Shardiya Navratri 2022 शारदीय नवरात्री जानिए तारीख कब है महाष्टमी और नवमी

 हिन्दू पंचांग के अनुसार इस साल शारदीय नवरात्री की शुरुवात 26 सितम्बर से लेकर 5 अक्टूबर तक मनाई जाएगी. अश्विन मास के अमावस्या के साथ पितृपक्ष खत्म हो जायेगा और इसी के साथ नवरात्री की शुरुवात हो जाएगी. नवरात्री को नवदुर्गा के नामसे भी जाना जाता है.  नवरात्री में 9 दिन 9 अलग अलग देवियो की पूजा की जाती है और १० वे दिन दशमी बनाई जाती है . तिथि के घटने बढ़ने के अनुसार नवरात्री में  अष्टमी और नवमी भी आगे पीछे होती रहती है।

शारदीय नवरात्रि का महत्व [Shardiya navratri 2022 importance ]

 नवरात्र का त्योहार हिंदू धर्म के सभी त्योहारों से भिन्न है क्योंकि  नवरात्र का पर्व नारी शक्ति का प्रतीक देवी दुर्गा का समर्पित है। हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयतेयानी “सभी जीव जंतुओं में चेतना के रूप में ही माँ/ देवी तुम स्थित हो”.

ऐसे में  नवरात्र का यह पर्व हमें इस बात का एहसास दिलाता है की हर बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।  धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्ही 9 दिनों में माँ दुर्गा धरती पर आती है और धरती को उनका मायका कहा जाता है और इसी आगमन में नवरात्री को बहुत धूम धाम से मान्य जाता है .

नवरात्री में कैसे करते है माता चौकी की स्थापना / देवी पूजन की सही और सही विधि

नवरात्री की पूजा पूरी विधि विधान से की जाये तो माँ दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती है. नवरात्री के ९ दिनों में इन खास बातो का हमेशा रखे ध्यान – १- नवरात्रि के पहले दिन ९ दिनों के उपवास का स्नाकल्प ले .

और कलश स्थापना करने के बाद देवी के इस स्वरूप की पूजा करें। सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें.और पूजा स्थल पर लाल कपडा रखे। हो सके तो किसी ब्रह्मण को इसके लिए बुलाये।

२- इन दिनों घर की सफाई का पूरी तरह ध्यान रखे .पुरे घर में गंगाजल और गोमूत्र का छिड़काव करे . उसके बाद फूल , अक्षत , चन्दन , कुमकुम, रोली से और र मिठाई का भोग लगाकर   देवी माँ क पूजा आरती  करे . और घी का दीपक जलाये ध्यान रखे ९ दिनों तक ये दीपक बुझ न पाए।   इसके पश्चात दुर्गा सप्तशती का पाठ, दुर्गा स्तुति करें। और इस मंत्र के उच्चारण करे

 या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

देवी के  पाठ स्तुति करने के बाद दुर्गाजी की आरती करके प्रसाद वितरित करें। – नवरात्री के ९ दिन और ९ देवी के रूप , और उनके बीज मंत्र  /

शुभ रंग

 नौ दिनों तक Devi Durga के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है .नौ दिनों तक Devi दुर्गा 9  अलग-अलग रूपों की पूजा होती है, देवी के नौ रूप अलग अलग शक्तियों को दर्शाते हैं. आईये जानते है देवी के 9 रूप उनके मंत्र और खास रंग

  नवरात्रो मे क्या करे और क्या न करे

क्या करे :-

-नवरात्रि पर अगर आप 9 दिन के लिए व्रत न रख सकें तो नवरात्रि के पहले और अंतिम दिन व्रत रखें और मां की पूजा-अर्चना करें. मान्‍यता है कि इससे जीवन में सफलता मिलती है.

-इन 9 दिनों में घर की साफ-सफाई का पूरा ध्‍यान रखना चाहिए.

-नवरात्रि पर कन्या भोजन जरूर कराएं. मान्‍यता है कि इससे घर में अन्न की कमी नहीं होती.

-धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए. साथ ही लहसुन, प्याज और मदिरा के सेवन से भी दूरी बनाकर रखें.

-नवरात्रि पर पक्षियों के लिए दाना पानी की व्यवस्था करनी चाहिए. -घर आए अतिथि और भिक्षा के लिए आए व्‍यक्ति को आदर के

साथ भोजन कराएं. इससे मां भगवती प्रसन्न होती हैं और भक्‍तों पर कृपा करती हैं

नवरात्र में क्या करे क्या न करे

-व्रत रखने वालों को दाढ़ी-मूंछ और बाल नहीं कटवाने चाहिए।

-नौ दिनों तक नाखून नहीं काटने चाहिए।

-अगर अखंड ज्योति जला रहे हैं तो इन दिनों घर खाली छोड़कर नहीं जाएं।

-खाने में प्याज, लहसुन और तामसिक न खाएं।

-नवरात्रि के दौरान व्रत करने वालों को दिन में नहीं सोना चाहिए।

– नवरात्रि में चमड़े से बनी किसी भी चीज का प्रयोग न करें।

-नवरात्रि के उपवास में अनाज और नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। हालांकि कई लोग व्रत में सेंधा नमक का सेवन करते हैं।

 इन 9 दिनों में  फलाहार भोजन  करें . और  सुबह पूजा अर्चणा करने के बाद दिन भर माँ देवी का ध्यान करे और शाम में पूजा अर्चना करने के बाद  फलाहार करे या एक वक़्त का भोजन भी कर सकते है . ध्यान रखे इन दिनों तामसिक भोजन न करें यानि इन 9 दिनों में प्याज , लहसुन और मांस का सेवन नहीं कारण चाहिए .

नवरात्री से जुडी पौराणिक कथा / नवरात्री का इतिहास

Navratri Saal me do Baar शारदीय नवरात्रि असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है. इससे जुड़ा इतिहास  के अनुसार मां दुर्गा ने महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया था . जिसने ब्रह्मा जी को अपने तपस्या से प्रसन्न किया था. महिषासुर ने ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था की उसे कोई देव दानव और राक्षस उसका वध ना कर सके।  और इसलिए ब्रह्मा जी ने इस एक शर्त पर महिसासुर को अमरता का वरदान दिया था . की उसका वध केवल एक स्त्री कर सकती है।  अमरता  वरदान के कारणवश महिसासुर ने तीनो लोक – पृथ्वी , स्वर्ग ,नरक पर हमला किया।  और महिसासुर से भयभीत होकर सभी देवताओ ने ब्रह्मा , विष्णु , महेश से मदद की प्रार्थना की।

महिषासुर का अंत

उन सभी असहाय देवताओ को देख के भगवान् विष्णु ने महिला बनाने  का निर्यण लिया चुकि महिसासुर का वध एक महिला ही कर कर सकती थी . तब भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा ने महिषासुर के विनाश  करने के लिए भगवान विष्णु द्वारा बनाई गई महिला में अपनी सारी शक्तियां एक साथ रख दीं। जिससे नवदुर्गा का रूप लिया .तब भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा ने महिषासुर को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु द्वारा बनाई गई महिला में अपनी सारी शक्तियां एक साथ रख दीं। और उन्होंने देवी दुर्गा का जन्म हुवा। मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक घमासान युद्ध चला और दसवे दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था.

और माना जाता है की देवी दुर्गा माता पार्वती का अवतार है जो शिव जी की पत्नी है।

नवरात्रि मे कन्या पूजन की विधि / कन्या पूजन कैसे करे ?

मां भवानी कन्याओं के रूप में आशीर्वाद देने आपके घर आती हैं . कन्या पूजन करके नवरात्रि व्रत का विधिवत पारण किया जाता है। जो भक्त नवरात्र में कन्या पूजन करता है उस पर मां दुर्गा की विशेष कृपा बरसती है। कन्या पूजन अक्सर महाष्टमी और महानवमी तिथि पर किया जाता है।
* नवमी तिथि के दिन कन्या पूजन से पहले घर को स्वच्छ कर लेना जरूरी है पहले घर का माहौल साफ-सुथरा कल लेना चाहिए तभी कन्या पूजन का फल मिलता है।
* कन्या पूजन में 9 कन्याओं के साथ एक बालक का पूजन करना उत्तम माना गया है। लेकिन अगर संभव नहीं हो तो कम से कम दो कन्याओं को जरूर भोजन कराएं।
* कन्याओं और बालक के पैर दूध या फिर पानी से अपने हाथों से साफ करें क्योंकि स्वयं देवी मां की सेवा मानी जाती है                        
* इसके बाद उनके पैर छूकर उनको साफ स्थान पर बैठाएं और फिर माथे पर अक्षत, फूल, कुमकुम का तिलक लगाएं।
*  कन्याओं को खीर-पूड़ी, हलवा-चना इत्यादि खिलाएं और इसके बाद उनको दान में रूमाल, लाल चुनरी, फल, खिलौने आदि भेंट स्वरूप दें और उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें। इसके बाद उनको खुशी-खुशी विदा करें।
* इस प्रकार पूजा करने के बाद दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन कर देना चाहिए, लेकिन जवारों को फेंकना नहीं चाहिए। उसको परिवार में बांटकर सेवन करना चाहिए।

FAQs

नवरात्री कब से शुरू हो रहे है /When is it Nvaratri Starting in 2022?

