गोवर्धन पर्वत परिक्रमा शुरू करने से पहले जान लें ये जरूरी नियम और मार्ग में आने वाले प्रमुख स्थान

गोवर्धन की परिक्रमा का महत्व ( Govardhan Parikrama Significance ) :


गोवर्धन वासी साँवरें की लीलाओं से सभी लोग भली भांति परिचित हैं पर आज हम आपको श्री कृष्ण की किसी लीला के बारे में बताने नहीं जा रहे हैं बल्कि हम आपको Goverdhan ji परिक्रमा के साक्षात् दर्शन कराने जा रहे हैं, वही गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा, जिसके आस पास का क्षेत्र ब्रजभूमि कहलाता है, वही गोवर्धन पर्वत जिसे गिरिराज जी ( Girraj Maharaj ) के नाम से भी जाना जाता है।

Govardhan Parvat के हर छोटे और बड़े पत्थर में श्री कृष्ण का वास है ये पत्थर इतने पावन है कि ब्रज में हर जगह इन पवित्र पत्थरों की पूजा होती दिखाई देती है। कान्हा द्वारा अपनी कनिष्ठ उंगली पर उठाये गए इस पर्वत पर लोगों का विश्वास इतना अडिग है कि यहाँ का बच्चा-बच्चा आपको पत्थरों पर चरणों के चिन्ह, गौमाता और राधा-कृष्ण की छवि तक दिखा देंगे। तो चलिए आज हम आपको लेकर चलेंगे प्रभुभक्ति के माध्यम से Govardhan hill की परिक्रमा के इस सफर पर :

वैसे तो Govardhan पर्वत की परिक्रमा 21 किलोमीटर की होती है पर भक्त इस परिक्रमा को अपनी श्रद्धा अनुसार कर सकते हैं। यह परिक्रमा दो  तरीके से की जाती है बड़ी परिक्रमा और छोटी परिक्रमा। जो भक्त बड़ी परिक्रमा करने में सक्षम नहीं है वे छोटी परिक्रमा भी कर सकते हैं। लेकिन आपको बता दें कि दोनों ही परिक्रमा अपने आप में महत्वपूर्ण है और समान रूप से फल देती है। सबसे पहले हम बड़ी परिक्रमा के सफर पर आपको लेकर चलेंगे जो 12 किलोमीटर ( Govardhan parikrama distance ) की होती है।

गोवर्धन पर्वत बड़ी परिक्रमा ( Govardhan Parvat Badi Parikrama )


1. दानघाटी मंदिर ( Daan Ghati Mandir ) : दानघाटी Govardhan Temple वह स्थान है जहाँ से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का शुभारंभ होता है। यहाँ गिरिराज जी का दूध से अभिषेक किये जाने की परम्परा है। एक समय ऐसा था जब सुनसान सी दिखने वाली दानघाटी के बारे में कोई नहीं जानता था पर आज यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का वैभव दिखाई पड़ता है। इस पवित्र स्थली के बारे में हमारा धार्मिक इतिहास बहुत कुछ बखान करता है। कहते हैं इसी जगह से होते हुए ब्रज की समस्त गोपियाँ राजा कंस को माखन कर चुकाने जाया करती थीं और यहीं पर माखन चोर कान्हा अपने ग्वाल बालों के संग माखन और दही का दान लिया करते थे।

यह कान्हा का ही अटूट प्रेम था जिसने कान्हा को अपने भक्तों से दान मांगने पर विवश कर दिया था। दान लिए जाने की इसी वजह के कारण इसे दानघाटी के नाम से जाना जाता है। दानकेलि कौमुदी ग्रन्थ में तो इस सुन्दर लीला का वर्णन बहुत विस्तार से किया गया है। क्योंकि यहाँ कान्हा अपने बालरूप में आते थे इसलिए इस मंदिर में प्रभु को भोग स्वरुप माखन-मिश्री और दूध दिया जाता है।

2. संकर्षण कुंड ( Sankarshan Kund ) : Govardhan Parikrama में आगे चलते हुए अब संकर्षण कुंड के दर्शन होते हैं जिसके पास में ही दाऊजी का एक बहुत प्राचान मंदिर भी मौजूद है जिसके बारे में ऐसी मान्यता है कि आज से पांच हजार वर्ष पहले भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने दाऊ जी को विराजमान किया था। संकर्षण भगवान ही दाऊ जी हैं जिन्हें हम बलराम, बालभद्र के नाम से भी जानते हैं।

3. पूंछरी का लौठा ( Poonchhri ka Lautha ) : अब हमारे मार्ग में पड़ेगा पूंछरी का लौठा, नाम थोड़ा अजीब है पर इसकी कहानी उतनी ही दिलचस्प है। पूंछरी का लौठा को भगवान श्री कृष्ण का सखा कहा जाता है। कहते हैं कि यहाँ पर जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा से govardhan ji परिक्रमा करने के लिए आता है उसकी हर मनोकमना पूर्ण होती है। यह स्थान भले ही छोटा हो पर इसका महत्व बहुत अधिक है। बंदरों से घिरे हुए इस स्थान के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने वाले हर भक्त को इस स्थान पर हाजिरी लगाना अनिवार्य है नहीं तो Giriraj Govardhan परिक्रमा पूरी नहीं मानी जाती है।

4. श्रीनाथ जी मंदिर ( Shri Nath Ji Temple, Govardhan ) : समर्पण भाव को समेटे हुए जतीपुरा का श्री नाथ मंदिर राधा कृष्ण के प्रेम की कहानी कहता है, यहाँ तक पहुँचने के लिए आपको गिरिराज जी की शिलाओं के ऊपर से जाना पड़ेगा। यहाँ प्रभु श्री नाथ जी के शयन कक्ष में ही प्रेम गुफा का एक द्वार बना हुआ है। श्री नाथ मंदिर में बनी यह गुफा दो प्रदेशों की अमर प्रेम कहानियों का बखान करती है। मेवाड़ की अजब कुमारी के पिता की जब तबियत खराब हुई तो वे अपने पिता के शीघ्र स्वस्थ होने की मनोकामना को लिए हुए गोवर्धन तक चली आईं। गोवर्धन पहुँचते ही श्री नाथ जी को कुमारी ने निहारा और उन्हें मन ही मन अपना पति स्वीकार कर लिया।

उन्होंने मीरा की भांति ही श्री कृष्ण की आराधना और सेवा में लीन हो गई। अपने भक्त की भक्ति को देख श्री कृष्ण प्रसन्न हो उठे और कुमारी को अपने विराट दर्शन दिए। कुमारी ने प्रभु से नाथ द्वारा चलकर अपने बीमार पिता को दर्शन देने का आग्रह किया। परन्तु श्री कृष्ण तो ब्रजवासियों के प्रेम में बंधे हुए थे इसलिए उन्होंने ब्रज के बाहर जाने से मना कर दिया। पर भक्त के वशीभूत भगवान कृष्ण ने रोजाना सोने के लिए ब्रज में आने की शर्त पर अजब कुमारी का आग्रह स्वीकार कर लिया। जब से मान्यता है, इस गुफा के रास्ते प्रभु श्री कृष्ण shree नाथ चले जाते हैं और नयनों में नींद भरते ही वापस गोवर्धन की ओर लौट आते हैं।

5. इंद्रमानभंग ( Indraman Bhang ) : यह वह स्थान हैं जहाँ पर देवराज इंद्र अपने ऐरावत हाथी के साथ उतरे थे और जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है यह वही स्थान है जहाँ पर इंद्र देव का मान भंग हुआ था। आपको जानकार हैरानी होगी कि यहाँ पर ऐरावत हाथी के पदचिन्ह अभी तक दिखाई देते हैं। आप इन चिन्हों को मान भांग वाले मंदिर के निकट देख सकते हैं।     

6. जतीपुरा मुखारबिंद ( Jatipura Temple ) : Govardhan ki parikrama के अगले पड़ाव में दर्शनीय स्थल जतीपुरा है जिसके बारे में ऐसी मान्यताएं है कि भगवान कृष्ण का मुख होने का यहाँ आभास होता है। जतीपुरा में पहुंचकर श्रद्धालु प्रसाद अर्पण करते हैं क्योंकि परिक्रमा के दौरान इस मंदिर के प्रसाद का बहुत महत्व बताया गया है। यहाँ पर आपको भगवान गिरिराज जी के मुखारविन्दु में श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम के मुख के दर्शन होते है इसीलिए यहाँ पर छप्पन भोग लगाए जाने की परम्परा है।

अब गोवर्धन पर्वत की छोटी परिक्रमा का आरंभ करते हैं लेकिन आगे बढ़ने से पहले हमारे चैनल प्रभुभक्ति को सब्सक्राइब करना न भूलें ताकि आगे आने वाले सभी अपडेट आप तक पहुंचते रहें।

गोवर्धन पर्वत छोटी परिक्रमा ( Govardhan Parvat Chhoti Parikrama )


गोवर्धन पर्वत की छोटी परिक्रमा 9 किलोमीटर ( Govardhan parikrama km 9 ) की है जतीपुरा मुखारबिंद के बाद यह छोटी परिक्रमा शुरू हो जाती है हमारे इस छोटी परिक्रमा के पड़ाव में सबसे पहले लक्ष्मी नारायण मंदिर आता है।

