Maha Shivratri 2022 : जाने अनजाने में ऐसे बना एक शिकारी भोलेनाथ का परमभक्त

महाशिवरात्रि का महत्व ( Mahashivratri Significance )


शैव पंथ के लिए सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि होता है, यह एक ऐसा दिन होता है जिस दिन भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। व्रत का पालन करते हैं और अपना पूरा समय भोलेनाथ के ध्यान में लगा देते हैं। आज हम Mahashivratri की कहानी के बारे में बताने जा रहे है। इस कथा का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि इसका वर्णन शिव पुराण में मिलता है।

महाशिवरात्रि की कथा ( Mahashivratri ki katha ) :


शिव पुराण में वर्णित महाशिवरात्रि की कथा कहती है कि पुराने में समय में एक शिकारी हुआ करता था जिसका नाम चित्रभानु था। चित्रभानु के ऊपर बहुत अधिक कर्जा था और यही उसके जीवन की सबसे बड़ी परेशानी थी। साहूकार ने शिकारी से अपना सारा कर्जा वसूलने के लिए उसे सज़ा देने की सोची।

साहूकार को मालूम था कि Chitrabhanu कर्ज देने की स्थिति में नहीं है इसलिए उसने चित्रभानु को एक शिवमठ में बंदी बना दिया। चित्रभानु के साथ सबसे बड़ा संजोग यह हुआ कि जिस दिन उसे बंदी बनाया गया वह दिन महाशिवरात्रि का था साहूकार ने महाशिवरात्रि के उपलक्ष में अपने घर में पूजा का भव्य आयोजन किया। पूजा के बाद Shivaratri की कथा का पाठ भी किया गया शिवमठ में बंदी बना बैठा चित्रभानु शिकारी भी पूजा और कथा में बताई गई बातों को ध्यान से सुनता रहा। जैसे ही पूजा कार्यक्रम समाप्त हुआ। तुरंत साहूकार ने चित्रभानु को अपने पास बुलाया और उससे कर्ज चुकाने की बात कही तो शिकारी ने उसे ऋण वापिस देने का वचन दिया।

इस Mahashivratri Vrat Katha में शिकारी का वचन सुन साहूकार ने तुरंत उसे रिहा कर दिया। अपनी रिहाई के तुरंत बाद शिकारी जंगल में शिकार के लिए गया, अब रात हो चली थी इसलिए शिकारी ने वहीँ जंगल में आराम करने की सोची। चित्रभानु आराम करने के लिए बेल के पेड़ पर चढ़ गया। बेल के पेड़ के ठीक नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। सौभाग्य तो चित्रभानु का इस तरह से साथ दे रहा था मानो स्वयं ईश्वर उसका मार्गदर्शन कर रहे हों। शिकारी बेल के पेड़ पर रात बिताने लगा और उसके नीचे स्थापित शिवलिंग बेलपत्र से ढक चुका था क्योंकि शिकारी ने पेड़ से बेलपत्र की कुछ पत्तियां तोड़ी और इसी दौरान उसकी कुछ पत्तियां शिवलिंग पर जा गिरी।

Shivratri Katha आगे इस प्रकार है कि शिकारी भूखा था इसलिए उसका Maha Shivaratri के व्रत का पालन हो गया। शिकारी भूख प्यास से बहुत व्याकुल था तभी उसे एक हिरणी वहां से जाते हुए दिखी। चित्रभानु ने जैसे ही हिरणी पर तीर दागने की सोची हिरणी बोली कि मैं गर्भवती हूँ कुछ ही समय में बच्चे को जन्म देने वाली हूँ तू अभी मुझे मारकर एक साथ दो जीवों की हत्या करेगा।

जैसे ही मैं अपने बच्चे को जन्म दे दूंगी शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाउंगी अभी मुझे जाने दो। इसपर शिकारी ने उसकी बात मान ली और उसे जाने दिया। अपना धनुष रखने के दौरान पेड़ से कुछ बेल पत्र गिराकर नीचे शिवलिंग पर गिर गए इस तरह चित्रभानु की प्रथम प्रहर की पूजा सम्पन्न हुई।

इसके कुछ समय बाद वहां से एक और हिरणी निकली शिकारी ने उसे देखते ही अपने धनुष से तीर शिकार के लिए निकाल लिया यह देख हिरणी बोली कि मैं थोड़ी देर पहले ऋतू से निवृत्त हुई हूँ और मैं अपने प्रिय को खोज रहीं हूँ। अपने पति से मिलकर मैं शीघ्र ही यहाँ आ जाउंगी। निवेदन है कि अभी मुझे यहाँ से जाने दें। शिकारी ने हिरणी की बात मान उसे भी जाने दिया। एक बार फिर से धनुष रखने पर पेड़ से बेल पत्र गिरकर Shivling पर जा गिरे और शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गई।

अब फिर से शिकारी को वहां से जाती हुई तीसरी हिरणी दिखाई दी अब चित्रभानु एक भी मौका नहीं छोड़ना चाहता था इसलिए तीर निशाने पर लगा लिया। इस बार जो हिरणी दिखी उसके साथ बच्चा भी था। हिरणी ने शिकारी से निवेदन किया कि मैं इन बच्चों को इनके पिता के पास छोड़ने जा रही हूँ मुझे अभी जाने दो। वापिस लौटते वक़्त मैं तुम्हारे पास आ जाउंगी तब तुम मेरा शिकार कर लेना। शिकारी से हिरणी की बातों से भावुक हो गया और उसे जाने दिया।

भूख से व्याकुल चित्रभानु पेड़ से बेल के पत्ते तोड़-तोड़ कर शिवलिंग पर फेंकता ही जा रहा था। इस प्रकार चित्रभानु की रात बीत गई। अब सुबह की पहली किरण निकली तो शिकारी ने जंगल में एक मृग देखा। शिकारी ख़ुशी से उत्साहित हो उठा और अपने धनुष से तीर निकालते हुए मृग पर निशाना लगाया।

यह देख मृग बोला कि यदि तुमने इस मार्ग से गुजरने वाली तीन हिरणियों और बच्चों को मार दिया है तो तुम मुझे भी मार सकते हो और यदि तुमने उन्हें जीवनदान प्रदान किया है तो तुम मुझे भी मेरे परिवार से मिलने दो क्योंकि मैं उन हिरणियों का पति हूँ। शिकारी मृग की बात सुनकर दया भाव से भर गया और उसे भी बाकियों की ही तरह जीवनदान दिया।

Mahashivratri Katha में आगे की बात करें तो अब सुबह हो चुकी थी शिकारी चित्रभानु का जाने अनजाने में व्रत पालन हुआ, भूख के कारण रात्रि का जागरण हुआ और व्याकुलता के कारण शिवलिंग पर बेल पत्र पर भी अर्पित हो गए। भगवान शिव की कृपा शिकारी को तुरंत प्राप्त हुई क्योंकि वे तो भोलेनाथ हैं। Bholenath की ही कृपा से अब शिकारी कोमल ह्रदय वाला चिरभानु बन गया था इसलिए जब मृग और हिरणी का परिवार उसके सामने आया तो उसने उन्हें मारा नहीं।

जाने अनजाने में चित्रभानु ने जो पूजा विधि का पालन किया था उससे उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। चित्रभानु मृत्यु के पश्चात यमदूत के साथ नहीं बल्कि शिवगणों के साथ शिवलोक पहुंचा। शिकारी का सौभाग्य तो देखिये अगले जन्म में राजा बने चित्रभानु को अपने पूर्व जन्म की सभी बातें याद थी। इसी के कारण राजा चित्रभानु Mahashivratri Vrat का इस जन्म में पालन कर सका और इस बार राजा ने जाने अनजाने में नहीं बल्कि चेतन मन से महाशिवरात्रि का पालन किया था।

आइये जानें ओम नमः शिवाय की उत्पत्ति, जाप करने की विधि और इसके लाभ

हिन्दू धर्म में भगवान शिव ( Lord Shiva in Hindu Religion )

हमारे हिन्दू धर्म में भगवान शिव ( Bhagwan Shiv ) एकमात्र ऐसे देवता है जिनकी सादगी और मासूमियत ही लोगों को उनकी ओर आकर्षित करती है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए भक्तों को कोई विशेष अनुष्ठान या भव्य यज्ञ का आयोजन नहीं करना पड़ता। भक्तों को तो बस जरूरत है योगमुद्रा में बैठकर उनके मंत्र का जाप करने की।

हमारी भक्ति, एकाग्र क्षमता और ध्यान ही भगवान शिव के निकट पहुंचाने वाला मार्ग है। काल और मृत्यु के भय से मुक्त भगवान शिव के ॐ नमः शिवाय मंत्र की महिमा के बारे में आज हम बात करेंगे और बताएंगे आपको कि आखिर कैसे भक्त इस मंत्र के माध्यम से बड़ी ही सरलता से उनके निकट पहुँच सकते हैं।

ॐ नमः शिवाय का अर्थ ( Om Namah Shivaya Meaning )

ॐ एक ध्वनि की भांति प्रतीत होता है परन्तु इस ॐ में ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्ति का वास है। ॐ शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है – अ उ म। जिसमें से अ का अर्थ है उत्पन्न होना, उ का अर्थ है विकास और म का अर्थ है मौन अवस्था में आ जाना यानी कि ब्रह्मलीन हो जाना। इसके बाद आने वाले शब्द हैं नमः शिवाय जिनका मतलब होता है भगवान शिव को नमस्कार। शैव और सिद्ध परम्परा में शिव के पांच तत्वों का बोध इस प्रकार किया गया है :

“न” ध्वनि पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करता है
“मः” ध्वनि पानी का प्रतिनिधित्व करता है
“शि” ध्वनि आग का प्रतिनिधित्व करता है
“वा” ध्वनि प्राणिक हवा का प्रतिनिधित्व करता है
“य” ध्वनि आकाश का प्रतिनिधित्व करता है
इस प्रकार इन शब्दों का कुल अर्थ है कि “सार्वभौमिक चेतना एक है”।

ओम नमः शिवाय का महत्व क्या है?( Importance of om namah shivay Mantra )

 नमः शिवाय ( Om Namah Shivay ) मंत्र हिन्दू धर्म में सबसे प्रसिद्ध मन्त्र है। ॐ नमः शिवाय मंत्र का महत्व इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह सभी की जीव्हा पर अक्सर रहता ही है। इस मंत्र को पञ्चाक्षर मन्त्र भी कहा जाता है। हम लोग इस मंत्र को रोज़ सुनने के आदि है परन्तु यह मंत्र सामान्य होकर मामूली नहीं है बल्कि अपने साथ कई सारी शक्तियों को समाहित किये हुए है। कहा जाता है कि इस मंत्र में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का वास है।

ॐ नमः शिवाय मंत्र के चमत्कार के बारे में शिवपुराण में उल्लेख किया गया है कि इस चमत्कारी मंत्र में इतनी शक्ति समाहित है जो सम्पूर्ण मनुष्य जाति के दुःखों और कष्टों को दूर करने में सक्षम है। साथ ही शिव पुराण में इस चमत्कारिक मंत्र को शरणाक्षर मंत्र का कहा गया है।

ओम नमः शिवाय की उत्पत्ति कैसे हुई? ( Om Namah Shivaya Origin in hindi )

भगवान शिव इस धरती पर एक अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। यह अग्नि स्तम्भ जब धरती पर प्रकट हुआ तो उस समय स्तंभ के पांच मुख थे। ये पांच मुख पंच तत्वों पृथ्वी, अग्नि, आकाश, जल और वायु से बने थे। इसके प्रकट होते ही सबसे पहले ॐ शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है।

इसके बाद बाकी पांच शब्द नमः शिवाय की उत्पत्ति उन पांच मुखों से हुई। तभी से ॐ नमः शिवाय मंत्र की महिमा के बारे में संसार को ज्ञात हुआ और यह मंत्र जीवन का एक अभिन्न बन गया।

ओम नमः शिवाय मंत्र से क्या लाभ है? ( Om Namah Shivaya Benefits in Hindi )

