पैसे की तंगी से निजात दिलाएगा लक्ष्मी कवच, जानें क्या है इसके उपयोग का तरीका

श्री लक्ष्मी कवच क्या है? ( What is Shri Laxmi Kavach? )

Laxmi kavach जिसके नाम से ही ज्ञात होता है वह कवच जो धन-संपत्ति और वैभव का प्रतीक हो। लक्ष्मी मां सुख- शांति और ऐश्वर्य का प्रतिनिधित्व करती हैं।

लक्ष्मी का अर्थ लोग हमेशा धन से जोड़कर देखते है जबकि लक्ष्मी शब्द चेतना का एक गुण है। ऐसी चेतना जो उपयोग में न आने वाली वस्तुओं को भी उपयोगी बना देती है। 

इस प्रकार यह कवच लक्ष्मी शब्द के साथ प्रयुक्त होने पर इसका महत्व भी अत्यधिक बढ़ जाता है। इस कवच को धन लक्ष्मी कवच भी कहा जाता है। बताते चलें कि Dhan Laxmi Kavach में चेतना का गुण विद्यमान है।

इसके जरिये व्यक्ति स्वल्प साधनों का भरपूर प्रयोग कर पाने में सक्षम हो जाता है। आइये जानते है Maha Dhan Laxmi Kavach के अद्भुत लाभों के बारे में ….

लक्ष्मी कवच के लाभ ( Laxmi Kavach Benefits )

1. यह maha laxmi kavach व्यक्ति को धन-संपदा और वैभव प्रदान करता है।  

2. लक्ष्मी धन कवच घर में सुख-शान्ति बनाये रखने के लिए सहायक है।  

3. इस shri laxmi kavach के माध्यम से संतानहीन स्त्री को पुत्र की प्राप्ति होती है। 
 
4. मां लक्ष्मी उस घर में स्थिर रूप से निवास करती है।  

5. व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।  

6. सभी आर्थिक संकटों से छुटकारा पाने में सहायक है यह shri laxmi kavach। 
 
7. लक्ष्मी धन कवच घर में मौजूद वास्तु दोषों को समाप्त करता है।  

लक्ष्मी कवच को धारण कैसे करें? ( How to wear lakshmi kavach? )

1. Laxmi Kavach को धारण करने के लिए सबसे शुभ दिन शुक्रवार का माना जाता है।  

2. प्रातःकाल स्नान कर चौकी पर लाल कपड़ा बिछाए और माता की प्रतिमा रखें। 
 
3. देवी को लाल चुनरी, लाल पुष्प और सिन्दूर अर्पित करें।  

4. तत्पश्चात मिठाई, मेवा या फल आदि भोग स्वरुप चढ़ाएं।  

5. फिर लक्ष्मी बीज मंत्र का 108 बार जाप करते हुए कवच या कवच रूपी लॉकेट को देवी के चरणों में अर्पित करें। 
 
6. इस प्रकार लक्ष्मी धन कवच या लॉकेट को धारण किया जाना चाहिए।  

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माता लक्ष्मी की कहानी ( Who is Laxmi? )

ऋषि भृगु की पुत्री देवी लक्ष्मी के अनेकों रूप हैं और इन रूपों में से सर्व प्रसिद्ध रूप है अष्टलक्ष्मी। वैसे देवी लक्ष्मी को मां चंचला के नाम से भी पुकारा जाता है। उनका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वह एक जगह पर टिक कर नहीं रहती है। मां लक्ष्मी का एक मुख और चार भुजाएं है। दो भुजाओं में देवी ने कमल पुष्प लिया हुआ है। एक हाथ से देवी आशीर्वाद दे रही हैं जबकि दूसरे हाथ से धन की वर्षा हो रही है। 

माता लक्ष्मी के जन्म से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं है। एक कथा के अनुसार मां लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई है। मंथन के दौरान निकले रत्नों में एक रत्न देवी लक्ष्मी भी थीं।  वहीँ दूसरी कथा के अनुसार देवी लक्ष्मी ऋषि भृगु की पुत्री हैं और उनकी माता का नाम ख्याति था। बताते चलें कि ऋषि भृगु भगवान शिव के साढ़ू और विष्णु जी के श्वसुर थे। [1]
नीचे माता लक्ष्मी के कुछ महत्वपूर्ण मन्त्रों, स्तोत्र और महालक्ष्मी कवचम का जिक्र किया गया है।  

महालक्ष्मी कवचम (Mahalaxmi kavach-am)

महा लक्ष्मी चालीसा पाठ

महालक्ष्मीकनकधारास्तोत्र

महा-लक्ष्मी जी की आरती

महा- लक्ष्मी जी का बीज मंत्र

ॐ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मी नम:।।

Om Laxmi Narayan Namah Mantra

ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:।।
ॐलक्ष्मीनारायणायनमः

लक्ष्मी गायत्री मंत्र

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥

लक्ष्मी गायत्री मंत्र का अर्थ :
इस मंत्र का अर्थ है कि हम माता लक्ष्मी जो भगवान विष्णु की पत्नी है का ध्यान करते हैं।  ताकि वे हमें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें।  हम देवी मां की उपासना करते है। कामना करते है कि वे हम पर अपनी कृपा बनाये रखें।  

Mahalaxmi Ashtakam

महालक्ष्मीअष्टकम इस प्रकार है : 