1. लक्ष्मीनारायण मंदिर गोवर्धन ( Laxmi Narayan Mandir Govardhan ) : कोई मनोकामना पूर्ण होने पर या किसी मनोकामना को लेकर दूध की परिक्रमा शुरू इसी लक्ष्मीनारायण govardhan mandir से की जाती है। मंदिर में विराजमान लक्ष्मीनारायण देवता धन, सुख समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। Govardhan parvat parikrama के लिए आने वाले तथा दूध की धार से परिक्रमा करने वाले सभी भक्त परिक्रमा से पहले लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजा की शुरुआत करते हैं।

2. उद्धव कुंड ( Uddhava Kunda ) : छोटी परिक्रमा के मार्ग में दूसरा स्थान उद्धव कुण्ड ( Uddhava Kunda ) है जो गोवर्धन के बिल्कुल पश्चिम में परिक्रमा मार्ग पर दाईं तरफ स्थित है। हमारे पुराणों में इस कुण्ड का वर्णन बहुत अच्छे से किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उद्धव जी ने द्वारका की महिषियों को इसी स्थान पर सांत्वना दी थी।

3. राधा कुंड ( Radha Kund ) : अब इस छोटी परिक्रमा के अगले पड़ाव में राधा कुंड आता है। इस radha kund govardhan की कहानी श्री कृष्ण के गौचारण करने से संबंधित है अब आप सोच रहे होंगे कि भला राधा कुंड का गौचारण से क्या संबंध? तो हम आपको बता दें कि गोवर्धन में ही कान्हा गाय चराने आया करते थे। जब अरिष्टासुर को ज्ञात हुआ तो कि कान्हा यहाँ आया करते हैं तो वह बछड़े का भेष धारण कर यहाँ पहुँच गया। बछड़े के भेष में आया अरिष्टासुर जब श्री कृष्ण पर हमला करने के लिए आगे बढ़ा तो उन्होंने उस बछड़े रूपी असुर का वध कर दिया।

वध करने के बाद राधा रानी ने श्री कृष्ण से कहा कि आपने बछड़े का वध किया है इसलिए आप पर गोहत्या का पाप लगेगा। राधा रानी के मुख से यह वचन सुन श्री कृष्ण ने अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और उसमें स्नान भी किया। तभी से इस स्थान को राधा कुंड के नाम से जाना जाने लगा। मान्यता है कि सप्तमी की रात्रि को पुष्य नक्षत्र में रात्रि 12 बजे राधा कुंड में स्नान किया जाता है। स्नान के बाद सुहागिनें अपने केश खोलकर राधा रानी से पुत्र प्राप्ति की कामना करती हैं। इस राधा कुंड की खासियत यह है की यहाँ का पानी सात रंगों में बदलता है और कभी कभी तो दूध जैसा सफ़ेद भी दिखाई देता है।   

4. श्याम कुंड ( Shyam Kunda ) : अब राधा कुंड के बाद श्याम कुंड के दर्शन होते हैं। यह तो शाश्वत सत्य है जहाँ राधा वहां कृष्ण। इसी प्रकार जहाँ पर राधा कुंड कुंड होगा वहां श्याम कुंड होना तो अनिवार्य ही है। जब श्री कृष्ण ने गोहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और उसमें स्नान किया था तो राधा जी ने भी अपने कंगन से पास में ही कुंड खोदा जिसे श्याम कुंड कहा जाता है। श्याम कुंड वही स्थान है जहाँ पर पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान आये थे।  

5. कुसुम सरोवर ( Kusum Sarovar ) : श्याम कुंड के बाद अब कुसुम सरोवर अगला पड़ाव है। यह मथुरा में गोवर्धन से 2 किमी दूर स्थित है कुसुम सरोवर जो 450 फ़ीट लम्बा और 60 फ़ीट गहरा है। कुसुम सरोवर से जुड़ी कई पौराणिक कहानियां हैं जिसमें से एक कहानी राधा कृष्ण से जुड़ी हुई है।

कहते हैं कि भगवान कृष्ण छुप-छुप कर राधा रानी से मिलने के लिए इसी स्थान पर आया करते थे। राधा रानी और उनकी सखिया श्री कृष्ण के लिए पुष्प चुनने के लिए कुसुम सरोवर ही जाया करती थी। इसका सौंदर्य देखते ही बनता है। Kusum Sarovar Govardhan के चारोँ ओर सीढ़ियां बनी हुई है। इसका सौंदर्य ही लोगों को इस स्थान तक खींच कर लाता है। यहाँ के रहने वाले लोगों का मानना है कि इस सरोवर में पारस पत्थर और नागमणि है जिस कारण इस सरोवर को रहस्यमयी कहा जाता है।

6. कान वाले बाबा ( Kaan Wale Baba ) : छोटी परिक्रमा के रास्ते में पड़ने वाला कान वाले बाबा का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। मंदिर के चमत्कार के किस्से पुरे ब्रज में  मशहूर है। इस मंदिर में स्थित गिरिराज जी के पत्थर रूपी स्वरुप में चमत्कारी कान है। परिक्रमा करते हुए भक्त इस मंदिर में आते है और गिरिराज जी महाराज के कान में अपनी मनोकामना मांगते है।

7. मानसी गंगा मुखारबिंद ( Mansi Ganga ) : छोटी परिक्रमा की समाप्ति मानसी गंगा मुखारबिंद पर आकर होती है। मानसी गंगा गोवर्धन गाँव के मध्य में स्थित है, परिक्रमा करने के दौरान मानसी गंगा दाईं ओर पड़ती है जबकि पूंछरी से लौटते समय बाईं ओर हमें इसके दर्शन होते हैं। गंगा के मानसी गंगा बनने की कहानी कुछ ऐसी है कि एक बार नन्द बाबा-यशोदा और सभी ब्रजवासी ने गंगा स्नान का मन बनाया और अपना सफर शुरू किया। चलते-चलते जब सभी goverdhan तक पहुंचे तो शाम हो चुकी थी। रात्रि व्यतीत करने के लिए नन्द जी ने वहीँ पर अपना विश्रामस्थान बनाने की सोची।

यहाँ पर रात्रि गुजारते हुए श्री कृष्ण के मन में विचार आया कि ब्रजधाम में ही सभी-तीर्थों का वास है, परन्तु ब्रजवासी गण इसकी महान महिमा से अनजान हैं। श्रीकृष्ण के मन में ऐसा विचार आते ही गंगा जी अपने मानसी रूप में गिरिराज जी की तलहटी में प्रकट हुई। सुबह जब ब्रजवासियों ने गिरिराज तलहटी में गंगा जी को देखा तो वे सब हैरान रह गए।

सभी हैरान देखते हुए श्री कृष्ण बोले कि ब्रजभूमि की सेवा के लिए तो तीनों लोकों के सभी-तीर्थ यहाँ आकर विराजते हैं और आप सभी गंगा स्नान के लिए ब्रज को छोड़कर जा रहे हैं। यही कारण है यहाँ गंगा मैया स्वयं Mansi Ganga का रूप धारण किये कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को पधारी हैं।

गोवर्धन परिक्रमा के नियम ( Rules of Govardhan Parikrama in hindi ) :


गोवर्धन परिक्रमा करने के नियम भी आपको जान लेना बहुत जरुरी है। गोवर्धन की परिक्रमा शुरू करने से पूर्व सर्वप्रथम गोवर्धन पर्वत को प्रणाम करें और जिस स्थान से परिक्रमा शुरू की है वहीँ पर उसे समाप्त करें। मान्यता है कि जो भी परिक्रमा आरम्भ करना चाहते हैं उन्हें मानसी गंगा में स्नान अवश्य कर लेना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि परिक्रमा को बीच में कभी अधूरा न छोड़े।

तो दोस्तों यह थी हमारी गोवर्धन पर्वत की छोटी और बड़ी परिक्रमा साथ ही उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं की कहानी। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई हो तो हमारे प्रभुभक्ति को सब्सक्राइब करना न भूलें।

Chinnamasta Temple : दुनिया के दूसरे बड़े शक्तिपीठ के रूप में स्थापित Maa Chinnamasta की कहानी

छिन्नमस्तिका मंदिर कहां है? ( Where is Chinnamasta Temple Located? )

Chinnamasta Mandir झारखंड राज्य की राजधानी रांची से करीब 80 किलोमीटर और रामगढ़ से 28 किमी दूर रजरप्पा में अवस्थित है। रजरप्पा में भैरवी-भेड़ा और दामोदर नामक नदी के संगम पर मौजूद देवी का यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। इस बात से ही इस मंदिर के महत्व के बारे में ज्ञात होता है। यह मंदिर इसलिए भी और लोकप्रिय है क्योंकि यहां बिना सिर वाली देवी को पूजा जाता है या दूसरे शब्दों में कहें तो इस शक्तिपीठ में देवी के कटे हुए सिर की पूजा की जाती है। साल में आने वाले चैत्र और शारदीय नवरात्रों के दौरान यहां भक्तों की भीड़ दोगुनी हो जाती है।

छिन्नमस्ता मंदिर का इतिहास : छिन्नमस्ता मंदिर कितना प्राचीन है? (  Chinnamasta Temple History : How old is Chinnamasta Temple? )