1. ॐ नमः शिवाय मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।  

2. इस मन्त्र जाप से शरीर संबंधी सभी विकार समाप्त हो जाते हैं।  

3. इससे आत्मीय और मानसिक शान्ति और स्थिरता प्राप्त होती है।  

4. आभामंडल में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ने लगता है।  

5 ईश्वर से निकटता महसूस करता है ॐ नमः शिवाय मंत्र

6. आध्यात्मिक क्रियाकलापों में रूचि बढ़ने लगती है।  

7. काल और मृत्यु के भय से मुक्ति का प्रतीक है ये मंत्र
( भगवान शिव के Trishakti Kavach में ॐ, त्रिशूल और स्वस्तिक तीनों की अद्भुत शक्तियों का समावेश है जिसे धारण करने से व्यक्ति के जीवन में एक नई ऊर्जा का आगमन होगा। )

ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप कैसे करना चाहिए? ( Om Namah Shivay ka Jap Kaise karna chahiye? )  

1. ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करने के लिए कोई विशेष समय निर्धारित नहीं किया गया है।  

2. भक्त इस मंत्र का जप अपने समय और सुविधानुसार कर सकते हैं।

3. जाप करने के लिए शांत और स्वच्छ स्थान को चुने।  

4. जाप के लिए अपना मुख हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर ही रखें।  

5. प्रतिदिन जाप के लिए रुद्राक्ष की माला को ही प्रयोग में लाएं।  

6. रोज़ के मंत्र जाप संख्या 108 ही रखें।  

7. ध्यान रहे कि जिस रुद्राक्ष माला से जाप करें वह असली Original Rudraksha Japa Mala हो।

ॐ नमः शिवाय मंत्र सिद्ध कैसे करें? ( Om Namah Shivaya Mantra kaise siddh kare? )

1. भगवान शिव के सबसे प्रभावशाली मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करने के लिए सबसे पहले एक शांत और स्वच्छ स्थान चुने।

2. जाप करने के लिए सोमवार का दिन ही चुने और एक भी सोमवार न छोड़े निरंतरता बनाये रखें।

3. मंत्र की संख्या का अनुष्ठान अपनी इच्छानुसार करें।

4. सबसे पहले सोमवार या किसी पुण्य नक्षत्र में मंदिर जाएँ और वहां शिव अभिषेक पूजन करें।

5. इसके बाद जल, अक्षत और पुष्प लेकर मंत्र सिद्धि का संकल्प करें।

6. घर आकर चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं और भगवान शिव और पार्वती की मूर्ति रखें।

7. चित्र या प्रतिमा के बाईं और दाईं ओर एक साबुत सुपारी पर मौली लपेट कर रखें ।

8. ताम्बे के लोटे में जल रखें, घी का दीपक और धूप जलाएं।

9. शिव जी का पूजन पंचविधि से करें फिर तिलक अक्षत और नैवैद्य चढ़ाएं।

10. इसके उपरान्त जप के लिए आसन पर बैठे, माला को मस्तक से लगाएं और जप आरंभ करें।

11. ध्यान रहे कि मन्त्रों का जाप तय की गई संख्या और दिन पर पूर्ण करें।

12. इसके बाद जप का दशांश हवन करना होता है।

13. यदि हवन का सामर्थ्य न हो तो उतने ही मंत्र का जाप और करें।

14. फिर तर्पण करना है जो हवन का दशांश होता है

15. तर्पण के लिए अंजुली में जलभरकर ॐ नमः शिवाय मंत्र बोलते हुए छोड़ देना है।

16. तर्पण का दसवां हिस्सा ब्राह्मण भोजन के रूप में देना होता है।

17. ध्यान रहे कि मंत्र सिद्धि के लिए किसी पंडित से जानकारी अवश्य लें।

आइये जानें सोमवार व्रत कथा ( Somvar Vrat Katha ) और क्या है प्रति सोमवार व्रत विधि?

सोमवार व्रत का महत्व : सोमवार का व्रत रखने से क्या होता है? ( Somvar ka vrat rakhne se kya hota hai? )

भगवान शिव की पूजा करने वाले लोगों के लिए सोमवार के व्रत का बहुत अधिक महत्व है। इस दिन व्रत का पालन करने से भगवान शिव और पार्वती जी की असीम कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

प्रति सोमवार व्रत विधि ( Somvar Vrat ki Puja Vidhi )

1. सोमवार के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।  
2. स्नान के बाद भगवान शिव का जलाभिषेक करें।  
3. फिर उन्हें बेलपत्र, पुष्प, फल आदि अर्पित करें।   
4. घी का दीपक और धूप जलाएं और व्रत का संकल्प लें।  
5. सोमवार व्रत कथा का पाठ करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का 108 बार जाप करें। 

( इस दिन स्वयंभू श्रेणी के Original Narmadeshwar Shivling का पंचामृत से अभिषेक करने पर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। नर्मदेश्वर शिवलिंग की पवित्रता और शुभता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे प्राण प्रतिष्ठा की भी जरूरत नहीं होती। नर्मदेश्वर शिवलिंग स्वयं ही नर्मदा नदी में निर्मित होते हैं। )

सोमवार व्रत के लाभ  ( Somvar Vrat ke labh )

1. सोमवार के दिन व्रत रखने से दुःख और चिंताएं दूर होती हैं।  
2. व्यक्ति को शरीर के अनेकों रोगों से मुक्ति मिलती है।  
3. घर की आर्थिक तंगी समाप्त होती है।  
4. घर नकारात्मक ऊर्जाओं से दूर रहता है। 

सोमवार व्रत कथा ( Somvar Vrat Katha )

एक बार की बात है एक नगर में साहूकार रहा करता था जिसके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। इतना अधिक धनवान होने के बावजूद वह साहूकार निः संतान था। कोई संतान न होने के कारण वह बहुत चिंतित रहा करता था। संतान प्राप्ति की इच्छा लिए वह साहूकार हर सोमवार व्रत किया करता और पूरी श्रद्धा से भगवान शिव और पार्वती की पूजा करता।
साहूकार की भक्ति से माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने के लिए कहा।

जिसपर भगवान शिव ने पार्वती जी को समझाने के प्रयास किया कि इस संसार में हर व्यक्ति को उसके कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इस तरह जिस भी व्यक्ति को जो हासिल है वह उसके कर्मों का फल ही है। भगवान शिव की बात तो पार्वती जी ने सुनी पर वे अभी भी साहूकार की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा को पूर्ण करना चाहती थी।

देवी पार्वती के बार – बार आग्रह किए जाने पर भगवान शिव ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान तो दिया परंतु वह बालक केवल बारह वर्ष तक ही जीवित रह सकता था। साहूकार भगवान शिव और माता पार्वती की सभी बातें सुन रहा था। दोनों की बातों को सुनकर भी साहूकार मन से स्थिर बना रहा उसे न तो इस बात की प्रसन्नता हुई और न ही कोई दुख। वह साहूकार पूरे मन से भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा-अर्चना करता रहा।

कुछ समय बीता और साहूकार के घर पुत्र ने जन्म लिया। जब साहूकार का बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी भेजने का फैसला लिया गया। साहूकार ने बालक के मामा को धन दिया और कहा कि इसे शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी ले जाओ। साथ ही जाते – जाते मार्ग में यज्ञ भी करवाना, जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा भी अवश्य देना।  

इस तरह मामा – भांजे यज्ञ करते हुए और ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देते हुए काशी की ओर निकल पड़े थे। वहीं मार्ग में एक नगर में कन्या का विवाह हो रहा था पर दुर्भाग्यवश जिस राजकुमार के साथ कन्या का विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था।

राजकुमार के पिता ने अपने बेटे के एक आंख से काने होने की बात छुपाने के लिए एक चाल सोची। उसने साहूकार के बेटे को देखकर सोचा कि क्यों न इस लड़के को अपने बेटे के स्थान पर बिठाकर कर कन्या से विवाह करा लिया जाए। फिर विवाह होने के बाद पैसे देकर इसे वापिस भेज दूंगा और राजकुमारी को अपने साथ ले जाऊंगा। इस प्रकार साहूकार के लड़के के साथ उस कन्या का विवाह करा दिया गया।

साहूकार के बेटे ने विवाह तो कर लिया परंतु वह अपनी ईमानदारी खोना नहीं चाहता था। उसे किया गया कृत्य न्यायसंगत नहीं लगा।  उसने यह बात बताने के लिए राजकुमारी की चुनरी के पल्ले पर लिखा कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हो रहा है परंतु मैं असली राजकुमार नहीं हूं। असली राजकुमार एक आंख से काना है। मैं तो यहां काशी में शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से आया हूं।

जब राजकुमारी को सारी बात पता चली तो उसने ने अपने माता-पिता को सब बात बताई। अपनी पुत्री की बात सुनकर राजा ने अपनी बेटी को विदा नहीं किया और बारात वापिस लौट गई। वहीं शिक्षा के लिए जा रहे मामा भांजे काशी में पहुंचे तो पहुंचते ही उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन यज्ञ था उसी दिन लड़के की आयु बारह वर्ष होनी थी। इसपर लड़के ने अपने मामा से कहा कि वह स्वस्थ महसूस नहीं कर रहा है। मामा ने भांजे को जाकर सोने के लिए कहा।

भगवान शिव के वरदान के अनुसार सोते ही बालक के प्राण निकल गए। मामा ने मृत भांजे को देखकर विलाप करना शुरू कर दिया। संयोग की बात थी कि उस समय शिव जी और पार्वती जी वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने निकट जाकर देखा तो भगवान शिव और पार्वती जी को मालूम हुआ कि यह तो वही साहूकार का पुत्र है जिसे केवल बारह वर्ष तक जीवित रहने के वरदान दिया था। माता पार्वती भाव विभोर हो उठी और उन्होंने भगवान शिव से आग्रह किया कि हे! प्रभु आप इसे और आयु प्रदान करें नहीं तो इसके माता पिता इसके जाने के वियोग सहन नहीं कर पाएंगे।

माता पिता के आग्रह किए जाने पर भगवान शिव ने साहूकार के बेटे को जीवनदान दे दिया। काशी से शिक्षा समाप्त कर जब मामा भांजे घर की ओर निकले तो सबसे पहले वे इस नगर में पहुंचे जहां उस लड़के का विवाह हुआ था। वहां पहुंचकर उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया तो राजकुमारी के पिता उस लड़के के पहचान गए और उन्होंने अपनी पुत्री को विदा कर दिया।
जब तीनों लोग घर पहुंचे तो वहां साहूकार और उनकी पत्नी अपने पुत्र के लौटने का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने प्रण लिया हुआ था कि अगर उन्हें अपने पुत्र के जीवित न होने का समाचार प्राप्त हुआ तो वे भी अपने प्राण त्याग देंगे। साहूकार और उनकी पत्नी ने बेटे को जीवित देखा तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

उसी रात्रि को साहूकार के सपने में भगवान शिव ने आकर कहा कि हे! श्रेष्ठी मैंने तेरे सोमवार के व्रत और सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है। इस तरह जो भी भक्तजन सोमवार का व्रत ( Somwar ka Vrat ) पालन कर सच्चे मन से भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता है और उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होंगी।

सोमवार व्रत कब से शुरू करना चाहिए? ( Somvar vrat kab se shuru karna chahiye? )

भगवान शिव को समर्पित सोमवार व्रत ( Somvar Vrat )  की शुरुआत श्रावण, चैत्र, मार्गशीर्ष और वैशाख मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से करनी चाहिए। ध्यान रहे कि सोमवार के व्रत कम से कम 16 तो अवश्य ही होने चाहिए। 

सोमवार के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए? ( Somvar ke vrat me kya nahi khana chahiye? )

सोमवार के व्रत में वैसे तो खाने को लेकर कोई कड़े नियम नहीं है परन्तु इस दिन अधिक तेल मसाले वाला भुना हुआ भोजन न लें। साथ ही ध्यान रहे कि इस दिन व्रत की शुरुआत चाय के साथ न करें।

क्या सोमवार व्रत में नमक खाना चाहिए? ( Kya Somvar vrat me namak khana chahiye? ) 

सोमवार के व्रत के दिन नमक न खाने की सलाह दी जाती है। इस दिन फलाहार करना चाहिए और संध्या के समय कुछ मीठा ग्रहण कर ही व्रत खोलना चाहिए।