महालक्ष्मी अष्टकम के लाभ ( MahaLaxmi Ashtakam Benefits )

mahalaxmi ashtakam benefits in hindi इस प्रकार है :

1. व्यक्ति को सिद्धि और बुद्धि की प्राप्ति होती है।  
2. धन-वैभव की प्राप्ति के साथ-साथ हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।  
3. धन संचय में वृद्धि होती है।  
4. सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य सदा बना रहता है।  

Mahalaxmi Mantra

ॐ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।।
लक्ष्मी मंत्र के लाभ : 

1. लक्ष्मी मंत्र का नियमित रूप से जाप करने से घर में मौजूद दरिद्रता दूर होती है।  
2. घर में लक्ष्मी जी का हमेशा के लिए वास होता है।  
3. व्यक्ति 16 प्रकार की कलाओं जैसे अन्नमया, प्राणमया, मनोमया, विज्ञानमया आदि में निपुण हो जाता है।  

लक्ष्मी सूक्त का पाठ

How to do Laxmi Puja at home daily? 

चलिए जानते हैं how to Perform Laxmi Pooja : 

1. प्रतिदिन माता लक्ष्मी की आराधना करने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि वह समयबद्ध रहे।  
 
2. हर रोज़ माता mahalaxmi mantra jaap 108 बार करने से देवी की असीम कृपा बरसती है।  

3. एक निश्चित समय पर प्रातःकाल या संध्या के समय दीपक जलाना चाहिए। 

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How to do Laxmi Puja on Diwali? 

दिवाली पूजन पर कुछ विशेष बातों का ध्यान देना बहुत जरूरी है। बताते चलें कि दीपावली पर जो पूजन किया जाता है उसे षोडशोपचार पूजा भी कहा जाता है। आइये जानते है

पूजा करने की विधि : 

1. शाम को पूजा का मुहूर्त देख एक लकड़ी की चौकी बिछाएं।  

2. चौकी पर लक्ष्मी और गणेश के साथ-साथ मां सरस्वती की प्रतिमा को रखें और उसपर गंगाजल से छिड़काव करें।  

3. पूजास्थल पर एक तांबे या स्टील का पानी से भरा हुआ कलश पांच मोली की गाँठ बांध कर साथ में रखें। कलश पर आम के पत्ते रखें।   

4. पांच तरह की मिठाई, पांच फल और पंचमेवा रखें। साथ ही खील बताशे भी चढ़ाएं।  

5. अन्य छोटे दीपक के साथ एक बड़ा दीपक भी जलाएं।   

6. इसके बाद भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की आरती करें।  

7. दिवाली पर प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण के साथ-साथ कुबेर देवता की भी उपासना की जानी चाहिए।  

How to do Laxmi Kuber Puja?

लक्ष्मी पूजा की ही तरह धन कुबेर की पूजा की जानी चाहिए। लक्ष्मी-कुबेर की पूजा के लिए विधि का नीचे उल्लेख किया गया है।  

1. सर्वप्रथम पूजास्थल पर कुबेर देवता की प्रतिमा रखें और फिर लक्ष्मी माता की भी प्रतिमा को रखना चाहिए।  

2. देवी देवताओं के समक्ष अपनी सब पूंजी गहने और तिजोरी रखें और उसपर स्वास्तिक बनाएं।  

3. उसके बाद दिए गए कुबेर देवता और mahalaxmi mantra jaap करें।  

4. अब पंच मिठाई, पांच फल और पंच मेवा अर्पित करें।  

5. इसके बाद चन्दन, रोली, धुप, अक्षत अन्य देवी-देवताओं को अर्पित करें।  

6. अंत में आरती कर हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद लें।  

 Why Laxmi Ganesh Puja in Diwali?

आइये जानते हैं आखिर गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा एक साथ क्यों होती है?

लोगों के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि जब प्रभु श्री राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या वापस लौटे थे तो दिवाली पर उनकी पूजा के बजाय लक्ष्मी गणेश की पूजा का क्यों विधान है? 

इसका जवाब यह है कि जब श्री राम अयोध्या लौटे तो उन्होंने सबसे पहले लक्ष्मी गणेश का ही पूजन किया था। पूजा करने का उद्देश्य अयोध्या में सुख शांति और समृद्धि बनाये रखना था। यही वजह है कि दिवाली के मौके पर लक्ष्मी गणेश का पूजन किया जाता है।  

लक्ष्मी पूजन का शुभ समय क्या है?

लक्ष्मी माता की पूजा के लिए शुक्रवार का दिन सबसे शुभ माना जाता है और इस दिन शाम को पूजा करनी चाहिये। संध्या के समय पूजा-अर्चना करने से घर में सुख शान्ति और धन-वैभव की प्राप्ति होती है। यह लक्ष्मी पूजन का समय है।

जानिए लक्ष्मी-गणेश की कहानी

भगवान गणेश माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र है जबकि गणेश जी माता लक्ष्मी के दत्तक पुत्र भी कहे जाते है। जिसके पीछे एक कहानी जुड़ी हुई है। 

जब माता लक्ष्मी को इस बात का अहंकार हो गया कि सारा जगत उनकी पूजा करता है अतः वह सबसे शक्तिशाली है। देवी लक्ष्मी को पाने के लिए सभी लालायित है। तब भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी का अहंकार तोड़ने के लिए एक बात कही।

उन्होंने कहा माना आपकी पूजा सम्पूर्ण सृष्टि करती है लेकिन बिना संतान के कोई भी मां पूर्ण नहीं हो सकती।