इस साल नवरात्री की शुरुवात 26 sepetember से हो रही है जो     4 october तक है और 5 अक्टूबर को विजयदशमी मनाई जाएगी .
नवरात्रि करने से क्या लाभ होता है?/ What are the Benefits of Navratri ?
नवरात्री में रखे गए व्रत का कई गुना ज्यादा फल मिलता है .  माँ दुर्गा  की उन पर विशेष कृपा बनी रहती है .व्यकित की इन दिनों भगवान के प्रति श्रद्धा और आस्था बनी रहती है नवरात्री के ये 9 दिन बहुत पावन  होते है . इसके साथ ही सुख है समृद्धि आती है

नवरात्रि 2022 अष्टमी कब है?/  When is Navratri 2022 Ashtmi?

राम नवमी के एक दिन पहले अष्टमी मनाई जाती है. इस बार शारदीय नवरात्री २६ सितम्बर से ४ अक्टूबर तक है तो इस साल नवरात्री  पर एक भी तिथि का क्षय न होने के कारण नवरात्रि नौ दिनों की पड़ रही है। जिसके कारण इस साल अष्टमी ३ अक्टूबर  को मनाई जाएगी।
शारदीय नवरात्रि क्यों मनाया जाता है?/ Why is  celebrated Shardiya Navratri ?
देवी दुर्गा ने आश्विन के महीने में महिसासुर के साथ 9 दिनों तक लगातार युद्ध किया और दसवे दिन  उसका वध किया.  इसलिए इस पर्व को 9 दिनों तक मनाया जाता है.
नवरात्रि का मतलब क्या होता है? / What is the meaning of Navratri ?

नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान,शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है।

    नवरात्रि साल में 2 बार क्यों मनाते हैं? / Why Navratri is celebrated twice a year?
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीराम ने रावण के साथ युद्ध पर जाने से पूर्व अपनी विजय की मनोकामना मानते हुए मां के आशीर्वाद लेने के लिए विशाल पूजा का आयोजन करवाया था। कहा जाता है कि राम देवी के आर्शीवाद के लिए इतना इतंजार नहीं करना चाहते थे और तब से ही प्रतिवर्ष दो बार नवरात्रि का आयोजन होता है।

      क्या है नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व? / What is the scientific significance of Navratri?
नवरात्र मनाने का वैज्ञानिक महत्व भी है। वर्ष के दोनों प्रमुख नवरात्र प्रायः ऋतु संधिकाल में या दो ऋतुओं के सम्मिलिन में मनाए जाते हैं। जब ऋतुओं का सम्मिलन होता है तो आमतौर पर शरीर में वात, पित्त, कफ का समायोजन घट बढ़ जाता है। इससे रोग प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है।

   नवरात्रों में क्या क्या खा सकते हैं? / What can eat during Navratras?

Navratri Vrat में लौकी, आलू ,शकरकंद ,कद्दू, गाजर, कच्चा केला ,खीरा और टमाटर का सेवन कर सकते हैं l. व्रत में आप दही का इस्तेमाल भी कर सकते हैं l आप अपने स्वाद के अनुसार दही को मीठी वा नमकीन इस्तेमाल कर सकते हैं .आप अधिक से अधिक फलों का सेवन कर सकते है . यदि आपने Navratri उपवास रखे है ,तो आप सिर्फ अरारोट का आटा ,साबूदाना आटा , कूटू का आटा, राजगिरा आटा ,समक के चावल या फिर सिंघाड़े के आटे का ही इस्तेमाल करें l

 

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नर्मदेश्वर शिवलिंग Narmadeshwar Shivling क्या है

नर्मदेश्वर शिवलिंग Narmadeshwar Shivling क्या है

दोस्तों आज मै आपको बताने जा रहा हूँ की नर्मदेश्वर शिवलिंग Narmadeshwar Shivling क्या है इसके फायदे ,लाभ, और पहचान आदि। तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े

यह कुछ प्रसिद्ध शिवलिंगो में से एक है। इस शिवलिंग को ‘बाणलिंग’ शिवलिंग के नाम से भी जाना जाता है। इस शिवलिंग के नाम के पीछे यह कारण बताया है की यह नर्मदा नदी के किनारे पाया जाता है। जिसके चलते ही इसका नाम नर्मदेश्वर शिवलिंग पड़ गया।

हमारे धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार मां नर्मदा को यह वरदान प्राप्त है कि इनकी नदी का किसी भी प्रकार का पत्थर शिवलिंग के रूप में ही विश्वभर में पूजा जाएगा। यहीं कारण है की नर्मदा नदी का हर पत्थर नर्मदेश्वर शिवलिंग के रूप में ही माना जाता है।

क्यों माना जाता है नर्मदेश्वर शिवलिंग को सर्वाधिक शक्तिशाली और पवित्र ?

नर्मदा नदी से निकलने वाले शिवलिंग को नर्मदेश्वर कहते है . – नर्मदा नदी को शिव के वरदान के कारण इससे प्राप्त होने वाले शिवलिंग को इतना ज्यादा पवित्र माना जाता है की नर्मदा नदी का कण-कण शिव माना जाता है.

जानिए नर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा करने के क्या लाभ है

हिन्दू धर्म में शिवलिंग की पूजा का बहुत ही विशेष महत्व बताया जाता है। शिवलिंग की पूजा आप अपने घर के आस पास के किसी मंदिर में जाकर कर सकते है, इसके अलावा आप शिवलिंग को अपने पूजा घर में भी स्थापित कर सकते है। घर में शिवलिंग होने से ना सिर्फ सकारत्मक वातावरण रहता है बल्कि सुख और शांति का भी संचार होता है।

वैसे तो शिवलिंग के बहुत से प्रकार पाएं जाते है लेकिन आज हम जिस शिवलिंग के बारे में जानकारी देने जा रहे है वो है – नर्मदेश्वर शिवलिंग। इस जानकारी में हम आपको बताएंगे कि क्यों आपको अपने घर में यह स्थापित करने चाहिए और इसके क्या फायदे हो सकते है। आइये जानते है क्या है नर्मदेश्वर शिवलिंग और इसके फायदे।

Narmadeshwar Shivling With Stone Base
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नर्मदेश्वर शिवलिंग Narmadeshwar Shivling के लाभ

1 घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना से आप किसी भी प्रकार के भय से मुक्ति पा सकते है। इसके साथ ही यह आपको आत्मविश्वास हासिल कराने में भी बहुत मददगार साबित होता है।
2 हर रोज इस शिवलिंग कि पूजा करने से सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिल जाती है। इसके साथ ही यह परिवारजनों पर आने वाले सभी
संकटों को भी टाल देता है।
3 यदि आप किसी काम के लिए बहुत अधिक प्रयास कर रहे है लेकिन किसी कारण से आपको सफलता नहीं मिल रही है तो इस स्थिति में
नर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा बहुत ही असरदार होती है। नर्मदेश्वर शिवलिंग भागोदय में भी कल्याणकारी साबित होता है।
4 नर्मदेश्वर शिवलिंग की प्रतिदिन पूजा करने से घर में सुख- समृद्धि के साथ शांति का भी वास होता है। माना जाता है की इसकी पूजा करने
से धन, वैभव, ज्ञान ओर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
5 नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना करने से घर से सभी प्रकार की नेगेटिव एनर्जी दूर हो जाती है। इसके अलावा यह शारीरिक कष्टों से
छुटकारा दिलाने के साथ ही मन की शांति प्रदान करने में भी असरदार साबित है।
6 नर्मदेश्वर शिवलिंग से अकाल मृत्यु की संभावना भी कम हो जाती है। वेद-पुराणों के अनुसार जिस स्थान पर नर्मदेश्वर शिवलिंग का वास
होता है, वहां काल और यम आसनी से प्रवेश नहीं करते है।

नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना के समय इन चीजों का रखें विशेष ध्यान

1 शिवलिंग की स्थापना किसी भी दिशा में की जा सकती लेकिन इनकी वेदी का मुख हमेशा उत्तर दिशा की ओर ही होना चाहिए।
2 घर में स्थापित होने वाले शिवलिंग की ऊंचाई 6 इंच से अधिक नहीं होनी चाहिए।
3 शिवलिंग को एक बड़े पात्र में रखें और फिर पूजा-घर में स्थापित करें।
4 शिवलिंग को स्थापित करने के बाद जल और बेलपत्र आदि अर्पित करें।

असली नर्मदेश्वर शिवलिंग Narmadeshwar Shivling की पहचान क्या है

दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से बताने जा रहे है की नर्मदेश्वर शिवलिंग की पहचान कैसे करते है तथा नर्मदेश्वर शिवलिंग कहा पाया जाता है. इसके अलावा इस टॉपिक से संबंधित अन्य और भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने वाले हैं. इसके लिए हमारा यह आर्टिकल लास्ट तक जरुर पढ़े.