आइये जानते हैं भगवान शिव के 19 अवतारों का रहस्य और उनसे जुड़ी कहानी

हिंदू धर्म में भगवान के धरती पर अवतरित होने और मनुष्यों का उद्धार करने की बातें सभी वेदों – ग्रंथों में लिखी गई हैं। भगवान विष्णु के अवतारों के बारे में तो लगभग सभी लोग परिचित हैं पर बहुत कम लोग हैं जो भगवान शिव के अवतारों के बारे में जानते हैं। आज हम आपको काल और मृत्यु से परे रहने वाले भगवान शिव के प्रमुख अवतारों का उल्लेख करेंगे जिन्होंने इस धरती पर अवतरित होकर किसी न किसी रूप में मनुष्य का कल्याण किया है और अब तक करते आए हैं।

भगवान शिव किसका अवतार है? ( Bbhagwan Shiv kiska Avatar hai? )

भगवान शिव के अवतारों के बारे में जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव को किसका अवतार बताया गया है। शिव पुराण की मानें तो भगवान शिव स्वयंभू है जिनका न कोई आदि है और न ही कोई अंत। उन्हीं के होने से ये समस्त संसार गतिमान है। जबकि विष्णु पुराण में भगवान शिव का जन्म भगवान विष्णु के द्वारा हुआ है।

भगवान शिव के निराकार रूप की पूजा करने के लिए सबसे उत्तम नर्मदेश्वर शिवलिंग ( Narmadeshwar Shivling ) माना जाता है। इसके पीछे की वजह यह है कि नर्मदा नदी से निर्मित होने वाले शिवलिंग स्वयंभू है जिन्हें निर्मित किये जाने या प्राण प्रतिष्ठा किये जाने की भी आवश्यकता नहीं है।  

भगवान शिव के 19 अवतार ( Bhagwan Shiv ke 19 Avatar )

1. वीरभद्र : भगवान शिव ने अपने इस वीरभद्र रूप में अवतार उस समय लिया था जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ आयोजन में देवी सती अपमान के कारण हवन कुंड में कूद पड़ी थीं। जब भगवान शिव को यह पता चला कि देवी सती ने अपने प्राण त्याग दिए हैं तो उन्होंने अपने सिर से एक जटा को उखाड़कर पर्वत के ऊपर पटक दिया था। उसी पटकी गई जटा के पूर्वभाग से वीरभद्र उत्पन्न हुए। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का पूरी तरह से विनाश कर दिया और दक्ष का सिर काट मृत्युदंड प्रदान किया।

2. पिप्पलाद : भगवान शिव का पिप्पलाद रूप शनि दोषों के निवारण में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उनकी कृपा से ही शनि पीड़ा से निजात पाना संभव हो पाया। पिप्पलाद से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार एक बार पिप्पलाद ने देवताओं से सवाल किया कि आखिर क्या वजह रही मेरे पिता दधीचि मेरे जन्म से पहले ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने कहा कि शनि की दृष्टि के चलते ही ऐसा हुआ है।

देवताओं की बातों को सुनकर पिप्पलाद क्रोधित हो उठे और उन्होंने शनिदेव को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे डाला। उनके श्राप का प्रभाव यह हुआ कि शनि अकाश से गिरने लगे, इसके बाद देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को क्षमा तो किया परंत एक शर्त रखी कि जन्म से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक शनि किसी पर अपनी दृष्टि नहीं डालेंगे।

3. नंदी अवतार : भगवान शिव का नंदी अवतार सभी जीवों से प्रेम करने का संदेश हमें देता है। नंदी यानी बैल कर्म का प्रतीक माना जाता है। शिव जी के इस अवतार से जुड़ी कथा कहती है कि शिलाद नामक मुनि ब्रह्मचारी थे। अपना वंश समाप्त होते देख शिलाद मुनि के पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने के लिए कहा।

इसके बाद शिलाद ने एक मृत्युहीन संतान की कामना के उद्देश्य से भगवान शिव की कठोर तपस्या करनी शुरू कर दी। शिलाद की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वर प्रदान किया। इसके कुछ समय पश्चात शिलाद एक बार भूमि जोत रहा था और भूमि जोतते समय शिलाद को उसी भूमि से एक बालक मिला जो भूमि से उत्पन्न हुआ था। शिलाद ने उस बालक का नाम नंदी रखा था।

4. भैरव अवतार : जब ब्रह्मा और विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे थे तब तेज पुंज के बीच पुरुष आकृति दिखाई दी। उसे देखकर ब्रह्मा जी बोले कि तुम मेरे पुत्र हो मेरी क्षरण में आओ। ब्रह्मा की बात को सुनकर भगवान् शिव को बहुत क्रोध आया और उन्होंने पुरुषाकृति से कहा कि काल की तरह शोभित होने के कारण आप कालराज और भैरव हैं।

शिव जी से यह वरदान प्राप्त कर काल भैरव ने अपनी अंगुली के नाख़ून से ही ब्रह्मा जी के पांचवे सिर को काट डाला। इससे काल भैरव ब्रह्महत्या के दोषी माने गए। काशी में प्रवेश के बाद ही भगवान शिव के इस रूप को ब्रह्महत्या के बड़े दोष से मुक्ति मिल पाई थी।  

5. अश्वत्थामा अवतार : अश्वत्थामा भगवान शिव के अंशावतार माने जातें हैं। महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ही एकमात्र ऐसे योद्धा माने जाते हैं पूरे युद्ध को कौरवों के पक्ष में रखने की क्षमता रखते थे। परन्तु दुर्भाग्यवश वे युद्ध के अंत में जाकर सेनापति बने थे।  इनके बारे में कहा जाता है कि वे आज भी अमर हैं और पृथ्वी पर मौजूद हैं।

6. शरभावतार : शरभावतार को भगवान शंकर छठा अवतार माना जाता है। उनका यह अवतार में आधा भाग मृग और आधा भाग शरभ पक्षी का था।  

7. गृहपति अवतार : यह शिव जी का सातवां अवतार है जो विश्वानर नामक मुनि और उनकी पत्नी शुचिष्मति के पुत्र थे। मुनि की आराधना की प्रसन्न होकर ही भगवान शिव ने शुचिष्मति के गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया था।  

8. ऋषि दुर्वासा : भगवान शिव के आठवें अवतार ऋषि दुर्वासा को अनसुइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा की आज्ञा से ऋक्षकुल पर्वत पर कठोर तपस्या कर वरदान के रूप में पाया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन पुत्र होने का वरदान दिया था।  ब्रह्मा जी के अंश से चन्द्रमा, विष्णु जी के अंश से दत्तात्रेय और शिव जी के अंश से ऋषि दुर्वासा ने जन्म लिया था।  

9. हनुमान : हनुमान जी भगवान शिव के नौंवे अवतार माने जाते हैं। अमृत मंथन के दौरान जब शिव जी विश्वमोहिनी के रूप को देख कामातुर हो गए थे तब उनके वीर्यपात को सप्तऋषियों ने एक पत्ते में संग्रहित कर लिया था। फिर समय आने पर सप्तऋषियों ने वह वानरराज केसरी की अर्धांग्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में धारण हुआ था। इससे ही बलशाली हनुमान जी का जन्म हुआ था।  

10. वृषभ अवतार : भगवान शिव के वृषभ अवतार ने उपद्रव मचा रहे विष्णु जी के पुत्रों का संहार किया था। विष्णु जी के ये पुत्र चन्द्रमुखियों के साथ रमण करते हुए उत्पन्न हुए थे। 

भगवान शिव के अन्य 9 अवतारों की सूची कुछ इस प्रकार है :
11. यतिनाथ अवतार
12. कृष्णदर्शन अवतार
13. अवधूत अवतार
14. भिक्षुवर्य अवतार
15. सुरेश्वर अवतार
16. किरात अवतार
17. सुनटनर्तक अवतार
18. ब्रह्मचारी अवतार
19. यक्ष अवतार

आइये जानें काल और मृत्यु से परे रहने वाले भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ?

शंकर भगवान की कहानी ( Shankar Bhagwan ki kahani ) 

हिंदू धर्म में कुल चार वेद और 18 पुराण हैं और इन वेदों पुराणों (ved puran) में देवी-देवताओं के जन्म से लेकर उनके अवतार और अन्य कृत्यों की जानकारी का वर्णन किया गया है। दुविधा की बात तो यह है कि कुछ समान बातों से परे सभी में कहानियों का अलग – अलग तरीके से बखान किया गया है जो इन जानकारियों की विश्वसनीयता को और भी अधिक पेचीदा बना देता है। पुराणों में त्रिदेव कहे जाने वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश के जन्म से जुड़ी कहानियों का भी उल्लेख किया गया है।

जहां एक तरफ वेदों में भगवान को एक निराकार रूप का दर्जा दिया गया है वहीं दूसरी तरफ पुराणों में त्रिदेवों के जन्म से संबंधित कहानियों के बारे में बताया गया है। आज हम बात करेंगे देवो के देव महादेव यानी शंकर भगवान की कहानी ( Shankar Bhagwan ki kahani )  के बारे में। भोलेनाथ के जन्म से जुड़ी कई सारी कहानियां हमें पुराणों में पढ़ने को मिलती है इन्हीं कहानियों में से हम जानेंगे कि आखिर शिवजी का जन्म कब हुआ और उनके जन्म के पीछे की वजह क्या थी।

भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ? ( Bhagwan Shiv ka Janm kaise hua? )

विष्णु पुराण की कथाएँ ( Vishnu Puran ki kathaye ) कहती हैं कि भगवान शिव का जन्म ( Bhagwan Shiv ka janm ) भगवान विष्णु के माथे से उत्पन्न हुए तेज से हुआ है। माथे के तेज से ही जन्में होने के कारण भगवान शंकर सदैव योग मुद्रा में रहते हैं। इतना ही नहीं विष्णु पुराण में वर्णित भगवान शिव के जन्म की कहानी उनके बालपन का एकमात्र वर्णन है क्योंकि और कहीं भी उनके जन्म से जुड़े साक्ष्य नहीं पाए जाते हैं।
विष्णु पुराण ( Vishnu Puran ) में वर्णित भगवान शिव के जन्म की कहानी कुछ इस प्रकार है कि ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या के फल के तौर पर एक रोता हुआ बालक उनकी गोद में आ गया। जब ब्रह्मा जी ने इस रोते हुए बालक को देखा तो यह सवाल किया कि तुम रो क्यों रहे हो?

इसपर वह बालक बोला कि उसका नाम ब्रह्मा नहीं है इसलिए वह रो रहा है। उस नन्हें मासूम बालक की बात को सुन ब्रह्मा ने उसे नाम दिया ‘रूद्र’। इस नाम का अर्थ था रोने वाला। परंतु बालक रूप में बैठे भगवान शिव तब भी चुप न हुए।
इस तरह बालक शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा जी ने आठ नाम दिए थे। वे आठ नाम हैं – रूद्र, भाव, उग्र, भीम, शर्व, पशुपति, महादेव और ईशान। यही वजह है कि भगवान शिव इन सभी नामों से भी जाने जाते हैं।

शिव जी (Shiv Ji) के जन्म के पीछे की इस पूरी कहानी की बात करें तो था कुछ इस प्रकार है। जब संपूर्ण ब्रह्मांड – धरती, आकाश और पाताल जलमग्न था, उस समय ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अलावा कोई भी अस्तित्व में नहीं था। उस दौरान केवल भगवान विष्णु ही थे जो जल में शेषनाग पर विश्राम करते हुए नजर आ रहे थे। तभी ब्रह्मा जी भगवान शिव की नाभि से प्रकट हुए और फिर भगवान शिव की उत्पत्ति ( Bhagwan Shiv ki Utpatti )   माथे के तेज से हुई।

ब्रह्मा जी से शिव जी को देखा तो पहचानने से साफ इनकार कर दिया। ब्रह्मा के इनकार से भगवान विष्णु को यह भय सताने लगा कि कहीं शिव जी रूठ न जाएं। जिस कारण उन्होंने ब्रह्मा जी को दिव्यदृष्टि प्रदान की जिससे उन्हें शिव जी के बारे में स्मरण हो आया।