विष्णु जी की इस बात से दुखी हो जाती है और अपना दुखड़ा माता पार्वती को सुनाती हैं। उनका दुखड़ा सुन पार्वती अपने पुत्र गणेश को गोद स्वरुप माता लक्ष्मी को सौंप देती हैं। इसी दिन से लक्ष्मी गणेश की पूजा साथ में की जाने लगी।

क्या है लक्ष्मी चरण पादुका का महत्व

माता लक्ष्मी की चरण पादुका को घर में धन के आगमन के लिए रखा जाता है। चरणपादुका एक शुभ संकेत है जिसे घर में किसी जिस भी स्थान पर रखा जाता है वहां समस्त प्रकार की समस्याओं का नाश हो जाता है। 

शास्त्रों की माने तो देवी लक्ष्मी के चरणों में 16 प्रकार के शुभ चिन्ह पाए जाते है। यह 16 शुभ चिन्ह 16 कलाओं के प्रतीक बताये गए हैं। 

बात करें कि where to place laxmi charan paduka तो इसे घर, ऑफिस या किसी दुकान पर रखा जा सकता है। इसी तरह लक्ष्मी सिक्का को अपने पर्स या तिजोरी में रखने से धन कभी कम नहीं होता।

लक्ष्मी घर में कैसे आती है? 

1. हर शुक्रवार और किसी तीज त्यौहार के मौके पर गाय को रोटी या अन्न खिलाएं।  
2. हर शुक्रवार नियमित तौर पर मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना करें।  
3. किसी निर्धन या जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं।  
4. घर में साफ़-सफाई रखने से मां लक्ष्मी सदैव उस घर में निवास करती हैं।   

How to make Goddess Laxmi happy?

माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सीधा सा आसान रास्ता है जिसका यदि पालन किया जाए तो वे अपने भक्त से प्रसन्न रहती हैं।  
1. सबसे पहले तो व्यक्ति को अपने घर में साफ़ सफाई यानी स्वच्छता का पालन करना चाहिए।  
2. देवी की नियमित रूप से आराधना करने और मंत्रो का जाप करने से वे खुश रहती हैं।

जानिये नर्मदेश्वर शिवलिंग का महत्व और इसकी पूजा विधि

What is Narmadeshwar Shivling?

हिन्दू धर्म में शिवलिंग की पूजा का काफी महत्व बताया गया है। शिवलिंग पूजा में भी नर्मदेश्वर शिवलिंग का सबसे अधिक महत्व है। नमर्दा नदी से निर्मित होने वाले Narmadeshwar Shivling समेत इस नदी का कण-कण शिव है। 

नर्मदा पुराण की माने तो नर्मदा शिव की पुत्री है जिन्हें भगवान शंकर का वरदान प्राप्त है। इसलिए narmada river shiva lingam stone को सबसे पवित्र माना जाता है।     

मान्यता है कि नर्मदा नदी में स्नान करने से वही फल प्राप्त होता है जो गंगा स्नान से प्राप्त होता है। इस नदी से निकलने वाले हर पत्थर पर भोलेनाथ की कृपा है। इस प्रकार narmada shivling भी अत्यधिक ख़ास है।[1]

Narmadeshwar Shivling Benefits (हिंदी में नर्मदेश्वर शिवलिंग लाभ)

Narmadeshwar shivling को ही बाणलिंग कहा जाता है आइये जानते है banalinga benefits  के बारे में : 

1. घर में सकारात्मक शक्तियों का आगमन होता है और मन भी शांत रहता है।  

2. narmada stone shivling की पूजा करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।  

3. यह व्यक्ति के तामसिक गुणों जैसे – क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और अहंकार को समाप्त करता है।  

4. घर के वास्तु दोष का खात्मा नर्मदेश्वर शिवलिंग के फायदे है।  

How to Worship Narmadeshwar Shivling?

नर्मदेश्वर शिव लिंग पूजा विधि : 

1. प्रातःकाल स्नान करें और शिवलिंग को किसी बड़े थाल में शिव जी प्रतिमा के आगे रखें।  

2. इसके पश्चात भगवान शिव की प्रतिमा के आगे बेलपत्र और नैवेद्य अर्पित करें।  

3. फिर शिवलिंग पर जल अर्पित करें।  

4. उसके बाद भगवान शिव का ध्यान करें और ॐ नमः शिवाय का जाप करें।  

5. साथ ही लिंगाष्टक स्तोत्रम् का पाठ भी कर सकते हैं।

6. थाल वाले जल को किसी पौधे में डाल सकते हैं। 

लिंगाष्टक स्तोत्रम्

नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना के नियम 

1. शिवलिंग को घर और मंदिर दोनों जगह पर अलग तरह से स्थापित किया जाता है।  

2. घर में स्थापित होने वाले शिवलिंग का आकार 6 इंच से बड़ा नहीं होना चाहिए।   

3. शिवलिंग को कहीं भी स्थापित किया जाये उसकी वेदी का मुख उत्तर दिशा की ओर ही होना चाहिए।  

4. नर्मदेश्वर शिवलिंग की तांबे, स्फटिक, पत्थर और सोने-चांदी से बने वेदी पर स्थापित कर पूजा की जाती है।

नर्मदेश्वर शिवलिंग के पीछे की कहानी

बाणलिंग कहे जाने के पीछे की एक कहानी है। इसके अनुसार बाणासुर ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या कर भगवान शंकर को खुश किया था। ताकि वे सदा के लिए अमरकंटक पर्वत पर लिंगरूप में ही रहें। बताते चलें कि इसी पर्वत से नर्मदा नदी बहती है, जहाँ से नदी के साथ बहकर पत्थर आते है। इन्हीं पत्थर रूपी शिव के अंश को बाणलिंग या narmada lingam के नाम से लोग पूजते हैं। ये तो रही नर्मदेश्वर शिवलिंग का महत्व। लेकिन यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?

