गईं। छाया होने की वजह से उसे सूर्य के तेज से भी किसी तरह की दिक्कत नहीं थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थें उस समय संज्ञा की छाया भगवान शंकर की भक्ति में अत्यधिक लीन हो गई थी। इसके कारण उन्हें खाने पीने तक का होश नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि शनिदेव का वर्ण काला हो गया।

Shanidev के वर्ण को देख सूर्य देव को शक था कि यह उनका पुत्र नहीं हो सकता इसलिए उन्होंने शनिदेव को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया। वहीँ छाया द्वारा की गई तपस्या की सारी शक्ति शनिदेव में पहुँच चुकी थी। अतः अपने पिता के यह शब्द सुनकर शनि क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपनी दृष्टि सूर्य देव पर डाली। जिससे सूर्य देव काले पड़ गए। सूर्य देव अपना हाल लेकर Bhagwan Shankar की शरण में पहुंचे। भगवान शंकर ने सूर्य को गलती बताई और फिर क्षमायाचना के बाद जाकर सूर्य देव ठीक हुए। पौराणिक काल की इस घटना के बाद से ही शनिदेव को पिता विरोधी माना जाता है।

शनि देव न्याय कैसे करते हैं? ( Shanidev nyay kaise karte hai? )

व्यक्ति को उसके कर्म के आधार पर फल देने वाले देवता शनि हैं इन्हें न्यायधीश की उपाधि भी दी गई है। अच्छे कर्मों का फल शुभ और बुरे कर्मों का फल अशुभ प्रदान करने वाले शनि की छवि नकारात्मक स्वरुप में अधिक प्रचलित है जबकि वे व्यक्ति के कर्मों के मध्य संतुलन बनाते है और मोक्ष का द्वार अख्तियार करते हैं।

घर पर शनिदेव की पूजा कैसे करें? ( How to do Shanidev Worship at home? )

1. प्रातःकाल स्नान कर शनिदेव की प्रतिमा के आगे तेल का जलाएं।
2. ध्यान रहे कि प्रतिमा के बिल्कुल सामने खड़े होकर पूजा न करें।    
3. साथ ही शनि भगवान को आक के फूल या अपराजिता के फूल चढ़ाएं।
4. भोग में मीठी पूरी, काला तिल और उड़द की खिचड़ी अर्पित करें।  
5. फिर शनिदेव की आरती और चालीसा का पाठ करें।   
6. शनि के बीज मंत्र का 11 बार जाप करना चाहिए।  
7. इस विधि का पालन करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।  

शनि के प्रभाव से क्या होता है? ( What are the bad effects of Shani? )

इन दोषों की वजह से व्यक्ति के जीवन पर कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने शुरू हो जाते है। शनि दोष के लक्षण हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव डालते है जैसे :

1. बालों का अत्यधिक तेजी से और कम उम्र में झड़ना,
2. ललाट पर कालापन छाना,
3. व्यवसाय में गड़बड़ी और पारिवारिक संबंध बिगड़ना,
4. बुरी लत जैसे सट्टेबाजी, जुआ और गलत काम की तरफ आकर्षण बढ़ना,
5. मांस मदिरा का सेवन करना आदि सभी शनि के प्रभाव है।

शनि दोष हटाने के लिए क्या करना चाहिए? ( Shani dosh hatane ke liye kya karna chahiye? )

शनि दोषों से छुटकारा पाने के लिए शनि यन्त्र या यन्त्र रूपी लॉकेट का प्रयोग किया जाना चाहिए। लॉकेट में अद्भुत शक्ति लिए Shani Yantra शनिदेव से संबंधित दोषों जैसे शनि की साढ़े साती और शनि ढैय्या को कम या बिल्कुल खत्म करने का कार्य करता है। Shani Yantra Locket को प्रयोग में लाने से पहले उसकी नियमित तौर पर पूजा अर्चना किया जाना बहुत जरुरी है। 

आइये जानते है शनि यन्त्र को पूजने की विधि :

1. यन्त्र लॉकेट धारण करने के लिए शनिवार का दिन सबसे शुभ है।  
2. इस दिन शनि यन्त्र लॉकेट को शनिदेव की प्रतिमा के साथ रखें और उसपर गंगाजल का छिड़काव करें।  
3. उसके बाद दीपक और धूप जलाकर शनि के समक्ष फल-फूल अर्पित करें।  
4. फिर शनि बीज मंत्र जाप 11 या 21 बार करें।  
 ‘ॐ शं शनैश्चराय नम:’
5. इस तरह विधिवत पूजा के बाद शनि यन्त्र लॉकेट को धारण करना चाहिए।

शनि मंदिर में क्या चढ़ाना चाहिए? ( Shani Mandir me kya chadhana chahiye? )

शनि मंदिर में पीपल के पेड़ और शनि देव पर सरसों का तेल और काला तिल चढ़ाना चाहिए। साथ ही गुड़ भी अर्पित करें।

शनि देव को क्या भोग लगाएं? ( Shani dev ko kya bhog lagaye? )

शनिदेव को भोग में काली उड़द की खिचड़ी, मीठी पूरी और काले तिल के लड्डू चढ़ाएं। इससे शनिदेव अत्यधिक प्रसन्न होंगे।

शनि पूजा में क्या-क्या सामान लगता है? ( Shani puja me kya-kya saman lagta hai? )

शनि पूजा में लोहे या मिटटी का मिट्टी का दीपक, काला तिल, सरसों का तेल, उड़द की दाल, नीले रंग का फूल, काले वस्त्र आदि आवश्यक है। 

शनि देव को क्या प्रिय है? ( Shani dev ko kya priya hai? )

शनिदेव को सर्वप्रिय काली वस्तुएं हैं इसलिए शनिवार के दिन काली वस्तुएं या पदार्थ ही उन्हें अर्पित किये जाते हैं।

छाया दान करने से क्या होता है? ( Chhaya daan karne se kya hota hai? )

शनिदेव से सम्बंधित सभी दोषों से मुक्ति पाने के लिए छाया दान किये जाने की प्रथा सदियों से प्रचलन में है। छाया दान के लिए मिट्टी के एक मर्तबान में सरसों का तेल डालकर और उसमें अपनी छाया देखकर यह दान संपन्न किया जाता है।

शनि देव के कितने भाई थे? ( Shani dev ke kitne bhai the? )

शनिदेव के चार भाई है – वैवस्वत मनु, यमराज, अश्वनीकुमार, कर्ण

शनिदेव की बहन कौन है? ( Shanidev ki behan kaun hai? )

शनिदेव की तीन बहनें हैं – भद्रा , कालिंदी  यमुना 

शनि देव के पुत्र का क्या नाम था? ( Shani dev ke putra ka kya naam tha? )

सूर्य देव और छाया के पुत्र कहलाने वाले शनि देव के पुत्र का नाम मांडी और कुलिगन था। बता दें कि शनि देव की दो पत्नियां थी नीलिमा और दामिनी। नीलिमा से पुत्र कुलिगन और दामिनी से पुत्र मांडी का जन्म हुआ था।  

शनि भगवान को कौन सा फूल पसंद है? ( Shani Bhagwan ko kaun sa phool pasand hai? )

शनिदेव को आक का फूल और नीले रंग में अपराजिता का फूल बेहद पसंद है। माना जाता है कि 5 नीले रंग का फूल अर्पित करने से शनिदेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

शनि व्रत में क्या खाना चाहिए? ( Shani vrat me kya khana chahiye? )

शनिवार के व्रत में मीठे पदार्थ खाने चाहिए। ध्यान रहे कि इस दिन नमकीन चीजे खानी वर्ज्जित हैं।

शनिदेव की पूजा कब करनी चाहिए? ( Shanidev ki puja kab karni chahiye? )

शनिदेव की पूजा के लिए सबसे शुभ दिन शनिवार माना जाता है। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और शनिदेव के सामने दीपक जलाकर उन्हें तेल अर्पित करें।

शनिदेव का मुंह किधर होना चाहिए? ( Shanidev ka muh kidhar hona chahiye? )

शनिदेव का मुख पश्चिम की ओर होना चाहिए क्योंकि शनिदेव पश्चिम दिशा के स्वामी माने जाते हैं। बाकी सभी देवता की पूजा पूर्व की दिशा में की जाती है।

शनि देव की मूर्ति घर में क्यों नहीं रखते? ( Shani dev ki murti ghr me kyon rakhte? )

शनिदेव की मूर्ति को घर में इसलिए नहीं रखा जाना चाहिए क्योंकि शनि जिसपर भी अपनी दृष्टि डालेंगे उसका अनिष्ट होगा।  इसके पीछे की वजह है शनिदेव को उनकी पत्नी से मिला श्राप।

शनिदेव को तेल कब चढ़ाना चाहिए? ( Shanidev ko tel kab chadhana chahiye? )

शनिदेव को शनिवार के दिन तेल चढ़ाने से शुभ फल मिलता है और शनि भगवान की कृपा बनी रहती है।

शनि ग्रह खराब होने पर क्या होता है? ( Shani grah kharab hone par kya hota hai? )

शनि का प्रभाव बढ़ते ही शनि की साढ़े साती और शनि की ढैय्या जैसे दोष कुंडली में लग जाते है।

जानिये क्यों दिया ब्रह्मा ने अपने कमंडल से सरस्वती को जन्म

देवी सरस्वती की उत्पत्ति कैसे हुई?