ये है दुनिया का सबसे पवित्र शिवलिंग, ऐसे करें आराधना

नर्मदेश्वर शिवलिंग को सबसे ज्यादा सर्वाधिक शक्तिशाली और पवित्र माना जाता है. आइए जानें, इसकी आराधना और स्थापना करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

शिव जी की पूजा में शिवलिंग का विशेष महत्व है। सामान्य तौर पर ऐसा भी कहा जाता है कि बिना शिवलिंग की पूजा किए शिव जी की आराधना अधूरी रहती है। बता दें कि शिवलिंग को भगवान शिव का निराकार स्वरूप कहा गया है। ऐसे में शिव भक्तों के लिए शिवलिंग का महत्व और भी अधिक हो जाता है। इसके अलावा शिवलिंग में शिव जी और मां शक्ति दोनों का ही वास है। इस तरह से शिवलिंग की पूजा करने से शिव और मां शक्ति दोनों की ही आराधना हो जाती है। मालूम कि शिवलिंग कुछ खास प्रकार के होते हैं। इन सभी का अपना अलग-अलग महत्व है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन सभी शिवलिंगों में नर्मदेश्वर शिवलिंग को सबसे पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। आज हम आपको नर्मदेश्वर शिवलिंग के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

बता दें कि नर्मदा नदी से निकलने वाले शिवलिंग को नर्मदेश्वर शिवलिंग कहा जाता है। दरअसल नर्मदा नदी को भगवान शिव का आशीर्वाद मिला हुआ है। इस आशीर्वाद से नर्मदा नदी का कण-कण बहुत ही पवित्र बताया गया है। इस वजह से इस नदी से निकलने वाले शिवलिंग सबसे ज्यादा पवित्र माने जाते हैं। नर्मदेश्वर शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि वह हमें कई तरह के भय से बचाता है। कहते हैं कि नर्मदेश्वर शिवलिंग के वास स्थान से काल और यम का भय दूर रहता है।
शिव पूजा में शिवलिंग की महत्ता को देखते हुए इसे घर और मंदिर दोनों जगहों पर स्थापित किया जाता है। इसे इन दोनों जगहों पर स्थापित करने के अलग-अलग नियम हैं। इसमें सबसे सामान्य सी बात यह है कि शिवलिंग की वेदी का मुख उत्तर दिशा में होना चाहिए। कहा जाता है कि नर्मदेश्वर शिवलिंग की आराधना से भक्त पर शिव जी की कृपा बरसती है। नर्मदेश्वर शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय उसमें बेलपत्र भी शामिल करना चाहिए। ऐसा करने से शिव जी काफी प्रसन्न रहते हैं।

Nazar Dosh : जानिये नज़र दोष के लक्षण और उससे मुक्ति पाने के उपाय

नज़र दोष क्या होता है? ( Nazar Dosh kya hota hai? )


Nazar Dosh :
कई बार व्यक्ति लाख कोशिश करे तब भी वह अपने लक्ष्य को पा सकने में असफल होता है। वह सोचता है कि इतनी मेहनत के बावजूद कुछ हासिल नहीं हो रहा इससे बेहतर है वह हार मान जाए। परन्तु जीवन में आने वाले ये संकट हमारे भाग्य में नहीं लिखे होते बल्कि कुछ लोगों की ईर्ष्या के चलते हमारे सफर का हिस्सा बन जाते हैं।

ये प्रतिकूल परिस्थितियां हमारे ग्रह दोषों और नज़र लगने के कारण उत्पन्न होती हैं। बुरी नज़र के कारण व्यक्ति के आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है और सभी शुभ कार्यों में अड़चनें आनी शुरू हो जाती हैं। आज हम आपको उन्हीं नज़र दोषों से जुड़ी जानकारी देने वाले हैं कि नज़र दोष के लक्षण क्या होते हैं?, नज़र लगी हो तो क्या करना चाहिए? साथ ही ऐसे कौन से टोटके हैं जिनसे व्यक्ति शीघ्र ही नजर दोष से मुक्ति पा सकता है।

कैसे पता करे की नजर लगी है? ( Kaise pata kare ki nazar lagi hai? ) 


आइये जानते हैं नजर दोष के लक्षण ( nazar dosh ke lakshan ) :

1. घर को बुरी नजर लग जाए तो हर दिन घर में किसी न किसी प्रकार का कलेश होता है, माहौल अशांति भरा बना रहता है।

2. दुकान में नजर लग जाए तो ग्राहकों पर असर पड़ता है, नकारात्मक ऊर्जाएं दुकान में बिक्री नहीं देती हैं।

3. व्यापार या धंधे में नजर दोष लगा हो तो लाभ नहीं मिलता, आक्समिक हानि का सामना करना पड़ता है। यदि प्रभाव ज्यादा हो तो धंधा चौपट होने की नौबत तक आ सकती है।

4. व्यक्ति पर बुरी नज़र का असर उसके मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। कोई भी कार्य सफल नहीं होने देता।

5. किसी शिशु नजर लगने की स्थिति में वह अचानक से बीमार पड़ जाता है। उसका व्यवहार चिड़चिड़ा हो जाता है।

नजर दोष से बचने के उपाय ( nazar dosh se bachne ke upay )


आइये जानते हैं buri nazar ke upay in hindi :

1. बुरी नजर यदि व्यक्ति को लगी है तो इसके लिए Panchmukhi Hanuman Kavach धारण करना चाहिए। हनुमान जी हर बुरी नजर से व्यक्ति की रक्षा करेंगे और जल्द ही सकरात्मक ऊर्जा का प्रवाह नजर दोष से पीड़ित व्यक्ति के आभामंडल में बढ़ने लगेगा।

2. व्यापार में भारी नुकसान और धंधा चौपट होने की स्थिति से गुजर रहे जातकों के लिए नजर दोष निवारण यंत्र Money Vastu fengshui Stone बहुत लाभकारी है इसे व्यापार या दुकान वाले मुख्य स्थान पर लगाने से जातक को शीघ्र ही अपनी समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।

3. यदि आपको ऐसा लगता है कि आपके घर या दुकान को किसी की बुरी नज़र लगी है तो अपने घर/ dukan ki nazar utarna के लिए मुख्य द्वार पर नींबू-मिर्ची के साथ नजर दोष निवारण यंत्र Ghode Ki Naal Evil Eye को लगाएं। कुछ समय बाद आपको अपने घर का माहौल शान्तिमय दिखने लगेगा।

4. घर की सुख-समृद्धि और धन-अन्न की कमी को दूर करने के लिए नजर दोष निवारण यंत्र Nazar Suraksha Kavach (नज़र सुरक्षा कवच) को घर के मुख्य द्वार पर लगाएं।

5. नजर उतारने के प्राचीन उपाय में एक उपाय है दो सूखी लाल मिर्च, थोड़ा नमक, सरसों के कुछ दाने बच्चे के सिर के ऊपर से नीचे की ओर 3 बार घुमाएं और फिर उसे जला दें। जलने की इस प्रक्रिया से उसके राख बनने तक शिशु की नजर तुरंत उतर जाएगी।

6. Dukan ko buri nazar se bachne ke upay के लिए दुकान में सुबह-शाम कपूर और लोबान जलाएं। अभिमंत्रित रक्षासूत्र को बांधकर रोजाना कपूर जलाने के बाद गंगाजल भी छिड़कें।

नजर बट्टू कब लगाना चाहिए? ( Nazar Battu kab lagana chahiye? )


जब आपको ऐसा लगे कि आपके घर को किसी बुरी शक्तियों ने घेर लिया है। नकारात्मक ऊर्जा हर कार्य में अड़चन डाल रही है तो घर में लाल धागे में बांधकर नज़र बट्टू लगाएं। इससे घर का वातावरण सकारात्मक बना रहेगा।

जानिये चार मुखी रुद्राक्ष की पहचान का तरीका और अद्भुत फायदे

4 मुखी रुद्राक्ष का महत्व ( Significance of Four Mukhi Rudraksha ) 

चार मुखी रुद्राक्ष संसार के जड़-चेतन के स्वामी ब्रह्मा जी का प्रतिनिधित्व करता है। इस रुद्राक्ष के अधिपति देवता ब्रह्मा जी और अधिपति देवी सरस्वती मानी जाती है जबकि इस रुद्राक्ष के अधिपति ग्रह बुध देव हैं। इसका अर्थ है कि यह char mukhi rudraksha ब्रह्मा के समान रचनात्मक, सरस्वती के समान ज्ञानी और कलात्मक गुणों से भरपूर है। बुध देव इसके अधिपति ग्रह होने के कारण यह रुद्राक्ष कुंडली में कमजोर बुध की स्थिति और उसके दोषों को दूर करने का कार्य भी करता है। इसका महत्व छात्रों के लिए बहुत अधिक है।
दूसरे शब्दों में कहें तो चार मुखी रुद्राक्ष पढ़ने-लिखने वाले छात्र वर्ग, शिक्षक, कला के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए सबसे उत्तम है। यह तो सभी को मालूम है कि rudraksh का उद्भव भगवान शिव के अश्रुओं से हुआ है इसलिए यह भोलेनाथ को अत्यधिक प्रिय है। परन्तु रुद्राक्ष के हर मुख में किसी न किसी देवी-देवता और ग्रह का वास है। जिस कारण हर रुद्राक्ष की विशेषताएं बदल जाती हैं। आज हम आपको चार मुखी रुद्राक्ष के बारे में बताने जा रहे हैं।

4 मुखी रुद्राक्ष के फायदे ( 4 mukhi rudraksha benefits in hindi ) 

आइये जानते हैं चार मुखी रुद्राक्ष के लाभ :

1. इसे धारण करने से संचार कौशल के विकास और आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है।

2. 4 mukhi rudraksha ke fayde में एक फायदा यह भी है कि इससे व्यक्ति में तार्किक और बौद्धिक क्षमता बढ़ने लगती है।

3. यह rudraksh पढ़ाई में स्कूली छात्रों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

4. char mukhi rudraksha पत्रकारों, शिक्षकों, लेखकों और शोधकर्ताओं के कौशल में वृद्धि करता है।   

5. बुध ग्रह से संबंधित दोषों वाले जातकों को यह रुद्राक्ष अवश्य ग्रहण करना चाहिए।

चार मुखी रुद्राक्ष कैसे धारण करें? ( How to wear four mukhi rudraksha? )

1. Rudraksh ki mala को धारण करने के लिए सबसे शुभ दिन सोमवार माना जाता है।

2. इस दिन भगवान शिव की पूजा कर, शिवलिंग पर जल अर्पित करें।

3. इसके बाद भोलेनाथ का नाम लेकर आसन पर बैठ जाए और चार मुखी रुद्राक्ष के धारणीय मंत्र का 108 बार जाप करें।

