Shani Yantra Reduces the Bad Effects of Shani Sade Sati Phase

शनि यंत्र क्या है? ( What is Shani Yantra? )


Shani Yantra कुंडली में प्रकट होने वाले ग्रह दोषो के निवारण के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह अत्यधिक प्रभावशाली उपाय है। यदि शनि जातक की कुंडली में अशुभ फल दे रहा है तो यह यन्त्र प्रयोग में लाया जाता है। 

बता दें कुंडली में इसके प्रभावों को कम करने के लिए शनि यन्त्र एक रामबाण उपाय के तौर पर देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इस बात का उल्लेख है कि यदि यह शुभ फल प्रदान कर रहा है तब भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। आइये जानते है शनि यन्त्र के अद्भुत फायदों के बारे में : 

शनि यंत्र के लाभ ( Shani Yantra Benefits in hindi )


1. Shani Yantra के प्रयोग से शुभ फल भी अत्यधिक मिलेगा। यह लाभ को दोगुना करना का कार्य करता है। 

2. शनि की साढ़े साती और ढैय्या के प्रभाव कम करने के लिए इसका प्रयोग होता है। इसके माध्यम से काफी हद तक अशुभ फलों को कम किया जा सकता है।  

3. Yantra के प्रभाव से जातक दीर्घायु और अच्छा स्वस्थ्य प्रदान करता है।  

4. व्यापार के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए यह बहुत लाभकारी है।  

5. प्राचीन काल से ही कई ज्योतिष विद्वान काले जादू और वशीकरण के प्रभाव को कम करने के लिए इसका प्रयोग करते हैं।  

6. आध्यात्मिक कार्यों में लगे लोगों के लिए यह यन्त्र बहुत फलदायी है। यह अनुशासन, एकाग्रता और आदर्श जैसे गुण प्रदान करता है।  

7. Shani Yantra इतना अधिक शक्तिशाली है कि यह बड़े प्रभुत्वशाली पद की प्राप्ति कराता है।
  
8. ध्यान रखने योग्य बात यह है कि बिना प्राण प्रतिष्ठा के यन्त्र का कोई लाभ नहीं होता है।

शनि यंत्र स्थापना विधि ( How to Place Shani Yantra? )


1. ShanI Yantra स्थापना के लिए शनिवार के दिन प्रातःकाल स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. इसके बाद शनि यन्त्र को शनिदेव की प्रतिमा के साथ रखें और उसपर गंगाजल छिड़कें।
   
3. दीपक और धूप जलाकर शनि के समक्ष फल-फूल अर्पित करें।  

4. तत्पश्चात शनि बीज मंत्र जाप 11 या 21 बार करें। 
 
5. इस विधि का पालन करते हुए Shani Yantra की स्थापना की जानी चाहिए। 

शनि यन्त्र लॉकेट क्या है? ( What is Shani Yantra Locket? )


Shani Yantra के अलावा जातक शनि यन्त्र लॉकेट धारण कर सकते हैं। शनि यन्त्र लॉकेट को धारण करने से यह कई प्रकार के रोगों से व्यक्ति की रक्षा करता है। जिस प्रकार एक यन्त्र वातावरण का शुद्धिकरण करता है। दोषों से मुक्ति दिलाता है उसी प्रकार Shani Yantra रुपी लॉकेट व्यक्ति के शरीर का शुद्धिकरण करता है। यह शरीर के दोषों का खात्मा करता है। आइये जानते हैं इसके लाभों के बारे में :

Shani Yantra Locket Benefits in hindi


1. Shani Yantra लॉकेट व्यक्ति को लम्बी आयु प्रदान कर रोगों से रक्षा करता है।  

2. अकाल मृत्यु के भय को कम करता है।  

3. यह जातकों को अनुसाशन, आदर्शवाद और एकाग्र क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।  

4. काले जादू और वशीकरण से सरंक्षण करता Shani Yantra है।  

How to wear a Shani Dev Locket?


1. Shani Yantra लॉकेट को धारण करने के सबसे शुभ दिन शनिवार है।  

2. शनिवार को प्रातःकाल स्नान कर शनिदेव की प्रतिमा के आगे तेल का दीपक जलाएं।  

3. शनि आरती का पाठ करते हुए लॉकेट को शनिदेव के समक्ष अर्पित करें।  

4. उसके बाद ही इस Shani Yantra लॉकेट को धारण करें।  

5. इस तरह शनिदेव की कृपा सदैव जातक पर बनी रहेगी। 

Why is Shanidev black?