Why Shivling is Worshiped?

हिन्दू धर्म में शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनकी आराधना दोनों रूपों में की जाती है। इनकी साकार और निराकार रूप में पूजा होती है। शिव अपने साकार रूप में हाथ में त्रिशूल और डमरू लिए दिखते हैं। वहीँ निराकार रूप में वे शिवलिंग रूप धारण किये हुए हैं। भगवान शिव का निराकार रूप पूरे संसार के आदि और अनंत का प्रतीक है।

शैव परंपरा में शिवलिंग का महत्व

शैव परंपरा में भगवान शिव की तीन प्रकार की परिपूर्णताओं का उल्लेख किया गया है। पहला परशिव, दूसरा पराशक्ति और तीसरा परमेश्वर। शिवलिंग का ऊपरी अंडाकार भाग है वह परशिव है। शिवलिंग का निचला भाग पराशक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति समेटे हुए यह शिवलिंग ऊर्जा का एक स्त्रोत है। इसी कारण से हिन्दू धर्म में इसे पूजे जाने की मान्यता है। [2]

शिवलिंग से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :

  1. वेदों की माने तो शिवलिंग में शामिल यह लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर का सूचक है।
  2. इस सूक्ष्म शरीर के कुल 17 तत्व है जिसमें मन, बुद्धि, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 वायु और 5 कर्मेन्द्रियाँ शामिल है।
  3. वायु पुराण में कहा गया है कि सृष्टि का जहाँ अंत होता है और पुनः जन्म होता है वह लिंग है।

FAQs


Types of Shivling 

शिवलिंग के 2 मुख्य प्रकार है अंडाकार और पारद। इसके साथ ही अन्य 6 शिवलिंग के प्रकार का नीचे उल्लेख किया गया है : 

1. देवलिंग 
2. स्वयंभूलिंग 
3. मनुष्यलिंग 
4. पुराणलिंग 
5. अर्शलिंग 
6. आसुरलिंग 

How to find the original Banalinga?

यह स्वयंभू शिवलिंग केवल नर्मदा नदी में पाए जाते है। कई बार तो लोग नर्मदा नदी में डुबकी लगाते समय इसे प्राप्त करते है और आशीर्वाद स्वरुप घर में स्थापित कर लेते हैं।  

Where to buy Narmadeshwar Shivling? 

वैसे तो इस शिवलिंग को बाजार में विश्वसनीय दुकान से खरीद सकते है। यदि आपके मन में सवाल हो कि where to get narmadeshwar shivling Online? तो आप ऑनलाइन इसे prabhubhakti.in पर Narmadeshwar Shivling Online खरीद सकते हैं। 

माँ काली कवच में समाहित है चमत्कारी शक्तियां, ऐसे करें कवच का प्रयोग

काली कवच क्या है? (Maa Kali Kavach in hindi)

माँ काली कवच के बारे में विश्वामित्र सहिंता में जानकारी है कि कवच किसी भी बीमारी को उसके जड़ मूल से समाप्त करने में बहुत प्रभावकारी है। शास्त्रों में यह उल्लेख है कि जब भी देवतागण किसी संकट से घिर जाया करते थे तब वे कवच का प्रयोग कर अपनी आत्मरक्षा करते थे। यह कवच समस्त बुराइयों का खात्मा करने वाली शक्ति प्रदान करता है।  [1]

काली कवच के फायदे

काली कवच को ही दक्षिणा काली कवच कहा जाता है आइये जानते हैं Dakshina kali kavach benefits :

1. Kali Kavach ke labh यह है कि व्यक्ति के शरीर को सभी प्रकार रोगों से रक्षा प्रदान करता है।  

2. यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर रोग से पीड़ित है तो उसको कम करने में भी यह महाकाली कवच प्रभावशाली है।  

3. साधक की उसके शत्रुओं पर विजय पाने और रक्षा के लिए प्रयोग में लाया जाता है ये Kali mata ka kavach

4. यह Adya kali kavach शनि की साढ़े साती के प्रभाव को कम करने में सहायक है।  

5. Kali raksha kavach नकारात्मक शक्तियों से हमारी रक्षा करता है।  

6. काले जादू से सरंक्षण प्रदान करना आदि Kali Kavach ke fayde हैं।

काली कवच को धारण कैसे करें?