                              4 मुखी रुद्राक्ष का मंत्र : धारण मंत्र-‘ॐ ह्रीं नम:’
 
4. अब चार मुखी रुद्राक्ष को मन्त्रों का उच्चारण करते हुए रुद्राक्ष माला धारण करें।  

5. ध्यान रहे कि रुद्राक्ष धारण करने के बाद भगवान शिव की नियमित रूप से पूजा अवश्य की जानी चाहिए।

4 मुखी रुद्राक्ष की पहचान ( Identification of Four mukhi rudraksha )


1. चार मुखी रुद्राक्ष को पहचानने का सबसे पहला तरीका है उसमें निर्मित धारियों को पर गौर करना। इस रुद्राक्ष की पहचान ही चार धारियां है।  

2. 4 मुखी रुद्राक्ष में विद्युत चुंबकीय तत्वों का समावेश होता है इसलिए जब इसे दो सिक्कों के बीच रखा जाता है तो इसमें एक गति देखने को मिलती है। उस गति के चलते यह खुद-ब-खुद किसी भी दिशा में मुड़ने लगता है। आप इस परिक्षण को घर में उपयोग में लाए जाने वाले सिक्कों से करके देख सकते हैं।

3. रुद्राक्ष को जब जल के अंदर डाला जाए तो वह ऊपर नहीं तैरता बल्कि जल में भीतर जाकर बैठ जाता है। हालाँकि यह परिक्षण इतना कारगर नहीं है क्योंकि आज कल बाजारों में ऐसी बहुत सी लकड़ियां है जो पानी में डूब जाती हैं।

4 मुखी रुद्राक्ष कौन पहन सकता है? ( Who can wear Four Mukhi Rudraksha? )

4 मुखी रुद्राक्ष को छात्र वर्ग, शिक्षक, कला के क्षेत्र से संबंध रखने वाले लोग, पत्रकार, शोधकर्ता आदि पहन सकते हैं।

4 मुखी रुद्राक्ष कब पहनना चाहिए? ( When to wear Four Mukhi Rudraksha? )

4 मुखी रुद्राक्ष को पहनने के सबसे शुभ दिन सोमवार का माना जाता है क्योंकि रुद्राक्ष में भगवान शिव का वास माना जाता है।

किस राशि वालों को चार मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए?

यदि वृष राशि, मिथुन राशि, कन्या राशि और तुला राशि के लोग चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करते हैं तो यह उनको अत्यधिक लाभ पहुंचाएगा। चार मुखी रुद्राक्ष इन चार राशियों के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है।  

Hanuman Jayanti 2022 : श्री नरसिंह हनुमान मंदिर में भव्य हनुमान जन्मोत्सव का आयोजन

अंजनी के लाल और केसरी महाराज के Kesari Nandan, मारुति नंदन पवनपुत्र हनुमान का जन्मोत्सव इस वर्ष १६ अप्रैल हिन्दू कैलेंडर की चैत्र महीने में रात्रि के 2 बज कर 25 मिनट पर मनाया जायेगा। इस साल ख़ास बात यह है की हनुमान जयंती  को शनिवार का दिन पड़ रहा है, जो की हनुमान पूजन के लिए  शुभ दिन माना जाता है. Hanuman jayanti utsav 2022 हिन्दुओ में बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। दिल्ली के चांदनी चौक मार्केट में स्थित पांडव कालीन प्राचीन श्री नरसिंह हनुमान महाराज मंदिर में तक़रीबन 150 वर्ष से Hanuman Jayanthi 2022 पर विशेष  कार्यक्रमों का आयोजन होता आ रहा है।  

Narsingh bhagwan hanuman प्राचीन मंदिर इस साल भी बड़े ही धूम धाम से हनुमान जयंती  के अवसर पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है। मंदिर के महंत श्री गौरव शर्मा महाराज जी ने “प्रभु भक्ति” से साक्षत्कार करते हुए बताया की इस वर्ष हनुमान जयंती पर होने वाला कार्यक्रम बहुत भव्य होगा। मंदिर के महंत के अनुसार प्राचीन नरसिंह भगवान हनुमान मंदिर में हनुमान जी की सवा मन की चांदी की प्रतिमा है। जिसका साल में  सिर्फ 2 बार श्रद्धालुओं को दर्शन कराया जाता है, एक हनुमान जयंती के दिन और दूसरा कृष्ण जन्माष्टमी के दिन। 

हनुमान जयंती 2022 भव्य यात्रा

16 अप्रैल 2022 हनुमान जयंती के दिन ऐतिहासिक विशाल शोभा यात्रा और कलश यात्रा को पुरे दिल्ली शहर में निकला जायेगा।  यह विशाल शोभा यात्रा दिल्ली के दरीबा से नई सड़क को पार  करते हुए हौज़ काज़ी  से अजमेरी गेट,सदानंद बाजार , खड़ी बावली से फतेहपुरी होते हुए वापिस narsingh devta हनुमान मंदिर पर  समाप्त होगी। यात्रा मे भव्य  हनुमान जी की  10 फुट  की हिलती हुई  प्रतिमा का भी दर्शन होगा जो दिल्ली की सड़को पर  पहली  बार देखने को मिलेगा।  इस यात्रा को और आनंद दायक बनाने के लिए उज्जैन से  50 लोगों के महाकाल के समूह को भी निमंत्रण दिया गया है , जो नाचते , गाते हुए यात्रा में  शामिल होंगे।  

श्री नरसिंह हनुमान मंदिर अखंड रामायण पाठ एवं विशाल भंडारा

यात्रा के साथ-साथ अखंड रामायण पाठ , जो की 24 घंटे, 16 अप्रैल को सुबह  5 बजे से शुरू होकर  17 अप्रैल की  सुबह 5 बजे तक चलेगा। पाठ के समय ही विशाल भंडारे  का भी प्रबंध किया गया है , जिसे भक्तगण उन 24 घंटो के बीच ग्रहण कर सकते है. मंदिर प्रबंधक  के द्वारा श्री हनुमान जी  महाराज को 56 भोग का प्रसाद  भी चढ़ाया जाएगा,जिसे भक्तो के बीच में भी बांटा जाएगा।

भजन संध्या एवं प्रसिद्ध गायकों की उपस्थिति

मंदिर द्वारा  हनुमान जयंती की संध्या को मधुर भजनों का कार्यक्रम  भी रखा गया है, जिसमे महान कलाकारों की टोली भी हिस्सा लेंगे  और हमारे प्रिये और प्रसिद्ध गायक हंसराज रघुवंशी का भी आगमन होगा। श्री narsingh swami hanuman मंदिर की  ओर  से हंसराज रघुवंशी के द्वारा भजन भी गाया गया है जिसे नरसिंह हनुमान मंदिर के परिसर में और चांदनी चौक की गलियों में  फिल्माया गया है , जिसमे खुद मंदिर के महंत गौरव शर्मा जी महाराज, हंसराज रघुवंशी और ओलम्पिक कांस पदक विजेता बजरंग पुनिया दिखाई देंगे। भजन हंसराज रघुवंशी के ऑफिशियल  यूट्यूब चैनल पर हनुमान जयंती के दिन लांच किया जाएगा। इस हनुमान जन्मोत्सव मे लेज़र शो के द्वारा  बड़े परदे पर सम्पूर्ण रामायण रात्रि 8 बजे से 45 मिंनट तक  दिखाई जायेगी। 

Maha Shivratri 2022 : जाने अनजाने में ऐसे बना एक शिकारी भोलेनाथ का परमभक्त

महाशिवरात्रि का महत्व ( Mahashivratri Significance )


शैव पंथ के लिए सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि होता है, यह एक ऐसा दिन होता है जिस दिन भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। व्रत का पालन करते हैं और अपना पूरा समय भोलेनाथ के ध्यान में लगा देते हैं। आज हम Mahashivratri की कहानी के बारे में बताने जा रहे है। इस कथा का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि इसका वर्णन शिव पुराण में मिलता है।

महाशिवरात्रि की कथा ( Mahashivratri ki katha ) :


शिव पुराण में वर्णित महाशिवरात्रि की कथा कहती है कि पुराने में समय में एक शिकारी हुआ करता था जिसका नाम चित्रभानु था। चित्रभानु के ऊपर बहुत अधिक कर्जा था और यही उसके जीवन की सबसे बड़ी परेशानी थी। साहूकार ने शिकारी से अपना सारा कर्जा वसूलने के लिए उसे सज़ा देने की सोची।

साहूकार को मालूम था कि Chitrabhanu कर्ज देने की स्थिति में नहीं है इसलिए उसने चित्रभानु को एक शिवमठ में बंदी बना दिया। चित्रभानु के साथ सबसे बड़ा संजोग यह हुआ कि जिस दिन उसे बंदी बनाया गया वह दिन महाशिवरात्रि का था साहूकार ने महाशिवरात्रि के उपलक्ष में अपने घर में पूजा का भव्य आयोजन किया। पूजा के बाद Shivaratri की कथा का पाठ भी किया गया शिवमठ में बंदी बना बैठा चित्रभानु शिकारी भी पूजा और कथा में बताई गई बातों को ध्यान से सुनता रहा। जैसे ही पूजा कार्यक्रम समाप्त हुआ। तुरंत साहूकार ने चित्रभानु को अपने पास बुलाया और उससे कर्ज चुकाने की बात कही तो शिकारी ने उसे ऋण वापिस देने का वचन दिया।