छिन्नमस्ता मंदिर के संबंध में इतिहासकारों का मानना है कि यह 6000 वर्ष प्राचीन मंदिर है जबकि कुछ इतिहासकार इसे महाभारत काल का मंदिर बताते हैं। अभी तक इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी हासिल नहीं हो पाई है। आपको बता दें कि Rajrappa Jharkhand में छिन्नमस्तिका मंदिर के अलावा महाकाली मंदिर, सूर्यदेव को समर्पित मंदिर, दस महाविद्या से जुड़ा मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंगबली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर समेत कुल सात मंदिर अवस्थित हैं।

छिन्नमस्ता देवी की कहानी   ( Chinnamasta Devi Story ) 

Chhinnamasta के कटे हुए सिर को देखकर सभी के मन में यह सवाल जरूर उठता होगा कि आखिर देवी ने अपने ही कटे हुए सिर को हाथ में क्यों लिया हुआ है। दरअसल देवी के कटे सिर से जुड़ी एक कहानी प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार जब मां अपनी सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान के लिए गईं तो कुछ समय वहां रुकने के कारण उनकी दो सहेलियां भूख से व्याकुल हो उठी। दो सहेलियों की भूख इतनी अधिक थी कि सभी का रंग तक काला पड़ गया।

दोनों सहेलियां Maa Chinmastika से भोजन की मांग करने लगी। इसपर माता ने उन्हें धैर्य रखने के लिए कहा परंतु सहेलियां भूख से तड़प रही थी। उनमें धैर्य अब बिल्कुल भी नहीं रह गया था। माता ने अपनी सहेलियों का यह हाल देख खड्ग से अपना ही सिर काट दिया। जब मां ने अपना सिर काटा तो उनका कटा हुआ उनके बाएं हाथ में आ गिरा।

उसमें से फिर रक्त की तीन धाराएं बहने लगी। दो धाराओं को तो माता ने सहेलियों की ओर कर दिया जबकि एक बची हुई धारा से खुद रक्तपान करने लगी। इसी के बाद से उन्हें रजरप्पा मंदिर माता Chinnamasta के नाम से पूजा जाने लगा जिसमें उनकी मूर्ति एक कटे हुए सिर को बाएं से पकड़ हुए है।

अन्य छिन्नमस्ता देवी की कहानी ( Another Chinnamasta Story )

ऐसा कहा जाता है कि बहुत पुराने समय में छोटा नागपुर में रज नामक राजा का शासन था जिनकी पत्नी का नाम रुपमा था। इन्हीं दोनों के नामों का मिश्रण कर क्षेत्र का नाम रजरूपमा किया गया जिसे आज रजरप्पा ( Rajrappa ) के नाम से जाना जाता है। एक बार राजा पूर्णिमा की रात्रि में दामोदर-भैरवी नदी के संगम पर पहुंचे। रात्रि में वहां विश्राम करते समय उन्होंने अपने स्वप्न में एक लाल वस्त्र धारण किये हुए तेजस्वी कन्या को देखा।

कन्या Chinnamasta Kali ने राजा से स्वपन में कहा कि हे! राजन तुम्हारी कोई संतान न होने के कारण तुम्हारा जीवन अधूरा और सूना सा प्रतीत होता है। मेरी आज्ञा मान लो तुम्हारे जीवन का सूनापन हमेशा के लिए दूर हो जाएगा। जब राजा ने भड़भड़ाते हुए अपनी आँखे खोली तो वह उस कन्या को ढूंढने लगे। फिर उन्होंने देखा कि वही कन्या जल के भीतर से प्रकट हो रही है।  

कन्या को जल से निलते देख राजा भयभीत हो उठे। प्रकट होकर वह कन्या बोली कि हे! राजन मैं छिन्मस्तिका देवी हूँ जो यहाँ गुप्त रूप से निवास करती है। मैं तुम्हें यह वरदान देती हूँ कि अगले नौ महीनों में तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। कन्या आगे बोली कि इसी नदी के संगम स्थल पर तुम्हें एक मंदिर दिखाई देगा जहाँ मैं विराजमान हूँ। तुम मेरी पूजा कर वहां बलि चढ़ाओ। तभी से यह स्थल रजरप्पा के रूप में जाना जाने लगा जहाँ आज Chinnamasta Temple स्थित है।  

छिन्नमस्ता देवी कौन सी है?  ( Who is Goddess Chinnamasta? )

Ramgarh Temple की देवी छिन्नमस्ता को छिन्नमस्तिका, चिंतपुरणी और प्रचंड चंडिका के नाम से भी जाना जाता है। इनका संबंध आदि शक्ति की दस महाविद्याओं से हैं और वे इन 10 महाविद्याओं में से छठी देवी मानी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि Maa Chinnamasta महाविद्या सकल चिंताओं का अंत करती है और हर मनोकामना को पूर्ण करती हैं।  

छिन्नमस्ता की पूजा क्यों की जाती है? ( Why Chinnamasta is worshipped? )

Rajrappa Mandir माँ छिन्नमस्ता की पूजा विशेष रूप से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए की पूजा की जाती है। मां के उग्र रूप के कारण तंत्र-मंत्र की क्रियाओं में भी इनकी पूजा किये जाने की परंपरा है। इन्हें बलि चढ़ाकर और तंत्र साधना के माध्यम से भक्त अपनी मनोकमना को पूर्ण करते हैं।

छिन्नमस्ता बीज मंत्र ( Chinnamasta Beej Mantra )

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐ वज्र वैरोचनीये हुं हुं फट् स्वाहा ।।

माँ छिन्नमस्ता रजरप्पा मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? ( Why is Chinnamasta Rajrappa Temple famous? )

Rajrappa Mandir Jharkhand छिन्नमस्ता इसलिए अत्यधिक प्रसिद्ध है क्योंकि यह देवी के 51 शक्तिपीठों में शामिल है साथ ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। मंदिर के भीतर माता छिन्नमस्ता की जो प्रतिमा कमलपुष्प पर विराजमान है उनके तीन नेत्र हैं। उनके दाएं हाथ में तलवार व बाएं हाथ में देवी का अपना ही कटा हुआ सिर है जिसमें से तीन धाराओं में रक्त बह रहा है। साथ ही देवी के पांव के नीचे विपरीत मुद्रा में कामदेव और रति शयन अवस्था में विराजित हैं। मां छिन्नमस्तिका के केश खुले और बिखरे हैं और उन्होंने सर्पमाला तथा मुंडमाला धारण की हुई है। माता आभूषणों से सुसज्जित नग्नावस्था में अपने दिव्य रूप में यहाँ विराजित हैं।

Mumba Devi Temple : मुंबई की सर्वप्रसिद्ध मुम्बा देवी की कहानी और मंदिर का इतिहास

मुंबा देवी मंदिर कहाँ स्थित है? ( In which city is Mumba Devi Temple? )

मुंबा देवी मंदिर महाराष्ट्र के दक्षिणी मुंबई में भुलेश्वर इलाके अवस्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। सबसे ख़ास बात यह है कि इसी मंदिर के नाम पर ही महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई का नाम निकला है। मुंबा देवी मंदिर में मुम्बा देवी की नारंगी चेहरे वाली रजत की प्रतिमा स्थापित है और उनके साथ माँ जगदम्बा और माँ अन्नपूर्णा भी विराजमान है।  कहते हैं कि यहाँ के मछुआरों की रक्षा माँ मुम्बा करती हैं और उनपर किसी तरह की आंच नहीं आने देती। आइये जानते हैं इस मंदिर का इतिहास, Mumbadevi की उत्पत्ति की कहानी और कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां।

मुम्बा देवी मंदिर का इतिहास : मंदिर का निर्माण किसने करवाया? ( Mumba Devi Temple History : Who built Mumba Devi Temple? )

Mumbadevi Temple का इतिहास आज से करीब 400 वर्ष प्राचीन है। मुम्बा देवी मंदिर का निर्माण वर्ष 1737 में मेंजिस नामक जगह पर बना था। उस स्थान पर आज विक्टोरिया टर्मिनस बिल्डिंग बनी हुई है। ब्रिटिश शासन के दौरान मुम्बा देवी के इस मंदिर को मरीन लाइन्स-पूर्व क्षेत्र में बाजार के बिल्कुल बीचों-बीच स्थापित कर दिया गया था।

इस Mumbai bamba devi mandir को मछुआरों द्वारा अपनी रक्षा के लिए स्थापित किया गया था। कहा जाता है कि इस मंदिर के लिए पांडु नामक सेठ ने अपनी ज़मीन दान में दी थी। शुरू-शुरू में तो Mumbadevi Temple Mumbai का रखरखाव पाण्डु सेठ के परिवार के पास था परन्तु बाद में उच्च न्यायलय के निर्देश पर इसका जिम्मा न्यास को सौंप दिया गया।   

मुम्बा देवी कौन हैं? ( Who is Mumbai God? )

आज के मुंबई शहर में सबसे पहले मछुआरों ने अपना बसेरा बनाया था और समुद्र से आने वाले तूफानों से अपनी रक्षा के लिए उन्होंने देवी का एक मंदिर स्थापित किया। आस्था और विश्वास का यह रूप कब चमत्कार में तब्दील हो गया पता ही नहीं चला। समुद्र से आने वाले हर तूफ़ान और बड़े संकट से देवी ने रक्षा की तो मछुआरों को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह देवी का चमत्कार है। तभी से Mumba Devi के नाम से जानी जाने लगी। मुम्बा देवी को माता लक्ष्मी और आदि शक्ति का ही एक रूप माना जाता है जो धन-दौलत और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।