काली कवच पाठ विधि (how to recite kali kavach) : 

1. प्रातःकाल स्नान कर देवी की प्रतिमा को चौकी पर रखें।  

2. देवी के समक्ष लाल फूल और फल आदि अर्पित करें।  

3. दिए गए mantra का जाप करते हुए इस कवच को धारण करें। कवच पाठ करने से देवी की असीम कृपा सदैव आपके साथ बनी रहेगी। 

4. ध्यान रहे कि देवी के समक्ष kali kavach locket बिना अर्पित करे इसे धारण करने से इसका प्रभाव कम हो सकता है। 

माँ काली की पूजा विधि इन हिंदी

1. सर्वप्रथम स्नान कर kali devi की प्रतिमा को एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर रखें।  

2.  उसके बाद माता को गुड़हल के फूल या लाल रंग के फूल, मिष्ठान और चावल अर्पित करने चाहिए।  

3. maa bhadrakali की पूजा के लिए मध्य रात्रि का समय सबसे सही माना जाता है। ध्यान रहे कि goddess mahakali की पूजा एक तो सामान्य तरीके से की जाती है वहीँ दूसरी है तंत्र-मंत्र के लिए देवी की उपासना करना।  

4. नैवेद्य और फूल चढ़ाने के बाद maa kali ka mantra का 108 बार जाप करें।  
5. माँ काली का भोग सात्विक भी हो सकता है और तामसिक भी। ज्यादातर देवी को तामसिक भोजन जैसे मांस-मदिरा का भोग लगाया जाता है। वैसे काली को गुड़ और उससे बने पदार्थ अत्यधिक प्रिय है। 

Who is Kali?

मां काली स्वरुप का महत्व :

भगवान शिव को काल का नाम दिया गया है तो उनकी पत्नी को Kali nameदिया है। इन्हें Smashan Kali के नाम से भी जाना जाता है। जिस प्रकार शत्रुओं का संहार करने वाले भगवान शिव अधिपति है उसी प्रकार स्त्री रूप में शत्रुओं की संहारक माँ काली का स्वरूप अधिष्ठात्री देवी हैं। 

Bhadrakali Goddess के ललाट पर चंद्र विराजमान है। कानों में बालकों के शव लटके हुए है और देवी के होंठों से रक्त प्रवाहित होता है। इन्होने अपने दांतों से अपनी जीभ दबाई हुई है। माँ काली का वाहन गदर्भ है जो तमोगुण का प्रतिमान है। ये मुंडमाला धारण करती हैं। Kali name meaning की बात करें तो काली का अर्थ है ‘काल’ जो सभी को अपने में समा लेता है। [2]

माँ काली की कहानी (maa kali story)

अब बात करते है कि आखिर देवी पार्वती के काली रूप की उत्पत्ति कैसे हुई?

माँ काली की कथा तो कई सारी प्रचलन में है। यहाँ मधु-कैटभ दानव और उनके वध के बारे में बताया गया है। जब भगवान विष्णु निद्रा में लीन थे उस वक़्त भगवान विष्णु के कीटकर्ण से निर्मित मधु और कैटभ हुए। यह दोनों ही राक्षस ब्रह्मा जी का वध करने पर उतारू थे ।

इससे डरकर जब ब्रह्मा जी भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे तो वे योगनिद्रा में लीन थे।  यह देख ब्रह्मा जी ने देवी भगवती की स्तुति करना आरम्भ कर दिया। 

स्तुति करते हुए ब्रह्मा जी ने कहा कि हे देवी आपकी ही माया से भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन हैं। कृपया उन्हें निद्रा से जगाएं ताकि इन दोनों राक्षसों का संहार किया जा सके। इसके तुरंत बाद ही भगवान विष्णु नींद से जगे और उन्होंने मधु -कैटभ पर अपनी दृष्टि डाली।

भगवान विष्णु ने लगातार 5 हज़ार वर्षों तक राक्षसों से युद्ध किया फिर भी दानवों को हराने में वे नाकामयाब रहे। इसके पीछे का कारण था देवी भगवती द्वारा मिला इच्छामृत्यु का वरदान। 

मां काली की स्तुति करने पर निद्रा से जागे भगवान विष्णु

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भगवान विष्णु ने मन ही मन mahakali mantra की स्तुति की।  काली मैया ने तुरंत प्रकट होकर दानवों को मारने का हल दिया।

देवी ने कहा कि मैं दोनों को माया से मोहित कर दूंगी। तब तुम उन्हें मार डालना। इस माया से मोहित हुए दानवों से भगवान विष्णु ने कहा तुम दोनों से मैं अत्यधिक प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे अपनी इच्छास्वरूप कोई वर मांग सकते हो।  

इस समय दानव देवी की माया में उलझे हुए थे अतः उन्होंने जवाब दिया ‘विष्णो! हम याचक नहीं हैं, दाता हैं। तुम्हें जो माँगना हो हम से मांगो।’  इसके जवाब में विष्णु बोले- ‘तुम मेरे हाथों से मृत्यु स्वीकार करो।’ इस प्रकार विष्णु ने उन राक्षसों  मस्तक का अपनी जांघ पर रख सुदर्शन चक्र से अंत कर दिया। [3]

नीचे माता काली से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण मंत्रो और स्तोत्र आदि का जिक्र किया गया है :

काली कवच स्तोत्र 

काली का बीज मंत्र (Kali Beej Mantra)

नमः ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा।

श्मशान काली मंत्र (Shamshan Kali Mantra)

॥ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॥

काली ध्यान मंत्र

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा।

सबसे ताकतवर मां काली का सुरक्षा घेरा मंत्र

‘क्रीं ह्रीं काली ह्रीं क्रीं स्वाहा’

माँ काली शाबर मंत्र

bhadrakali maa के कई प्रकार के मंत्र है जैसे वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक और शाबर मंत्र। इनमें से शाबर मंत्र की बात करें तो यह 2 प्रकार के है जिनका जिक्र यहाँ किया गया है।  