इस Mahashivratri Vrat Katha में शिकारी का वचन सुन साहूकार ने तुरंत उसे रिहा कर दिया। अपनी रिहाई के तुरंत बाद शिकारी जंगल में शिकार के लिए गया, अब रात हो चली थी इसलिए शिकारी ने वहीँ जंगल में आराम करने की सोची। चित्रभानु आराम करने के लिए बेल के पेड़ पर चढ़ गया। बेल के पेड़ के ठीक नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। सौभाग्य तो चित्रभानु का इस तरह से साथ दे रहा था मानो स्वयं ईश्वर उसका मार्गदर्शन कर रहे हों। शिकारी बेल के पेड़ पर रात बिताने लगा और उसके नीचे स्थापित शिवलिंग बेलपत्र से ढक चुका था क्योंकि शिकारी ने पेड़ से बेलपत्र की कुछ पत्तियां तोड़ी और इसी दौरान उसकी कुछ पत्तियां शिवलिंग पर जा गिरी।

Shivratri Katha आगे इस प्रकार है कि शिकारी भूखा था इसलिए उसका Maha Shivaratri के व्रत का पालन हो गया। शिकारी भूख प्यास से बहुत व्याकुल था तभी उसे एक हिरणी वहां से जाते हुए दिखी। चित्रभानु ने जैसे ही हिरणी पर तीर दागने की सोची हिरणी बोली कि मैं गर्भवती हूँ कुछ ही समय में बच्चे को जन्म देने वाली हूँ तू अभी मुझे मारकर एक साथ दो जीवों की हत्या करेगा।

जैसे ही मैं अपने बच्चे को जन्म दे दूंगी शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाउंगी अभी मुझे जाने दो। इसपर शिकारी ने उसकी बात मान ली और उसे जाने दिया। अपना धनुष रखने के दौरान पेड़ से कुछ बेल पत्र गिराकर नीचे शिवलिंग पर गिर गए इस तरह चित्रभानु की प्रथम प्रहर की पूजा सम्पन्न हुई।

इसके कुछ समय बाद वहां से एक और हिरणी निकली शिकारी ने उसे देखते ही अपने धनुष से तीर शिकार के लिए निकाल लिया यह देख हिरणी बोली कि मैं थोड़ी देर पहले ऋतू से निवृत्त हुई हूँ और मैं अपने प्रिय को खोज रहीं हूँ। अपने पति से मिलकर मैं शीघ्र ही यहाँ आ जाउंगी। निवेदन है कि अभी मुझे यहाँ से जाने दें। शिकारी ने हिरणी की बात मान उसे भी जाने दिया। एक बार फिर से धनुष रखने पर पेड़ से बेल पत्र गिरकर Shivling पर जा गिरे और शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गई।

अब फिर से शिकारी को वहां से जाती हुई तीसरी हिरणी दिखाई दी अब चित्रभानु एक भी मौका नहीं छोड़ना चाहता था इसलिए तीर निशाने पर लगा लिया। इस बार जो हिरणी दिखी उसके साथ बच्चा भी था। हिरणी ने शिकारी से निवेदन किया कि मैं इन बच्चों को इनके पिता के पास छोड़ने जा रही हूँ मुझे अभी जाने दो। वापिस लौटते वक़्त मैं तुम्हारे पास आ जाउंगी तब तुम मेरा शिकार कर लेना। शिकारी से हिरणी की बातों से भावुक हो गया और उसे जाने दिया।

भूख से व्याकुल चित्रभानु पेड़ से बेल के पत्ते तोड़-तोड़ कर शिवलिंग पर फेंकता ही जा रहा था। इस प्रकार चित्रभानु की रात बीत गई। अब सुबह की पहली किरण निकली तो शिकारी ने जंगल में एक मृग देखा। शिकारी ख़ुशी से उत्साहित हो उठा और अपने धनुष से तीर निकालते हुए मृग पर निशाना लगाया।

यह देख मृग बोला कि यदि तुमने इस मार्ग से गुजरने वाली तीन हिरणियों और बच्चों को मार दिया है तो तुम मुझे भी मार सकते हो और यदि तुमने उन्हें जीवनदान प्रदान किया है तो तुम मुझे भी मेरे परिवार से मिलने दो क्योंकि मैं उन हिरणियों का पति हूँ। शिकारी मृग की बात सुनकर दया भाव से भर गया और उसे भी बाकियों की ही तरह जीवनदान दिया।

Mahashivratri Katha में आगे की बात करें तो अब सुबह हो चुकी थी शिकारी चित्रभानु का जाने अनजाने में व्रत पालन हुआ, भूख के कारण रात्रि का जागरण हुआ और व्याकुलता के कारण शिवलिंग पर बेल पत्र पर भी अर्पित हो गए। भगवान शिव की कृपा शिकारी को तुरंत प्राप्त हुई क्योंकि वे तो भोलेनाथ हैं। Bholenath की ही कृपा से अब शिकारी कोमल ह्रदय वाला चिरभानु बन गया था इसलिए जब मृग और हिरणी का परिवार उसके सामने आया तो उसने उन्हें मारा नहीं।

जाने अनजाने में चित्रभानु ने जो पूजा विधि का पालन किया था उससे उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। चित्रभानु मृत्यु के पश्चात यमदूत के साथ नहीं बल्कि शिवगणों के साथ शिवलोक पहुंचा। शिकारी का सौभाग्य तो देखिये अगले जन्म में राजा बने चित्रभानु को अपने पूर्व जन्म की सभी बातें याद थी। इसी के कारण राजा चित्रभानु Mahashivratri Vrat का इस जन्म में पालन कर सका और इस बार राजा ने जाने अनजाने में नहीं बल्कि चेतन मन से महाशिवरात्रि का पालन किया था।

गोवर्धन पर्वत परिक्रमा शुरू करने से पहले जान लें ये जरूरी नियम और मार्ग में आने वाले प्रमुख स्थान

गोवर्धन की परिक्रमा का महत्व ( Govardhan Parikrama Significance ) :


गोवर्धन वासी साँवरें की लीलाओं से सभी लोग भली भांति परिचित हैं पर आज हम आपको श्री कृष्ण की किसी लीला के बारे में बताने नहीं जा रहे हैं बल्कि हम आपको Goverdhan ji परिक्रमा के साक्षात् दर्शन कराने जा रहे हैं, वही गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा, जिसके आस पास का क्षेत्र ब्रजभूमि कहलाता है, वही गोवर्धन पर्वत जिसे गिरिराज जी ( Girraj Maharaj ) के नाम से भी जाना जाता है।

Govardhan Parvat के हर छोटे और बड़े पत्थर में श्री कृष्ण का वास है ये पत्थर इतने पावन है कि ब्रज में हर जगह इन पवित्र पत्थरों की पूजा होती दिखाई देती है। कान्हा द्वारा अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठाये गए इस पर्वत पर लोगों का विश्वास इतना अडिग है कि यहाँ का बच्चा-बच्चा आपको पत्थरों पर चरणों के चिन्ह, गौमाता और राधा-कृष्ण की छवि तक दिखा देंगे। तो चलिए आज हम आपको लेकर चलेंगे प्रभुभक्ति के माध्यम से Govardhan hill की परिक्रमा के इस सफर पर :

वैसे तो Govardhan पर्वत की परिक्रमा 21 किलोमीटर की होती है पर भक्त इस परिक्रमा को अपनी श्रद्धा अनुसार कर सकते हैं। यह परिक्रमा दो  तरीके से की जाती है बड़ी परिक्रमा और छोटी परिक्रमा। जो भक्त बड़ी परिक्रमा करने में सक्षम नहीं है वे छोटी परिक्रमा भी कर सकते हैं। लेकिन आपको बता दें कि दोनों ही परिक्रमा अपने आप में महत्वपूर्ण है और समान रूप से फल देती है। सबसे पहले हम बड़ी परिक्रमा के सफर पर आपको लेकर चलेंगे जो 12 किलोमीटर ( Govardhan parikrama distance ) की होती है।

गोवर्धन पर्वत बड़ी परिक्रमा ( Govardhan Parvat Badi Parikrama )


1. दानघाटी मंदिर ( Daan Ghati Mandir ) : दानघाटी Govardhan Temple वह स्थान है जहाँ से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का शुभारंभ होता है। यहाँ गिरिराज जी का दूध से अभिषेक किये जाने की परम्परा है। एक समय ऐसा था जब सुनसान सी दिखने वाली दानघाटी के बारे में कोई नहीं जानता था पर आज यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का वैभव दिखाई पड़ता है। इस पवित्र स्थली के बारे में हमारा धार्मिक इतिहास बहुत कुछ बखान करता है। कहते हैं इसी जगह से होते हुए ब्रज की समस्त गोपियाँ राजा कंस को माखन कर चुकाने जाया करती थीं और यहीं पर माखन चोर कान्हा अपने ग्वाल बालों के संग माखन और दही का दान लिया करते थे।

यह कान्हा का ही अटूट प्रेम था जिसने कान्हा को अपने भक्तों से दान मांगने पर विवश कर दिया था। दान लिए जाने की इसी वजह के कारण इसे दानघाटी के नाम से जाना जाता है। दानकेलि कौमुदी ग्रन्थ में तो इस सुन्दर लीला का वर्णन बहुत विस्तार से किया गया है। क्योंकि यहाँ कान्हा अपने बालरूप में आते थे इसलिए इस मंदिर में प्रभु को भोग स्वरुप माखन-मिश्री और दूध दिया जाता है।

2. संकर्षण कुंड ( Sankarshan Kund ) : Govardhan Parikrama में आगे चलते हुए अब संकर्षण कुंड के दर्शन होते हैं जिसके पास में ही दाऊजी का एक बहुत प्राचान मंदिर भी मौजूद है जिसके बारे में ऐसी मान्यता है कि आज से पांच हजार वर्ष पहले भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने दाऊ जी को विराजमान किया था। संकर्षण भगवान ही दाऊ जी हैं जिन्हें हम बलराम, बालभद्र के नाम से भी जानते हैं।