यहाँ के लोगों की आस्था कहती है कि मुम्बा देवी की कृपा से ही मुंबई शहर आज भारत की आर्थिक राजधानी बन पाया। मुंबई को ऊंचाइयों पर पहुंचाने का सारा श्रेय मुम्बा देवी को दिया जाता है यही वजह रही कि इस शहर का नाम Mumbai मुम्बा देवी के नाम से निकला है।  

मुंबा देवी मुंबई शहर में बड़े ही ऐशो आराम से रहा करती हैं। हर दिन अपने अलग-अलग वाहन पर विराजमान होती हैं, सोमवार को वे नंदी पर सवार होती है तो मंगलवार को हाथी पर, बुधवार को देवी मुर्गे को अपना वाहन चुनती हैं तो बृहस्पतिवार को गरुड़ उनकी सवारी होती है। वहीँ शुक्रवार को माता की सवारी हंस है शनिवार को वे हाथी और रविवार के दिन माँ Mumba देवी का वाहन सिंह होता है।  

यदि आप भी घर में सुख-समृद्धि और धन को आकर्षित करना चाहते हैं तो आज ही घर में अलौकिक शक्तियों से भरपूर Dhan Laxmi Kuber Yantra को पूजा विधि के द्वारा स्थापित करें। ज्योतिष शास्त्र में Dhan Laxmi Kuber Yantra का बहुत महत्व बताया गया है, कहते हैं जिस भी स्थान पर यह यन्त्र स्थापित किया जाता है वहां माता लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।

मुम्बा देवी से जुड़ी मुंबई की कहानी ( Mumba Devi story in hindi )

आज का विकसित मुंबई शहर पहले एक उजड़ा हुआ स्थल हुआ करता था। इस उजड़े हुए स्थल पर सर्वप्रथम मछुआरों ने अपनी बस्ती बनाई। मुंबई में मछुआरों को कोली कहा जाता है। समुद्र के किनारे रहते हुए उन्हें हर वक़्त खतरा रहता था कि कहीं समुद्र के तूफ़ान उनकी बस्ती को उजाड़ न दें। वो कहते है न जब मानवीय सामर्थ्य खत्म हो जाता है तब मनुष्य ईश्वर की भक्ति की ओर आगे बढ़ता है। 

ऐसा ही कुछ उन मछुआरों ने किया, उन्होंने Mumba Devi ka mandir स्थापित किया और पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा अर्चना की। उनकी आस्था और विश्वास चमत्कार में तब्दील हो गया, देवी ने मछुआरों की रक्षा का जिम्मा लिया और उन्हें समुद्र से आने वाले हर तूफान से बचाया। इन चमत्कारों के कारण ही देवी को मुम्बा देवी नाम दिया गया।      

बॉम्बे का नाम मुंबई कैसे पड़ा? ( How was Bombay named Mumbai? )

मुंबई के इतिहास पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इसका इतिहास पौराणिक काल से संबंध रखता है। आदि शक्ति दुर्गा के नाम अम्बा और माँ को मिलकर इनका नाम मुम्बा पड़ा है। इन्हें देवी लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है। वर्ष 1995 में शिवसेना सरकार ने बम्बई का नाम परिवर्तित कर मुंबई कर दिया जो Mumba Devi को समर्पित है। कहते हैं कि इन्हीं की कृपा से मुंबई तरक्की के रास्ते पर चल पाई और आर्थिक राजधानी बन पाने में सक्षम हुई।    

मुम्बा देवी के निकट स्टेशन कौन सा है? ( Which station is near Mumbadevi? )

Mumbra Devi Temple के सबसे निकट का रेलवे स्टेशन मस्जिद रेलवे स्टेशन है जहाँ से आसानी से इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।   

Hinglaj Mandir : आदिशक्ति के 51 शक्तिपीठों में सबसे पहले शक्तिपीठ हिंगलाज मंदिर की कहानी

हिंगलाज मंदिर कहाँ पर स्थित है? ( Where is Hinglaj Devi Temple? )

Hinglaj Mata Mandir भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त के हिंगलाज नामक क्षेत्र में हिंगोल नदी के निकट अवस्थित है। यह देवी सती के 51 shakti peeth में से सबसे पहला शक्तिपीठ माना जाता है। यह मंदिर पूरे विश्व में बहुत प्रसिद्ध है और पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के लिए ख़ास महत्व रखता है।     

हिंगलाज में कौन सी देवी है? ( Hinglaj me kaun si devi hai? )

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में हिंगुल नदी के निकट अवस्थित प्राचीन Hinglaj Temple देवी को समर्पित है जो देवी सती का अंग माना जाता है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि हिंगलाज में देवी सती ही शक्तिपीठ के रूप में वास करती हैं। इस जगह के बारे में ऐसी मान्‍यता है कि प्रभु श्रीराम ने भी अपनी यात्रा के दौरान ब्रह्म हत्या से मुक्ति पाने के लिए इस Hinglaj Devi Mandir शक्तिपीठ में दर्शन किए थे। साथ ही हमारे ग्रंथों में इस बात का भी वर्णन मिलता है कि भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ने भी इसी स्थान पर घोर तपस्या की थी।  

हिंगलाज माता की उत्पत्ति कैसे हुई? ( How was Hinglaj Mata born? )

Hinglaj Mata की उत्पत्ति से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं कहती है कि वे आदि शक्ति का ही एक रूप हैं जिन्हें आज शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। आइये जानें आखिर मां हिंगलाज की उत्पत्ति कैसे हुई? :

हिन्दू धर्म में आदि शक्ति के 51 शक्तिपीठों को मान्यता प्राप्त है और इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है हिंगलाज shaktipeeth in Pakistan। शक्तिपीठों की स्थापना से जुड़ी कथा का संबंध देवी सती से है। साथ ही हिंगलाज माता की कथा के तार भी इसी कहानी से जुड़े हुए हैं। 

प्रजापति दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें उन्होंने लगभग सभी देवी देवताओं को न्योता भेजा परन्तु भगवान शिव और सती को यज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण नहीं आया। देवी सती को इसपर बहुत क्रोध आया और भगवान शिव से यज्ञ में जाने की हठ करने लगी।

शिव जी ने उन्हें अनुमति दी तो उन्होंने वहां जाकर अपने पिता से सवाल जवाब किये परन्तु पिता द्वारा अपने पति का अपमान किया जाना वे सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने उसी यज्ञ की पावन अग्नि ने कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। भगवान शिव को जब यह पता चला तो वे क्रोधित अवस्था में वहां पहुंचे। उन्होंने देवी सती के जले हुए पार्थिव शरीर को उठा लिया और ब्रह्माण्ड में घूमने लगे।

यह दृश्य देख सृष्टि को भयंकर प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से पार्थिव सती के शरीर के टुकड़े ( sati devi body parts ) कर दिए थे। इन्हीं टुकड़ों में से एक टुकड़ा हिंगलाज मंदिर वाले स्थान पर गिरा। कहते हैं कि हिंगलाज मंदिर में देवी सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था जिसने devi shakti peeth का रूप धारण कर लिया। माता सती का ब्रह्मरंध्र सिन्दूर यानी हिंगुलु से सुशोभित था जिसे कारण इस स्थान का नाम Hinglaj Mandir पड़ा।  

हिंगलाज माता किसकी कुलदेवी है? ( Hinglaj Mata kiski kuldevi hai? )

लोकगाथाएँ कहती हैं कि चारणों और राजपुरोहितों की कुलदेवी माता हिंगलाज थीं जिनका निवास स्थान Hinglaj Mata Mandir Pakistan हुआ करता था। हिंगलाज देवी के संबंध में गीत का छंद कुछ इस प्रकार है :

    सातो द्वीप शक्ति सब रात को रचात रास।
    प्रात:आप तिहु मात हिंगलाज गिर में॥

अर्थात : सातो द्वीपों में सब शक्तियां रात्रि में रास रचाती है और फिर प्रात:काल सब शक्तियां भगवती हिंगलाज के गिर में आ जाती है।   

पाकिस्तान में कौन सा शक्तिपीठ है? ( Pakistan me kaun sa shaktipeeth hai? )

हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान में आदिशक्ति के 51 शक्तिपीठों में से सबसे पहला शक्तिपीठ हिंगलाज स्थापित है। यह Shakti peeth in Pakistan सभी शक्तिपीठों में सबसे पहला स्थान इसलिए रखता है क्योंकि जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से पार्थिव सती के शरीर के टुकड़े किये तो सबसे पहला टुकड़ा ब्रह्मरंध्र यानी मस्तिष्क यहीं पाकिस्तान के बलूचिस्तान Hinglaj mandir में गिरा था। हमारे शास्त्रों में इस शक्तिपीठ को आग्नेय तीर्थ का नाम दिया गया है।

हिंगलाज माता की पूजा कैसे की जाती है? ( Hinglaj Mata ki puja kaise ki jati hai? )

1. कुलदेवी Hinglaj mata की कई तरह से पूजा की जा सकती है फिर चाहे वह पंचोपचार पूजा हो षोडशोपचार पूजा विधि, परन्तु इन सभी में सबसे उत्तम षोडशोपचार पूजा मानी जाती है जिसमें हिंगलाज माता की 16 चीजों से पूजा किये जाने का विधान है।  