हिन्दू धर्म में हर वर्ष वसंत पंचमी का त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन का संबंध सरस्वती देवी की उत्पत्ति से है।  

ऋतुओं का राजा कहे जाने वाले वसंत में ही सरस्वती का जन्म हुआ था। दरअसल भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी थी।

सृष्टि के निर्माण की इस प्रक्रिया में ब्रह्मा जी ने जीव जंतुओं, पेड़ पौधों, और मनुष्य को जन्म दे तो दिया परन्तु वे अपने ही द्वारा बनाई गई सृष्टि से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें बार-बार इस बात की अनुभूति हो रही थी कि मेरे द्वारा बनाये गए इस संसार में हर्ष और सौंदर्य की कमी थी।

ब्रह्मा जी ने उस कमी को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल छिड़का और जैसे ही वह जल धरती पर गिरा धरती कांपने लगी। इसके बाद एक ऐसी शक्ति का जन्म हुआ जिसने श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे। उस अद्भुत शक्ति के एक हाथ में वीणा थी तो एक हाथ वरमुद्रा में था। वह एक हाथ में पुस्तक लिए हुए थी तो दूसरे हाथ में माला थी।

ब्रह्मा जी ने जैसे ही सौंदर्य पूर्ण चतुर्भुज स्त्री के रूप को देखा तो उन्हें वीणा बजाने का अनुरोध किया। सरस्वती ने जैसे ही वीणा बजाई पूरा संसार हर्ष से खिल उठा। पेड़-पौधे खिलखिला उठे और जीव-जंतुओं में भी हर्ष उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा जी ने उसी क्षण उस शक्ति को सरस्वती कहकर पुकारा।

सरस्वती माता का जन्म कब और कहां हुआ था?

सरस्वती माता का जन्म माघ मास की शुक्ल पक्ष को पंचमी के दिन हुआ था। यह वही ऋतू है जिसे ऋतुओं का राजा कहा जाता है। श्री कृष्णा ने भी इसी संबंध में कहा था कि ऋतुओं में भी मैं वसंत ऋतू हूँ।

सरस्वती जन्मोत्सव कब मनाया जाता है?

सरस्वती का जन्मोत्सव वसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है। इसी दिन को वसंत पंचमी के रूप में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है।

माँ सरस्वती के पति कौन है?

माता सरस्वती के पति ब्रह्मा जी को माना जाता है। ब्रह्मा जी ने ही देवी सरस्वती को जन्म दिया था और बाद में वे अपनी ही पुत्री पर मोहित हो गए थे। ब्रह्मा जी का देवी के प्रति आकर्षण इतना अधिक था कि उनके मन में देवी से विवाह करने की इच्छा जागी। देवी ब्रह्मा जी की इच्छा को जान गई और उनसे बचने का प्रयास करने लगी लेकिन देवी के सभी प्रयास असफल रहे और अंततः सरस्वती को ब्रह्मा जी से विवाह करना पड़ा।   

सरस्वती मां कौन है?

सरस्वती जिनकी गिनती त्रिदेवियों में की जाती है। इनकी चार भुजाएं हैं। जिनके एक हाथ में वीणा, एक हाथ में पुस्तक, एक में माला और एक हाथ वर मुद्रा में है। सरस्वती वह जो विद्या की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनके हाथों में विराजमान पुस्तक से ज्ञान का और वीणा से संगीत विद्या का बोध होता है। देवी सरस्वती साहित्य, संगीत और कला की देवी हैं।  

सरस्वती की कृपा कैसे पाएं?

सरस्वती माता की कृपा पाने के लिए जातक Saraswati kavach और कवच रुपी locket को धारण कर सकते है। ऐसा करने से सरस्वती माँ की कृपा सदैव जातकों पर बनी रहेगी। इसका सबसे अधिक लाभ यह है कि व्यक्ति की एकाग्रता शक्ति बढ़ेगी और वह कला, साहित्य और संगीत आदि जैसे क्षेत्र में तेजी से प्रगति करेगा। पढ़ाई में अत्यधिक मन लगेगा और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगे छात्रों के लिए भी यह अत्यंत लाभकारी है।

ये है नर्मदा नदी के अपने उद्गम स्थल से विपरीत दिशा में बहने की वजह

नर्मदा नदी का हिन्दू धर्म में महत्व

भारतीय समाज में नदियों को पूजे जाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। हम पूजा किये जाने का आधार धार्मिक मानें या वैज्ञानिक पर सच तो यही है कि हिन्दू परम्परा में नदियों को पूजने का अत्यधिक महत्व है। भारत जैसे देशों में वैज्ञानिक से ज्यादा धार्मिक आधार मान्य है। हम इसी धार्मिक आधार पर नर्मदा नदी से जुड़े कुछ रहस्यों को उजागर करेंगे।

मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा से जुड़े रहस्यों में सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि नर्मदा बाकी सभी नदियों के विपरीत उल्टी दिशा में बहती है। हिन्दू धर्म में जो स्थान गंगा को हासिल है वही स्थान नर्मदा को भी हासिल है। गंगा में डुबकी लगाने से यदि पुण्य की प्राप्ति होती है तो नर्मदा अविनाशी रूप धारण किये सभी पापों का नाश कर देती है। मत्स्य पुराण में इस बात का वर्णन है कि गंगा कनखल में और सरस्वती कुरूक्षेत्र में पुण्य प्रदान करती है पर नर्मदा की गिनती सर्वत्र पुण्य प्रदान करने वालों में शामिल है।

नर्मदा से जुड़े ऐसे ही कई रहस्य है जिनसे लोग आज तक अनजान है। आज हम उन्हीं रहस्यों का खुलासा करेंगे और आपको बताएंगे नर्मदा के उद्भव से लेकर उनके विवाह तक की पूरी कहानी। साथ ही इस बात से भी आपको अवगत कराएंगे कि आखिर क्यों नर्मदा से निर्मित होने वाले शिवलिंग रखते है इतना ख़ास महत्व।  

नर्मदा नाम कैसे पड़ा?

’नर्म ददाति‘ अर्थात् आनन्द या हर्ष पैदा करने वाली। नर्मदा एक ऐसी नदी है जो मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार को समाप्त कर हर्ष का सृजन करती है। देवताओं को हर्ष प्रदान करने के कारण रेवा का नाम नर्मदा पड़ा। 

नर्मदा को रेवा भी कहा जाता था जिसका अर्थ होता है कूदना। नर्मदा कई बड़ी चट्टानों और विशाल पर्वतों से छलांगे लगाती हुई आगे बढ़ती है इसलिए इसका नाम रेवा रखा गया। स्कंदपुराण में तो रेवा खंड पूरा का पूरा नर्मदा पर ही समर्पित है। वहीँ नर्मदा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह प्रवाह के साथ तटों से गुजरती हुई आनंद प्रदान करती है इसलिए यह नर्म-दा कहलाती है।   

नर्मदा नदी किसकी बेटी है?

पौराणिक कथाओं में दो कहानियां प्रचलित है जिनमें से पहली कहानी के अनुसार नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री बताया गया है।  ऐसा माना जाता है कि नर्मदा का जन्म तपस्या करते हुए भगवान शिव के स्वद से हुआ है। दूसरी कहानी के मुताबिक नर्मदा राजा मैखल की पुत्री हैं

आखिर नर्मदा नदी उल्टी दिशा में क्यों बहती है?

इस सवाल का जवाब नर्मदा नदी की प्रेम कहानी में मिलता है। राजकुमारी नर्मदा राजा मैखल की पुत्री थी। राजा ने अपनी अत्यंत सुन्दर पुत्री के लिए यह तय किया की जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प नर्मदा के लिए लेकर आएगा उसी से नर्मदा का विवाह तय किया जाएगा। 

कई सारे राजकुमार वह पुष्प लाने में विफल हुए जबकि सोनभद्र वह पुष्प ले आया। अतः राजकुमारी नर्मदा के साथ सोनभद्र का विवाह तय कर दिया गया। नर्मदा अब तक सोनभद्र से मिल नहीं पाई थी। लेकिन सोनभद्र के वीर और पराक्रम की कथाएं सुन नर्मदा के मन में सोनभद्र के प्रति प्रेम पनप ही गया।  

विवाह होने में कुछ ही दिन बाकी थे पर नर्मदा अभी से सोनभद्र से मिलने के लिए व्याकुल थी।  उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों एक प्रेम सन्देश सोनभद्र के पास भेजा। जुहिला सन्देश लेकर जाने के लिए तैयार तो हो गई लेकिन उसे ठिठोली सूझी और उसने नर्मदा से उसके वस्त्र  और आभूषण मांगे। फिर इसके बाद वह सोनभद्र से मिलने के लिए निकल पड़ी।  

जुहिला सोनभद्र के पास पहुंची तो वे जुहिला को ही राजकुमारी समझ बैठे। सोनभद्र का व्यवहार देख जुहिला की नीयत बिगड़ गई और वह राजकुमार सोनभद्र के प्रणय निवेदन को ठुकरा नहीं पाई। वहीँ सोनभद्र के सन्देश का बेसब्री से इंतज़ार कर रही नर्मदा विचलित हो उठी।  

अपनी व्याकुलता पर काबू न पाते हुए वह सोनभद्र से मिलने पहुंची। वहां पहुँचने पर सोनभद्र और जुहिला को साथ देख नर्मदा क्रोध में झुलस उठी। क्रोध में नर्मदा ने आजीवन कुंवारी रहने का प्रण लिया और उल्टी दिशा में चली गईं। यही कारण है नर्मदा उल्टी दिशा में बहती है।

कौन सा विशेष लक्षण नर्मदा नदी के लिए उपयुक्त है?

नर्मदा नदी का सबसे विशेष लक्षण है यहाँ से निर्मित होने वाले शिवलिंग जिन्हें Narmadeshwar Shivling के नाम से जाना जाता है। इसके पीछे एक कहानी काफी प्रचलन में है।

दरअसल पौराणिक काल में नर्मदा ने कठोर तपस्या के माध्यम से ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था। जब तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा ने Narmada से वरदान मांगने को कहा तो नर्मदा ने वरदान स्वरुप माँगा कि उसे भी गंगा के समान पवित्र होने का दर्जा दिया जाए।

यह सुन ब्रह्मा जी ने कहा कि यदि संसार में कोई ऐसा है जो भगवान शंकर या भगवान विष्णु की बराबरी कर पाए तो कोई और नदी भी गंगा के समान पवित्र हो सकती है। इन वाक्यों को सुन नर्मदा काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में Shivling की स्थापना कर तपस्या में लीन हो गईं। उनकी तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और नर्मदा से वरदान मांगने के लिए कहा।

नर्मदा ने वरदान में भगवान Shiva की भक्ति मांगी।  यह वरदान सुन भगवान शंकर ने कहा कि हे! नर्मदे तुम्हारे तट में आने वाले सभी पत्थर  शिवलिंग में परिवर्तित हो जाएँ। जिस प्रकार गंगा में स्नान कर पुण्य की प्राप्ति होती है उसी प्रकार नर्मदा नदी और इससे निकलने वाले पत्थर के दर्शन मात्र से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होगा। तभी से नर्मदा से निकलने वाला हर कंकर शंकर कहलाने लगा और इन्हें Narmadeshwar Shivling कहा जाने लगा। 

नर्मदा को मिले वरदान के कारण ही नर्मदेश्वर शिवलिंग का महत्व दोगुना हो जाता है। कहा जाता है कि यहाँ से निकले शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठा की भी आवश्यकता नहीं होती है। यह बगैर प्राण प्रतिष्ठा के अत्यंत शुभ फल प्रदान करता है। यदि आप इस पवित्र नर्मदेश्वर शिवलिंग को खरीदने के इच्छुक है तो यह हमारे पास उपलब्ध है। हमारी वेबसाइट prabhubhakti.in पर Buy Narmadeshwar Shivling Online.