3. पूंछरी का लौठा ( Poonchhri ka Lautha ) : अब हमारे मार्ग में पड़ेगा पूंछरी का लौठा, नाम थोड़ा अजीब है पर इसकी कहानी उतनी ही दिलचस्प है। पूंछरी का लौठा को भगवान श्री कृष्ण का सखा कहा जाता है। कहते हैं कि यहाँ पर जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा से govardhan ji परिक्रमा करने के लिए आता है उसकी हर मनोकमना पूर्ण होती है। यह स्थान भले ही छोटा हो पर इसका महत्व बहुत अधिक है। बंदरों से घिरे हुए इस स्थान के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने वाले हर भक्त को इस स्थान पर हाजिरी लगाना अनिवार्य है नहीं तो Giriraj Govardhan परिक्रमा पूरी नहीं मानी जाती है।

4. श्रीनाथ जी मंदिर ( Shri Nath Ji Temple, Govardhan ) : समर्पण भाव को समेटे हुए जतीपुरा का श्री नाथ मंदिर राधा कृष्ण के प्रेम की कहानी कहता है, यहाँ तक पहुँचने के लिए आपको गिरिराज जी की शिलाओं के ऊपर से जाना पड़ेगा। यहाँ प्रभु श्री नाथ जी के शयन कक्ष में ही प्रेम गुफा का एक द्वार बना हुआ है। श्री नाथ मंदिर में बनी यह गुफा दो प्रदेशों की अमर प्रेम कहानियों का बखान करती है। मेवाड़ की अजब कुमारी के पिता की जब तबियत खराब हुई तो वे अपने पिता के शीघ्र स्वस्थ होने की मनोकामना को लिए हुए गोवर्धन तक चली आईं। गोवर्धन पहुँचते ही श्री नाथ जी को कुमारी ने निहारा और उन्हें मन ही मन अपना पति स्वीकार कर लिया।

उन्होंने मीरा की भांति ही श्री कृष्ण की आराधना और सेवा में लीन हो गई। अपने भक्त की भक्ति को देख श्री कृष्ण प्रसन्न हो उठे और कुमारी को अपने विराट दर्शन दिए। कुमारी ने प्रभु से नाथ द्वारा चलकर अपने बीमार पिता को दर्शन देने का आग्रह किया। परन्तु श्री कृष्ण तो ब्रजवासियों के प्रेम में बंधे हुए थे इसलिए उन्होंने ब्रज के बाहर जाने से मना कर दिया। पर भक्त के वशीभूत भगवान कृष्ण ने रोजाना सोने के लिए ब्रज में आने की शर्त पर अजब कुमारी का आग्रह स्वीकार कर लिया। जब से मान्यता है, इस गुफा के रास्ते प्रभु श्री कृष्ण shree नाथ चले जाते हैं और नयनों में नींद भरते ही वापस गोवर्धन की ओर लौट आते हैं।

5. इंद्रमानभंग ( Indraman Bhang ) : यह वह स्थान हैं जहाँ पर देवराज इंद्र अपने ऐरावत हाथी के साथ उतरे थे और जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है यह वही स्थान है जहाँ पर इंद्र देव का मान भंग हुआ था। आपको जानकार हैरानी होगी कि यहाँ पर ऐरावत हाथी के पदचिन्ह अभी तक दिखाई देते हैं। आप इन चिन्हों को मान भांग वाले मंदिर के निकट देख सकते हैं।     

6. जतीपुरा मुखारबिंद ( Jatipura Temple ) : Govardhan ki parikrama के अगले पड़ाव में दर्शनीय स्थल जतीपुरा है जिसके बारे में ऐसी मान्यताएं है कि भगवान कृष्ण का मुख होने का यहाँ आभास होता है। जतीपुरा में पहुंचकर श्रद्धालु प्रसाद अर्पण करते हैं क्योंकि परिक्रमा के दौरान इस मंदिर के प्रसाद का बहुत महत्व बताया गया है। यहाँ पर आपको भगवान गिरिराज जी के मुखारविन्दु में श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम के मुख के दर्शन होते है इसीलिए यहाँ पर छप्पन भोग लगाए जाने की परम्परा है।

अब गोवर्धन पर्वत की छोटी परिक्रमा का आरंभ करते हैं लेकिन आगे बढ़ने से पहले हमारे चैनल प्रभुभक्ति को सब्सक्राइब करना न भूलें ताकि आगे आने वाले सभी अपडेट आप तक पहुंचते रहें।

गोवर्धन पर्वत छोटी परिक्रमा ( Govardhan Parvat Chhoti Parikrama )


गोवर्धन पर्वत की छोटी परिक्रमा 9 किलोमीटर ( Govardhan parikrama km 9 ) की है जतीपुरा मुखारबिंद के बाद यह छोटी परिक्रमा शुरू हो जाती है हमारे इस छोटी परिक्रमा के पड़ाव में सबसे पहले लक्ष्मी नारायण मंदिर आता है।

1. लक्ष्मीनारायण मंदिर गोवर्धन ( Laxmi Narayan Mandir Govardhan ) : कोई मनोकामना पूर्ण होने पर या किसी मनोकामना को लेकर दूध की परिक्रमा शुरू इसी लक्ष्मीनारायण govardhan mandir से की जाती है। मंदिर में विराजमान लक्ष्मीनारायण देवता धन, सुख समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। Govardhan parvat parikrama के लिए आने वाले तथा दूध की धार से परिक्रमा करने वाले सभी भक्त परिक्रमा से पहले लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजा की शुरुआत करते हैं।

2. उद्धव कुंड ( Uddhava Kunda ) : छोटी परिक्रमा के मार्ग में दूसरा स्थान उद्धव कुण्ड ( Uddhava Kunda ) है जो गोवर्धन के बिल्कुल पश्चिम में परिक्रमा मार्ग पर दाईं तरफ स्थित है। हमारे पुराणों में इस कुण्ड का वर्णन बहुत अच्छे से किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उद्धव जी ने द्वारका की महिषियों को इसी स्थान पर सांत्वना दी थी।

3. राधा कुंड ( Radha Kund ) : अब इस छोटी परिक्रमा के अगले पड़ाव में राधा कुंड आता है। इस radha kund govardhan की कहानी श्री कृष्ण के गौचारण करने से संबंधित है अब आप सोच रहे होंगे कि भला राधा कुंड का गौचारण से क्या संबंध? तो हम आपको बता दें कि गोवर्धन में ही कान्हा गाय चराने आया करते थे। जब अरिष्टासुर को ज्ञात हुआ तो कि कान्हा यहाँ आया करते हैं तो वह बछड़े का भेष धारण कर यहाँ पहुँच गया। बछड़े के भेष में आया अरिष्टासुर जब श्री कृष्ण पर हमला करने के लिए आगे बढ़ा तो उन्होंने उस बछड़े रूपी असुर का वध कर दिया।

वध करने के बाद राधा रानी ने श्री कृष्ण से कहा कि आपने बछड़े का वध किया है इसलिए आप पर गोहत्या का पाप लगेगा। राधा रानी के मुख से यह वचन सुन श्री कृष्ण ने अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और उसमें स्नान भी किया। तभी से इस स्थान को राधा कुंड के नाम से जाना जाने लगा। मान्यता है कि सप्तमी की रात्रि को पुष्य नक्षत्र में रात्रि 12 बजे राधा कुंड में स्नान किया जाता है। स्नान के बाद सुहागिनें अपने केश खोलकर राधा रानी से पुत्र प्राप्ति की कामना करती हैं। इस राधा कुंड की खासियत यह है की यहाँ का पानी सात रंगों में बदलता है और कभी कभी तो दूध जैसा सफ़ेद भी दिखाई देता है।   

4. श्याम कुंड ( Shyam Kunda ) : अब राधा कुंड के बाद श्याम कुंड के दर्शन होते हैं। यह तो शाश्वत सत्य है जहाँ राधा वहां कृष्ण। इसी प्रकार जहाँ पर राधा कुंड कुंड होगा वहां श्याम कुंड होना तो अनिवार्य ही है। जब श्री कृष्ण ने गोहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और उसमें स्नान किया था तो राधा जी ने भी अपने कंगन से पास में ही कुंड खोदा जिसे श्याम कुंड कहा जाता है। श्याम कुंड वही स्थान है जहाँ पर पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान आये थे।  

5. कुसुम सरोवर ( Kusum Sarovar ) : श्याम कुंड के बाद अब कुसुम सरोवर अगला पड़ाव है। यह मथुरा में गोवर्धन से 2 किमी दूर स्थित है कुसुम सरोवर जो 450 फ़ीट लम्बा और 60 फ़ीट गहरा है। कुसुम सरोवर से जुड़ी कई पौराणिक कहानियां हैं जिसमें से एक कहानी राधा कृष्ण से जुड़ी हुई है।

कहते हैं कि भगवान कृष्ण छुप-छुप कर राधा रानी से मिलने के लिए इसी स्थान पर आया करते थे। राधा रानी और उनकी सखिया श्री कृष्ण के लिए पुष्प चुनने के लिए कुसुम सरोवर ही जाया करती थी। इसका सौंदर्य देखते ही बनता है। Kusum Sarovar Govardhan के चारोँ ओर सीढ़ियां बनी हुई है। इसका सौंदर्य ही लोगों को इस स्थान तक खींच कर लाता है। यहाँ के रहने वाले लोगों का मानना है कि इस सरोवर में पारस पत्थर और नागमणि है जिस कारण इस सरोवर को रहस्यमयी कहा जाता है।