2. माता हिगंलाज को पंचामृत से स्नान कराने के साथ चंदन आदि से भी स्नान कराया जाता है।  

3. पूजा में गेहूं या चावल की ढेरी को तांबे के कलश के ऊपर रखा जाता है फिर उसपर नागरबेल के पत्ते, और नारियल रख कलश स्थापना की जाती है। कलश को मौली से बाँधा जाता है।  

4. हिंगलाज माता की पूजा से पहले सर्वप्रथम गणपति जी का ध्यान अवश्य करें।  

5. बता दें माता को लाल गुलाब पुष्प, गुलाब का इत्र, सिन्दूर और लाल चुनरी अत्यंत प्रिय है।  

6. माता की पूजा करते समय उन्हें चन्दन, अक्षत, दूर्वा, फल आदि जरूर अर्पित करें।

7. माता हिंगलाज के ध्यान मंत्र का 108 बार जाप भी अवश्य किया जाना चाहिए।  

Padmavathi Temple : भगवान वेंकटेश्वर की पत्नी पद्मावती को समर्पित मंदिर का इतिहास और कहानी

पद्मावती मंदिर कहाँ है? ( Where is Padmavathi Temple? )

Padmavati devi temple आंध्र प्रदेश में बालाजी तिरुपति के निकट चित्तूर जिले में 5 किमी की दूरी पर तिरुचनूर नामक गांव में अवस्थित है। यह मंदिर धन-लक्ष्मी और वैभव प्रदान करने वाली माता लक्ष्मी को समर्पित है। इस मंदिर का दूसरा नाम अलमेलमंगापुरम है। Padmavathi Temple Tirupati से जुड़ी मान्यताएं कहती हैं कि मां पद्मावती मंदिर के दर्शन करने से व्यक्ति की सभी मनोकामना पूर्ण होती है।

लोक मान्यताएं कहती है कि तिरुपति बालाजी के मंदिर के दर्शन करने वालों की मनोकामना तभी पूर्ण होती है जब श्रद्धालु बालाजी के साथ Sri padmavathi मंदिर के दर्शन कर आशीर्वाद भी ले लें। बताते चलें कि पद्मावती मंदिर में भगवान श्री कृष्ण, भगवान बलराम, सुंदरराज स्वामी, सूर्यनारायण स्वामी का भी उप मंदिर अवस्थित है। 

पद्मावती मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा ( Mythological Story behind Padmavati temple )

Sri Padmavathi Ammavari Temple से जुड़े कोई ख़ास तथ्य मौजूद नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि मंदिर की कहानी क्या है और कब इसका निर्माण किया गया। हालांकि कई सारी पौराणिक किद्वन्तियाँ हैं जो भगवान वेंकटेश्वर और उनकी पत्नी पद्मावती के बारे में कुछ जानकारी हमें देती हैं।  

पद्मावती देवी कौन थी? ( Who is Padmavati Devi? )

पौराणिक किदवंतियां कहती है कि देवी पद्मावती का जन्म कमल पुष्प से हुआ है जो यहां मंदिर के तालाब में खिला था। दरअसल देवी पद्मावती ने स्वर्ण कमल में पद्मसरोवरम नामक पवित्र पुष्करिणी में स्वयं को प्रकट किया। वहीँ कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार पद्मावती देवी इस क्षेत्र के शासक आकाश राजा की पुत्री अलमेलु ( tirupati alamelu mangapuram ) थीं जिनका विवाह वेंकटेश्वर से हुआ था। कहा यह भी जाता है कि देवी लक्ष्मी ने भगवान वेंकटेश्वर को लाल कमल पुष्प पर अलामेलु मंगपुरम में बारह वर्षों तक उनके घोर तप के बाद दर्शन दिए थे।  

पद्मावती मंदिर का इतिहास ( Padmavati Temple History )

Tiruchanoor temple पद्मावती के इतिहास पर गौर करें तो यह Tiruchanur गाँव से संबंधित है। इस मंदिर की दीवारों पर अंकित ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि पहले तिरुचुरा गाँव में ही वेंकटेश्वर भगवान का प्राचीन मंदिर अवस्थित था। इस स्थान पर श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक रहने के कारण इस मंदिर को तिरुपति में स्थानांतरित करना पड़ा। तभी से सारे रीति-रिवाज तिरुपति में ही मनाए जाने लगे। जिससे तिरुचुरा गांव की लोकप्रियता में कमी आई।

इसके पश्चात बारहवीं शताब्दी में यादव राजा ने यहाँ कृष्ण-बलराम के खूबसूरत और आकर्षक मंदिर का निर्माण करवाया औऱ यह गाँव एक बार फिर लोगों की नजरों में आया। इसके बाद सोलहवीं और सत्रहवी शताब्दी में यहाँ दो और मंदिर बने। इनमें से एक सुंदरा वरदराजा को समर्पित था तो दूसरा देवी पद्मावती के लिए ।

पद्मावती मंदिर का निर्माण किसने बनवाया? ( Who built Padmavati temple? )

Tiruchanur temple पद्मावती के निर्माण के तार इसी मंदिर में मौजूद उप- मंदिर कृष्णस्वामी और सुंदरराजा स्वामी मंदिर से जुड़े हुए है। यहाँ मौजूद श्री कृष्ण स्वामी मंदिर का निर्माण 1221 ईसवी में किया गया था। जबकि सुन्दरराजा स्वामी मंदिर और पद्मावती का निर्माण 16 वीं शताब्दी में किया गया। सुन्दरराजा स्वामी मंदिर श्री वरदराजा स्वामी और उनकी पत्नी श्रीदेवी तथा भूदेवी समर्पित है। भगवान वेंकटेश्वर की पत्नी को समर्पित मंदिर पद्मावती है जिसे Alamelu Mangapuram Temple के नाम से भी जाना जाता है।  

अलवेलु मंगम्मा कौन है? ( Who is Alivelu Mangamma? )

अल्वेलु मंगम्मा तिरुचनूर के राजा आकाश की पुत्री थीं जिनका विवाह वेंकेटेश्वर से करवाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि वे देवी लक्ष्मी का ही रूप हैं जिन्होंने भगवान विष्णु के वेंकटेश्वर रूप से विवाह के लिए जन्म लिया था। 

देवी पद्मावती माता लक्ष्मी का ही एक रूप मानी जाती है यदि आप माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद सदैव अपने ऊपर बनाये रखना चाहते हैं तो शुक्रवार के दिन माँ लक्ष्मी की पूजा कर Lakshmi Charan Paduka को घर में स्थापित करें। नियमित रूप से माँ लक्ष्मी की अलौकिक चरण पादुका की पूजा-अर्चना करें, आपके घर में सदैव उनका वास रहेगा।  

भगवान वेंकटेश्वर कौन है? ( Who is Venkateswara wife? )

भगवान वेंकटेश्वर को भगवान विष्णु के ही अन्य अवतारों में से एक माना जाता है। ऐसी मान्यताएं हैं कि भगवान वेकंटेश्वर इस धरती पर कलयुग के अंत तक विराजमान रहेंगे। वे कलयुग में अपने भक्तों के दुःख हरने के लिए अवतरित हुए हैं।  

Grishneshwar Temple : इस प्रकार हुई थी घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति, जानें पूरा इतिहास

घृष्णेश्वर मंदिर कहाँ है? ( Where is the Grishneshwar Temple? )

 भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल घृष्णेश्वर मंदिर ( Grishneshwar Jyotirlinga Temple ) महाराष्ट्र के औरंगाबाद के निकट मौजूद दौलताबाद से करीब 11 किलोमीटर की दूरी पर वेरुलगाँव में अवस्थित है। इस प्रसिद्ध मंदिर को घुश्मेश्वर मंदिर ( Ghushmeshwar Mandir ) के नाम से भी जाना जाता है। जिस स्थान पर ज्योतिर्लिंग स्थापित है वह बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की गुफाओं से कुछ ही दूरी पर मौजूद है।  

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी ( Grishneshwar Jyotirling ki kahani )

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग ( Ghushmeshwar Jyotirlinga ) की कहानी के अनुसार दक्षिण देश में देवगिरी पर्वत के निकट ही सुधर्मा नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहा करता था। दोनों ने जीवन में सबसे बड़ा दुःख इस बार का था कि वे निःसंतान थे। इसपर ब्राह्मण की पत्नी ने एक हल यह निकाला कि वह अपनी छोटी बहन घुष्मा से अपने पति का विवाह करा दे। उसने वैसा ही किया और अपनी बहन घुष्मा का विवाह अपने पति सुधर्मा से करा दिया। घुष्मा भगवान शिव की परमभक्त थी जो हर रोज सौ पार्थिव शिवलिंग निर्मित कर बड़े मन से शिव जी की पूजा अर्चना किया करती थी। पूजा के बाद उन शिवलिंग को तालाब में विसर्जित कर देती थी।

भगवान शिव ( Bhagwan Shiv ) की असीम कृपा होने के कारण घुष्मा ने पुत्र को जन्म दिया। घर में बच्चे की किलकारी गूंजी तो पूरा घर खुशनुमा रहने लगा। सुदेहा ने अपनी बहन से अपने पति सुधर्मा का विवाह खुशी खुशी तो करा दिया था परंतु अब वह खुशी ईर्ष्या में तब्दील हो गई। अब सुदेहा को बहन का पुत्र एक आंख न सुहाता। उसने अपनी ईर्ष्या के कारण एक रात पुत्र की हत्या कर उसे तालाब में फेंक दिया।  