नर्मदा नदी कहाँ से निकलती है और कहाँ तक जाती है?

नर्मदा नदी का उद्गम स्थल मध्य प्रदेश का अमरकंटक है और यह अपने उद्गम से पश्चिम की ओर आगे बढ़ती हुई खंभात की खाड़ी और अरब सागर में जा मिलती है। 

नर्मदा नदी की सहायक नदियां कौन कौन सी है?

वैसे तो छोटी बड़ी कुल 41 नदियां नर्मदा में गिरती है पर ऐसी कुल 19 प्रमुख नदियां है जिनमें हिरदन, टिन्डोनी, बारना, कोलार, मान, उरी, हथिनी, बर्नर, बंजर, शक्कर, दूधी, तवा, गंजाल, कुंदी, गोई आदि शामिल है।   

Do Durga Kavach Paath and Get the Blessings of Maa Durga

दुर्गा कवच क्या है? ( What is Durga Kavach? )

Durga Kavach का पाठ करने व्यक्ति को बहुत राहत मिलती है। जो माता दुर्गा में विश्वास करते हैं जो उनकी इष्ट देवी हैं उन्हें Shri Durga Kavach पाठ अवश्य ही करना चाहिए। बताते चलें कि दुर्गा कवच मार्कण्डेय पुराण का हिस्सा है। 

दुर्गा मां हमें बुरी परिस्थितियों से लड़ने का साहस प्रदान करती हैं। मां दुर्गा कवच स्थापित करते ही व्यक्ति के आसपास के आभामंडल में एक सुरक्षा कवच बन जाता है। इस को कई नामों जैसे भगवती कवच, Durga Saptashati Kavach, Durga raksha Kavach आदि नामों से जाना जाता है। 

दुर्गा कवच के लाभ ( Durga Kavach Benefits )

आइये जानते हैं Durga Kavach Benefits in hindi :

1. दुर्गा कवच व्यक्ति की असुरी शक्तियों से रक्षा प्रदान करता है।  
2. व्यक्ति के सभी रोगो से सरंक्षण करता है।  
3. सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाने में सहायक है।  
4. यह हमारे बाहरी और आंतरिक अंगों की रक्षा करता है।  
5. दुर्गा सप्तशती का कवच पाठ किये जाने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 

दुर्गा कवच का पाठ कैसे करें? ( How to do Durga Kavach Paath? )

1. दुर्गा रक्षा कवच पाठ करने के लिए सबसे अच्छा दिन शुक्रवार माना जाता है।  
2. इसके लिए प्रातःकाल स्नान कर दुर्गा मां की प्रतिमा को रखें और उसपर गंगाजल से छिड़काव करें।  
3. इसके पश्चात देवी के समक्ष फल और लाल रंग का फूल अर्पित करें।
4. फिर माता के सामने धूप और घी का दीपक जलाएं।
5. इसके बाद दुर्गा मां के बीज मंत्र का 11 बार जाप करें।
6. मंत्र का जाप करने के बाद ध्यान लगाकर भगवती दुर्गा कवच का पाठ करना चाहिए।  

माँ दुर्गा की कहानी ( Who is Maa Durga? )

देवी महात्मय को दुर्गा सप्तशती ( Durga Saptashati ) के नाम से भी जाना जाता है। देवी भागवत पुराण में इस बात का वर्णन मिलता है कि देवी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति है। देवी दुर्गा बहुत ही गंभीर और क्रोधित प्रवृति की हैं। इन्हें बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है। अब जानते हैं देवी दुर्गा के जन्म की पौराणिक कथा। [source]

जब देव और मानव दोनों लोक असुरों के अत्याचार से तंग आ गए तो उन्होंने ब्रह्मा जी की ओर रुख किया। सभी देवता गण ब्रह्मा जी के पास पहुँच असुरी शक्ति के खात्मे की बात कहने लगे। ब्रह्मा जी ने समाधान के रूप में यह कहा कि इसका नाश केवल कुंवारी कन्या ही कर सकती है। इस तरह से सभी देवताओं ने मिलकर एक शक्ति का निर्माण किया।

शक्ति का मुख भगवान शिव ( Bhagwan Shiv ) के तेज से बना। उनकी भुजाएं भगवान विष्णु के तेज से निर्मित हुई। इसके बाद ब्रह्मा जी के तेज से माता के दोनों चरण बने। यमराज के तेज से माथा और केश, चन्द्र देव के तेज से स्तन निर्मित हुए। वरुण देव के तेज से जाँघे, सूर्य देव के तेज से उंगलियां तथा अग्नि देव के तेज से आँखें निर्मित हुई। 

इस शक्ति का नाम रखा गया देवी दुर्गा। इन्हीं दुर्गा के नौ रूपों की नवरात्रों के दौरान पूजा- अर्चना की जाती है। यह वही शक्ति हैं जिन्होंने रक्तबीज, चण्डमुण्ड और महिषासुर का वध किया था। [source]

माँ दुर्गा की पूजा कैसे करें? ( How to Worship Maa Durga? )

आइये जानते हैं माँ दुर्गा की पूजा विधि ( How to do Simple Durga Puja at Home ) :

1. दुर्गा माता की पूजा करने के लिए सबसे शुभ दिन शुक्रवार माना गया है।
2. इस दिन माता को लौंग, लाल फूल(गुलाब), नारियल, सुपारी आदि चढ़ानी चाहिए।  
3. सुबह दुर्गा मां की प्रतिमा को सामने रखें और देवी के समक्ष धूप व घी का दीपक जलाएं।
4. शुक्रवार के दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना बहुत ही शुभ माना जाता है।  
5. देवी को भोग स्वरुप खीर अर्पित करनी चाहिए।  

दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे करें? ( How to do Durga Saptashati Path? )

चलिए जानते हैं How to read Durga Saptashati daily :

1. दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए घर में किसी शांत जगह की तलाश करें।
2. उस स्थान पर आसन लगाएं और देवी की प्रतिमा को अपने सामने रखें।  
3. फिर धूप और दीपक जलाएं।  
4. इसके पश्चात आसन पर बैठकर माता का ध्यान करते हुए दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।  

दुर्गा यन्त्र बनाने की विधि ( How to Draw Durga Yantra? )

1. यन्त्र एक ख़ास प्रकार की ज्यामितीय आकृतियों से बना होता हैं।  
2. इसमें एक केंद्र होता है और उसके आसपास 9 प्रकार के त्रिकोण खाने होते हैं।  
3. इसे बनाने के लिए अनार की कलम और अष्टगंध की स्याही का प्रयोग करें।  
4. इस यन्त्र के हर एक खाने में 1 से 9 तक अंक लिखें।  
5.  यन्त्र के केंद्र में  ‘दुं’ लिखें और यंत्र के तीन ओर ‘ऊं दुं दुं दुं दुर्गायै नम:’ मंत्र लिखें।  
6. इसके बाद यन्त्र की षोडशोपचार पूजा करते हुए सप्तशती के श्लोकों से इसे सिद्ध करें।  

नीचे दुर्गा मां को प्रसन्न करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण मंत्रो का उल्लेख किया गया है :

मां दुर्गा का गायत्री मंत्र

ॐ महादेव्यै विह्महे दुर्गायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ।।

माँ दुर्गा का सबसे शक्तिशाली मंत्र

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

माँ दुर्गा का मंत्र

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते
।।

दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र

सर्वकल्याण के लिए दुर्गा मंत्र
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥


बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि मंत्र

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भव‍िष्यंति न संशय॥


आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के चमत्कारिक मंत्र

देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥


विपत्ति नाश के लिए मंत्र

शरणागतर्द‍िनार्त परित्राण पारायणे।
सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥

Durga Kavach Stotra (श्री दुर्गा कवच स्तोत्र)

दुर्गा कवच की शक्तियों के बारे में मार्कण्डेय पुराण में वर्णन मिलता है।
ब्रहदेव ने इस बारे में कहा कि जो व्यक्ति दुर्गा सप्तशती का पाठ नियमित तौर पर करेगा उसे सुख मिलेगा।
पुराण में उल्लेख है कि मानव जाति के कल्याण के लिए यह कवच अत्यंत आवश्यक है।

Shani Yantra Reduces the Bad Effects of Shani Sade Sati Phase

शनि यंत्र क्या है? ( What is Shani Yantra? )


Shani Yantra कुंडली में प्रकट होने वाले ग्रह दोषो के निवारण के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह अत्यधिक प्रभावशाली उपाय है। यदि शनि जातक की कुंडली में अशुभ फल दे रहा है तो यह यन्त्र प्रयोग में लाया जाता है। 

बता दें कुंडली में इसके प्रभावों को कम करने के लिए शनि यन्त्र एक रामबाण उपाय के तौर पर देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इस बात का उल्लेख है कि यदि यह शुभ फल प्रदान कर रहा है तब भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। आइये जानते है शनि यन्त्र के अद्भुत फायदों के बारे में : 

शनि यंत्र के लाभ ( Shani Yantra Benefits in hindi )