6. कान वाले बाबा ( Kaan Wale Baba ) : छोटी परिक्रमा के रास्ते में पड़ने वाला कान वाले बाबा का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। मंदिर के चमत्कार के किस्से पुरे ब्रज में  मशहूर है। इस मंदिर में स्थित गिरिराज जी के पत्थर रूपी स्वरुप में चमत्कारी कान है। परिक्रमा करते हुए भक्त इस मंदिर में आते है और गिरिराज जी महाराज के कान में अपनी मनोकामना मांगते है।

7. मानसी गंगा मुखारबिंद ( Mansi Ganga ) : छोटी परिक्रमा की समाप्ति मानसी गंगा मुखारबिंद पर आकर होती है। मानसी गंगा गोवर्धन गाँव के मध्य में स्थित है, परिक्रमा करने के दौरान मानसी गंगा दाईं ओर पड़ती है जबकि पूंछरी से लौटते समय बाईं ओर हमें इसके दर्शन होते हैं। गंगा के मानसी गंगा बनने की कहानी कुछ ऐसी है कि एक बार नन्द बाबा-यशोदा और सभी ब्रजवासी ने गंगा स्नान का मन बनाया और अपना सफर शुरू किया। चलते-चलते जब सभी goverdhan तक पहुंचे तो शाम हो चुकी थी। रात्रि व्यतीत करने के लिए नन्द जी ने वहीँ पर अपना विश्रामस्थान बनाने की सोची।

यहाँ पर रात्रि गुजारते हुए श्री कृष्ण के मन में विचार आया कि ब्रजधाम में ही सभी-तीर्थों का वास है, परन्तु ब्रजवासी गण इसकी महान महिमा से अनजान हैं। श्रीकृष्ण के मन में ऐसा विचार आते ही गंगा जी अपने मानसी रूप में गिरिराज जी की तलहटी में प्रकट हुई। सुबह जब ब्रजवासियों ने गिरिराज तलहटी में गंगा जी को देखा तो वे सब हैरान रह गए।

सभी हैरान देखते हुए श्री कृष्ण बोले कि ब्रजभूमि की सेवा के लिए तो तीनों लोकों के सभी-तीर्थ यहाँ आकर विराजते हैं और आप सभी गंगा स्नान के लिए ब्रज को छोड़कर जा रहे हैं। यही कारण है यहाँ गंगा मैया स्वयं Mansi Ganga का रूप धारण किये कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को पधारी हैं।

गोवर्धन परिक्रमा के नियम ( Rules of Govardhan Parikrama in hindi ) :


गोवर्धन परिक्रमा करने के नियम भी आपको जान लेना बहुत जरुरी है। गोवर्धन की परिक्रमा शुरू करने से पूर्व सर्वप्रथम गोवर्धन पर्वत को प्रणाम करें और जिस स्थान से परिक्रमा शुरू की है वहीँ पर उसे समाप्त करें। मान्यता है कि जो भी परिक्रमा आरम्भ करना चाहते हैं उन्हें मानसी गंगा में स्नान अवश्य कर लेना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि परिक्रमा को बीच में कभी अधूरा न छोड़े।

तो दोस्तों यह थी हमारी गोवर्धन पर्वत की छोटी और बड़ी परिक्रमा साथ ही उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं की कहानी। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई हो तो हमारे प्रभुभक्ति को सब्सक्राइब करना न भूलें।

आइये जानें सपने में गड़ा हुआ धन देखने या मिलने का क्या अर्थ है?

सपने में गड़ा हुआ धन देखना ( Sapne me gada hua dhan dekhna )


हमारे हिन्दू शास्त्रों में लगभग हर कृत्य के पीछे एक ठोस कारण छिपा हुआ है, यानी इस संसार में जो भी घटित हो रहा या घटित होने की संभावना है उसके होने का कोई न कोई कारण तो है। भगवान कृष्ण ने भी कहा है कि मनुष्य द्वारा किये जा रहे कर्म उनके पूर्व जन्म में किये गए कर्मों का ही फल हैं।

आज हम कर्म या भविष्य का लेखा जोखा रखने वाले सपनों की बात करेंगे, वो सपनें जो हमारे लिए भले ही इतने महत्वपूर्ण न हो पर उनका कोई न कोई अर्थ तो जरूर है। ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि हिन्दू धर्म के स्वप्न शास्त्र स्वयं ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। आज के इस लेख में हम सपने में खजाने या गड़े हुए खजाने को देखने के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की बात करने जा रहे हैं।

सपने में गड़ा हुआ खजाना देखना ( Sapne me gada hua khajana dekhna )


हमारे वैदिक ग्रंथों में रावण सहिंता और वराह संहिता स्वप्न फल को जानने के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। लोगों को सपने बड़े ही विचित्र से आते हैं कई बार तो उन सपनों का कोई अर्थ ही नहीं निकलता है पर सपनों में हमारा जोर तो चलता नहीं है। कुछ लोग सपनें में कहीं पर गड़ा हुआ खजाना देख लेते हैं फिर उन्हें लगता है कि यह सच हो सकता है। फिर वे जी जान से उस गड़े हुए खजाने को ढूंढने में जुट जाते हैं।

शायद लोगों को यह नहीं मालूम कि सपने में गड़े हुए खजाने को देखने का अर्थ यह नहीं है। जब भी कोई व्यक्ति सपने में गड़ा धन मिलना देखता है तो यह रावण सहिंता और वराह सहिंता के अनुसार यह नहीं कहता कि उस व्यक्ति को कहीं पर गड़ा हुआ खजाना मिल ही जाएगा। दरअसल इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उस व्यक्ति को अचानक धन मिलने या सम्मान-प्रतिष्ठा हासिल होने की संभावना है। गड़ा धन मिलने के संकेत है कि आपको अज्ञात स्त्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है और समाज में प्रतिष्ठा मिल सकती है।

अब आपको बताते हैं कि आखिर कब आपको गड़ा हुआ धन प्राप्त होने की संभावना अत्यधिक होती है और गुप्त धन मिलने के संकेत क्या होते हैं? :


रावण सहिंता और वराह सहिंता के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को गड़े हुए खजाने के मिलने की संभावनाएं होती हैं तो उसे सपनें में सफेद नाग दिखाई देता है। वह सफेद नाग जिस स्थान पर दिखाई देता हैं वहीँ पर गड़ा हुआ खजाना मिलने की संभावना होती है।

आपको बता दें कि सपने में दिखने वाला सफेद नाग कोई सामान्य नाग नहीं बल्कि नाग के रूप में पितर होते हैं जो अपने वंशजों को गड़े हुए खजाने ( Gada hua khajana ) पाने के लिए संकेत दिया करते हैं। पितर अपने ही द्वारा छिपाए गए खजाने के रक्षक होते हैं जो अपने परिवार जनों को बार बार सफेद नाग के रूप में सपने में आकर संकेत दिया करते हैं और गुप्त धन के बारे में जानकारी देते हैं।

जानिये सृष्टि के पालन हार भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की कहानी 

भगवान विष्णु के अवतार का महत्व  ( Importance of Lord Vishnu Avatar )

भगवान विष्णु जो इस सृष्टि के पालन हार माने जाते हैं समय समय पर अवतार लेकर संसार का कल्याण और उनकी रक्षा करते हैं। उनके कई अवतार हुए जिनमें से आज हम भगवान विष्णु के कूर्म अवतार के बारे में बात करने जा रहे हैं।

भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहा जाता है, यह विश्व कल्याण के लिए लिया गया उनका दूसरा अवतार था। अपने कूर्म अवतार में विष्णु जी एक कछुए के रूप में अवतरित हुए थे इसलिए इन्हें Tortoise God कहा गया है। आइए जानते हैं आखिर भगवान विष्णु के Kachhap Avatar Ki Katha.

कुर्म अवतार की कहानी ( Kurma Avatar Story In Hindi )

विष्णु जी के एक कछुए के रूप में अवतार लेने का कारण समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है। दरअसल समुद्र मंथन के दौरान देव गणों और दैत्यों की सहायता करने के लिए उन्होंने कच्छप रूप धारण किया था। Lord Vishnu Kurma Avatar Story In Hindi कुछ इस प्रकार है कि एक समय की बात है जब देवताओं को अपनी शक्ति का खूब अभिमान हो चला था और इस अभिमान में डूबे हुए देवों ने ऋषि दुर्वासा का अपमान किया तो उन्होंने क्रोध में आकर देवताओं को श्राप दे डाला था कि समय आने पर तुम सभी शक्तिहीन हो जाओगे तुम्हारी सारी शक्ति क्षीण हो जाएगी।

इसी श्राप के परिणामस्वरूप दैत्यों से युद्ध करते समय देवताओं की शक्ति कम होने लगी। शक्तिहीनता का लाभ उठाते हुए दैत्यों ने देवराज इंद्र को चुटकियों में पराजित कर डाला। इस तरह अब सभी दैत्यों दानवों का तीनों लोकों पर राज हो गया। शक्तिहीन हुए सभी देव भय की अवस्था में भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने Samudra Manthan का उपाय सुझाया। अभी अभी सतयुग की शुरुआत हुई थी पृथ्वी को प्रलय झेले हुए कुछ ही समय बीता था और सभी बहुमूल्य रत्न प्रलय के कारण समुद्र में गिर गए थे। ऐसे में समुद्र मंथन का विष्णु जी का सुझाव सबसे सही था।

Kachhap Avatar Ki Kahani का आरम्भ भी यहीं से होता है। समुद्र मंथन का कार्य करना अकेले देवताओं के बस में नहीं था इसलिए दैत्यों को साथ में लाना एक मजबूरी थी। विष्णु जी ने बताया था कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा जिसका पान कर सभी देवता अमर हो जाएंगे। इस तरह वे फिर से शक्तिशाली हो जाएंगे और पुरानी अवस्था में लौट आएंगे।