पुत्र की हत्या की बात जब सबको पता चल गई तो पूरा घर मातम में बदल गया। घुष्मा को अपने प्रभु भगवान शिव पर पूर्ण विश्वास था इसलिए वह बिना विलाप किए रोज की ही तरह सौ पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना कर रही थी। पूजा करने के दौरान उसने देखा कि उसका पुत्र तालाब में से वापिस आ रहा है। भगवान शिव की कृपा से उसका मृत पुत्र जीवित हो गया था। पुत्र के आने के कुछ क्षण बाद भगवान शिव वहां प्रकट होकर घुष्मा को दर्शन देते हैं।

शिव जी ( Shiv ji ) वहां घुष्मा की बहन को दंड देने के लिए पधारे थे लेकिन घुष्मा के सात्विक आचरण ने शिव जी को ऐसा करने से मना कर दिया। घुष्मा के क्षमा याचना करने पर शिव जी मान जाते हैं फिर घुष्मा से शिवजी वरदान मांगने को कहते हैं। इसपर घुष्मा कहती है कि आप सभी के कल्याण के लिए यहीं पर बस जाएं। इसी स्थान को आज Ghushmeshwar Jyotirling या Grishneshwar Jyotirlinga के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति हुई। 

घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास ( Grishneshwar Temple History )

Grishneshwar Temple से जुड़ा पौराणिक इतिहास कहता है कि यहाँ भगवान शिव अपनी परम भक्त घुष्मा के कहने पर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए थे। आज के आधुनिक ऐतिहासिक तथ्यों के हिसाब से इस मंदिर का निर्माण 16 वीं शताब्दी और जीर्णोद्धार 18 वीं शताब्दी में कराया गया था।  

घृष्णेश्वर मंदिर का निर्माण किसने करवाया? ( Who built Grishneshwar Temple? )  

दौलताबाद से 11 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित Grishneshwar मंदिर का निर्माण 16 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के दादाजी मालोजी राजे भोंसले ने करवाया था। इसके बाद इस मंदिर का जीर्णोद्धार 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था।  

घृष्णेश्वर मंदिर की स्थापत्य कला ( Architecture of Grishneshwar Temple )

Grishneshwar Mandir की स्थापत्य कला की बात करें तो इसकी दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गईं हैं। मंदिर में मौजूद 24 खम्भों पर सुंदर नक्काशी तराशी गई है जिसपर सभा मण्डप बनाया गया है। घृष्णेश्वर मंदिर का गर्भगृह 17 गुणा 17 फुट का है जिसमें पूर्वाभिमुख शिवलिंग स्थापित है। भव्य नंदीकेश्वर सभामण्डप में ही विराजमान हैं। घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर ( Ganeshwar Jyotirlinga Mandir ) की एक विशेष बात यह है कि यहाँ 21 गणेश पीठों में से एक पीठ ‘लक्षविनायक’ मौजूद है।

Trimbakeshwar Shiva Temple : ऐसे बने भगवान शिव त्रियंबकेश्वर, जानें इतिहास और कहानी

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग कहाँ है? ( Where is Trimbakeshwar Jyotirling? )

त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंग मन्दिर ( Trimbakeshwar Mandir ) महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में ब्रह्मगिरि पहाड़ियों के निकट त्रयंबक गांव में अवस्थित है। यह भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में शामिल एक ज्योतिर्लिंग है। त्रियंबकेश्वर मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे शिवलिंग स्थापित हैं। माना जाता है कि इन तीनों शिवलिंग में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास है।

शिवपुराण में त्र्यम्बकेश्वर ( Nashik Trimbakeshwar ) स्थान का वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है कि ब्रह्मगिरि पर्वत के ऊपर जाने के लिये सात सौ सीढ़ियाँ हैं। इन सात सीढ़ियों पर चढ़कर ‘रामकुण्ड’ और ‘लक्ष्मणकुण्ड’ मिलते हैं और पर्वत के शिखर पर पहुंचकर गोमुख से निकलती हुई गौतमी जिसे हम गोदावरी भी कहते हैं के दर्शन होते हैं।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति कैसे हुई? ( What is the story behind Trimbakeshwar temple? )

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ( Trimbakeshwar Jyotirlinga ) की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में ब्रह्मगिरी की पहाड़ियों पर एक आश्रम में गौतम ऋषि और उनकी पत्नी अहिल्या रहते और वहीं तपस्या करते थे। वहां रहने वाले लगभग सब ऋषि उनसे ईर्ष्या किया करते थे और बात बात पर नीचा दिखाने और परेशान करने के प्रयासों में जुटे रहते थे।

एक बार सभी ऋषि मुनियों ने धोखा करके गौतम ऋषि ( Gautam Rishi ) पर गौहत्या का आरोप लगा दिया। जब गौतम ऋषि ने गौहत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए हल मांगा तो सभी ऋषियों ने गौहत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए गंगा नदी को ब्रह्मगिरी की पहाड़ियों पर लाने के लिए कहा।

गंगा मां ( Maa Ganga ) को प्रसन्न करने के लिए गौतम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना कर पूजा अर्चना करनी आरंभ कर दी। गौतम ऋषि की तपस्या से भगवान शंकर और देवी पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए और वहां प्रकट हो गए। जब शिवजी ने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा तो उन्होंने वरदान स्वरूप गंगा मां को इस स्थान पर लाने के लिए कहा।

इसपर देवी गंगा ने यह प्रार्थना की और कहा कि मैं इस स्थान पर तभी निवास कर सकती हूं जब मुझे अपनी जटाओं में धारण करने वाले भगवान शिव भी यहां वास करें। गंगा में कहने पर ही भगवान शिव ने वहां वास करने का निर्णय लिया और Shri Trimbakeshwar Shiv Jyotirlinga के रूप में स्थापित हो गए। तभी से गंगा नदी वहां गौतमी के रूप में बहती चली आ रही है जिसे हम गोदावरी के नाम से जानते हैं।

त्रियंबकेश्वर मंदिर का इतिहास ( Trimbakeshwar Temple History )

नासिक जिले में स्थित Trimbakeshwar Shiva Temple से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि भगवान शिव को समर्पित इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण मराठा साम्राज्य के पेशवा नानासाहेब ( Peshwa Nanasaheb ) ने एक शर्त पर करवाया था। शर्त यह थी कि यहाँ स्थापित ज्योतिर्लिंग का पत्थर अंदर से खोखला है या फिर नहीं। परन्तु पेशवा नानासाहेब अपनी शर्त हार गए। इसके बाद उन्होंने इस मंदिर का निर्माण भव्य तरीके से वर्ष 1755 से 1786 के मध्य में करवाया। उन्होंने यहाँ विराजित भगवान शिव की प्रतिमा को नासक डायमंड से निर्मित करवाया। परन्तु दुर्भाग्यवश एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान अंग्रेजो ने यहाँ के डायमंड को लूट लिया था।

त्रियंबकेश्वर मंदिर की स्थापत्य कला ( Architecture of  Trimbakeshwar Temple )

भगवान शिव को समर्पित Trimbakeshwar Mandir Nashik काले पत्थरों से निर्मित किया गया है जो इसकी स्थापत्य कला को एक सुन्दर रूप प्रदान करता है। मंदिर की दीवारों पर सुन्दर नक्काशी बनी हुई है, यह सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर में चारो तरफ दरवाजे बने हुए हैं जिनमें से पश्चिम की ओर वाला दरवाजा विशेष तीज-त्यौहार के मौका पर ही खुलता है। वहीँ मंदिर की पूर्व दिशा की ओर एक चौकोर मंडप बना हुआ है।          

बताते चलें कि इस Nasik Temple के पास तीन पर्वत हैं नीलगिरि, ब्रह्मगिरि और गंगाद्वार पर्वत। ब्रह्मगिरि भगवान शिव को समर्पित है, नीलगिरि पर्वत पर गुरु दत्तात्रेय और नीलाम्बिका देवी का मंदिर मौजूद है। वहीँ गंगाद्वार पर गंगा मंदिर अवस्थित है।  

त्रियंबकेश्वर से कौन सी नदी का उद्गम स्थल है? ( Which river originates from Trimbakeshwar?

Trimbakeshwar Nashik से गंगा नदी जिन्हें गौतमी या गोदावरी कहा जाता है का उद्गम स्थल है। पौराणिक मान्यताएं कहती हैं कि गौतम ऋषि द्वारा यहाँ पर गंगा नदी को घोर तप कर लाया गया था जिन्हें यहाँ गोदावरी के नाम से जाना गया।

भगवान शिव को त्रियंबकेश्वर क्यों कहते हैं? ( Why is Shiva called Trimbakeshwar? )

भगवान शिव को त्रियंबकेश्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। Temple in Nashik त्रियंबकेश्वर मंदिर जहाँ पर स्थित है वहां तीन छोटे शिवलिंग स्थापित हैं जो त्रिदेवों का प्रतिनिधित्व करते हैं।   

त्रियंबकेश्वर मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? ( Why Trimbakeshwar temple is famous? )

त्रियंबकेश्वर मंदिर के प्रसिद्ध होने का सबसे प्रमुख कारण है कि यहाँ स्थापित Trimbakeshwar Shivlingभगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है। इस मंदिर में स्थापित ज्योतिर्लिंग ( Nashik Jyotirling ) में त्रिदेवों का वास माना जाता है। अतः जो भी यहाँ दर्शन करता है उसे तीनों देवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दर्शन स्वतः ही हो जाते हैं। अपनी सुन्दर वास्तुकला के लिए भी स्थान लोकप्रिय है क्योंकि भगवान शिव की हीरों से जड़ी प्रतिमा, दीवारों पर बनी सुन्दर नक्काशी, काले और विशाल पत्थर सभी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

Somnath Temple के नीचे से निकला कुछ ऐसा कि सभी रह गए दंग !