माँ काली का शाबर मंत्र 

ॐ नमो काली कंकाली महाकाली मुख सुन्दर जिह्वा वाली,

चार वीर भैरों चौरासी, चार बत्ती पूजूं पान ए मिठाई,

अब बोलो काली की दुहाई।

दूसरा शाबर मंत्र 

।।ऊँ कालिका खडग खप्पर लिए ठाड़ी

ज्योति तेरी है निराली

पीती भर भर रक्त की प्याली

कर भक्तों की रखवाली

ना करे रक्षा तो महाबली भैरव की दुहाई।।

दक्षिणा काली मंत्र

ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं॥

मां काली के 108 नाम (108 Goddess Kali Names)

यहाँ 108 Names of Kali का उल्लेख किया गया है :

Dakshina Kali Mandir


दक्षिणेश्वर काली मंदिर भारत के उत्तर कोलकाता में हुगली नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन मंदिर है। इस dakshina kali temple का संबंध dakshina kali maa से है। यह कालीघाटी मंदिर के बाद सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण रानी रासमणि द्वारा कराया गया था। [4]

काली का पुत्र कौन है?

माँ काली देवी पार्वती का ही अन्य रूप है। इस तरह मां काली के 2 पुत्र हैं कुमार कार्तिकेय और भगवान गणेश।  


माँ काली को क्या पसंद है?

1. देवी काली को गुड़ और उससे बने पदार्थ अति प्रिय हैं।  

2. गुड़हल का फूल उन्हें बहुत पसंद है।  

3. लाल रंग के वस्त्र भी देवी बहुत पसंद करती है।  

माँ काली का ध्यान कैसे करे? 

1. मां काली का ध्यान करने के लिए सर्वप्रथम किसी शांत स्थान की तलाश करें।  

2. उस स्थान पर चौकी रख उसपर लाल कपड़ा बिछाए और माता की प्रतिमा को रखें।  

3. देवी के समक्ष एक दीपक जलाएं।  

4. इसके पश्चात काली माता के बीज मंत्र का 108 बार जाप करें।

काली माता को कौन सा फूल पसंद है?

मां काली को गुड़हल का फूल बेहद पसंद है।  ऐसा माना जाता है कि अगर 108 गुड़हल के फूल  देवी के चरणों में अर्पित करें तो मनवांछित फल मिलता है।   

काली माता के व्रत कैसे रखे जाते हैं?

किसी कठिन समय जब व्यक्ति सभी ओर से हताश हो जाता है उस स्थिति में वह देवी के चरणों में जाता है। माता का व्रत रखने के लिए शनिवार माँ काली का दिन शुभ माना जाता है। नवरात्रि में जिन नियमों का पालन किया जाता है वही नियम काली माता के व्रत में मानने चाहिए।

माँ काली की घर में फोटो क्यों नहीं रखनी चाहिए?

Kali Mata का रूप अत्यंत भयवाह है क्योंकि देवी अपने रौद्र रूप में होती हैं। इसलिए देवी की प्रतिमा को घर में नहीं रखना चाहिए। इससे घर का वातावरण गर्म बना रहेगा और शांति भंग होगी। 

What is the difference between Kali and Mahakali?

काली और महाकाली में स्पष्ट अंतर इसके नाम में ही दिखाई पड़ता है। जहाँ एक तरफ काली का तात्पर्य समय से है जो सबका नाश करता है। वहीँ महाकाली का संबंध भगवान शिव के स्त्री रूप से है यानी महाकाल का स्त्री रूप महाकाली जो कि उनकी पत्नी है। काली का भयवाह रूप केवल दुष्ट प्रवृति के व्यक्तियों के लिए है जिनका संहार देवी काली अपनी शक्तियों से करती है।   

Can we worship Kali at home?


काली माता की उपासना घर में की जा सकती है। बस शर्त यह है कि वह स्थान पवित्र और ध्यान करने के लिए शांति वाला होना चाहिए।  

FORMS OF KALI

मां काली के कई सारे रूप है जिनमें से 12 forms of kali का उल्लेख यहाँ किया गया है : 

आद्य काली 
चिंतामणि काली 
स्पर्शमणि काली 
संतति काली 
सिद्धि काली 
दक्षिणा काली 
भद्रकाली 
श्मशान काली 
अथर्वण भद्रकाली 
कामकला काली 
गुह्य काली 
हंस काली 
कलसंकर्षिणि काली 

महाकाल कवच का इस तरह पाठ करने से मिलेंगे अद्भुत लाभ

महाकाल कवच क्या है? ( What is Mahakal Kavach? )

Mahakal kavach की महिमा अपरंपार है, इसकी महिमा के जैसा दूसरा कोई कवच नहीं है। इसे अमोघ शिव कवच भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे समस्त प्रकार के कष्टों का निपटान हो जाता है । जिनमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक सभी कष्ट शामिल है। कवच का वास्तविक अर्थ ही है रक्षा करना। प्राचीन या पौराणिक समय में जब कोई क्षत्रिय युद्ध आरंभ करता है तो वह सर्वप्रथम किसी लौह कवच को अपने शरीर पर धारण करता है जिससे वह शत्रु के वार से सुरक्षा प्राप्त कर सके। इसी तरह जब किसी व्यक्ति को दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्ति चाहिए होती है तो वह अमोघ शिव कवच का प्रयोग रक्षा के लिए करता है।[1