Kurma Avatar In Hindi की कहानी आगे इस प्रकार है कि अब समुद्र मंथन का कार्य आरंभ हुआ जिसके लिए विशाल मदारी की आवश्यकता थी जिससे समुद्र को मथा जा सके। इसके लिए विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र की मदद से मंदार पर्वत को काटकर समुद्र में रखा। इसकी सहायता से ही देव व दानव समुंद्र को मथने का कार्य कर सकते थे। इस पर्वत को घुमाने के लिए रस्सी के रूप में भगवान विष्णु के वासुकी नाग का प्रयोग किया गया। वासुकी नाग को मंदार पर्वत पर लपेटा गया। नाग के मुख को दैत्यों की ओर तथा तथा पूँछ को देवताओं की ओर रखा गया।

भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार क्यों लिया था? ( What was the purpose of Kurma avatar? )

Vishnu Ka Kachua Avatar की कहानी में अब एक और परेशानी सामने आई क्योंकि समुद्र गहरा होता है इसलिये मंदार पर्वत अंदर रसातल में डूबता जा रहा था। मंदार पर्वत के डूबने से समुद्र मंथन का कार्य पूर्ण होना असंभव था। यह दृश्य देखकर भगवान विष्णु ने एक बार फिर सहायता की और अपना द्वितीय कूर्म अवतार लिया। 

Kurma अवतार में उन्होंने मंदार पर्वत का सारा भार अपनी पीठ पर उठाए रखा और वे तब भार सहन करते रहे जब तक समुद्र मंथन का कार्य पूर्ण नहीं हो गया। Kurma avatar of Vishnu के कारण ही समुद्र मंथन का कार्य संपन्न हो पाया, देवताओं को अमृत मिल पाया और चौदह रत्नों को भी प्राप्ति हुई।

कूर्म का मतलब क्या है? ( What is the meaning of Kurma? )

कूर्म का अर्थ होता है ऐसा जीव जिसकी पीठ पर ठोस ढाल हो, इसलिए कछुए को कूर्म कहा जाता है और भगवान विष्णु द्वारा लिए गए अवतार को भी कूर्म कहते हैं।  

कूर्म अवतार कब हुआ था? ( When was Kurma avatar taken? )

भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार सत्ययुग में समुद्र मंथन के दौरान लिया था। यह संसार के कल्याण के लिया लिया गया उनका दूसरा अवतार माना जाता है।

ऐसे करें असली Chandan की पहचान, जानें इसके फायदे और टोटके

हिंदू धर्म में चंदन का क्या महत्व है? ( Importance of Sandalwood in hindu religion )

हिंदू धर्म में चंदन ( Sandalwood ) का महत्व इस बात से जाना जा सकता है कि इसका प्रयोग वैष्णव और शैव परंपरा दोनों में किया जाता है। तिलक के रूप में चंदन ललाट की शोभा बढ़ाता है तो पूजा में देवी देवताओं को चंदन अर्पित किए जाने से उन्हें प्रसन्न करने का मार्ग खुल जाता है। चंदन का पौधा जैसे जैसे बढ़ता रहता है वैसे वैसे ही Chandan ka ped के तने में तेल का अंश भी बढ़ता रहता है जो सुगंधित होने के साथ ही बह फायदेमंद है। चंदन का तेल हर्बल औषधियों के लिए प्रयोग में लाया जाता है जबकि कई अध्ययन इस बात का दावा करते हैं कि यह हमारे अवसाद और चिंताओं को दूर करने में बहुत मददगार साबित हो सकता है।

चन्दन की ही तरह Chandan Mala भी सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक मानी गई है। लाल चन्दन की माला माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है, Original Chandan Mala से यदि माँ लक्ष्मी के मन्त्रों का जाप किये जाए तो जातक को शीघ्र शुभ फल की प्राप्ति होती है और उनकी मनोकामना भी पूर्ण होती है।

चंदन लगाने से क्या फायदे हैं? ( Sandalwood Benefits )

Uses of Sandalwood in hindi :

1. चंदन की सुंगध हमारे भीतर पनप रहे अवसाद और तनाव वाले हार्मोंस को नियंत्रित करने का कार्य करती है।

2. चंदन हमारी कई तरह की मानसिक बीमारियों से रक्षा करता है और उदासी जैसी अवस्था से भी बचाता है।

3. भगवान को चंदन अर्पित करने का हमारा भाव यह रहता है कि जिस प्रकार चंदन सुगंधित है उसी प्रकार हमारा जीवन भी हमेशा सुगंधित रहे।

4. इसे ललाट पर लगाए रखने से पवित्रता और शांति का एहसास होता रहता है। साथ ही आज्ञा चक्र सक्रिय होकर शुभ फल देने लगता है।

5. Sandalwood uses में चंदन को बालों के कंडीशनर के रूप में भी प्रयोग में लाया जा सकता है, इससे बाल मजबूत होते हैं।

चन्दन के टोटके ( Chandan ke totke )

1. चन्दन को पीसकर उसके पाउडर, अश्वगंधा और गोखरूचूर्ण में कपूर का मिश्रण कर लगातार 40 दिन तक हवन करने से घर का वास्तु दोष दूर होता है।

2. यदि आपको ऐसा लगता है कि आप हर समय परेशानियों से घिरे रहते हैं तो गुरुपुष्य नक्षत्र से एक दिन पहले चन्दन के पेड़ की जड़ पर पीले चावल और जल चढ़ाएं फिर धूप दिखाकर उसे आमंत्रित कर दें। उसके अगले दिन उसी पेड़ की लकड़ी लें और एक लाल कपड़े में उसे बांधकर अपने घर के मुख्यद्वार पर टांग दें। इससे आपकी सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी और आने वाले सभी संकट टल जाएंगे।  

3. यदि चन्दन के वृक्ष को घर की पश्चिम या दक्षिण दिशा में लगाया जाए तो यह अत्यधिक शुभ फल प्रदान करता है।

4. किसी व्यक्ति या बच्चे को नज़र लगी हो तो उसे चन्दन की छाल का धुआं देना चाहिए इससे नज़र तुरंत उतर जाती है।    

5. Safed Chandan का वृक्ष घर की सीमा में लगाने से वास्तु दोष और समस्त प्रकार के रोगों से परिवार के सदस्यों को छुटकारा मिलता है।  

असली चंदन की पहचान क्या है? ( How to Identify real Chandan? )

असली चन्दन की पहचान करनी हो तो उसे जमीन या ठोस सतह पर घिसे और तब तक घिसे जब तक वह गर्म न हो जाए। जैसे ही चन्दन गर्म होगा उसमें से सुगंध आनी शुरू हो जाएगी। सुगन्धित चन्दन ही असली चन्दन की पहचान मानी जाती है। 

चन्दन की क्या विशेषता है? ( What is the specialty of Sandalwood? )

चन्दन की विशेषता के बारे में सबसे उत्तम जानकारी हमें संस्कृत का यह श्लोक देता है : ”चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग” अर्थात चन्दन के वृक्ष में शीतलता के कारण विषधारी सांप लिपटे रहते हैं इसके बावजूद चंदन के वृक्ष पर साँपों के विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह चन्दन की सबसे बड़ी विशेषता है। चन्दन हमारे मन-मस्तिष्क को शान्ति और स्थिरता प्रदान करता है। इसके प्रयोग से आज्ञा चक्र शुभ फल देने लगता है, यह सौभाग्य में वृद्धि का भी सूचक है।

चन्दन कितने प्रकार के होते है? ( Types of Chandan in hindi )

Chandan दो प्रकार का होता है : सफेद चन्दन और लाल चंदन। इन दोनों के ही अपने अद्भुत फायदे हैं।

लाल चंदन लगाने से क्या होता है? ( Laal Chandan lagane se kya hota hai? )

लाल चन्दन में कई तरह के पॉलीफेनोलिक यौगिक, ग्लाइकोसाइड, जरूरी तेल, फ्लेवोनोइड, टैनिन और फेनोलिक एसिड जैसे गुण पाए जाते है जो इसे अलग पहचान देते हैं। लाल चन्दन को चेहरे पर लगाने से त्वचा से संबंधित रोगों एक्ने, चकत्ते और झाइयों से शीघ्र ही मुक्ति मिलती है।  

लाल चंदन को कैसे पहचाने? ( Laal Chandan ko kaise pehchane? )

लाल Chandan ki lakdi पानी में बाकी लकड़ियों के मुकाबले जल्दी डूबती है। इसके पीछे की प्रमुख वजह यह है कि लाल चन्दन की लकड़ी का घनत्व पानी से ज्यादा होता है। इसलिए लाल चन्दन की लकड़ी की पहचान करनी हो तो उसके लिए सामान्य लकड़ी और लाल Chandan ki lakadi लें। दोनों को साथ में पानी में डुबोये यदि लाल चन्दन की लकड़ी जल्दी पानी में डूब जाए तो वह असली लाल चन्दन है। लाल चन्दन श्वेत चन्दन की तरह सुगन्धित नहीं होता है।  

हिन्दू माथे पर चन्दन क्यों लगाते हैं? ( Why do Hindus put chandan on forehead? ) 

हिन्दू धर्म में माथे पर Chandan का तिलक लगाना बहुत शुभ माना गया है। हमारे शास्त्रों में यह बात वर्णित है कि चन्दन का तिलक लगाने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। पापों का नाश होता है तथा व्यक्ति के शरीर को एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है।  
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