सब कुछ स्मरण होते ही ब्रह्मा जी को अपनी गलती का आभास हुआ और उन्होंने शिव जी से माफी मांगी। साथ ही ब्रह्मा जी ने शिव जी से अपने पुत्र के रूप में जन्म लेने का आशीर्वाद भी मांगा। भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को माफ करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।

इसके बाद भगवान विष्णु के मैल से उत्पन्न हुए मधु कैटभ के वध के बाद जब ब्रह्मा जी ने संसार की रचना करना आरंभ किया तब उन्हें एक बच्चे की जरूरत पड़ी। इसी समय उन्हें भगवान शिव से मिला आशीर्वाद याद आया। आशीर्वाद को पाने के लिए उन्होंने तपस्या की और फिर एक बालक उनकी गोद में प्रकट हो गया।

भगवान शिव के पिता कौन है? ( Bhagwan Shiv ke pita kaun hai? )

विष्णुपुराण की मानें तो शिव जी के पिता ब्रह्मा जी थे जिन्होंने शिव जी से अपने पुत्र के रूप में जन्म लेने का आशीर्वाद माँगा था। फिर समय आने पर सृष्टि के निर्माण के समय शिव जी ने ब्रह्मा जी के पुत्र के रूप में जन्म लिया।

शंकर भगवान के गुरु कौन थे? ( Shankar Bhaghwan ke guru kaun the? )

भगवान शिव स्वयं इस संसार के गुरु माने जाते हैं जिन्होंने इस संसार में गुरु शिष्य की परंपरा का शुभारंभ किया था। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ कहते हैं कि ब्रह्मा जी और शिव जी इस संसार के सबसे पहले गुरु हैं। जहाँ ब्रह्मदेव ने अपने मानस पुत्रों को शिक्षा प्रदान की थी वहीँ भगवान शिव ने अपने सात शिष्यों को शिक्षा प्रदान की थी। इन्हीं सात शिष्यों को सप्तऋषियों का दर्जा दिया गया।

शिवपुराण की कथा ( Shiv Puran ki Katha )

शिव पुराण में जन्म से जुड़ा शिव का रहस्य कहता है कि भगवान शिव का आदि और अंत से कोई संबंध नहीं है। वे काल और मृत्यु के चक्र से बिल्कुल परे हैं। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव स्वयंभू हैं जिनका जन्म स्वयं हुआ है। जिस प्रकार शिव स्वयंभू हैं उसी प्रकार नर्मदा नदी से निर्मित होने वाले शिवलिंग को भी स्वयंभू माना जाना जाता है।

इसके पीछे की वजह यह है कि उन शिवलिंग को कहीं से निर्मित नहीं किया गया है वे खुद ही नर्मदा नदी से निर्मित होकर निकले हैं। नर्मदेश्वर शिवलिंग ( Narmadeshwar Shivling )स्वयंभू होने के कारण अपने साथ कई विषेशताओं को लिए हुए है। जिस घर में भी इस स्वयंभू शिवलिंग को पूजा जाता है वहां भगवान शिव का आशीर्वाद सदैव बना रहता है सभी बिगड़े काम बनने लगते हैं।  

This is How You Can Energize Parad Shivling and Get the Lord Shiva Blessings

पारद शिवलिंग क्या है? ( What is Parad Shivling? )

पारद शिवलिंग(Parad Shivling) पारे से निर्मित होता है जिस कारण इसे पारद नाम दिया गया है। पारा को संस्कृत भाषा में पारद की संज्ञा दी गई है। पुराणों में कई प्रकार के शिवलिंग का जिक्र है। इन शिवलिंगों में पारद शिवलिंग सबसे अधिक सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सावन के महीने में इस शिवलिंग की पूजा करना बेहद शुभ है। 

पारद शिवलिंग महत्व ( Significance Of Parad Shivling )

इससे व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। ऐसी मान्यता है कि पारद शिवलिंग की पूजा करने से 12 Jyotirlingas पूजा का फल मिलता है। यह एकमत्र ऐसा धातु है जो तरल रूप में उपलब्ध है। इसलिए इसे बनाने की प्रक्रिया बहुत कठिन मानी जाती है। रूद्र संहिता में वर्णन है कि रावण ने पारद शिवलिंग की पूजा कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। यही वजह है कि वह अपनी लंका को स्वर्ण का बना पाया था। [1]

पारद संहिता में कई औषधियों का उल्लेख है जिससे पारा धातु को शुद्ध कर पत्थर रूप दिया जाता है। उदाहरणस्वरूप : चित्रक, नक्षिणकी, व्यग्रपादि, शंकपुष्पी, लाजवंती, नीम, शमी, वक्रतुण्डी और पुत्रजीविका आदि। [2

पारद शिवलिंग के फायदे ( Parad Shivling Benefits )

पूरे विधि विधान से पूजा किये जाने से Parad Shivling ke fayde अनेक है आइये जानते हैं Parad Shivling benefits in hindi :

1. पारद शिवलिंग को जिस घर में स्थापित किया जाता है वहां सुख-समृद्धि और शान्ति का वास होता है।
  
2. इससे 100 अश्वमेघ, लाखों गो दान और चारधाम यात्रा का फल प्राप्त होता है।  (शिव महापुराण श्लोक-1)

3. भगवान शिव की कृपा से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। (शिव महापुराण श्लोक-2)

4. पारद शिवलिंग की पूजा करने से ब्रह्म हत्या, गोहत्या जैसे पाप से मुक्ति मिलती है। (शिव महापुराण श्लोक-15)

5. Benefits of Parad Shivling में व्यक्ति को दीर्घायु और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होना शामिल है।  

6. यह शिवलिंग सबसे पवित्र माना जाता है। यह घर के सभी वास्तुदोषों की समाप्ति करता है।

7. उच्च रक्क्तचाप, ह्रदय रोग और अस्थमा जैसी बिमारियों को नियंत्रण करने में सहायक है।

8.देवी सरस्वती की कृपा होती है, बौद्धिक विकास होता है साथ ही एकाग्रता क्षमता बढ़ती है। [3]

पारद शिवलिंग की पूजा विधि (Parad Shivling Puja Vidhi in hindi)

आइये जानते हैं Parad Shivling ki puja kaise kare : 

1. Parad Shivling puja के लिए प्रातःकाल स्नान करें।  

2. भगवान शिव की प्रतिमा को शिवलिंग के साथ में रखें। 

3. फिर शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाएं और प्रतिमा पर भी छिड़कें।  

4. इसके पश्चात बेलपत्र अर्पित करें। साथ ही दिए गए मंत्र का 108 बार जाप करें।

Parad Shivling Puja Mantra
‘ऐं ह्रीं श्रीं ‘ॐ नम: शिवाय’ : श्रीं ह्रीं ऐं’

5. ध्यान रहे कि शिवलिंग पर दूध, दही, सिन्दूर, शहद और चंदन आदि नहीं चढ़ाना चाहिए।  

6. चढ़ाये गए जल को तुलसी, पीपल और बरगद छोड़कर किसी भी पौधे में डाल सकते हैं।  

शिव महापुराण श्लोक

 लिंगकोटिसहस्त्रस्य यत्फलं सम्यगर्चनात्।

तत्फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद् भवेत्।।

ब्रह्महत्या सहस्त्राणि गौहत्याया: शतानि च।

तत्क्षणद्विलयं यान्ति रसलिंगस्य दर्शनात्।।

स्पर्शनात्प्राप्यत मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम्।।

इस श्लोक के अनुसार करोड़ों शिवलिंग पूजन से जो फल मिलता है। उससे भी कई गुना ज्यादा फल पारद शिवलिंग की पूजा से प्राप्त होता है। इसके केवल स्पर्श से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। 

पारद शिवलिंग अभिषेक ( Parad Shivling Abhishek )

1. इस शिवलिंग का अभिषेक करने से  व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।  

2. पारद शिवलिंग का अभिषेक गन्ने के रास से किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति को लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

यदि आप यह खरीदने के इच्छुक हैं तो इसे prabhubhakti.in पर Parad Shivling Online खरीद सकते हैं।

How to identify original Parad Shivling?

1.पारद शिवलिंग की पहचान करने के लिए उसे हथेली पर घिसे। यदि  उसमें से कालिख न निकले तो वह असली है।  

2. लैब में टेस्ट करने से यदि इसमें जस्ता, सिक्का धातु मिलें तो यह नकली है।  

3. इसकी पहचान के लिए एक तरीका और है। इसे पानी में डालकर धूप में रखा जाए तो यह सोने के रंग में तब्दील हो जाता है। 

How to clean Parad Shivling?

आइये जानते हैं पारद शिवलिंग कैसे साफ करें : 

1. सर्वप्रथम तो यह जान लें कि घर में किसी छोटे आकार के शिवलिंग को ही रखना चाहिए।  

2. शिवलिंग को साफ़ करने के लिए एक थाल में शिवलिंग रखें।  

3. इसके पश्चात उसके ऊपर गंगाजल से अभिषेक करें।  

4. तब तक उसपर जल डालें जब तक वह अच्छी तरह से साफ़ न हो जाए।  

5. वैसे यदि शुद्ध जल से प्रतिदिन अभिषेक किया जाए तो वह साफ़ हो ही जाता है।     

How to make Parad Shivling at home?

कई बार लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर पारद शिवलिंग को घर में कैसे बनायें? आपको बता दें पारद शिवलिंग पारा धातु से निर्मित होता है. जो कि तरल होता है। अतः इसे घर पर नहीं बनाया जा सकता। इस शिवलिंग को बनाये जाने की प्रक्रिया कठिन है। 

How to place Parad Shivling at home?

1. सर्वप्रथम भगवान शंकर की प्रतिमा के आगे दीपक जलाएं।  

2. उसके बाद सफ़ेद कपड़े में लपेटकर शिवलिंग को स्थापित करें।   

3. फिर उस पर जल अभिषेक किया जाना चाहिए। 

3. अभिषेक करते समय ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप भी अवश्य करें।  

4. ध्यान रखें इसपर केतकी के पुष्प अर्पित नहीं करने चाहिए।  

5. शिवलिंग पर तुलसी, हल्दी और सिन्दूर चढ़ाना भी वर्जित है।  
 
6. यदि आप शिवलिंग की प्रतिदिन पूजा नहीं सकते तो इसे घर में स्थापित न करें।  

What is Parad Shivling made of?

पारद शिवलिंग मर्क्युरी यानी पारा धातु से बना होता है। ध्यान रखें इसे किसी सोने की वस्तु के आस-पास नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से वह सोना रंग छोड़ने लगता है।  

पारद शिवलिंग घर में रखना चाहिए या नहीं?

इस शिवलिंग को घर में रखा जा सकता है यदि उसका आकार छोटा हो। पारद शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए या नहीं? इसका जवाब है कि इसपर जल चढ़ाया जा सकता है। साथ ही आपको बता दें कि पारद शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा होनी भी जरुरी नहीं है।   

How to energize Parad Shivling?

पारद शिवलिंग को ऊर्जावान बनाये रखने के लिए इसमें पानी भरकर रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जल भरकर शिवलिंग रखने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यह घर में मौजूद बुरी शक्तियों का नाश करता है।

जानिये नर्मदेश्वर शिवलिंग का महत्व और इसकी पूजा विधि

What is Narmadeshwar Shivling?

हिन्दू धर्म में शिवलिंग की पूजा का काफी महत्व बताया गया है। शिवलिंग पूजा में भी नर्मदेश्वर शिवलिंग का सबसे अधिक महत्व है। नमर्दा नदी से निर्मित होने वाले Narmadeshwar Shivling समेत इस नदी का कण-कण शिव है। 

नर्मदा पुराण की माने तो नर्मदा शिव की पुत्री है जिन्हें भगवान शंकर का वरदान प्राप्त है। इसलिए narmada river shiva lingam stone को सबसे पवित्र माना जाता है।     

मान्यता है कि नर्मदा नदी में स्नान करने से वही फल प्राप्त होता है जो गंगा स्नान से प्राप्त होता है। इस नदी से निकलने वाले हर पत्थर पर भोलेनाथ की कृपा है। इस प्रकार narmada shivling भी अत्यधिक ख़ास है।[1]

Narmadeshwar Shivling Benefits (हिंदी में नर्मदेश्वर शिवलिंग लाभ)

Narmadeshwar shivling को ही बाणलिंग कहा जाता है आइये जानते है banalinga benefits  के बारे में : 

1. घर में सकारात्मक शक्तियों का आगमन होता है और मन भी शांत रहता है।  

2. narmada stone shivling की पूजा करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।  

3. यह व्यक्ति के तामसिक गुणों जैसे – क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और अहंकार को समाप्त करता है।  

4. घर के वास्तु दोष का खात्मा नर्मदेश्वर शिवलिंग के फायदे है।  

How to Worship Narmadeshwar Shivling?