1. Shani Yantra के प्रयोग से शुभ फल भी अत्यधिक मिलेगा। यह लाभ को दोगुना करना का कार्य करता है। 

2. शनि की साढ़े साती और ढैय्या के प्रभाव कम करने के लिए इसका प्रयोग होता है। इसके माध्यम से काफी हद तक अशुभ फलों को कम किया जा सकता है।  

3. Yantra के प्रभाव से जातक दीर्घायु और अच्छा स्वस्थ्य प्रदान करता है।  

4. व्यापार के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए यह बहुत लाभकारी है।  

5. प्राचीन काल से ही कई ज्योतिष विद्वान काले जादू और वशीकरण के प्रभाव को कम करने के लिए इसका प्रयोग करते हैं।  

6. आध्यात्मिक कार्यों में लगे लोगों के लिए यह यन्त्र बहुत फलदायी है। यह अनुशासन, एकाग्रता और आदर्श जैसे गुण प्रदान करता है।  

7. Shani Yantra इतना अधिक शक्तिशाली है कि यह बड़े प्रभुत्वशाली पद की प्राप्ति कराता है।
  
8. ध्यान रखने योग्य बात यह है कि बिना प्राण प्रतिष्ठा के यन्त्र का कोई लाभ नहीं होता है।

शनि यंत्र स्थापना विधि ( How to Place Shani Yantra? )


1. ShanI Yantra स्थापना के लिए शनिवार के दिन प्रातःकाल स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. इसके बाद शनि यन्त्र को शनिदेव की प्रतिमा के साथ रखें और उसपर गंगाजल छिड़कें।
   
3. दीपक और धूप जलाकर शनि के समक्ष फल-फूल अर्पित करें।  

4. तत्पश्चात शनि बीज मंत्र जाप 11 या 21 बार करें। 
 
5. इस विधि का पालन करते हुए Shani Yantra की स्थापना की जानी चाहिए। 

शनि यन्त्र लॉकेट क्या है? ( What is Shani Yantra Locket? )


Shani Yantra के अलावा जातक शनि यन्त्र लॉकेट धारण कर सकते हैं। शनि यन्त्र लॉकेट को धारण करने से यह कई प्रकार के रोगों से व्यक्ति की रक्षा करता है। जिस प्रकार एक यन्त्र वातावरण का शुद्धिकरण करता है। दोषों से मुक्ति दिलाता है उसी प्रकार Shani Yantra रुपी लॉकेट व्यक्ति के शरीर का शुद्धिकरण करता है। यह शरीर के दोषों का खात्मा करता है। आइये जानते हैं इसके लाभों के बारे में :

Shani Yantra Locket Benefits in hindi


1. Shani Yantra लॉकेट व्यक्ति को लम्बी आयु प्रदान कर रोगों से रक्षा करता है।  

2. अकाल मृत्यु के भय को कम करता है।  

3. यह जातकों को अनुसाशन, आदर्शवाद और एकाग्र क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।  

4. काले जादू और वशीकरण से सरंक्षण करता Shani Yantra है।  

How to wear a Shani Dev Locket?


1. Shani Yantra लॉकेट को धारण करने के सबसे शुभ दिन शनिवार है।  

2. शनिवार को प्रातःकाल स्नान कर शनिदेव की प्रतिमा के आगे तेल का दीपक जलाएं।  

3. शनि आरती का पाठ करते हुए लॉकेट को शनिदेव के समक्ष अर्पित करें।  

4. उसके बाद ही इस Shani Yantra लॉकेट को धारण करें।  

5. इस तरह शनिदेव की कृपा सदैव जातक पर बनी रहेगी। 

Why is Shanidev black?


पौराणिक कथाओ के अनुसार राजा विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य देव के तेज के कारण संध्या भय में रहती थी। सूर्य देव और संज्ञा की वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संताने हुई। तीन संताने होने के बावजूद संज्ञा का तेज को लेकर भय कम नहीं हुआ था।

इसके समाधान के रूप में संज्ञा ने अपनी छाया को जन्म दिया। फिर वह अपने बच्चों की देखभाल के लिए छाया को छोड़कर अपने पिता के घर चली गई। संज्ञा का यह रूप छाया था और इसके कारण उसे सूर्य के तेज से भी कोई परेशानी नहीं थी।
धर्म ग्रंथों में इस बात का जिक्र है कि जब shani dev छाया के गर्भ में थें, उस वक़्त छाया भगवान शिव की भक्ति में लीन हो गई थी। छाया अपनी भक्ति में इतनी अधिक मग्न थी कि उन्हें खाने पीने तक की सुध न रही। इसका प्रभाव शनिदेव पर पड़ा और उनका रंग काला पड़ गया। बता दें कि शनिदेव के वाहन 9 है जिनमें कौआ, गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, सियार, शेर, हिरण, मोर और हाथी है।

शनिदेव के दृष्टि डालते ही सूर्य देव पड़े काले

Lord Shanidev के वर्ण को देख सूर्य देव को संदेह हुआ और उनहोंने शनिदेव को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया कर दिया। छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी और उनकी तपस्या की सारी शक्ति शनिदेव में पहुँच चुकी थी। 

अपने पिता के यह शब्द सुन वे क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपनी दृष्टि सूर्य देव पर डाली। दृष्टि डालते ही सूर्य देव काले पड़ गए। अपना यह हाल देख सूर्य देव भगवान शंकर की शरण में पहुंचे। 

भगवान शंकर ने सूर्य देव को उनकी गलती का एहसास कराया। फिर क्षमायाचना के बाद जाकर सूर्य देव पुरानी स्थिति में आये। लेकिन इस घटना के बाद से ही शनिदेव को पिता विरोधी कहा जाता है। शनि देव न्याय के देवता कहे जाते हैं। यही देवता सभी को उनके कर्मों के आधार पर न्याय दिया करते हैं। [source

How to Worship Shani Dev on Saturday?


1. शनिवार को प्रातःकाल स्नान कर शनिदेव की प्रतिमा के आगे सरसो के तेल का जलाएं।  

2. साथ ही शनि भगवान को आक के फूल अर्पित करें।

3. भोग स्वरुप मीठी पूड़ी, काला तिल आदि अर्पित करें।  

4. इसके बाद शनिदेव की आरती और चालीसा का पाठ भी अवश्य करें।   

5. संभव हो तो शनि महाराज के मंत्र का ध्यानपूर्वक 108 बार जाप करना चाहिए।
  
6. इस विधि का हर शनिवार पालन किये जाने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

शनि व्रत कथा ( Shani Vrat Katha )


शनि महाराज की कथा में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में झगड़ा हुआ। विवाद यह कि हम में सर्वश्रेष्ठ कौन है? इसके लिए वे इंद्रदेव के पास गए और कहा कि न्याय करो हम में बड़ा कौन है?यह सवाल सुन इंद्र देव चिंता में आ गए।  

उन्होंने कहा कि मेरे अंदर इतना सामर्थ्य नहीं जो किसी को बड़ा या छोटा बताऊँ। एक उपाय है कि आप सब राजा विक्रमादित्य के पास जाएँ वे लोगों के दुखो का निवारण कर न्याय दिलाते हैं।  यह सब सुन सभी नवग्रह राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे और अपना प्रश्न राजा के सामने रखा। 
 
राजा भी यह प्रश्न सुन चिंतित हो उठे और हल तलाशने में जुट गए। उन्होंने उपाय के तौर पर सोना, चांदी, कांसा, पीतल, शीशा, रांगा, जस्ता अभ्रक और लौह इन 9 धातुओं के 9 आसन बनवाये। इन आसनों को उनके धातुओं के क्रम वार तरीके से रख दिया गया। 

जिसमें सबसे पहला स्थान सोने का उसके बाद चांदी और इसी क्रम में सभी आसन रखे गए। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने सब ग्रहों से कहा कि आप सब अपने अपने सिंहासन पर विराजमान हो जाएँ।  

जब राजा के न्याय से शनिदेव हुए क्रोधित

Shani Dev ki Katha : जिसका आसन सबसे आगे है वह सबसे बड़ा और जिसका आसन सबसे पीछे है वह सबसे छोटा होगा। क्रमवार आसन में लोहे का स्थान सबसे पीछे था और वह शनिदेव का आसन था। यह देख शनिदेव को ज्ञात हो गया कि राजा ने उन्हें सबसे छोटा बतलाया है। 

इसपर शनिदेव क्रोधित हो उठे और उन्होंने कहा कि राजा तू मेरे पराक्रम को नहीं जानता, सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति 13 महीने, बुध और शुक्र एक महीना, पर मैं एक राशि पर ढाई अथवा साढ़े सात साल तक विराजमान रहता हूँ। 

बड़े से बड़े देवताओं को भी मैंने अत्यधिक दुःख दिया।  राम को साढ़ेसाती आई तो उन्हें वनवास हो गया और रावण की आई तो रावण के कुल का नाश हो गया। अब तुम सावधान रहना! यह सुन राजा ने कहा जो कुछ भाग्य में होगा देखा जाएगा।  यह कहकर शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से गए।  

विक्रमादित्य की साढ़े साती की दशा

शनिदेव की कथा : कुछ समय बाद राजा को साढ़े साती की दशा आई। शनिदेव उस समय घोड़ों के सौदागर बनकर अनेक सुन्दर घोड़ो सहित राजा की राजधानी में आये।  जब राजा ने सौदागर के आने की खबर सुनी तो उन्होंने अश्वपाल को अच्छे घोड़ों को लेने का आदेश दिया। घोड़ों की कीमत बहुत ज्यादा थी, अश्वपाल ने जाकर यह सारी व्यथा राजा को कह सुनाई। 

राजा वहां पहुंचें और उन्होंने उसमें से सबसे उत्तम घोड़ा चुनकर उसपर सवार हो गए। घोड़े पर सवार होते ही घोड़ा जोर से भागा। घोड़ा बहुत दूर एक घने जंगल में राजा को छोड़कर कहीं दूर चला गया। इसके बाद राजा अकेले घने जंगल में भटकता रहा। भूख- प्यास से व्याकुल राजा को एक ग्वाला दिखा जिसमें राजा को जल दिया। जल पीकर राजा ने अपनी अंगूठी ग्वाले को भेंट स्वरुप दी।