पौराणिक कथाओ के अनुसार राजा विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य देव के तेज के कारण संध्या भय में रहती थी। सूर्य देव और संज्ञा की वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संताने हुई। तीन संताने होने के बावजूद संज्ञा का तेज को लेकर भय कम नहीं हुआ था।

इसके समाधान के रूप में संज्ञा ने अपनी छाया को जन्म दिया। फिर वह अपने बच्चों की देखभाल के लिए छाया को छोड़कर अपने पिता के घर चली गई। संज्ञा का यह रूप छाया था और इसके कारण उसे सूर्य के तेज से भी कोई परेशानी नहीं थी।
धर्म ग्रंथों में इस बात का जिक्र है कि जब shani dev छाया के गर्भ में थें, उस वक़्त छाया भगवान शिव की भक्ति में लीन हो गई थी। छाया अपनी भक्ति में इतनी अधिक मग्न थी कि उन्हें खाने पीने तक की सुध न रही। इसका प्रभाव शनिदेव पर पड़ा और उनका रंग काला पड़ गया। बता दें कि शनिदेव के वाहन 9 है जिनमें कौआ, गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, सियार, शेर, हिरण, मोर और हाथी है।

शनिदेव के दृष्टि डालते ही सूर्य देव पड़े काले

Lord Shanidev के वर्ण को देख सूर्य देव को संदेह हुआ और उनहोंने शनिदेव को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया कर दिया। छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी और उनकी तपस्या की सारी शक्ति शनिदेव में पहुँच चुकी थी। 

अपने पिता के यह शब्द सुन वे क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपनी दृष्टि सूर्य देव पर डाली। दृष्टि डालते ही सूर्य देव काले पड़ गए। अपना यह हाल देख सूर्य देव भगवान शंकर की शरण में पहुंचे। 

भगवान शंकर ने सूर्य देव को उनकी गलती का एहसास कराया। फिर क्षमायाचना के बाद जाकर सूर्य देव पुरानी स्थिति में आये। लेकिन इस घटना के बाद से ही शनिदेव को पिता विरोधी कहा जाता है। शनि देव न्याय के देवता कहे जाते हैं। यही देवता सभी को उनके कर्मों के आधार पर न्याय दिया करते हैं। [source

How to Worship Shani Dev on Saturday?


1. शनिवार को प्रातःकाल स्नान कर शनिदेव की प्रतिमा के आगे सरसो के तेल का जलाएं।  

2. साथ ही शनि भगवान को आक के फूल अर्पित करें।

3. भोग स्वरुप मीठी पूड़ी, काला तिल आदि अर्पित करें।  

4. इसके बाद शनिदेव की आरती और चालीसा का पाठ भी अवश्य करें।   

5. संभव हो तो शनि महाराज के मंत्र का ध्यानपूर्वक 108 बार जाप करना चाहिए।
  
6. इस विधि का हर शनिवार पालन किये जाने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

शनि व्रत कथा ( Shani Vrat Katha )


शनि महाराज की कथा में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में झगड़ा हुआ। विवाद यह कि हम में सर्वश्रेष्ठ कौन है? इसके लिए वे इंद्रदेव के पास गए और कहा कि न्याय करो हम में बड़ा कौन है?यह सवाल सुन इंद्र देव चिंता में आ गए।  

उन्होंने कहा कि मेरे अंदर इतना सामर्थ्य नहीं जो किसी को बड़ा या छोटा बताऊँ। एक उपाय है कि आप सब राजा विक्रमादित्य के पास जाएँ वे लोगों के दुखो का निवारण कर न्याय दिलाते हैं।  यह सब सुन सभी नवग्रह राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे और अपना प्रश्न राजा के सामने रखा। 
 
राजा भी यह प्रश्न सुन चिंतित हो उठे और हल तलाशने में जुट गए। उन्होंने उपाय के तौर पर सोना, चांदी, कांसा, पीतल, शीशा, रांगा, जस्ता अभ्रक और लौह इन 9 धातुओं के 9 आसन बनवाये। इन आसनों को उनके धातुओं के क्रम वार तरीके से रख दिया गया। 

जिसमें सबसे पहला स्थान सोने का उसके बाद चांदी और इसी क्रम में सभी आसन रखे गए। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने सब ग्रहों से कहा कि आप सब अपने अपने सिंहासन पर विराजमान हो जाएँ।  

जब राजा के न्याय से शनिदेव हुए क्रोधित

Shani Dev ki Katha : जिसका आसन सबसे आगे है वह सबसे बड़ा और जिसका आसन सबसे पीछे है वह सबसे छोटा होगा। क्रमवार आसन में लोहे का स्थान सबसे पीछे था और वह शनिदेव का आसन था। यह देख शनिदेव को ज्ञात हो गया कि राजा ने उन्हें सबसे छोटा बतलाया है। 