सोमनाथ मंदिर से जुड़े नए राज़ से हुआ पर्दाफाश 

दोस्तों आज हम आपको भगवान शिव के सबसे पहले ज्योतर्लिंग यानी Gujarat Temple Somnath से जुड़े हुए एक ऐसे रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आप भी चौंक जायेंगे। आखिर क्या निकला सोमनाथ मंदिर के नीचे से कुछ ऐसा? जिसे देख सभी की आँखें फटी की फटी रह गयी।  क्या मंदिर के नीचे मौजूद है कोई और शहर? क्यों इस रहस्य के बारे में जानकर वैज्ञानिक भी भाग गए ? दोस्तों सोमनाथ मंदिर के नीचे उस दबे रहस्य के बारे में हम आज आपको बताएंगे।

सोमनाथ मंदिर का रहस्य जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा ( Mystery of Somnath Temple )

दोस्तों सोमनाथ मंदिर के निर्माण के बारे में कोई नहीं जानता और न ही किसी को पता है कि आखिर ये मंदिर कितने साल पुराना है। लेकिन साल 2020 में मंदिर के नीचे से कुछ ऐसा मिला, जिसे देख सभी वैज्ञानिकों के रोंगटे खड़े हो गए और वे वंहा से भाग गए।  दरअसल Somnath Temple के नीचे से नई तकनीकी मशीनों जैसे जीपीआर से इन्वेस्टिगेशन की जा रही थी कि तभी वैज्ञानिकों के हाथ कुछ ऐसा लगा कि वह दंग रह गए। इस मशीन के जरिये उन्हें पता लगा कि मंदिर के नीचे तीन मंजिला पक्की इमारत है। जिसकी इमारत की पहली मंजिल की गहराई ढाई मीटर है, दूसरी मंजिल 5 मीटर गहरी है तथा तीसरी मंजिल की गहराई 7.30 मीटर है। ये इमारत L आकार में बनी हुई है।

इस बड़े रहस्य का पता चलते ही सभी लोग चौंक उठे, आज तक किसी ने नहीं सोचा था कि इस भव्य मंदिर के नीचे एक और इमारत भी होगी। आखिर यह इमारत किसने बनाई होगी? ये आज भी रहस्य बना हुआ है।  दोस्तों आपको बता दें कि यही नहीं मंदिर से कुछ दूरी पर बौद्ध गुफाओं का भी पता चला है। क्या इस Somnath Jyotirling मंदिर के स्थान पर बुद्धिस्ट लोग रहते थे या फिर कुछ और ही रहस्य छिपा हुआ है  इस मंदिर के निर्माण के पीछे?  खैर इन सभी जानकारियों के बारे में पुरातत्व विभाग और कुछ वैज्ञानिक मिलकर इसका पता लगा रहे हैं लेकिन मंदिर के नीचे इमारत का होना वाकई में चौंका देने वाला रहस्य है।

सोमनाथ मंदिर का इतिहास ( History of Somnath Temple )   

दोस्तों Somnath Mandir history कि बात करें तो पुराणों में भी इस मंदिर का जिक्र हुआ है। माना जाता है कि मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने किया था तथा उन्होंने ही यंहा पर शिवलिंग की स्थापना की थी, क्योंकि चंद्रदेव का एक नाम सोम भी है इसलिए मंदिर का नाम सोमनाथ पड़ा।  माना जाता है की दक्ष प्रजापति ने अपनी सभी 27 कन्याओं का विवाह चंद्रदेव के साथ किया था परन्तु चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से सबसे अधिक प्रेम रोहिणी नाम की पत्नी से करते थे। जब दक्ष प्रजापति को इस बात का पता चला तो उन्होंने क्रोध में आकर चंद्रदेव को श्राप दिया कि उनका तेज धीरे धीरे कम होता रहेगा। श्राप के कारण ऐसा ही हुआ और चंद्रदेव का तेज धीरे धीरे कम होने लगा।  इसके बाद उन्होंने भगवान शिव की स्तुति कर श्राप से मुक्ति पायी।

दोस्तों अलग अलग पुराणों में भगवान शिव के Somnath Jyotirling का वर्णन हुआ है , साथ ही इस मंदिर को कई बार खंडित भी किया लेकिन भगवान शिव का यह भव्य मंदिर आज भी जस का तस अपने स्थान पर बना हुआ है। दोस्तों क्या आप सोमनाथ मंदिर गए हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइयेगा और हर हर महादेव भी जरूर लिखियेगा।

Padmanabhaswamy Temple : विष्णु जी को क्यों कहते हैं पद्मनाभस्वामी? जानें इतिहास और रहस्यभरी कहानी

पद्मनाभस्वामी मंदिर कहाँ स्थित है? ( Where is Padmanabhaswamy temple? )

पद्मनाभस्वामी मंदिर ( Padmanabhaswamy Temple ) भगवान विष्णु को समर्पित एक प्रसिद्ध मंदिर है जो केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में स्थित है। यह मंदिर केरल राज्य के ख़ास पर्यटन स्थलों में शामिल होने के साथ-साथ वैष्णव पंथ के प्रमुख स्थलों में से एक माना जाता है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास ( Padmanabhaswamy Temple History )

ऐतिहासिक पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि पद्मनाभ मंदिर केरल के इतिहास की जड़े 8वीं सदी से संबंधित है। प्राचीन काल से ही यह मंदिर भगवान विष्णु के भक्तों का गढ़ माना जाता रहा है और यह भगवान विष्णु के 108 प्रमुख मंदिरों की सूची में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

पद्मनाभ मंदिर कब बना? ( Who created Padmanabhaswamy Temple? )

Kerala Temple Padmanabhaswamy का सुधार कार्य 1733 ई. में शुरू किया गया जिसे त्रावणकोर के महाराजा मार्तण्ड वर्मा ने वर्ष 1750 तक संपन्न करवाया। महाराजा मार्तण्ड वर्मा भगवान विष्णु के परमभक्त थे जो स्वयं को भगवान विष्णु का दास बतलाते थे।

पद्मनाभस्वामी मंदिर स्थापत्य कला ( Architecture of Padmanabhaswamy Temple in hindi )

भगवान विष्णु के 108 प्रमुख मंदिरों दिव्य देसम में से पद्मनाभस्वामी मंदिर ( Padmanabhan Mandir ) के निर्माण के दौरान इसकी स्थापत्य शैली और वास्तुकला का खासतौर पर ध्यान दिया गया था। यही वजह है कि यह मंदिर दक्षिण भारत की उत्कृष्ट वास्तकला के उदाहरणों में शामिल किया जाता है। Padmanabhaswamy Temple Kerala का वास्तुशिल्प द्रविड़ और केरल शैली दोनों पर आधारित है क्योंकि मंदिर का 30 मीटर ऊँचा और सात मंजिला गोपुरम द्रविड़ शैली में निर्मित है जबकि बाकि विशेषताएं केरल शैली से संबंधित दिखाई पड़ती हैं।

पद्मनाभस्वामी मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा ( Padmanabhaswamy Temple Idol ) सहस्त्रमुखी शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। इस प्रतिमा के निर्माण में 12008 शालिग्राम का प्रयोग किया गया है। बताते चलें कि इन 12008 शालिग्राम को नेपाल गंधकी नदी के किनारे से लाया गया था। यहाँ शिखर पर जो ध्वज फहरा रहा है उसपर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की आकृति है। मंदिर में एक स्वर्णस्तम्भ होने के साथ ही गलियारे में कुल 324 सुंदर नक्काशी वाले स्तंभ मौजूद हैं। 

Padmanabha Mandir की एक और ख़ास बात यह है कि यहाँ भगवान विष्णु के दर्शन हमें तीन रूपों में मिलते हैं, जब हम पहले द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं तो हमें विष्णु जी का मुख और सर्प की आकृति के दर्शन होते हैं। दूसरे द्वार तक जाते-जाते हमें मध्यभाग और कमलपुष्प पर विराजमान ब्रह्मा के दर्शन होते हैं और तीसरे द्वार पर भगवान के चरण कमल के दर्शन होते हैं।  

यहाँ Padmanabh Swami Mandir में एक बहुत विशाल सरोवर भी मौजूद है जिसे ‘पद्मतीर्थ कुलम’ कहा जाता हैं। इसके आसपास ख़परैल रूपी लाल टाइल्स की छत के सुंदर घर बने हुए हैं। मंदिर में यदि दर्शन के लिए जाना हो तो विशेष परिधान गणवेष को धारण करना अनिवार्य है इस गणवेष में पुरुषों को धोती तथा स्त्रियों को साड़ी पहननी होती है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर का रहस्य ( Padmanabhaswamy Temple Secrets )