सेठ का हार चोरी करने का वीका पर आरोप

शनि देव कथा : राजा शहर में पहुंचकर एक सेठ की दुकान में जाकर बैठ गया और उसने खुद को उज्जैन का रहने वाला वीका बताया। उस दिन भाग्यवश सेठ की बिक्री अधिक हुई थी। तब सेठ उसको वीका को भाग्यवान समझकर अपने साथ ले गया।  राजा ने आश्चर्य की बात देखी कि खूँटी पर हार लटक रहा है और वह खूँटी उस हार को निगल रही है। 

जब सेठ को कमरे में हार न मिला तो सब ने यही निश्चय किया कि सिवाय वीका के इस कमरे में कोई नहीं आया। अतः उसने ही हार को चोरी किया है। हार चुराने के जुर्म में वीका को फौजदार के पास ले जाया गया। वहां पर वीका के सजा के तौर पर हाथ पैर काट दिए गए। 

इस तरह वीका चौरंगिया हो गया। इसके बाद कुछ समय बाद एक तेली चौरंगिया को अपने घर ले गया और उसे एक कोल्हू पर बैठा दिया। वीका उस कोल्हू पर बैठकर जबान से बैल हांकता रहा। इस तरह शनि की दशा खत्म हुई।

राग सुन चौरंगिया पर मुग्ध हुई राजकुमारी

Shani Dev Vrat Katha : इसके बाद एक रात को वर्षा ऋतू के समय वीका मल्हार गाने लगा।  यह गाना सुन उस शहर के राजा की कन्या उसपर मोहित हो उठी।  उसने दासी को गाने वाले का पता लगाने के लिए भेजा।  दासी शहर में घूमती रही और अंत में जाकर उसे तेली के घर में एक चौरंगिया राग गाता हुआ दिखाई दिया। 

दासी ने यह सब वृतांत राजकुमारी को कह सुनाया।  यह सुन राजकुमारी ने उसी क्षण यह प्रण लिया कि वह उसी चौरंगिया से विवाह करेगी। यह सब सुन कन्या के माता पिता बहुत दुखी हुए परन्तु राजकुमारी की हठ के आगे राजा की एक न चली और राजकुमारी का विवाह चौरंगिया से करा दिया गया।  

राजा विक्रमादित्य को शनिदेव का स्वप्न

Shani katha : रात्रि को जब विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये तब शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न दिया।  उस वक़्त विक्रमादित्य ने शनिदेव से अपने किये की क्षमा मांगी और शनिदेव के सामने प्रार्थना की। प्रार्थना करते हुए विक्रमादित्य ने कहा कि हे! शनिदेव जैसा दुःख आपने मुझे प्रदान किया है ऐसा दुःख अन्य किसी को भी न दें।

शनिदेव ने कहा कि तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार है।  जो भी मनुष्य मेरी कथा सुनेगा या कहेगा, जो नित्य ही मेरा ध्यान करेगा और चींटियों को आटा डालेगा। उसके ऊपर मेरा प्रकोप होने के बावजूद कोई दुःख नहीं होगा।  साथ ही उस व्यक्ति के सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। यह कहते हुए शनिदेव ने राजा विक्रमादित्य को माफ़ कर दिया।  इस तरह विक्रमादित्य के हाथ पैर लौटा दिए गए।

चौरंगिया से फिर विक्रमादित्य रूप में आये राजा

Shanivar Vrat Katha : सुबह होते ही राजकुमारी राजा को देख आश्चर्यचकित हो गई। राजा विक्रमादित्य ने रानी को यह सब वृतांत कह सुनाया। फिर रानी ने अपनी सखी को यह सब कहानी बताई। यह वृतांत सेठ के कान तक पहुंचा। सेठ दौड़ा-दौड़ा राजा विक्रमादित्य के पास आया और अपने किये की माफ़ी मांगने लगा। 

राजा ने विक्रमादित्य को कहा कि मुझपर शनिदेव का दोष था जिस कारण मैंने यह दुःख भोगा। इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं। सेठ बोला कि मुझे तभी शान्ति होगी जब आप प्रीतिपूर्वक भोजन करेंगे।  

इसके बाद वह सेठ राजा को अपने घर ले गया। जहाँ राजा विक्रमादित्य को भोजन करते समय फिर से वहीँ खूँटी दिखाई दी जो हार को उगल रही थी। यह देख सेठ को हार मिल गया और उसने राजा को बहुत सारी भेंट दी। इसी के साथ सेठ ने कहा कि मेरी कन्या का पाणिग्रहण आप करें। इसके बाद सेठ ने अपनी कन्या का विवाह राजा के साथ कर दिया और बहुत दान-धन, हाथी-घोड़े भी दिए।  कुछ दिन के बाद दोनों राजकुमारियां और राजा विक्रमादित्य अपनी सेना लेकर अपने राज्य की ओर चले।  

Shaniwar ki katha : राजा के आगमन की खबर सुन उज्जैन के सब लोग ख़ुशी से झूम उठे। अपने राज्य पधारने के बाद राजा ने अपने राज्य में यह सूचना दी कि शनि देवता सभी ग्रहों में सर्वोपरि है। मैंने उनको छोटा बतलाया जिसके कारण मैंने अनेक दुःख झेले। इस तरह राज्य में हर शनिवार को पूरे राज्य में शनिदेव की पूजा अर्चना की जाने लगी।

राहु-केतु और शनि को प्रसन्न करने के खास उपाय 


शनि दोष के उपाय :

1. शनि से जुड़े दोषों को समाप्त करने के लिए शनि यन्त्र को स्थापित करना चाहिए। यह सबसे सर्वोत्तम उपाय है।  
 
2. हर शनिवार को कुत्ते को रोटी खिलानी चाहिए और दान करना चाहिए।  

3. शनिवार के ही दिन बरगद के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इससे दोषों की समाप्ति होती है यदि यह क्रिया नियमित तौर पर चलें।  

4. शनि बरगद के पेड़ के साथ ही शमी के पेड़ की भी पूजा करने से शनि दोष की समाप्ति होती है।   

राहु के प्रकोप को कम करने के उपाय


1. राहु को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।

2. उसके बाद नीचे दिए गए राहु मंत्र का भी जाप करना चाहिए।
राहु मंत्र –

ह्रीं अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:।
ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु प्रचोदयात्।


3. रात्रि को सोते समय अपने सिरहाने पर जौ रखें जौ के दानों को दान करें।

4. पक्षी जैसे चिड़िया को दाना खिलाने से राहु का प्रकोप दूर होता है।  

केतु का प्रकोप कम करने का उपाय


1. केतु को प्रसन्न करने के लिए भगवान गणेश की पूजा की जानी चाहिए।

2. इसके बाद नीचे दिए मंत्र का जाप करें।

केतु मंत्र –

”ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम।।
ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:।
ॐ पद्मपुत्राय विद्‍महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात्।”


3. बताते चलें राशि में केतु के प्रभाव को कम करने के लिए कुत्ते को पालना भी अच्छा माना जाता है।  

शनि देव को कैसे प्रसन्न करें?


1. शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए हर शनिवार को व्रत करें और पूजा पाठ करें।  

2. शनि पूजा में सिन्दूर, काली तिल्ली का तेल का दीपक जलाएं और नीले रंग के फूल अर्पित करें। 
 
3. हर शनिवार शनि महाराज के 10 नामों को दोहराते हुए पूजा करनी चाहिए। 
   
4. शनि देव को काला वस्त्र और काला तिल चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं।   

5. शनि मंत्र जाप खासकर बीज मंत्र का 108 बार जाप करने से जातकों पर शनि की असीम कृपा बरसती है।  

नीचे शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण मंत्रो का उल्लेख किया गया है :

शनि बीज मंत्र

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

श्री शनि वैदिक मंत्र

ऊँ शन्नोदेवीर-भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः।

शनि देव का जाप मंत्र

ॐ शं शनैश्चराय नमः।

Shani Tantrik Mantra

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

Shri Shani Dev ki Aarti

Shri Shani Chalisa

Shani Dev Stotra

शनि की ढैय्या क्या है?

शनि की ढैय्या का अर्थ है जब शनि की दशा जातक की राशि में ढाई साल तक रहती है। इस दौरान व्यक्ति को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह समस्याएं सेहत से जुड़ी, जॉब, व्यवसाय और धन से जुड़ी हो सकती है। 
  

शनि की साढ़े साती कितने समय की होती है?

जब चंद्र राशि से शनि 12वें, पहले और दूसरे भाव में रहता तो उसे साढ़ेसाती अवधि कहते है। यह अवधि साढ़े सात साल की होती है। इसके तीन चरण होते हैं, जिसमें से तीसरे चरण खत्म होते-होते यह व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करने लगता है।
जब शनिदेव चंद्र राशि पर गोचर से अपना भ्रमण करते हैं तो उस समय साढेसाती मानी जाती है। इसका प्रभाव राशि में आने के 30 माह पहले से और 30 माह बाद तक रहता है।  

शनि देव को क्या-क्या चढ़ाया जाता है?

शनि महाराज को सरसों का तेल, काला तिल, काले वस्त्र व काले रंग की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। यह सभी सामग्री यदि शनिवार के दिन शनिदेव को चढ़ाई जाएँ तो शुभ फल की प्राप्ति होती है।  

शनि के चमत्कारी उपाय कौन-2 से हैं?

1. नियमित रूप से शिव सहस्त्रनाम का पाठ करने से शनि का प्रकोप खत्म हो जाता है।  
2. यदि जातक शनि की ढैय्या या साढ़े साती की दशा से गुजर रहा है तो व्यक्ति को शमी के पेड़ की जड़ को एक काले कपड़े में गाँठ बांधकर दाहिने हाथ में बांधे।  साथ ही शनि मंत्र जाप करें।    

3. कुंडली में शनि के प्रकोप को कम करने के लिए हर रोज सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। इससे व्यक्ति के सभी दोष दूर हो जाते हैं।  

4. शमी के पेड़ की पूजा करने से भी शनि का प्रकोप दूर होता है।  

5. अपने मां बाप और घर के बड़े बुजुर्गों का आदर सम्मान और सेवा करने से शनिदेव की कृपा होती है।        

शनिदेव का भोग क्या होना चाहिए?  