नर्मदेश्वर शिव लिंग पूजा विधि : 

1. प्रातःकाल स्नान करें और शिवलिंग को किसी बड़े थाल में शिव जी प्रतिमा के आगे रखें।  

2. इसके पश्चात भगवान शिव की प्रतिमा के आगे बेलपत्र और नैवेद्य अर्पित करें।  

3. फिर शिवलिंग पर जल अर्पित करें।  

4. उसके बाद भगवान शिव का ध्यान करें और ॐ नमः शिवाय का जाप करें।  

5. साथ ही लिंगाष्टक स्तोत्रम् का पाठ भी कर सकते हैं।

6. थाल वाले जल को किसी पौधे में डाल सकते हैं। 

लिंगाष्टक स्तोत्रम्

नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना के नियम 

1. शिवलिंग को घर और मंदिर दोनों जगह पर अलग तरह से स्थापित किया जाता है।  

2. घर में स्थापित होने वाले शिवलिंग का आकार 6 इंच से बड़ा नहीं होना चाहिए।   

3. शिवलिंग को कहीं भी स्थापित किया जाये उसकी वेदी का मुख उत्तर दिशा की ओर ही होना चाहिए।  

4. नर्मदेश्वर शिवलिंग की तांबे, स्फटिक, पत्थर और सोने-चांदी से बने वेदी पर स्थापित कर पूजा की जाती है।

नर्मदेश्वर शिवलिंग के पीछे की कहानी

बाणलिंग कहे जाने के पीछे की एक कहानी है। इसके अनुसार बाणासुर ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या कर भगवान शंकर को खुश किया था। ताकि वे सदा के लिए अमरकंटक पर्वत पर लिंगरूप में ही रहें। बताते चलें कि इसी पर्वत से नर्मदा नदी बहती है, जहाँ से नदी के साथ बहकर पत्थर आते है। इन्हीं पत्थर रूपी शिव के अंश को बाणलिंग या narmada lingam के नाम से लोग पूजते हैं। ये तो रही नर्मदेश्वर शिवलिंग का महत्व। लेकिन यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?

Why Shivling is Worshiped?

हिन्दू धर्म में शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनकी आराधना दोनों रूपों में की जाती है। इनकी साकार और निराकार रूप में पूजा होती है। शिव अपने साकार रूप में हाथ में त्रिशूल और डमरू लिए दिखते हैं। वहीँ निराकार रूप में वे शिवलिंग रूप धारण किये हुए हैं। भगवान शिव का निराकार रूप पूरे संसार के आदि और अनंत का प्रतीक है।

शैव परंपरा में शिवलिंग का महत्व

शैव परंपरा में भगवान शिव की तीन प्रकार की परिपूर्णताओं का उल्लेख किया गया है। पहला परशिव, दूसरा पराशक्ति और तीसरा परमेश्वर। शिवलिंग का ऊपरी अंडाकार भाग है वह परशिव है। शिवलिंग का निचला भाग पराशक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति समेटे हुए यह शिवलिंग ऊर्जा का एक स्त्रोत है। इसी कारण से हिन्दू धर्म में इसे पूजे जाने की मान्यता है। [2]

शिवलिंग से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :

  1. वेदों की माने तो शिवलिंग में शामिल यह लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर का सूचक है।
  2. इस सूक्ष्म शरीर के कुल 17 तत्व है जिसमें मन, बुद्धि, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 वायु और 5 कर्मेन्द्रियाँ शामिल है।
  3. वायु पुराण में कहा गया है कि सृष्टि का जहाँ अंत होता है और पुनः जन्म होता है वह लिंग है।

FAQs


Types of Shivling 

शिवलिंग के 2 मुख्य प्रकार है अंडाकार और पारद। इसके साथ ही अन्य 6 शिवलिंग के प्रकार का नीचे उल्लेख किया गया है : 

1. देवलिंग 
2. स्वयंभूलिंग 
3. मनुष्यलिंग 
4. पुराणलिंग 
5. अर्शलिंग 
6. आसुरलिंग 

How to find the original Banalinga?

यह स्वयंभू शिवलिंग केवल नर्मदा नदी में पाए जाते है। कई बार तो लोग नर्मदा नदी में डुबकी लगाते समय इसे प्राप्त करते है और आशीर्वाद स्वरुप घर में स्थापित कर लेते हैं।  

Where to buy Narmadeshwar Shivling? 

वैसे तो इस शिवलिंग को बाजार में विश्वसनीय दुकान से खरीद सकते है। यदि आपके मन में सवाल हो कि where to get narmadeshwar shivling Online? तो आप ऑनलाइन इसे prabhubhakti.in पर Narmadeshwar Shivling Online खरीद सकते हैं। 

1 to 21 Mukhi Rudraksha Benefits, Uses, Mantra And, ruling Deities

रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई ? (how did rudraksha originate from?)

Rudraksh ke fayde के बारे में तो बहुत लेख मिलते हैं लेकिन,इसकी उत्पत्ति के बारे में उल्लेख किया गया है कि इसका उद्भव शिव के अश्रु से हुआ है जिस कारण रुद्राक्ष का अर्थ रूद्र+अक्ष हुआ।

शिव पुराण में रुद्राक्ष का वर्णन ( Rudraksha shiva story in hindi )

इस संबंध में शिवपुराण में एक कहानी का वर्णन किया गया है कि, एक बार शिव जी देवी पार्वती से वार्ता करते हुए कहते हैं कि मैंने अपनी तपस्या के माध्यम से अपने मन-मस्तिष्क को स्थिर करने का प्रयास किया लेकिन, मुझे कुछ समय के लिए भय सा लगा और, मेरे नेत्र खुले जिनसे आंसुओं की बूँद गिरने लगी।

मान्यता हैं की, शिव के अश्रुओं की बूँदें ही पृथ्वी पर एक वृक्ष के तौर पर निर्मित हो गई और, इन वृक्षों में जो फल पाया जाता है उसे ही Rudraksha कहा जाता है।

रुद्राक्ष के पेड़ कहां पाए जाते हैं? (Rudraksha tree where found?)

  • रुद्राक्ष पहाड़ी पेड़ का ख़ास तरह का फल हैं
  • रुद्राक्ष के पेड़ मुख्यतः इंडोनेशिया और नेपाल में पाए जाते है। 
  • जिसमें से नेपाल के पाली क्षेत्र के रुद्राक्ष सबसे अच्छे माने जाते है। 
  • इंडोनेशिया के दाने 4 से 15 मिमी व्यास के होते हैं
  • वहीँ, नेपाल के पाली क्षेत्र के ये रुद्राक्ष दाने 10 से 33 मिमी व्यास के होते है। 

रुद्राक्ष कैसे बनता है?

  • रुद्राक्ष को प्राप्त करने के लिए, सबसे पहले इसके फल का छिलका उतार दे
  • फिर रुद्राक्ष का बीज निकाले फल में से
  • इस के बीज को पानी में गाला कर साफ़ करे
  • और इस तरह रुद्राक्ष banta है।

रुद्राक्ष का पेड़ भारत में कहाँ पाया जाता है? ( Where is rudraksha tree found in india? )

  • वहीँ भारत में यह वृक्ष खासतौर पर मथुरा, अयोध्या, काशी और मलयाचल पर्वत में पाए जाते है।
  • इससे संबंधित और साक्ष्यों की बात करें तो इसका वर्णन शिवपुराण के अलावा स्कंदपुराण, बालोपनिषद, रूद्रपुराण, श्रीमदभागवत तथा देवी भागवत में मिलता है।[1]

असली रुद्राक्ष की पहचान कैसे करे? (how to identify real rudraksh?)

  • शुद्ध रुद्राक्ष के अंदर प्राकर्तिक रूप से छेद होते है।
  • असली रुद्राक्ष में संतरे की तरह फांके बने होते है। जिसके आधार पर ही रुद्राक्ष का वर्गीकरण किया जाता है।
  • सभी रुद्राक्ष की पहचान इनमे उपस्थित लाइन्स के आधार पर या अंदर x ray करने पर बीज दिखते है उनके आधार पर किया जाता है।
  • एक रुद्राक्ष में जितनी धारिया या लाइन्स होती हैं वह उतने मुखी रुद्राक्ष कहलाता है।
  • और, x-ray करने पर उसमें उतने ही बीज दिखाई पड़ते है।
  • रुद्राक्ष में कीड़ा न लगा हों
  • कही से टुटा फूटा न हों
  • रुद्राक्ष में अलग से दाने उभरे न हों
  • ऐसे रुद्राक्ष कभी भी धारण नहीं करने चाहिए
  • आप किसी लैब टेस्ट की बजाए, स्वये ही रुद्राक्ष की पहचान कर सकते हैं
  • रुद्राक्ष की पहचान के लिए उसे सुई से खुरेदे अगर रेशा निकले तो रुद्राक्ष असली होंगे नहीं तो नकली होगा
  • इसके आलवा शुद्ध सरसो के तेल में रुद्राक्ष को डाल कर 10 मिनट तक गर्म किया जाए तो असली रुद्राक्ष होने पर उसकी चमक बढ़ जाएगी तथा नकली होने पर फ़ीकी हों जायगी [source]

शिव रुद्राक्ष माला का जप कैसे करे? (Shiva rudraksha mala ka jap kaise kare? )

निम्नलिखित shiva rudraksha mala का हिन्दू परंपरा में अत्यधिक महत्व है जिसके माध्यम से भक्तजन ईश्वर के निकट रहने का प्रयास करते है। भगवान शिव को रुद्राक्ष माला सबसे अधिक प्रिय है और ऐसी मान्यता है कि जो भी जातक shiv mala 108 बार जाप मंत्र का उच्चारण कर धारण करता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती है और उसके जीवन में भगवान शिव एक साये की तरह सदैव साथ रहते है।  

shiv ji ki mala को पहनने का भी एक तरीका है जिसके अनुसार ही इसका प्रयोग किया जाए तो इसके लाभ अनगिनत है। नीचे उन्हीं तरीकों का वर्णन किया गया है |

रुद्राक्ष माला सिद्ध करने का मंत्र ( Mantra to activate rudraksha mala)

ईशानः सर्वभूतानां मंत्र

रुद्राक्ष सिद्ध करने की विधि ( Mantra to activate rudraksha)

यदि japa-mala सिद्ध करनी हो तो पंचामृत में डुबोएं, फिर साफ पानी से उसे अच्छी तरह धो लें। ध्यान रहे कि हर मणि पर ईशानः सर्वभूतानां मंत्र 10 बार बोलें। यह shiva mala rules के अनुसार ही किसी भी रुद्राक्ष को धारण किया जाना चाहिए। 

मेरू मणि पर स्पर्श करते हुए ‘ऊं अघोरे भो त्र्यंबकम्’ मंत्र का जाप करें और अगर एक ही रुद्राक्ष सिद्ध करना हो तो पहले उसे पंचामृत से स्नान कराएं। बाद में उसकी षोडशोपचार विधान से पूजा-अर्चना करें, फिर उसे चांदी के डिब्बे में रखें। ध्यान रहे कि उस पर प्रतिदिन या महीने में एक बार इत्र की दो बूंदें अवश्य डालें। इस तरह से किसी रुद्राक्ष की japa-mala या किसी एक रुद्राक्ष को सिद्ध किया जा सकता है।  [2]

रुद्राक्ष कितने प्रकार के होते हैं? या Shiva Mala k Prakar ( types of rudraksha in hindi)

  • दरअसल, रुद्राक्ष कूल मिला कर 21 प्रकार के होते है। जिनमे से मुख्यता 14 प्रकार के रुद्राक्ष को उपयोग में लाया जाता है।
  • Rudraksha के कई प्रकार के मुख हैं और इन मुखों में अलग-अलग नक्षत्रों, देवताओं तथा ऋषियों का वास होता है और इनकी विशेषता के ही अनुसार इन Rudraksha से बनी वस्तु जैसे माला आदि का प्रयोग किया जाता है। आज हम इन्हीं विशेषताओं का विस्तार से वर्णन करेंगे ताकि पाठकों को Rudraksha के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त हो सके।

वैसे तो नक्षत्रों के हिसाब से रुद्राक्ष 16 और 21 मुखी भी पाए गए हैं लेकिन, 14 मुखी तक का रुद्राक्ष बड़ी ही कठिनाइयों से पाया जाता है।

1 से 21 मुखी रुद्राक्ष के लाभ (1 to 21 mukhi rudraksha benefits)

एक मुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of ek mukhi rudraksha)

एकमुखी रुद्राक्ष का संबंध सीधे भगवान शिव से है। एक मुखी सभी रुद्राक्षों में सबसे अधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसमें भगवान शिव की परम शक्ति समाहित है।

धारण मंत्रॐ ह्रीं नम:’

1 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे (Ek mukhi rudraksha ke fayde)

  • एकमुखी Rudraksha का संबंध शिव से है जिसे, धारण करने ब्रह्महत्या जैसे दोष तक समाप्त हो जाते है।
  • इससे व्यक्ति के घर में सुख-समृद्धि आती है और उस घर से सभी तरह के उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।
  • वहां लक्ष्मी सदैव के लिए निवास करती है।
  • रूद्र सहिंता में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार दिया गया है कि जिस घर में एक मुखी Rudraksha का वास होता है उस घर में दरिद्रता, आर्थिक संकट का वास नहीं होता है।

एक मुखी रुद्राक्ष की पहचान कैसे करें? ( Ek mukhi rudraksha kaisa hota hai?)

  • इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि यह आधे काजू के आकार में दिखाई देता है और इसमें एक ही धारी होती है।
  • एक मुखी रुद्राक्ष को गर्म पानी में उबालें अगर वह रंग छोड़ने लगे तो वह असली नहीं है।
  • सरसों के तेल में डुबोकर रखने से भी इसकी असली पहचान की जा सकती है यदि रुद्राक्ष का रंग गहरा दिखाई दे।

 दो मुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 2 mukhi rudraksha)

  • 2 मुखी रुद्राक्ष का सम्बन्ध चन्द्रमा से हैं।
  • और, जैसा की आपको पता होंगा की “चंद्रमा मनसो जात:” यानी चंद्रमा मन का कारक हैं।
  • इसलिए 2 मुखी रुद्राक्ष का सीधा सम्भंध मन से हैं।
  • और, अर्द्धनारीश्वर से भी हैं। तथा, इसे देवेशवर भी कहाँ जाता हैं।
  • माता पार्वती और शिव का एकत्र रूप हैं अर्द्धनारीश्वर
  • २ मुखी रुद्राक्ष धारण करने का शुभ दिन – सोमवार!
  • क्युकी, सोमवार से चन्द्रमा का सम्बन्ध हैं। (source)

धारण मंत्र‘ॐ नम:’

2 मुखी रुद्राक्ष पहनने से क्या फायदा होता है? (2 mukhi rudraksha ke fayde) (2 mukhi rudraksha benefits in hindi)

  • इसके फायदों की बात करें तो द्विमुखी Rudraksha धारण करने से जन्मों के संचित पाप खत्म हो जाते हैं।
  • जो भी व्यक्ति इस प्रकार के Rudraksha को पहनता है वह ग्यारह वर्षों में भगवान शिव के बराबर समता प्राप्त कर लेता है।
  • जो व्यक्ति पांच वर्षों तक इसे धारण कर स्तोत्र का पाठ करता है उसकी कोई कामना बचती नहीं है सब पूर्ण हो जाती है।
  • नारद पुराण के अनुसार जो भी द्विमुखी Rudraksha को धारण करता है वह अक्षत यौनदृढ़ता को प्राप्त करता है।
  • यह रचनात्मकता और सफलता के लिए बहुत लाभकारी है।
  • 2 मुखी रुद्राक्ष को पहनने से 108 गाय दान का पुण्य मिलता है।
  • महा शिव पुराण के अनुसार, इसे धारण करने से हर परेशानी दूर हों जाती है।
  • यह रुद्राक्ष सुखी पारिवारिक जीवन के लिए भी लाभकारी है।
  • 2 मुखी रुद्राक्ष का सीधा सम्भंध मानसिक स्थिति से है। इसलिए एक बेहतर सोच-विचार के लिए बहुत उपयोगी है। 
इसके फायदों को यदि एक श्लोक में समेटा जाए तो ये कुछ इस प्रकार है

द्विवस्त्रों देव देवेशो गोबधं नाश्येदध्रुवं

 त्रिमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 3 mukhi rudraksha)

 तीन मुख वाले Rudraksha का संबंध अग्नि से है। यह त्रि-शक्तियों ब्रह्मा-विष्णु-महेश से संबंधित है जिस कारण इसकी व्याख्या संस्कृत में कुछ इस प्रकार की गई है : 

त्रिवक्योग्निस्य विज्ञेयःस्त्री हत्या च व्यपोहति

धारण मंत्र- ‘ॐ क्लीं नम:’

3 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे (3 mukhi rudraksha ke fayde)

  • तीन शक्तियों का सम्मिश्रण होने के कारण यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रदान करने वाला माना जाता है।
  • इसे केवल धारण करने से व्यक्ति कई प्रकार की विधाओं और कलाओं में निपुण हो जाता है।
  • ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति त्रिशक्ति रुपी प्राण- प्रतिष्ठित रुद्राक्ष धारण करता है उसकी सभी मनोकमनाएं पूरी होती है।
  • इससे पिछले जन्म और इस जन्म के पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है।
  • इसके अलावा नकारात्मक विचार, अपराध बोध, हीनभावना कम होती है।
  • इससे रक्तचाप की समस्या, कमजोरी और पेट से संबंधित बीमारी का भी उपचार होता है। 

चतुर्मुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 4 mukhi rudraksha )

चार मुखी rudraksha का संबंध ब्रह्मा जी से माना जाता है। इस संसार के सभी पदार्थों के जड़-चेतन स्वामी ब्रह्मा जी को ही बताया गया है। 

धारण मंत्र-‘ॐ ह्रीं नम:’

4 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे ( 4 mukhi rudraksha benefits in hindi)

  • इसे धारण करने वाला व्यक्ति ब्रह्मा जी की भांति निर्माण कार्यों में लीन हो जाता है और उसी दिशा में कार्य करना आरम्भ कर देता है।
  • चार मुखी rudraksha व्यक्ति को चार फलों धन, काम, धर्म और मोक्ष प्रदान करता है।
  • इस प्रकार के rudraksha का प्रयोग किये जाने से प्रेत बाधा, नक्षत्र बाधा, तनाव और मानसिक समस्याएं दूर हो सकती हैं।
  • स्वास्थ्य के लाभों के सन्दर्भ में इसे देखें तो इससे पीत ज्वर, श्वांस रोग, गर्भस्थ शिशु दोष, बांझपन और नपुसंकता जैसी बीमारियां दूर हो जाती है।
  • चार मुखी रुद्राक्ष से व्यक्ति को मेधावी आँखें प्राप्त होती है और वह तेजस्वी बनता है।
  • इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे मानसिक संतुलन स्थिर रहता है।

4 मुखी रुद्राक्ष की पहचान क्या है? ( 4 mukhi rudraksha identification)

  • रुदाक्ष की धारियों के अनुसार पहचान होती हैं जैसे, एक रुद्राक्ष मे जितनी धारिया पड़ी होती हैं वह उतने मुखी रुद्रक्षा कहलाता है।
  • इसलिए 4 मुखी रुदाक्ष की पहचान उसमें पड़ी 4 धारिया से होती है।
  • इंडोनेशिया और नेपाल में मुख्यतः 4 मुखी रुद्राक्ष के पेड़ पाए जाते है।
  • इंडोनेशिया के 10 मुखी रुद्राक्ष के पेड़ के दाने 4 से 15 मिलीमीटर व्यास वाले होते हैं
  • नेपाल के 10 मुखी रुद्राक्ष के पेड़ के दाने 10 से 33 मिलीमीटर व्यास वाले होते हैं [source]

 पंचमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 5 mukhi rudraksha)

5 mukhi rudraksha का संबंध भगवान शिव के सबसे कल्याणकारी स्वरुप महादेव से है जो वृष पर विराजमान है और जिनके पांच मुख है पांच मुखों में से चार मुख सौम्य प्रवृति के हैं जबकि दक्षिण की ओर किया हुआ मुख भयंकर रूप धारण किये हुए है।

महादेव के पांच कार्य हैं- सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव, अनुग्रह। यह सभी कार्य करने के लिए भगवान शिव के पांच मुख है और इन्हीं पांच मुखों से ॐ नमः शिवाय मंत्र का उद्भव हुआ है।

बताते चलें कि यही मंत्र पंचमुखी rudraksha का प्राण मंत्र माना जाता है। 

धारण मंत्रॐ ह्रीं क्लीं नम:

5 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे (5 mukhi rudraksha benefits in hindi)

  • पंचमुखी rudraksha कालाग्नि नामक रूद्र है,यह भौतिक और दैहिक रोग को समाप्त करने में सहायक है।
  • यह सभी बुरे कर्मों को नष्ट कर देता है।
  • यह मधुमेह के रोगियों, स्तनशिथिलता, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, एसिडिटी जैसी बिमारियों से बचाव करने में सहायता करता है।
  • अगर इस तरह की पूरी माला धारण करना संभव न हो तो केवल पांच पंचमुखी rudraksha को गूंथ कर धारण कर लेना चाहिए
  • गुरु के प्रतिकूल प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।

5 मुखी रुद्राक्ष पहनने के नियम (5 मुखी रुद्राक्ष पहनने की विधि)

1. 5 मुखी रुद्राक्ष को सोने या चांदी में मढ़वाकर या बगैर मढ़वाये भी पहन सकते है।  

2. सर्वप्रथम इसे गंगाजल या दूध से शुद्ध करना चाहिए।   

3. उसके बाद भगवान शिव की प्रतिमा के आगे धूप और दीपक जलाकर उपासना करें।  

4. उपासना के पश्चात इस मंत्र का 108 बार जाप करें। 

  ‘ॐ ह्रीं नम:’

5. इसे धारण करने के लिए श्रावण माह या सोमवार का दिन अधिक शुभ है।  

6 . ध्यान रखने वाली यह है कि इसे पहनकर शमशान में या किसी शव यात्रा में नहीं जाना चाहिए।  

5 मुखी रुद्राक्ष की पहचान (how to identify 5 mukhi rudraksha?)