पूरे विश्व में पद्मनाभ मंदिर रहस्य की वजह से जाना जाता है। इस मंदिर को जहाँ एक तरफ दुनिया का सबसे अमीर मंदिर कहा जाता है वहीँ यहाँ के दरवाज़े कई रहस्यों को अपने साथ लिए हुए हैं। दरअसल यहाँ गुप्त तहखाने बने हुए हैं जिनमें से कुछ तहखानों को खोल जा चुका है। बताते चलें कि ये गुप्त तहखाने यहाँ के 7 दरवाजों में बंद हैं। इन सात दरवाजों में से अब तक 6 दरवाजों को खोला जा चुका है। इन दरवाजों के पीछे छिपे तहखानों से अब तक एक लाख 32 हज़ार करोड़ पद्मनाभ मंदिर का खजाना प्राप्त किया गया है।

पद्मनाभ स्वामी के सातवें दरवाजे का रहस्य क्या है? ( What is behind 7th door of Padmanabhaswamy Temple? )

मंदिर का सातवां दरवाजा Vault B अभी तक अपने साथ रहस्य लिए हुए है क्योंकि सातवें दरवाजे पर कोई ताला नहीं लगा फिर भी उसे आज तक खोला नहीं गया है। कहा जाता है कि उसे यदि खोला गया तो बहुत कुछ अपशकुन हो सकता है। हम ऐसा भी कह सकते हैं कि उसे आज तक कोई खोल नहीं पाया है क्योंकि बोल्ट बी नामक यह दरवाजा शापित माना जाता है। जिसे केवल गरुड़ मन्त्रों के उच्चारण से ही खोला जा सकता है। 
Kerala Anantha Padmanabhaswamy Temple बोल्ट बी दरवाजे पर सर्प के आकार का एक चित्र बना है। कहते हैं कि यहाँ छिपे खजाने की रक्षा सांप करते है और इसे कई लोगों ने खोलने का प्रयास किया था परन्तु उसी समय उन्हें ज़हरीले सांप ने काट लिया। इस तरह अब तक मंदिर के इस रहस्य पर से पर्दा नहीं उठ सका है कि सातवें दरवाजे के पीछे ऐसा क्या है जिसकी रक्षा स्वयं सर्प करते हैं।    
 

पद्मनाभस्वामी मंदिर की कहानी ( What is the real story of Padmanabhaswamy temple? )

Padmanabhaswamy Temple Gold की कहानी के संबंध में कहा जाता है कि त्रावणकोर के महाराजा अनिझम थिरुनल मार्थंडा वर्मा ( Anizham Thirunal Marthanda Varma ) ने 17 जनवरी 1750 को अपना सारा राजपाठ भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया था और भगवान को ही राजा घोषित कर दिया था। साथ ही भगवान के समक्ष खड़े होकर यह भी प्रण लिया था कि वे और उनकी आने वाली पीढ़ी यहाँ भगवान की सेवा में ही समर्पित रहेंगी।    

भगवान विष्णु को पद्मनाभस्वामी क्यों कहते हैं? ( Why is Vishnu called Padmanabha? )

भगवान विष्णु को पद्मनाभस्वामी ( Padmanabhaswamy ) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ मंदिर में विराजित भगवान विष्णु शयन मुद्रा में या यूं कहें कि विश्राम अवस्था में हैं। उन्हें पद्मनाभ के साथ अनंतशयनम और मंदिर को Anantha Padmanabha Temple भी कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम का नाम भगवान के अनंत नामक नाग के आधार पर ही रखा गया है।

पद्मनाभ स्वामी मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा ( Mythological story behind Padmanabhaswamy Temple )

Padmanabh Mandir  से जुड़ी पौराणिक किद्वंतियाँ कहती हैं कि यह स्थान सात परशुराम क्षेत्रों में से एक है जिसके बारे में हमें स्कन्द पुराण और पदम् पुराण में भी वर्णन मिलता है।  

पद्मनाभस्वामी मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? ( What is Padmanabhaswamy temple famous for? )

Padmnabh Swami Mandir अपने भव्य इतिहास, वास्तुशिल्प की सुंदरता, स्वर्णस्तंभ और तहखानों के रहस्यों के लिए जाना जाता है। यह स्थान वैष्णव पंथ के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि पद्मनाभस्वामी मंदिर भगवान विष्णु के 108 दिव्य देसम में शामिल है। ऐसी कई पुराणी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं कि यहाँ के आखिरी या सातवें दरवाजे की रक्षा स्वयं सर्प करते हैं जिस कारण उसे आज तक कोई खोल न सका।  

पद्मनाभ मंदिर दर्शन समय ( Sree Padmanabhaswamy Temple Timing )

सुबह 3:30am–12pmशाम 5–8:30pm

( नोट : मंदिर में त्यौहारों के सीजन में पूजा समय में बदलाव हो सकता है। )

Ram Mandir : राम जन्मभूमि अयोध्या मंदिर का खुलने लगा राज़, क्या निकला मंदिर के नीचे?

Ram Janmabhoomi अयोध्या मंदिर जहाँ पर राम मंदिर को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा था लेकिन अब राम मंदिर का निर्माण कार्य को सौगात मिल गयी है। जिसके बनने का सभी को इंतज़ार भी है, इसके लिए 1200 खम्भे की ड्राइंग भी तैयार की गयी थी। हालाँकि  राम मंदिर निर्माण 2023 तक पूरा होना था लेकिन Ayodhya Mandir के नीचे से कुछ ऐसा निकला है जिसे देख सभी के होश उड़ गए। क्या मिला राम मंदिर के नीचे ऐसा कि सरकार समेत सभी लोग दंग रह गए। आखिर कौन सा है वो राज, जो अब खुलने लगा है ? आखिर क्या निकला मंदिर के नीचे से? ये जानने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ियेगा।  

Ayodhya Ram Janmabhoomi का रहस्य

दोस्तों आपको बता दें कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण ( Ram Mandir Nirman ) को लेकर कई कार्य चल रहे हैं।  लेकिन इस निर्माण कार्य के चलते एक ऐसा राज़ खुला जिसे देख सभी हैरान रह गए।  दरअसल जब Ram janam bhumi मंदिर को लेकर निर्माण कार्य चल रहा था तो अचानक से मंदिर के नीचे से सरयू नदी ( Sarju nadi ) की धारा निकल गयी, जिसे देख सभी लोग चौंक गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस सतह पर खुदाई के दौरान अचानक से नदी की धार कैसे निकल गयी? Saryu river की धारा निकलने के कारण काम उसी वक़्त रोक दिया गया और कमेटी के साथ बैठक की गयी।  वंही सूत्रों के अनुसार कमेटी ने Ram Mandir Ayodhya के नीचे saryu nadi के निकलने से बताया है कि इससे निर्माण कार्य में बाधा आ सकती है और मंदिर को बनाने के लिए जो मॉडल तैयार किया गया था वह सरयू नदी के मिलने से सही नहीं है।

 Ayodhya Ram Mandir के नीचे से निकलती Saryu nadi का रहस्य

दोस्तों आपको बता दें कि Ayodhya Ram Mandir के नीचे से सरयू नदी तो जरूर मिली है लेकिन इससे मंदिर के निर्माण में मुश्किलें आ सकती है। साथ ही राम मंदिर के निर्माण में कुछ और भी राज़ भी सामने आये हैं।  दरअसल Saryu River Ayodhya के मिलने से पहले, अयोध्या राम जन्म भूमि की नींव जिन खम्भों पर टिकनी थी उनकी टेस्टिंग के लिए 1200 खम्भों को 125 फ़ीट नीचे डाला गया और फिर तीस दिन तक इन्हें  ऐसे ही रहने दिया गया।  इसके बाद इन खम्भों पर सात सौ टन का वजन डाला गया , साथ ही भूकंप के झटके भी दिए गए लेकिन भूकंप के झटके देते ही कुछ ऐसा हुआ कि सभी के पैरों तले जमीन खिसक गयी।  

हुआ कुछ ऐसा कि सभी खम्भे अपनी जगह से हिल गए थे और कुछ टेढ़े भी हो गए थे। ये देख सभी की चिंताएं बढ़ गयी। दोस्तों हैरानी की बात ये है कि Ram janm bhumi मंदिर को लेकर धीरे धीरे कई खुलासे हो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य था मंदिर के नीचे मिलने वाली सरयू नदी का ( Saryu river in Ayodhya )

दोस्तों क्या Ayodhya ka Ram mandir तय किये गए मॉडल के अनुसार बन पाएगा ? क्या 2023 तक मंदिर बनकर तैयार हो जायेगा ? ये तो वक़्त ही बताएगा।  परन्त।  सरयू नदी का Ram janmabhoomi मंदिर के नीचे मिलना कोई चमत्कार है या कुदरत का करिश्मा ? ये तो कोई नहीं जानता लेकिन कुछ लोग इसे भगवान का ही चमत्कार मान रहे हैं। अगर आप भी राम भक्त है तो कमेंट बॉक्स में जय श्री राम अवश्य लिखयेगा। अगर आपके आस-पास या आपके साथ कोई ऐसी घटना घटित हुई है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है तो आप हमारे साथ जरूर साझा कीजियेगा।

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