महाकाल कवच के फायदे ( Benefits of Mahakal Kavach in hindi )

महाकाल कवच को ही अमोघ शिव कवच के नाम से जाना जाता है। आइये जानते हैं Amogh Shiv Kavach Benefits :

1. Amogh Shiv Kavach का पाठ करने वाले व्यक्ति को अकाल मृत्यु जैसा भय कभी नहीं रहता। 

2.Aamogh Shiv Kavach ke labh है कि व्यक्ति को बिमारी और विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता। वह सभी चिंताओं से मुक्त हो जाता है।  

3. Shiv kavach पाठ करने वाले व्यक्तियों के आभामंडल में एक सुरक्षा घेरा सा बना रहता है । वह सभी बुराइयों से कोसों दूर रहता है।  

4. साधक ही नहीं साधक के परिवारजनों को भी हर प्रकार से सुरक्षा प्रदान करना Shiva kavacham benefits में से एक है। [2]

महाकाल कवच क्यों धारण करें? ( Why to wear Mahakal kavach? )

1. चिंताओं से मुक्ति और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहने के लिए siva kavacham का प्रयोग कर सकते हैं।
 
2. शक्तिशाली अमोघ शिव कवच व्यक्ति को एक आरोग्य जीवन प्रदान करेगा।  

3. अकाल मृत्यु और अन्य प्रकार के भय से हमारी रक्षा करेगा।   

महाकाल कवच पूजा विधि ( Mahakal Kavach Worship Method )

1. भगवान शिव की आराधना करते समय हमेशा आचमन कर पवित्री धारण करें। 

2. अपने ऊपर और पूजा सामग्री के ऊपर गंगाजल छिड़कें और संकल्प लेकर महाकाल का ध्यान करें।  

3. दिए गए सर्व शक्तिशाली शिव मंत्र का उच्चारण करने के पश्चात शिव जी के समक्ष नैवैद्य और पुष्पादि अर्पित करें।  [3]

महाकाल कवच का मंत्र : 

ऊॅ हौं जूं सः। ऊॅ भूः भुवः स्वः ऊॅ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

4. शिवअमोघकवचम का पाठ करें और कवच/ कवच रूपी लॉकेट/ या पेंडंट को धारण करें। 

(महाकाल कवच में शामिल चमत्कारी शक्तियों का लाभ उठाने के लिए आज ही Mahakal Kavach Locket Online Online Order करें। )

आखिर भगवान शिव के Shri Mahakal रूप की उत्पत्ति कैसे हुई? ( How Mahakal was born? )

भगवान शिव के अनेकों नाम है जैसे Rudra, Mahakal आदि। जिनके पीछे कोई न कोई पौराणिक रहस्य जुड़ा है। आज हम आपको महाकाल की कहानी के बारे में बताएंगे। महाकाल का संबंध उज्जैन से है जिसे पहले अवंतिकापुरी के नाम से जाना जाता था। 

इसी अवंतिकापुरी में एक परम शिवभक्त ब्राह्मण रहा करता था । जिसे एक दुषण नामक राक्षस ने परेशान कर रखा था। दरअसल राक्षस को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था जिसके कारण वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर उत्पात मचाये रहता था।  

जब राक्षस के तंग किये जाने के कारण परम शिवभक्त तकलीफों में रहने लगा तो Mahakal को बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री महाकाल रूप को धारण कर राक्षस का वध कर दिया। इसी घटना के बाद से भगवान को कालों के काल महाकाल (kalo ke kal mahakal) नाम से जाना जानें लगा। जो भी साधक पूरी श्रद्धा से महादेव की पूजा-अर्चना करते हैं उन्हें महाकाल का चमत्कार अवश्य ही दिखाई देता है। [4]

 Mahakal Mantra

जाप के लिए महाकाल मंत्र :

ऊॅ हौं जूं सः। ऊॅ भूः भुवः स्वः ऊॅ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

Mahakal Stotra

शिव रक्षा स्तोत्र : 

महाकाल श्लोक (Mahakal Shlok) : 

Mahakal Chalisa: 

12 Jyotirlinga Names

सोमनाथ
मल्लिकार्जुन
महाकालेश्वर
ॐकारेश्वर
वैद्यनाथ
भीमाशंकर
रामेश्वर
नागेश्वर
रामेश्वर
घृष्णेश्वर

Name of Char Dham : 

यमुनोत्री धाम 
गंगोत्री धाम 
केदारनाथ धाम
बद्रीनाथ धाम

Why is the Mahakaleshwar Shiva temple famous?

मध्य प्रदेश के Ujjain Mahakal का सर्वप्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है जिसके कारण इसका महत्व अत्यधिक है। बताते चलें कि कई हिन्दू धार्मिक ग्रथों और महाकवियों की रचनाओं जैसे रामायण, महाभारत आदि में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि जिस किसी ने भी इस भव्य मंदिर के दर्शन कर लिए उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।  

When should the prayer of Lord Shiva be in the morning or in the evening?

पूजा करने के लिए सुबह और शाम दोनों ही समय अनुकूल है। ऐसा कहीं उल्लेख नहीं मिलता है कि शिव आराधना केवल सुबह या केवल शाम को ही होनी चाहिए।   

What are the benefits of reciting Shiva suvarnamala Stuti?