इसपर शनिदेव क्रोधित हो उठे और उन्होंने कहा कि राजा तू मेरे पराक्रम को नहीं जानता, सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति 13 महीने, बुध और शुक्र एक महीना, पर मैं एक राशि पर ढाई अथवा साढ़े सात साल तक विराजमान रहता हूँ। 

बड़े से बड़े देवताओं को भी मैंने अत्यधिक दुःख दिया।  राम को साढ़ेसाती आई तो उन्हें वनवास हो गया और रावण की आई तो रावण के कुल का नाश हो गया। अब तुम सावधान रहना! यह सुन राजा ने कहा जो कुछ भाग्य में होगा देखा जाएगा।  यह कहकर शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से गए।  

विक्रमादित्य की साढ़े साती की दशा

शनिदेव की कथा : कुछ समय बाद राजा को साढ़े साती की दशा आई। शनिदेव उस समय घोड़ों के सौदागर बनकर अनेक सुन्दर घोड़ो सहित राजा की राजधानी में आये।  जब राजा ने सौदागर के आने की खबर सुनी तो उन्होंने अश्वपाल को अच्छे घोड़ों को लेने का आदेश दिया। घोड़ों की कीमत बहुत ज्यादा थी, अश्वपाल ने जाकर यह सारी व्यथा राजा को कह सुनाई। 

राजा वहां पहुंचें और उन्होंने उसमें से सबसे उत्तम घोड़ा चुनकर उसपर सवार हो गए। घोड़े पर सवार होते ही घोड़ा जोर से भागा। घोड़ा बहुत दूर एक घने जंगल में राजा को छोड़कर कहीं दूर चला गया। इसके बाद राजा अकेले घने जंगल में भटकता रहा। भूख- प्यास से व्याकुल राजा को एक ग्वाला दिखा जिसमें राजा को जल दिया। जल पीकर राजा ने अपनी अंगूठी ग्वाले को भेंट स्वरुप दी।

सेठ का हार चोरी करने का वीका पर आरोप

शनि देव कथा : राजा शहर में पहुंचकर एक सेठ की दुकान में जाकर बैठ गया और उसने खुद को उज्जैन का रहने वाला वीका बताया। उस दिन भाग्यवश सेठ की बिक्री अधिक हुई थी। तब सेठ उसको वीका को भाग्यवान समझकर अपने साथ ले गया।  राजा ने आश्चर्य की बात देखी कि खूँटी पर हार लटक रहा है और वह खूँटी उस हार को निगल रही है। 

जब सेठ को कमरे में हार न मिला तो सब ने यही निश्चय किया कि सिवाय वीका के इस कमरे में कोई नहीं आया। अतः उसने ही हार को चोरी किया है। हार चुराने के जुर्म में वीका को फौजदार के पास ले जाया गया। वहां पर वीका के सजा के तौर पर हाथ पैर काट दिए गए। 

इस तरह वीका चौरंगिया हो गया। इसके बाद कुछ समय बाद एक तेली चौरंगिया को अपने घर ले गया और उसे एक कोल्हू पर बैठा दिया। वीका उस कोल्हू पर बैठकर जबान से बैल हांकता रहा। इस तरह शनि की दशा खत्म हुई।

राग सुन चौरंगिया पर मुग्ध हुई राजकुमारी

Shani Dev Vrat Katha : इसके बाद एक रात को वर्षा ऋतू के समय वीका मल्हार गाने लगा।  यह गाना सुन उस शहर के राजा की कन्या उसपर मोहित हो उठी।  उसने दासी को गाने वाले का पता लगाने के लिए भेजा।  दासी शहर में घूमती रही और अंत में जाकर उसे तेली के घर में एक चौरंगिया राग गाता हुआ दिखाई दिया। 

दासी ने यह सब वृतांत राजकुमारी को कह सुनाया।  यह सुन राजकुमारी ने उसी क्षण यह प्रण लिया कि वह उसी चौरंगिया से विवाह करेगी। यह सब सुन कन्या के माता पिता बहुत दुखी हुए परन्तु राजकुमारी की हठ के आगे राजा की एक न चली और राजकुमारी का विवाह चौरंगिया से करा दिया गया।  

राजा विक्रमादित्य को शनिदेव का स्वप्न

Shani katha : रात्रि को जब विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये तब शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न दिया।  उस वक़्त विक्रमादित्य ने शनिदेव से अपने किये की क्षमा मांगी और शनिदेव के सामने प्रार्थना की। प्रार्थना करते हुए विक्रमादित्य ने कहा कि हे! शनिदेव जैसा दुःख आपने मुझे प्रदान किया है ऐसा दुःख अन्य किसी को भी न दें।