शनिदेव का सबसे प्रिय भोग उड़द की दाल की खिचड़ी है। साथ ही शनि महाराज को मीठी पूड़ी और काले तिल भी चढ़ाए जाते है।   

शनिदेव को क्या पसंद है?

शनिदेव को आके के फूल और सरसो का तेल भी बहुत पसंद है।  शनिवार के दिन ये दोनों चीजे अर्पित करते हुए शनिदेव की पूजा की जानी चाहिए। इससे जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है।  

शनि ग्रह का रंग कैसा होता है?

वैसे तो शनि ग्रह रंग काला बताया गया है लेकिन कहीं कहीं पर नीला रंग भी शनि का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक शनि का काला रंग यानी नाइट्रोजन (N2) के कारण है। 

शनिदेव की माता का नाम क्या है?

शनिदेव की माता का नाम छाया है जो कि विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा की छाया थीं। इन्हीं के गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ था।  

Who is Wife of Shanidev?

शनिदेव की पत्नी का नाम नीलिमा और दामिनी है। दरअसल उनकी दो पत्नियां हैं नीलिमा उनकी शक्ति है।  वहीँ दामिनी ने शनिदेव को उनपर ध्यान न देने के कारण श्राप दिया था। श्राप यह कि आप जिसपर भी अपनी दृष्टि डालोगे वह नष्ट हो जाएगा। यही वजह है शनिदेव सदैव अपनी दृष्टि नीचे झुकाकर रखते हैं।    

This is How You Can Worship Shaligram Stone and Get Lord Vishnu Blessings

शालिग्राम पत्थर (शिला) क्या है? (What is Shaligram Stone in Hindi)

शालिग्राम वैसे तो एक शिला है लेकिन हिन्दू धर्म में इसे शिला की संज्ञा नहीं दी गई। शालिग्राम भगवान का एक रूप है जिसे पूजने की प्रथा है। शालिग्राम नदी के किनारे ही मिलता है। शालिग्राम भगवान विष्णु का निराकार रूप है। जैसे शिवलिंग भगवान शिव का निराकार रूप है।

वैष्णव लोग गंडकी नदी के निकट पाए जाने वाले शालिग्राम को पूजते हैं। बात करें कि शालिग्राम का मतलब क्या है? तो शालिग्राम का अर्थ है एक पत्थर। पद्मपुराण के मुताबिक गण्डकी यानी नारायणी नदी के पास एक प्रदेश है। 

जहाँ शालिग्राम नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; इसी जगह से Shaligram Stone निकलता है। शालिग्राम को अमोनाइट जीवाश्म कहा जाता है। आइये अब आपको बताते हैं शालिग्राम कितने प्रकार के होते हैं……     

Types of Shaligram

  1. सुदर्शन शालिग्राम (1 विष्णु चक्र)
  1. लक्ष्मीनारायण शालिग्राम (2 विष्णु चक्र)
  1. अच्युत शालिग्राम (3 विष्णु चक्र)
  1. जनार्दन शालिग्राम (4 विष्णु चक्र)  
  1. वासुदेव शालिग्राम (5 विष्णु चक्र)
  1. प्रद्युमन शालिग्राम (6 विष्णु चक्र)
  1. शंकरशन शालिग्राम (7 विष्णु चक्र)
  1. पुरुषोत्तम शालिग्राम (8 विष्णु चक्र)
  1. नवव्यूहा शालिग्राम (9 विष्णु चक्र)
  1. दशावतार शालिग्राम (10 विष्णु चक्र)
  1. अनिरुद्ध शालिग्राम (11 विष्णु चक्र)
  1. अनंत शालिग्राम (12 विष्णु चक्र)
  1. परमात्मा शालिग्राम (13 विष्णु चक्र)
  1. परमात्मा शालिग्राम (13 विष्णु चक्र)

इस तरह कुल 33 different types of Shaligram बताये गए हैं। जिसमें से 24 विष्णु के विभिन्न अवतार से जुड़े हैं।  

Shaligram Stone Benefits

शालिग्राम के फायदे(Shaligram Stone Benefits) अनेक हैं जिनका जिक्र यहाँ किया गया है :

1. शालिग्राम को केवल स्पर्श करने से ही व्यक्ति के जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।  

2. जो कुछ भी शालिग्राम के संपर्क में आता है वह अपने आप शुद्ध हो जाता है।  (पद्म पुराण)

3. जीवन की अंतिम यात्रा शालिग्राम के सामने से निकाली जाये तो व्यक्ति को वैकुण्ठ धाम प्राप्त होता है।  (पद्म पुराण)

4. जो भी जातक सच्चे मन से शालिग्राम की पूजा-अर्चना करते हैं वह निर्भीक बनते हैं।   

5. पद्म पुराण के अनुसार शालिग्राम दान में देना सबसे सर्वोत्तम हैं। यह वनों, पहाड़ों और समस्त पृथ्वी को दान करने के बराबर है।

6. ऐसा कहा जाता है कि जहां 108 शिलाओं को रख पूजा होती है, वह स्थान ‘वैकुंठ’ बन जाता है। (गरुड़ पुराण)

7. व्यक्ति को हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल होती है। यह सभी shaligram pendant benefits में से एक है। [source]

शालिग्राम की स्थापना कैसे करें?

1. शालिग्राम स्वयंभू माना जाता है इसलिए इसे स्थापित करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती।  

2. शालिग्राम को स्थापित करने के समय तुलसी का होना अनिवार्य है। बगैर तुलसी के शालिग्राम की पूजा अधूरी है।  

3. स्थापना के लिए शालिग्राम पर सर्वप्रथम चन्दन लगाएं।

4. फिर उसे स्नान कराएं और तुलसी अर्पित करें।  

5. इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए नैवेद्य अर्पित करें।  
6. नियमित रूप से शालिग्राम पर जल चढ़ाने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य मिलता है।  

How to do Shaligram Puja at home?

आपको बताते हैं how to worship shaligram :

1. पूर्व और उत्तर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।  

2 . शालिग्राम को गंगाजल से स्नान कराएं।  फिर पंचगव्य और दोबारा गंगाजल से स्नान कराएं।  

3 . ऐसा माना जाता है कि स्नान किया हुआ जल अमृत के समान होता है।  इसे पीने से कई तरह की बीमारी खत्म हो जाती हैं।  

4 . शालिग्राम को किसी थाल, पीपल के पत्ते या फिर किसी कपड़े पर रखें।  

5. इसके पश्चात घी का दीपक जलाएं।  

6.  शालिग्राम पर चन्दन का लेप लगाएं।  

7. शालिग्राम के आस-पास तुलसी माला लगाएं और तुलसी के पत्ते भी अर्पित करें।   

8.  दीपक को एक गोलाकार में एक घड़ी की दिशा में घुमाते हुए आरती करें।  

9. इन सभी के बाद नीचे दिए गए मंत्र को 9 बार दोहराएं।  

“ध्येय सदा सवित्र मंडल मध्यवर्ती , नारायण सर सुसज्जितासान सन्निविष्ठ:

केयूरवान मकर कुण्डलवान किरीटी , हारी हिरण्यमय वपुधृत शंख चक्र :”।।

हरे राम, हरे राम, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, हरे हरे!

10. मंत्र जाप के बाद दूध, फल, मिठाई और नारियल शालिग्राम को अर्पित करें।

11 . ध्यान रहे यदि एक से ज्यादा शालिग्राम की पूजा की जा रही है तो वह संख्या सम होनी चाहिए।

Who is Shaligram?

वृषध्वज नामक एक राजा को भगवान सूर्य ने गरीबी का श्राप दिया था।  इसका कारण था राजा वृषध्वज की भगवान शिव के अलावा किसी अन्य देवता की पूजा न करना।

अपना खोया राजपाठ वापस लाने के लिए उनके दोनों पोतों ने तपस्या करने की ठानी। धर्मध्वज और कुशध्वज ने माता लक्ष्मी को तपस्या के माध्यम से प्रसन्न किया।

तपस्या से प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उन्हें बेटियों के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। उसके बाद लक्ष्मी ने कुशध्वज की पुत्री वेदवती और धर्मध्वज की पुत्री वृंदा के रूप में जन्म लिया।  

वृंदा जो बाद में तुलसी बनी

वृंदा भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में पाने के लिए तपस्या करने बदरिकाश्रम गईं।  लेकिन ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि उन्हें इस जीवन में भगवान विष्णु पति के रूप में नहीं मिलेंगे। बल्कि उन्हें शंखचूड़ नाम के दानव से शादी करनी होगी।

शंखचूड़ ने वृंदा से विवाह के बाद देवों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। जिसमें शंखचूड़ और उसके दानवों की जीत हुई। बाद में विजयी दानवों द्वारा देवों को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया गया।

शंखचूड़ से परेशान देवता विष्णु के पास पहुंचे

पराजित हुए सभी देवता भगवान विष्णु के पास समाधान के लिए पहुंचे।  जहाँ भगवान विष्णु ने बताया कि शंखचूड़ को भगवान शिव द्वारा मारा जाना तय है।  इसके बाद देवताओं के अनुरोध पर, भगवान शिव ने शंखचूड़ के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

इस युद्ध में कोई भी पक्ष एक-दूसरे को परास्त न कर सका। युद्ध के दौरान एक निर्जीव आवाज ने भगवान शिव को एक जानकारी दी।  वो यह कि भगवान ब्रह्मा के वरदान से, शंखचूड़ युद्ध में अजय है। जब तक कि उसने अपना कवच पहना है और वृंदा का सतीत्व अखंडित है।

इसलिए भगवान विष्णु ने सबसे पहले साधु का भेष धारण कर कवच दान में लिया। इसके बाद शंखचूड़ का भेष धारण कर वृंदा का सतीत्व खंडित कर दिया।  इस प्रकार वृंदा की पवित्रता भंग हुई। अंततः भगवान शिव के त्रिशूल से शंखचूड़ का वध हुआ।  

How did the Shaligram form?