  • रुद्राक्ष को पहचानने के दो तरीके हैं जिसमें से पहला तरीका तो, यह कि रुद्राक्ष को पानी में थोड़े समय के लिए उबाले यदि वह रंग न छोड़े तो वह असली है।
  • दूसरा तरीका है रुद्राक्ष को सरसों के तेल में रख दें और यदि रुद्राक्ष का रंग उसके रंग से थोड़ा गहरा दिखे तो भी यह उसके असली होने की एक निशानी है।

षट्मुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 6 mukhi rudraksha )

छः मुख वाले rudraksha का संबंध कार्तिकेय से है, इस प्रकार के rudraksha को धारण करने से भ्रूण हत्या जैसे पापों से व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है। कार्तिकेय के बारे में रूद्र सहिंता में वर्णन है कि इनका पालन पोषण 6 स्त्रियों द्वारा किया गया है जिस कारण उन्हें 6 मुख धारण करने पड़े थे ताकि वे सभी को वात्सलयता प्रदान कर सकें।

धारण मंत्र-’ॐ ह्रीं ह्रुं नम:’

6 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे (6 mukhi rudraksha benefits in hindi)

  • भगवान कार्तिकेय 6 विधाओं पूरब, पश्चिम, उतर, दक्षिण, उर्धव और पाताल के धनी है जिस कारण जो भी इसे धारण करता है वो इन 6 प्रतिभा का स्वतः ही धनी बन जाता है।
  • इस का संबंध शुक्र ग्रह से है जो भोग विलास के मालिक हैं अतः जिस भी व्यक्ति का जन्मनक्षत्र शुक्र हो उन्हें यह धारण करना चाहिए।
  • नेत्र से संबंधित रोग जैसे मोतियाबिंद, दृष्टि दोष, रतौंधी आदि से निजात मिल सकती है।
  • इस प्रकार की rudraksha माला को बच्चों को पहनाने से उनकी नेत्र ज्योति हमेशा बनी रहेगी।
  •  इससे बुद्धि का विकास और अभिव्यक्ति में कुशलता आती है।
  • इसे धारण किये जाने से व्यक्ति में इच्छाएं व आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती हैं।
  • व्यक्ति को शौर्य और प्रेम हासिल होता है।
  • मुख, गले और मूत्र रोग से छुटकारा पाने में लाभकारी है।  

सप्तमुखी रुद्राक्ष का महत्व (importance of 7 mukhi rudraksha)

सात मुखों वाली rudraksha माला के बारे में कहा जाता है कि यह अनंत है इसलिए इसे महासेन अन्तादि गणों के नाम से भी जाना जाता है।

धारण मंत्र-’ॐ हुं नम:’

7 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे (7 mukhi rudraksha benefits in hindi)

  • सप्तमुखी रुद्राक्ष का प्रतिनिधित्व शनिदेव करते हैं यदि शनि के प्रतिकूल प्रभाव से कोई व्यक्ति पीड़ित है तो इसके प्रयोग से समस्या से निजात पाया जा सकता है।
  • सेवा, नौकरी और व्यापार करने वालों के यह लाफ़ी लाभदायक है।
  • यह शारीरिक दुर्बलता, अंगहीनता, विकलांगता, लकवा, मिर्गी आदि रोगों से छुटकारा दिलाने में सहायक है।
  • इससे व्यक्ति के जीवन में प्रगति, कीर्ति और धन की वर्षा होती है।
  • इसे धारण करने वालो को गुप्त धन की प्राप्ति होती है।  

अष्टमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 8 mukhi rudraksha)

अष्टमुखी rudraksha का सीधा सम्बन्ध सिद्धिविनायक भगवान गणेश से है और, संसार के सभी जघन्य पापों को माफ़ कर देने वाले विनायक अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते है। 

धारण मंत्र-’ॐ हुं नम:’

8 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे ( 8 mukhi rudraksha benefits in hindi )

  • अष्टमुखी rudraksha छायाग्रह से सम्बन्ध रखता है अर्थात इसके प्रयोग से राहु दोष से पीड़ित लोगों को राहत मिलती है। साथ ही भगवान गणेश की कृपा बानी रहती है।
  • इस rudraksha को पहनने वाला व्यक्ति तेजस्वी, बलशाली, बुद्धिमान व्यक्तित्व वाला बनता है।
  • इसके प्रयोग से फेफड़े का रोग, चर्म रोग, सर्पदंश भय से मुक्ति मिलती है।
  • यह rudraksha सौंदर्य वृद्धि करता है यह दोनों ही रूपों बाहरी और आंतरिक सुंदरता बढ़ाने में सहायक है।
  • यह बुद्धि विकास और गणना शक्ति प्रदान करता है।
  • कला में निपुणता और प्रतिनिधित्व कौशल में वृद्धि होगी।
  • इससे नाड़ी संबंधित रोग से छुटकारा मिलता है। 

नौमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 9 mukhi rudraksha)

नौ मुख वाले इस rudraksha का सम्बन्ध भैरव से है, इसकी अधिष्ठात्री देवी अम्बे है और अष्टमुखी का यह स्वरुप कपिल है। नौ देवियों के रूप वाला यह रुद्राक्ष नवदुर्गा के सभी नौ रूपों की शक्तियों को समाहित किये हुए है।

धारण मंत्र’ॐ ह्रीं ह्रुं नम:’

9 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे ( 9 mukhi rudraksha benefits in hindi )

  • यह rudraksha के प्रयोग से वैवाहिक बाधा, संतानोत्पत्ति में बाधा, व्यापार में किसी तरह की अड़चन समाप्त हो जाती है।
  • इससे राहु पीड़ित दोष, नेत्र रोग, फोड़े-फुंसी आदि से छुटकारा मिल सकता है।
  • किसी बच्चे के गले में 9 मुखी rudraksha माला को पहनाने से बच्चे के निकट श्वांस और नेत्र सम्बन्धी बीमारियां नहीं आती है।[3]

दसमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 10 mukhi rudraksha )

दसमुखी rudraksha भगवान विष्णु यानी जनार्दन का प्रतिनिधित्व करता है जो पूरे ब्रह्माण्ड के संचालक है। 

10 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे

  • दसमुखी rudraksha माला को धारण करने वाला व्यक्ति और उसका परिवार सदैव भगवान विष्णु की छत्रछाया में रहता है और विष्णु जी एक सरंक्षक के तौर पर उनकी रक्षा करते हैं।
  • इस rudraksha पर यमराज की भी कृपा दृष्टि बनी हुई है, इसके प्रयोग से व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो सकता है।
  • प्रसव काल (प्रसव का अर्थ होता है जनन या बच्चे को जन्म देना से ठीक पहले) यदि इस दसमुखी rudraksha माला को स्त्री की कमर में बाँध दिया जाए तो इससे प्रसव क्रिया कम कष्ट पूरी होती है।
  • मिर्गी, हकलाना, सूखा रोग जैसी बिमारियों से व्यक्ति को छुटकारा मिलता है।
  • दस मुखी रुद्राक्ष काला जादू, भूत-प्रेत और अकेलेपन आदि के भय से छुटकारा दिलाता है।  
  • तनाव और अनिद्रा की शिकायत रखने वालों के लिए यह लाभकारी है।   
  • नवग्रह की शान्ति और वास्तु दोषों को समाप्त करने में मुख्य भूमिका निभाता है। 
  • किसी भी प्रकार की कानूनी समस्या से निपटने के लिए और व्यापार में हो रही समस्याओं से निजात दिलाता है।  
  • सम्मान शांन्ति और सौंदर्य मिलता है।
  • कान और हृदय की बीमारियों में राहत मिलती हैं
  • विवाह में परेशानी और बृहस्पति ग्रह से सम्बन्ध रखने वालों को दसमुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।[4]

10 मुखी रुद्राक्ष की पहचान क्या है?

  • 10 धारियों वाला रुद्राक्ष 10 मुखी रुद्राक्ष कहलाता हैं रुद्राक्ष के पेड़ मुख्यता इण्डोनेशिआ और नेपाल में होते हैं
  • इंडोनेशिया के 10 मुखी रुद्राक्ष के पेड़ के दाने 4 से 15 मिलीमीटर व्यास वाले होते हैं
  • नेपाल के 10 मुखी रुद्राक्ष के पेड़ के दाने 10 से 33 मिलीमीटर व्यास वाले होते हैं [5]

10 मुखी रुद्राक्ष धारण की विधि

  • पहले 10 मुखी रुद्राक्ष को गंगाजल में स्नान करवाए
  • इसके बाद 10 मुखी रुद्राक्ष को चन्दन लगाए, धूप दिखाए और सफ़ेद फूल चढ़ाए
  • इसके बाद 10 मुखी रुद्राक्ष को शिव जी की मूर्ति या शिवलिंग से स्पर्श करवाए
  • और धारण मंत्र-’ॐ नम:शिवाय’ का 11 बार जाप करे [6]

एकादशमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 11 mukhi rudraksha)

ग्यारह मुखी rudraksha के बारे में स्कंदपुराण में भगवान शिव ने वर्णन करते हुए कहा कि इसका संबंध भगवान के रूद्र स्वरुप से है। जो भी जातक इसे धारण करते हैं उसे हज़ार अश्वमेध यज्ञ करने, सौ बाजपेय यज्ञ करने और चंद्रग्रहण में दान करने के बराबर फल प्राप्त होता है। इसमें भगवान शिव के सर्वश्रेष्ठ 11 अवतारों की शक्तियां समाहित हैं।

धारण मंत्र’ॐ ह्रीं ह्रुं नम:’

11 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे

  • एकादशमुखी rudraksha धारण करने से भाग्योदय होता है। धन वृद्धि होती है साथ ही व्यक्ति पर भगवान शिव की कृपा सदैव बनी रहती है।
  • यह rudraksha अत्यंत दुर्लभ श्रेणी का है, मान्यता है कि इस प्रकार का rudraksha बहुत भाग्यवान लोगों को ही प्राप्त होता है।
  • इसे प्रयोग में लाने वाला व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है।
  • ग्यारह मुखी rudraksha कई गंभीर और लाइलाज बिमारियों जैसे कैंसर, पित्ताश्मरी, अपस्मार आदि रोगों का शमन करता है।

द्वादशमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 12 mukhi rudraksha )

बारह मुख वाले rudraksha का सीधा संबंध भगवान सूर्य से है। ऋग्वेद में सूर्य देवता के बारे में कहा गया है कि वे सभी नक्षत्रों, ग्रहों और राशिमंडल के राजा है जिनके होने से ही इस संसार में रोशनी विद्यमान है। सूर्य देवता की उपासना से बड़े से बड़े रोगों से निजात पाई जा सकती है जिसका प्रमाण सूर्य पुराण में उल्लेखित है।

धारण मंत्र-’ॐ क्रौं क्षौं रौं नम:’

12 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे

  • द्वादशमुखी rudraksha का प्रभाव बिल्कुल एक मुखी रुद्राक्ष के सामान है, एकमुखी rudraksha न होने पर 12 मुख वाले rudraksha को धारण किया जा सकता है।
  • जो भी बारहमुखी rudraksha माला को धारण करते हैं या कंठ में धारण करते है वे जो हत्या, नरहत्या, अमूल्य रत्नों की चोरी आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं।
  • ह्रदय, त्वचा और आँखों से जुड़े रोगों, दाद, कुष्ठादि, स्फोट, रतौंधी, रक्त विकार संबंधी बिमारियों से छुटकारा मिलता है।
  • उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को यह जरुर धारण करना चाहिए।
  • इसे धारण करने से व्यक्ति हर प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है।
  • व्यक्ति निर्भीक बनता है और उसका आत्मतत्व बहुत मजबूत स्थिति में आ जाता है।
  • इससे जातक का आर्थिक पक्ष मजबूत होता है और वह दरिद्रता आदि से दूर रहता है

त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 13 mukhi rudraksha)

तेरह मुखी rudraksha का प्रतिनिधित्व मां लक्ष्मी करती हैं। इस rudraksha को धारण करने से मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। 

धारण मंत्र-’ॐ ह्रीं नम:’

13 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे

  • यह rudraksha साधना, सिद्धि और भौतिक उन्नति के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
  • आयुर्वेद शास्त्रकारों ने त्रयोदशमुखी rudraksha को संजीवनी की संज्ञा है जिससे इसके औषधीय महत्व को समझा जा सकता है। यह कैंसर, रक्तचाप, लिंगदोष, योनिदोष आदि से बचाव करता है।
  • इसे धारण करने वाले व्यक्ति सभी प्रकार की महामारियों से बचे रहते है।

चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 14 mukhi rudraksha )

इस rudraksha का प्रतिनिधित्व भगवान हनुमान करते है। इसे धारण करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान शिव ने अपनी लीलाओं को संपन्न करने के लिए हनुमान रुपी अवतार लिया था। संकट मोचक बन हनुमान अपने भक्तों का आज तक उद्धार कर रहे हैं। 

धारण मंत्र-’ॐ नम:’

14 मुखी रुद्राक्ष पहनने के फायदे

  • हनुमान जी की कृपा से व्यक्ति सभी संकटों का निर्भीक होकर सामना करते है।
  • मनुष्य के जीवन में मौजूद सभी आपदाएं तकरीबन नष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति दिग्विजय रूप धारण कर लेता है।
  • इससे ह्रदय रोग, नेत्र रोग, अल्सर, मधुमेह और कैंसर आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।

पंचदशमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 15 mukhi rudraksha )

यह rudraksha पशुपतिनाथ का स्वरुप माना गया है। भगवान पशुपतिनाथ आर्थिक मनोकामनाओं को पूरा करते है। यह अत्यंत दुर्लभ श्रेणी में आता है।