शनिदेव ने कहा कि तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार है।  जो भी मनुष्य मेरी कथा सुनेगा या कहेगा, जो नित्य ही मेरा ध्यान करेगा और चींटियों को आटा डालेगा। उसके ऊपर मेरा प्रकोप होने के बावजूद कोई दुःख नहीं होगा।  साथ ही उस व्यक्ति के सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। यह कहते हुए शनिदेव ने राजा विक्रमादित्य को माफ़ कर दिया।  इस तरह विक्रमादित्य के हाथ पैर लौटा दिए गए।

चौरंगिया से फिर विक्रमादित्य रूप में आये राजा

Shanivar Vrat Katha : सुबह होते ही राजकुमारी राजा को देख आश्चर्यचकित हो गई। राजा विक्रमादित्य ने रानी को यह सब वृतांत कह सुनाया। फिर रानी ने अपनी सखी को यह सब कहानी बताई। यह वृतांत सेठ के कान तक पहुंचा। सेठ दौड़ा-दौड़ा राजा विक्रमादित्य के पास आया और अपने किये की माफ़ी मांगने लगा। 

राजा ने विक्रमादित्य को कहा कि मुझपर शनिदेव का दोष था जिस कारण मैंने यह दुःख भोगा। इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं। सेठ बोला कि मुझे तभी शान्ति होगी जब आप प्रीतिपूर्वक भोजन करेंगे।  

इसके बाद वह सेठ राजा को अपने घर ले गया। जहाँ राजा विक्रमादित्य को भोजन करते समय फिर से वहीँ खूँटी दिखाई दी जो हार को उगल रही थी। यह देख सेठ को हार मिल गया और उसने राजा को बहुत सारी भेंट दी। इसी के साथ सेठ ने कहा कि मेरी कन्या का पाणिग्रहण आप करें। इसके बाद सेठ ने अपनी कन्या का विवाह राजा के साथ कर दिया और बहुत दान-धन, हाथी-घोड़े भी दिए।  कुछ दिन के बाद दोनों राजकुमारियां और राजा विक्रमादित्य अपनी सेना लेकर अपने राज्य की ओर चले।  

Shaniwar ki katha : राजा के आगमन की खबर सुन उज्जैन के सब लोग ख़ुशी से झूम उठे। अपने राज्य पधारने के बाद राजा ने अपने राज्य में यह सूचना दी कि शनि देवता सभी ग्रहों में सर्वोपरि है। मैंने उनको छोटा बतलाया जिसके कारण मैंने अनेक दुःख झेले। इस तरह राज्य में हर शनिवार को पूरे राज्य में शनिदेव की पूजा अर्चना की जाने लगी।

राहु-केतु और शनि को प्रसन्न करने के खास उपाय 


शनि दोष के उपाय :

1. शनि से जुड़े दोषों को समाप्त करने के लिए शनि यन्त्र को स्थापित करना चाहिए। यह सबसे सर्वोत्तम उपाय है।  
 
2. हर शनिवार को कुत्ते को रोटी खिलानी चाहिए और दान करना चाहिए।  

3. शनिवार के ही दिन बरगद के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इससे दोषों की समाप्ति होती है यदि यह क्रिया नियमित तौर पर चलें।  

4. शनि बरगद के पेड़ के साथ ही शमी के पेड़ की भी पूजा करने से शनि दोष की समाप्ति होती है।   

राहु के प्रकोप को कम करने के उपाय


1. राहु को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।

2. उसके बाद नीचे दिए गए राहु मंत्र का भी जाप करना चाहिए।
राहु मंत्र –

ह्रीं अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:।
ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु प्रचोदयात्।


3. रात्रि को सोते समय अपने सिरहाने पर जौ रखें जौ के दानों को दान करें।

4. पक्षी जैसे चिड़िया को दाना खिलाने से राहु का प्रकोप दूर होता है।  

केतु का प्रकोप कम करने का उपाय


1. केतु को प्रसन्न करने के लिए भगवान गणेश की पूजा की जानी चाहिए।

2. इसके बाद नीचे दिए मंत्र का जाप करें।

केतु मंत्र –

”ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम।।
ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:।
ॐ पद्मपुत्राय विद्‍महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात्।”


3. बताते चलें राशि में केतु के प्रभाव को कम करने के लिए कुत्ते को पालना भी अच्छा माना जाता है।  

शनि देव को कैसे प्रसन्न करें?


1. शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए हर शनिवार को व्रत करें और पूजा पाठ करें।  

2. शनि पूजा में सिन्दूर, काली तिल्ली का तेल का दीपक जलाएं और नीले रंग के फूल अर्पित करें। 
 
3. हर शनिवार शनि महाराज के 10 नामों को दोहराते हुए पूजा करनी चाहिए। 
   
4. शनि देव को काला वस्त्र और काला तिल चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं।   

5. शनि मंत्र जाप खासकर बीज मंत्र का 108 बार जाप करने से जातकों पर शनि की असीम कृपा बरसती है।  

नीचे शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण मंत्रो का उल्लेख किया गया है :

शनि बीज मंत्र

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

श्री शनि वैदिक मंत्र

ऊँ शन्नोदेवीर-भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः।

शनि देव का जाप मंत्र

ॐ शं शनैश्चराय नमः।

Shani Tantrik Mantra

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

Shri Shani Dev ki Aarti

Shri Shani Chalisa

Shani Dev Stotra

शनि की ढैय्या क्या है?

शनि की ढैय्या का अर्थ है जब शनि की दशा जातक की राशि में ढाई साल तक रहती है। इस दौरान व्यक्ति को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह समस्याएं सेहत से जुड़ी, जॉब, व्यवसाय और धन से जुड़ी हो सकती है। 
  

शनि की साढ़े साती कितने समय की होती है?

जब चंद्र राशि से शनि 12वें, पहले और दूसरे भाव में रहता तो उसे साढ़ेसाती अवधि कहते है। यह अवधि साढ़े सात साल की होती है। इसके तीन चरण होते हैं, जिसमें से तीसरे चरण खत्म होते-होते यह व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करने लगता है।
जब शनिदेव चंद्र राशि पर गोचर से अपना भ्रमण करते हैं तो उस समय साढेसाती मानी जाती है। इसका प्रभाव राशि में आने के 30 माह पहले से और 30 माह बाद तक रहता है।  

शनि देव को क्या-क्या चढ़ाया जाता है?

शनि महाराज को सरसों का तेल, काला तिल, काले वस्त्र व काले रंग की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। यह सभी सामग्री यदि शनिवार के दिन शनिदेव को चढ़ाई जाएँ तो शुभ फल की प्राप्ति होती है।  

शनि के चमत्कारी उपाय कौन-2 से हैं?

1. नियमित रूप से शिव सहस्त्रनाम का पाठ करने से शनि का प्रकोप खत्म हो जाता है।  
2. यदि जातक शनि की ढैय्या या साढ़े साती की दशा से गुजर रहा है तो व्यक्ति को शमी के पेड़ की जड़ को एक काले कपड़े में गाँठ बांधकर दाहिने हाथ में बांधे।  साथ ही शनि मंत्र जाप करें।    

3. कुंडली में शनि के प्रकोप को कम करने के लिए हर रोज सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। इससे व्यक्ति के सभी दोष दूर हो जाते हैं।  

4. शमी के पेड़ की पूजा करने से भी शनि का प्रकोप दूर होता है।  

5. अपने मां बाप और घर के बड़े बुजुर्गों का आदर सम्मान और सेवा करने से शनिदेव की कृपा होती है।        

शनिदेव का भोग क्या होना चाहिए?  

शनिदेव का सबसे प्रिय भोग उड़द की दाल की खिचड़ी है। साथ ही शनि महाराज को मीठी पूड़ी और काले तिल भी चढ़ाए जाते है।   

शनिदेव को क्या पसंद है?

शनिदेव को आके के फूल और सरसो का तेल भी बहुत पसंद है।  शनिवार के दिन ये दोनों चीजे अर्पित करते हुए शनिदेव की पूजा की जानी चाहिए। इससे जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है।  

शनि ग्रह का रंग कैसा होता है?

वैसे तो शनि ग्रह रंग काला बताया गया है लेकिन कहीं कहीं पर नीला रंग भी शनि का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक शनि का काला रंग यानी नाइट्रोजन (N2) के कारण है। 

शनिदेव की माता का नाम क्या है?

शनिदेव की माता का नाम छाया है जो कि विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा की छाया थीं। इन्हीं के गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ था।  

Who is Wife of Shanidev?

शनिदेव की पत्नी का नाम नीलिमा और दामिनी है। दरअसल उनकी दो पत्नियां हैं नीलिमा उनकी शक्ति है।  वहीँ दामिनी ने शनिदेव को उनपर ध्यान न देने के कारण श्राप दिया था। श्राप यह कि आप जिसपर भी अपनी दृष्टि डालोगे वह नष्ट हो जाएगा। यही वजह है शनिदेव सदैव अपनी दृष्टि नीचे झुकाकर रखते हैं।    

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