वृंदा का त्यागा शरीर गंडकी नदी में तब्दील हो गया।  श्रापित विष्णु ने गंडकी नदी के तट पर बड़े चट्टानी पर्वत का रूप धारण कर लिया।  जिसे शालिग्राम के नाम से जाना जाता है।

FAQs

Who is the shaligram god?

भगवान विष्णु का शापित रूप ही शालिग्राम है जिसे तुलसी का शाप मिला है। उसी समय से तुलसी और शालिग्राम की पूजा साथ में की जाने लगी। बताते चलें तुलसी शालिग्राम विवाह भी हिन्दू धर्म में शुभ माना जाता है।   

Where to get the original shaligram?

यदि आप खरीदने के इच्छुक हैं तो यह हमारी वेबसाइट prabhubhakti.in पर Shaligram Stone Online उपलब्ध है।

Who can wear Shaligram? 

शलिग्राम रूपी माला, शालिग्राम लॉकेट या शालिग्राम पेंडंट को कोई भी धारण कर सकता है। इसके बहुत लाभकारी प्रभाव देखने को मिलते है।  

Where to keep shaligram at home?

शालिग्राम को घर में सदैव तुलसी के पौधे के निकट ही रखा जाना चाहिए। पौराणिक कथाओं में तुलसी और शालिग्राम के बनने की कहानी एक दूसरे से जुड़ी हुई है। यही वजह है दोनों को साथ में रखा जाना चाहिए। 

Where is the shaligram found? 

शालिग्राम को गंडकी नदी के समीप पाया जाता है। यही इस शिला का उद्गम स्थल है जहां ये निर्मित होते हैं। 

Can ladies touch shaligram?

 यह सभी मिथ्या है कि स्त्री शालिग्राम की पूजा नहीं कर सकती। कई मान्यताओं के अनुसार स्त्री का पूजा करना वर्जित है। जबकि स्कंद पुराण में स्पष्ट वर्णन है कि वे इसकी उपासना कर सकती हैं। केवल अशुद्ध होने के समय पूजा यह पूजा वर्जित है।

Who can worship shaligram?

शालिग्राम की पूजा अर्चना करने के लिए व्यक्ति का सात्विक रहना अनिवार्य शर्त है। शालिग्राम भगवान विष्णु का प्रतीक है। इनकी उपासना वैष्णव परंपरा के लोग करते हैं। इस परंपरा में उपासना के कड़े नियम हैं। 

Which shaligram is best for home?

शालिग्राम का कोई भी रूप घर में स्थापित किया जा सकता है। एक नियम यह है कि एक ही शालिग्राम घर में रखा जाए। इसकी नियमित तौर पर पूजा अर्चना भी की जानी चाहिए। ऐसा नहीं करने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के आसार है। 

Kaal Sarp Dosh : A Serious Condition in Your Horoscope You Should Know

What is Kaal Sarp Dosh Yog Yantra?

Kaal Sarp Dosh means जब कुंडली के सारे ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, गुरु, राहु और केतु के मध्य में होते हैं। यह सभी कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं। [1]

इस समस्या का निपटारा करने के लिए कालसर्प योग यन्त्र का प्रयोग किया जाता है। यह राहु और केतु की दशा को ठीक करने का कार्य करता है। इसके अनेक फायदे हैं जिसके बारे में आपको बताएंगे :

Kaal Sarp Dosha Yantra के फायदे

1. यह राहु और केतु के ग्रह दशा को ठीक करने में अत्यंत लाभकारी है। उल्टे प्रभावों को खत्म करता है।  

2. यह मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक समस्याओं को समाप्त करता है।  

3. यह kaal sarp dosh nivaran yantra जीवन में मृत्यु जैसी स्थिति को टालता है।  

4. आत्मविश्वास जगाने, तरक्की के मार्ग पर चलने और प्रतिनिधित्व कौशल अर्जित करने में सहयक है।  

काल सर्प दोष कितने होते है?  

यह कई प्रकार के होते हैं जिनका उल्लेख यहाँ किया गया है :

अनंत काल सर्प योग

  1. जब लग्न में राहु और केतु सातवें घर में हों तब अनंत कालसर्प योग बनता है।
  2. इसे विपरीत कालसर्प योग भी कहा जाता है। 
  3. यह वैवाहिक जीवन के लिए ठीक नहीं है। जिस कुंडली में यह दोष होता है उनका विवाह देर से होता है।  

शंखचूड़ कालसर्प योग

  1. जब राहु नौवें घर में हो और केतु का स्थान कुंडली में तीसरा हो तब यह योग बनता है।
  2. इस योग वाले व्यक्ति के जीवन में बहुत उतार चढ़ाव आते हैं।
  3. झूठ बोलने की आदत होती है और वे जल्दी अपना आत्मसंयम खो देते हैं।   

घातक कालसर्प योग

  1. यह योग तब बनता है जब राहु दसवें स्थान पर और केतु चौथे स्थान पर होता है। 
  2. इस स्थिति में व्यक्ति को कानूनी सजा मिलने की संभावना होती है।
  3. बताते चलें कि इस योग का फायदा भी है।  सिंह और कन्या राशि के जातकों को बड़ी राजनितिक सत्ता मिलने की भी संभावना होती है।   

कुलिक कालसर्प योग

  1. राहु का दूसरा भाव और केतु का अष्टम भाव यह स्थिति उत्पन्न करता है।
  2. इस संयोग से व्यक्ति के स्वस्थ्य पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।
  3. कोई दुर्घटना होने की सम्भावना अधिक रहती है। 
  4. आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।  

वासुकि कालसर्प योग

  1. राहु तीसरे भाव में हो और केतु नवम भाव में तब यह योग बनता है।
  2. इससे व्यक्ति को नौकरी न मिलने और व्यवसाय में घाटे का सामना करना पड़ता है।

शंकपाल कालसर्प योग

  1. जब शंकपाल चौथे भाव में और केतु दशम भाव में मौजूद हो शंकपाल कालसर्प योग बनता है।
  2. इस दोष से ग्रस्त व्यक्ति को काम में बाधा उतपन्न होती है। 
  3. तनाव और अवसाद का सामना करना पड़ सकता है।  

पदम कालसर्प योग

  1. पांचवें भाव में राहु और 11वें भाव में विराजमान केतु से पदम कालसर्प योग बनता है।
  2. इस योग की कुंडली वाले जातक सदैव अपनी संतान के संबंध में सदैव चिंतित रहते है। 
  3. यदि चन्द्रमा की दशा भी ख़राब हो तो व्यक्ति को भूत-प्रेत का भी भय रहता है।
  4. यदि इस समय व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ता है तो व्यक्ति को ठीक होने में काफी समय लगता है।  

महापदम कालसर्प योग

  1. यह योग तब बनता है जब राहु अपने छठे भाव में और केतु 12वें भाव में हो।
  2. इस योग की कुंडली वाले जातक के कई शत्रु होते हैं।
  3. साथ ही व्यक्ति को कई बिमारियों का सामना करना पड़ता है।
  4. यह योग लाभकारी स्थिति में व्यक्ति को राजनितिक क्षेत्र में उच्च पदवी दिलाता है।  

तक्षक कालसर्प योग

  1. जब राहु 7वें भाव में हो और केतु प्रथम भाव में तब यह योग बनता है।
  2. व्यक्ति इस स्थिति में मदिरा, स्त्री और जुए की लत का शिकार होता है।
  3. जातक का वैवाहिक जीवन भी सुखी नहीं रहता है।  

कर्कोटक कालसर्प योग

  1. आठवें भाव में बैठा राहु और दूसरे भाव में विराजमान केतु के चलते यह योग बनता है। 
  2. इस योग का जातक हमेशा शत्रुओं से घिरा रहता है।
  3. व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से जुड़े विवाद का सामना भी करना पड़ता है।   

विषधर कालसर्प योग

  1. यदि राहु लाभ भाव में और केतु 5वें भाव में हो तब यह योग बनता है।
  2. ऐसा जातक को घर से दूरी का सामना करना पड़ता है। व्यक्ति को हृदय रोग भी होता है।
  3. संतान से जुड़ी समस्या का भी सामना करना पड़ता है।  

शेषनाग कालसर्प योग

  1. जब राहु बारहवें भाव में हो और केतु छठे भाव में हो तब यह योग बनता है।
  2. इस योग से ग्रस्त व्यक्ति के शत्रु अधिक होते हैं और स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। [2]

Kaal Sarp Dosh Effects

आइये आपको बताते  हैं कि काल सर्प दोष कैसे पता करें :

1. हर कार्य में असफलता हाथ लगना।    

2. स्वास्थ्य कभी ठीक नहीं रहता।   

3. आर्थिक रूपों से तंगी या धंधे में बड़ा नुकसान काल सर्प दोष के प्रभाव हैं।

4. परिवार में विवाद खासकर संपत्ति को लेकर।  

5. बुरी संगति का शिकार होना जैसे मदिरापान और जुए आदि की लत।  

कालसर्प दोष का उपाय (Kaal Sarp Dosh Remedies)

काल सर्प दोष निवारण पूजा के लिए सामग्री :

काल सर्प दोष निवारण यन्त्र, जाप माला, सुपारी, सिन्दूर, भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की प्रतिमा।

अन्य सामग्री जैसे दीपक, धूप, चावल के दाने, भस्म, घी, मौली आदि भी आवश्यक हैं।

1.काल सर्प दोष दूर करने का १ रामबाण उपाय है, काल सर्प योग यन्त्र की स्थापना करना।  

2. यदि कोई कालसर्प दोष से ग्रसित है तो उसे हर सोमवार शिवलिंग पर पंचामृत अर्पित करना चाहिए।  

3. महादेव के मंदिर में जाकर उपासना भी करनी चाहिए। 

4. काल सर्प दोष पूजा में नागराज देवता की और यन्त्र की प्रतिदिन उपासना करनी चाहिए।  साथ ही नीचे दिए गए मंत्र का जप करें।   

Kaal Sarp Yog Mantra : 

ॐ क्रौं नमो अस्तु सर्पेभ्यो काल सर्प शान्ति कुरु-कुरु स्वाहा।।

सर्प मंत्र :

ॐ नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथ्वी मनु ये अंतरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः   

5. शिव साधना में लीन होकर महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करने से दोष समाप्त होता है।

ऊँ हौं ऊँ जूं स: भूर्भुव: स्व: त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवद्र्धनम्.

उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् भूर्भुव: स्वरों जूं स: हौं ऊँ

6. चांदी के स्वस्तिक को द्वार पर लगाना चाहिए ताकि बुरी आत्माओं से रक्षा हो। यह सभी kaal sarp dosh remedy में से एक है। [3]

FAQs

काल सर्प दोष कितने वर्ष तक रहता है?

काल सर्प दोष व्यक्ति को बहुत कर सकता है। इसकी अवधि कभी 47 वर्ष तक रहती है तो कभी यह दोष आजीवन व्यक्ति के साथ रहता है। इस दोष के प्रभाव से हर कार्य में व्यक्ति को असफलता हाथ लगती है।  

Good Effects of Kaal Sarp Yog

काल सर्प दोष के फायदे अनेकों है जो इस प्रकार हैं :
1. कालसर्प के मुख में शुक्र ग्रह शुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति का वैवाहिक जीवन सुखी रहता है।  

2. यदि कुंडली में राहु की दशा अच्छी स्थिति में है तो उसे हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी।  

3. यदि मंगल कालसर्प के मुख में अवस्थित हो तो व्यक्ति निडर और साहसी बनता है।

4. अगर कालसर्प के मुख में बुध अवस्थित हो तो व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।    

5. जन्मांक 1, 2, 3, 10 और 12 हो तो राहु अच्छे फल प्रदान करता है।

6. शनि कालसर्प के मुख में अस्वथित हो तो व्यक्ति को जल्दी कामयाबी मिलती है।

7. गुरु के शुभ होने की स्थिति में व्यक्ति हर क्षेत्र में सफलता हासिल करता है।      

This is How You Can Energize Parad Shivling and Get the Lord Shiva Blessings

पारद शिवलिंग क्या है? ( What is Parad Shivling? )

पारद शिवलिंग(Parad Shivling) पारे से निर्मित होता है जिस कारण इसे पारद नाम दिया गया है। पारा को संस्कृत भाषा में पारद की संज्ञा दी गई है। पुराणों में कई प्रकार के शिवलिंग का जिक्र है। इन शिवलिंगों में पारद शिवलिंग सबसे अधिक सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सावन के महीने में इस शिवलिंग की पूजा करना बेहद शुभ है। 

पारद शिवलिंग महत्व ( Significance Of Parad Shivling )

इससे व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। ऐसी मान्यता है कि पारद शिवलिंग की पूजा करने से 12 Jyotirlingas पूजा का फल मिलता है। यह एकमत्र ऐसा धातु है जो तरल रूप में उपलब्ध है। इसलिए इसे बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन मानी जाती है। रूद्र संहिता में वर्णन है कि रावण ने पारद शिवलिंग की पूजा कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। यही वजह है कि वह अपनी लंका को स्वर्ण का बना पाया था। [1]

पारद संहिता में कई औषधियों का उल्लेख है जिससे पारा धातु को शुद्ध कर पत्थर रूप दिया जाता है। उदाहरणस्वरूप : चित्रक, नक्षिणकी, व्यग्रपादि, शंकपुष्पी, लाजवंती, नीम, शमी, वक्रतुण्डी और पुत्रजीविका आदि। [2

पारद शिवलिंग के फायदे ( Parad Shivling Benefits )

पूरे विधि विधान से पूजा किये जाने से Parad Shivling ke fayde अनेक है आइये जानते हैं Parad Shivling benefits in hindi :

1. पारद शिवलिंग को जिस घर में स्थापित किया जाता है वहां सुख-समृद्धि और शान्ति का वास होता है।
  
2. इससे 100 अश्वमेघ, लाखों गो दान और चारधाम यात्रा का फल प्राप्त होता है।  (शिव महापुराण श्लोक-1)

3. भगवान शिव की कृपा से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। (शिव महापुराण श्लोक-2)

4. पारद शिवलिंग की पूजा करने से ब्रह्म हत्या, गोहत्या जैसे पाप से मुक्ति मिलती है। (शिव महापुराण श्लोक-15)

5. Benefits of Parad Shivling में व्यक्ति को दीर्घायु और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होना शामिल है।  

6. यह शिवलिंग सबसे पवित्र माना जाता है। यह घर के सभी वास्तुदोषों की समाप्ति करता है।

7. उच्च रक्क्तचाप, ह्रदय रोग और अस्थमा जैसी बिमारियों को नियंत्रण करने में सहायक है।

8.देवी सरस्वती की कृपा होती है, बौद्धिक विकास होता है साथ ही एकाग्रता क्षमता बढ़ती है। [3]

पारद शिवलिंग की पूजा विधि (Parad Shivling Puja Vidhi in hindi)

आइये जानते हैं Parad Shivling ki puja kaise kare : 

1. Parad Shivling puja के लिए प्रातःकाल स्नान करें।  

2. भगवान शिव की प्रतिमा को शिवलिंग के साथ में रखें। 

3. फिर शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाएं और प्रतिमा पर भी छिड़कें।  

4. इसके पश्चात बेलपत्र अर्पित करें। साथ ही दिए गए मंत्र का 108 बार जाप करें।

Parad Shivling Puja Mantra
‘ऐं ह्रीं श्रीं ‘ॐ नम: शिवाय’ : श्रीं ह्रीं ऐं’

5. ध्यान रहे कि शिवलिंग पर दूध, दही, सिन्दूर, शहद और चंदन आदि नहीं चढ़ाना चाहिए।  

6. चढ़ाये गए जल को तुलसी, पीपल और बरगद छोड़कर किसी भी पौधे में डाल सकते हैं।  

शिव महापुराण श्लोक

 लिंगकोटिसहस्त्रस्य यत्फलं सम्यगर्चनात्।

तत्फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद् भवेत्।।

ब्रह्महत्या सहस्त्राणि गौहत्याया: शतानि च।

तत्क्षणद्विलयं यान्ति रसलिंगस्य दर्शनात्।।

स्पर्शनात्प्राप्यत मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम्।।

इस श्लोक के अनुसार करोड़ों शिवलिंग पूजन से जो फल मिलता है। उससे भी कई गुना ज्यादा फल पारद शिवलिंग की पूजा से प्राप्त होता है। इसके केवल स्पर्श से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। 

पारद शिवलिंग अभिषेक ( Parad Shivling Abhishek )

1. इस शिवलिंग का अभिषेक करने से  व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।  

2. पारद शिवलिंग का अभिषेक गन्ने के रास से किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति को लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

यदि आप यह खरीदने के इच्छुक हैं तो इसे prabhubhakti.in पर Parad Shivling Online खरीद सकते हैं।

How to identify original Parad Shivling?

1.पारद शिवलिंग की पहचान करने के लिए उसे हथेली पर घिसे। यदि  उसमें से कालिख न निकले तो वह असली है।  

2. लैब में टेस्ट करने से यदि इसमें जस्ता, सिक्का धातु मिलें तो यह नकली है।  

3. इसकी पहचान के लिए एक तरीका और है। इसे पानी में डालकर धूप में रखा जाए तो यह सोने के रंग में तब्दील हो जाता है। 

How to clean Parad Shivling?

आइये जानते हैं पारद शिवलिंग कैसे साफ करें : 

1. सर्वप्रथम तो यह जान लें कि घर में किसी छोटे आकार के शिवलिंग को ही रखना चाहिए।  

2. शिवलिंग को साफ़ करने के लिए एक थाल में शिवलिंग रखें।  

3. इसके पश्चात उसके ऊपर गंगाजल से अभिषेक करें।  

4. तब तक उसपर जल डालें जब तक वह अच्छी तरह से साफ़ न हो जाए।  

5. वैसे यदि शुद्ध जल से प्रतिदिन अभिषेक किया जाए तो वह साफ़ हो ही जाता है।     

How to make Parad Shivling at home?

कई बार लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर पारद शिवलिंग को घर में कैसे बनायें? आपको बता दें पारद शिवलिंग पारा धातु से निर्मित होता है. जो कि तरल होता है। अतः इसे घर पर नहीं बनाया जा सकता। इस शिवलिंग को बनाये जाने की प्रक्रिया कठिन है। 

How to place Parad Shivling at home?

1. सर्वप्रथम भगवान शंकर की प्रतिमा के आगे दीपक जलाएं।  

2. उसके बाद सफ़ेद कपड़े में लपेटकर शिवलिंग को स्थापित करें।   

3. फिर उस पर जल अभिषेक किया जाना चाहिए। 

3. अभिषेक करते समय ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप भी अवश्य करें।  

4. ध्यान रखें इसपर केतकी के पुष्प अर्पित नहीं करने चाहिए।  

5. शिवलिंग पर तुलसी, हल्दी और सिन्दूर चढ़ाना भी वर्जित है।  
 
6. यदि आप शिवलिंग की प्रतिदिन पूजा नहीं सकते तो इसे घर में स्थापित न करें।  

What is Parad Shivling made of?

पारद शिवलिंग मर्क्युरी यानी पारा धातु से बना होता है। ध्यान रखें इसे किसी सोने की वस्तु के आस-पास नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से वह सोना रंग छोड़ने लगता है।  

पारद शिवलिंग घर में रखना चाहिए या नहीं?

इस शिवलिंग को घर में रखा जा सकता है यदि उसका आकार छोटा हो। पारद शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए या नहीं? इसका जवाब है कि इसपर जल चढ़ाया जा सकता है। साथ ही आपको बता दें कि पारद शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा होनी भी जरुरी नहीं है।   

How to energize Parad Shivling?

पारद शिवलिंग को ऊर्जावान बनाये रखने के लिए इसमें पानी भरकर रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जल भरकर शिवलिंग रखने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यह घर में मौजूद बुरी शक्तियों का नाश करता है।
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