धारण मंत्र-‘ॐ श्रीं मनोवांछितं ह्रीं ॐ नमः’

षोडशमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 16 mukhi rudraksha)

सोलह मुखों वाला यह rudraksha महाकाल स्वरुप से संबंधित है। इसे धारण करने वाले काल भय से मुक्त रहते है। मान्यता तो यह भी है कि इसे धारण करने से सर्द मौसम में भी ठण्ड का एहसास नहीं होता है।

धारण मंत्र-‘ॐ हौं जूं सः’

सप्तदशी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 17 mukhi rudraksha)

सत्रह मुखों वाले इस rudraksha में मां कात्यायनी का वास होता है। इसे प्रकार के rudraksha को धारण करने से साधक इस लोक में रहकर अलौकिक शक्तियों को पा सकता है।

धारण मंत्र-‘ॐ ह्रीं हूं हूं नमः’

अष्टदशीमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 18 mukhi rudraksha)

17 मुखों वाले रुद्राक्ष का संबंध पृथ्वी से है जिस कारण इसे धारण करने वाला व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ तथा बुद्धिमान होता है। शिशु के रोगों से निवारण के लिए इस प्रकार के rudraksha का प्रयोग किया जाता है।

धारण मंत्र‘ॐ ह्रीं हूं एकत्व रूपे हूं ह्रीं ॐ’

उन्नीसमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 19 mukhi rudraksha)

उन्नीस मुखों वाले rudraksha को क्षीर सागर में शयन कर रहे नारायण देवता का है। यह व्यापर में उन्नति और भौतिक सुखों के लिए उपयोग में लाया जाता है।

धारण मंत्र-‘ॐ ह्रीं हूं नमः’

बीसमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 20 mukhi rudraksha)

यह 20 मुखों वाला rudraksha भी दुर्लभ श्रेणी में आने वाले रुद्राक्षों में शामिल है। इसके अंतर्गत नवग्रह- सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु समेत दिक्पालों तथा त्रिदेव की शक्तियां समाहित होती है।

धारण मंत्रॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं ब्रह्मणे नमः’

इक्कीसमुखी रुद्राक्ष का महत्व ( importance of 21 mukhi rudraksha )

21मुखों वाला रुद्राक्ष कुबेर का प्रतिनिधित्व करता है और कुबेर की शक्तियां निहित होने के कारण जो भी इसे धारण करता है वह संसार की सभी सुख-समृद्धि और भोग-विलास का आनंद प्राप्त करता है।  [4]

धारण मंत्र’ॐ ह्रीं हूं शिव मित्राय नमः’

कौन सा रुद्राक्ष किस देवता के लिए है? (which rudraksha is for which god?)

जानिये किस राशि के अनुसार रुद्राक्ष कौन सा मुखी रुद्राक्ष लाभकारी है? (which rudraksha is for which rashi?)

मेष :  मेष राशि वालों को तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

वृष : वृष राशि वालों के लिए छः मुखी रुद्राक्ष धारण करना अच्छा रहता है। 

मिथुन : मिथुन राशि वालों के लिए चार मुखी रुद्राक्ष अत्यंत लाभकारी है। 

कर्क : कर्क राशि वालों को दो मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

सिंह : सिंह राशि के जातकों को 12 मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

कन्या : कन्या राशि वालों को चार मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

तुला : तुला राशि वालों के आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करना अच्छा माना जाता है।  

वृश्चिक : वृश्चिक राशि वालों के लिए तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।। 

धनु : धनु राशि वालों के लिए पांच मुखी रुद्राक्ष सही रहता है। 

मकर : मकर राशि के जातकों को सात मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

कुम्भ : कुम्भ राशि वालों के लिए आठ मुखी रुद्राक्ष अच्छा होता है। 

मीन : मीन राशि वालों को दस मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।  

रुद्राक्ष केवल फल मात्र नहीं

शिवपुराण में उल्लेखित ये 21 मुखी rudraksha भगवान शिव के अश्रु से बने है लेकिन इनकी विशेषताओं को गहराई से जानें तो मालूम पड़ता है कि यह केवल वृक्ष पर पाया जाने वाला फल मात्र नहीं बल्कि जीवन में मौजूद हर उस संकट का हल है जिसे खोज पाना थोड़ा कठिन तो है पर मुश्किल हरगिज़ नहीं।

खेत से निकला शिवलिंग और शिवजी ने अपने भक्तों को आत्महत्या करने से रोका।

गांव में गरीब किसान रहा करता था जिसका नाम था साधु , साधु अपने खेत में दिन रात मेहनत करता परंतु मेहनत अनुसार उसे उसका फल कभी नहीं मिलता था। कभी बारिश ना होने के कारण कभी धूप तेज होने के कारण कभी कोई परेशानी हो जाने के कारण उसको उसकी फसल का सही मूल्य नहीं मिल पाता था। एक बार गांव में बिल्कुल भी बारिश ना हुई। सूखा पड़ने के कारण खेत में फसल हुई नहीं थी जिससे परेशान होकर साधु है। आत्महत्या करने का निर्णय लिया । अगले दिन जब साधु अपने खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि उसने देखा कि खेत के बीचो-बीच कोई चीज पड़ी हुई है जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ रहा है और वह बहुत चमक रही है। वह खेत में बीच गया तो उसने देखा एक बहुत छोटा सा शिवलिंग वहां पर पड़ा हुआ था।

उसे समझ ना आया कि यह शिवलिंग यहां कैसे आया। उसने उस शिवलिंग को बड़े आदर के साथ उठाया और खेत के पास ही एक पेड़ के नीचे रख दिया। वह शिवलिंग बहुत गंदा हो रहा था तो पास ही से एक पात्र में जल लाया और उस शिवलिंग को स्नान कराने लगा। स्नान कराते समय संयोग मात्र से शिव लिंग से पानी उसकी खेत में चला गया। कुछ देर बाद वहां से साधु अपने घर चला गया। यह सोच कर कि धूप बहुत है और मैं इस धूप में कार्य नहीं कर सकता। सारा दिन घर पर भी सोचता रहा कि मैं ऐसा क्या करूं कि मेरे खेत में फसल हो जाए और अगर कुछ नहीं हुआ तो जो पैसा ब्याज पर लिया है वह मैं कैसे लौट आऊंगा?

परंतु जब उसे कोई उपाय नहीं मिला तो उसने हाथ जोड़े पर शिवजी को याद कर कहा हे महादेव, अब आप ही कोई रास्ता दिखाओ। अन्यथा मेरे पास एक ही उपाय है कि मैं आत्महत्या कर हर चीज से दूर हो जाऊं l यह सब सोचते सोचते साधु बिना कुछ खाए पिए सो गया। जब वे सुबह उठा तो उसने देखा कि गांव में बहुत तेज वर्षा हुई है। वह भागा भागा अपने खेत की ओर गया कि खेत में कहीं जल तो नहीं भर गया। अगर ज्यादा जल भर गया। तुम्हें जो मैंने बीज खेत में डाले हैं वह सब खराब हो जाएंगे। परंतु जब वह खेत पहुंचा तो उसने देखा कि बीज अंकुरित हो चुके हैं और उनमें छोटे-छोटे पौधे निकल आए हैं।

यह देख साधु की खुशी का ठिकाना ना रहा l परन्तु उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि 1 दिन में इतना सब कैसे हो गया तब उसकी नजर उस शिवलिंग पर पड़ी जिसकी स्थापना साधु ने पेड़ के नीचे की थी। उस शिवलिंग से अभी बूंद-बूंद जल साधु के खेत में बहता हुआ आ रहा था। साधु को ज्ञात हुआ कि यह कुछ और नहीं यह महादेव की महिमा है जिसने मेरे सारे संकट दूर किए हैं और मैं कितना मूर्ख था। मैं आत्महत्या करने की कोशिश कर रहा था।

साधु शिवलिंग के पास गया उस पर जल डालकर उसको फिर से स्नान कराया और शिव जी से माफी मांग कर कहा कि प्रभु आप मेरे साथ हैं और मैं इतना अंधा हो चुका था कि आत्महत्या करने चला था। प्रभु मुझे क्षमा कर दें। प्रकार महादेव ने खुद शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों के सारे संकट दूर किए और आत्महत्या करने से रोका। 

जब शेषनाग ने अंध शिव भक्त के पाँव से लिपट कर बचायी उसकी जान

भगवान को लेकर सभी की आस्था और विश्वास भिन्न भिन्न होता है , कोई भगवान् को पिता के रूप में देख , खुद को उसकी संतान बताता है तो कोई भगवान् को मित्र ही बताता है। और भगवान् के भक्त कुछ है ही इस प्रकार के की अपने भक्ति की सहारे से ही आत्मा का परमात्मा से मिलान करवा ही लेते है।

तो यह कहानी है ऐसे ही काशी के गंगा घाट पर रहने वाले अन्ध शिव भक्त की जिनका नाम भोला था ।भोला जन्म से अंधा था और माता
पिता को ही बचपन में खो दिया था तो क्रूर संसार में जब भोला अकेला था तो उसने भगवान शिव का हाथ थामा। भोला प्रात
उठकर रोज गंगा नदी में स्नान करने जाता तो लोग कहा करते थे कि मत जा भोला, तुझे दिखता तो है नहीं किसी दिन डूब
जाएगा, तो भोला कहता मुझे नहीं दिखता तो क्या हुआ भोलेनाथ को तो दिखता है ना वह बचा लेंगे। भोला का भाव महादेर के प्रति कुछ अलग ही था। दिन भर शिव का नाम लेकर उन्हें याद करता। परंतु जब कुछ गलत होता तो शिव का नाम लेकर उन पर चिल्लाता उन्हें डांट
देता।

भोला के भाव व भक्ति शिव के प्रति कुछ भिन्न ही थी। इस कारण लोगों से पागल भी कहने लगे थे। पर भोला ने कभी इन बातों
पर ना ध्यान दिया ना दिल में रखकर बुरा लगाया । वह खुद में और शिव की भक्ति में खुश था। एक रोज जब भोला पूजा कर घर
की ओर लौट रहा था तब भोला को पता चला कि शहर से बाहर आज शाम शिव सत्संग है, तो भोला ने सोच लिया कि वह आज
सत्संग में जाएगा।

घर पहुंचकर अपना थैला जिसमें शिवजी की एक तस्वीर और कुछ फल थे व अपनी लाठी उठाई और चल दिया सत्संग के लिए । शहर से बाहर था एक रेलवे फाटक भोला उसे पार करने लगा। पर वह इस बात से अनजान था कि दूसरी ओर से तेजी से बढ़ती हुई ट्रेन भोला की तरफ चली आ रही है। आसपास के लोगों ने चिल्लाकर भोला को पीछे हटने को कहा पर भोला ट्रेन की आवाज में कुछ सुनने में असमर्थ था। भरी भीड़ में से किसी ने कहा देखो एक साँप उसकी ओर तेजी से बढ़ रहा है l आसपास की भीड़ ने मान लिया कि आज भोला की जान नहीं बचेगी एक ओर से ट्रेन दूसरी ओर से साँप । और फिर लोगों ने कुछ ऐसा देखा जिसे देखकर भी माना ना जा सके।

भोला के दोनों पैरों में रस्सी की तरह लिपट गया और जब भोला ने आगे कदम बढ़ाया तो वह गिर गया और ट्रेन भोला के बगल से निकल गई। ट्रेन के निकलते ही सांप भी भोला के पैरों से अलग होकर कहीं दूर निकल गया तो यह देखकर सभी मौजूद लोग अचंभित रह गए। यह उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। जब लोगों ने बोला, वो सब बताया तो वह मुस्कुराया और बोला मेरी रक्षा किसी और ने नहीं भगवान शिव व उनके भेजे शेषनाग ने की है।हां, यह सत्य है। मैं जन्म से अंधा हूं। मैं कुछ देख नहीं पाता परंतु शिव तो सब देखता है,मेरा सुख-दुख सब मैं अपनी रक्षा क्या करूंगा। शिव है ना मेरी रक्षा करने वाले और जय महादेव बोल कर वहां से निकल गया , भोला की भक्ति और महादेव के प्रति आस्था व विश्वास को देख सभी हैरानी में पड़ गए।

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