1. आदि शंकराचार्य ने भगवान शिव की सुवर्णमाला स्तुति की 50 छंदों में रचना की है। इन छंदों के माध्यम से भगवान शिव के समक्ष अपनी सभी चिंताओं का समर्पण किया जाता है।  

2. स्तुति करने से व्यक्ति की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है।  

3. मन-मस्तिष्क को शांत करने के लिए यह स्तुति का पाठ करना चाहिए।  

4. दुष्ट शक्तियों से हमारी रक्षा करता है। 

Which instrument is not used during the aarti of Lord Shiva?

भगवान शिव की पूजा के समय कई विशेष बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है जैसे पूजा के दौरान तुलसी के पत्तों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। साथ ही ध्यान रखने योग्य बात यह है कि करतल भी नहीं बजाय जाना चाहिए क्योंकि इससे उत्पन्न होने वाली ध्वनि से पूजा में अड़चन होगी।  

त्रिशक्ति कवच को धारण करने की विधि और इसके चमत्कारी फायदे

त्रिशक्ति कवच क्या है? ( What is Trishakti Kavach? )


Trishul Om Swastik के सम्मिश्रण से बना यह त्रिशक्ति कवच तीनों की अद्भुत शक्तियों को लिए हुए है। इसमें शामिल ॐ शब्द में पूरे ब्रह्माण्ड की शक्ति समाहित है। मान्यता है कि इसके उच्चारण मात्र से ईश्वर के निकट पहुंचा जा सकता है। 

वहीँ शिव जी का त्रिशूल समस्त बुराइयों का खात्मा करता है। इससे कोई भी बुरी शक्ति व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचा सकती है।

स्वस्तिक हर कार्य में शुभ का प्रतीक है।  बताते चलें कि ‘अमरकोश’ में ‘स्वस्तिक’ का अर्थ पुण्यकार्य करना लिखा है। इस प्रकार यह कवच हर काम को शुभ करता है। यह सारी बुरी शक्तियों से दूर रखते हुए हमें ईश्वर के निकट पहुंचाता है।

त्रिशक्ति कवच के क्या फायदे? ( Trishakti Kavach Benefits in hindi )


1. त्रिशक्ति कवच इसे धारण करने वाले को संसार की सभी नकारात्मक ऊर्जा से सरंक्षण करता है।  

2. इस भगवान शिव शक्ति कवच  के प्रयोग व्यक्ति के हर काम मंगल होते है।  

3. भगवान शिव की कृपा सदैव जातकों पर बनी रहती है।
   
4. यह सोचने- समझने की क्षमता और रचनात्मकता में वृद्धि करता है। 

कवच लॉकेट की तरह यन्त्र के भी अनेक फायदे है जिनका जिक्र नीचे किया गया है :

त्रिशक्ति यन्त्र क्या है? ( What is Trishakti Yantra? )


अपनी अलग-अलग प्रकार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में यंत्रों का उल्लेख है। धन और वैभव की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी या कुबेर यन्त्र का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार त्रिशक्ति यन्त्र की भी कुछ खास विशेषताएं हैं। इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही इसे प्रयोग में लाया जाता है।

त्रिशक्ति यन्त्र के लाभ ( Trishakti Yantra Benefits )


Trishakti Yantra Benefits in hindi इस प्रकार है :

1. यह विभिन्न ग्रहों की दशा को ठीक करने में सहायक है।  

2. यह वास्तु दोष और पितृ दोष के हानिकारक प्रभावों को शांत करता है।
  
3. यह घर और जीवन में मौजूद संकटों का निवारण करता है।  

4. आभामंडल में सकरात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाता है।  

त्रिशक्ति कवच और यन्त्र को धारण कैसे करें? ( Worship Method of Wearing Trishakti Kavach and Yantra )


1.Trishakti Shivyog कवच को धारण करने या यन्त्र की स्थापना के लिए शिव की प्रतिमा को एक चौकी पर रखें।  

2. इसके पश्चात प्रतिमा पर गंगाजल का छिड़काव करें और भगवान को पुष्प और बेलपत्र अर्पित करें।  

3. प्रतिमा के आगे एक दीपक और धुप जलाकर भगवान शंकर की आराधना करें।  

4. साथ ही ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए इसे धारण करें या स्थापित करें। 

त्रिशक्ति का महत्व ( Significance of Trishakti )


आइये जानते है इस Trishakti Locket में शामिल Trishakti Symbol यानी त्रिशूल, ॐ और स्वस्तिक के महत्व के बारे में : 

शिव जी का त्रिशूल : 

भगवान शंकर का त्रिशूल रजोगुण, तमोगुण और सतगुण की विशेषता लिए है। यह ब्रह्मांण्ड को चलाने और उसका अंत करने का प्रतीक है। ग्रह, नक्षत्र और तारे ये सभी इसमें सम्मिलित है।

यह त्रिशूल व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भौतिक संकटों का निवारण करने में सक्षम है। भगवान शिव के त्रिशूल की एक विशेषता यह है कि यह तीनों कालों का प्रतिनिधित्व करता है। यह भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल से संबंधित है।  

ॐ का महत्व : 

ॐ शब्द में पूरी सृष्टि की ऊर्जा समाहित है। किसी भी मंत्र के उच्चारण में यह शब्द विद्यमान है। देवी देवताओं के हर स्तोत्र, कवच पाठ, सूक्तपाठ में यह शब्द मौजूद है। इससे हमें ॐ शब्द के महत्व का पता चलता है। बताते चलें कि यह कई गंभीर बिमारियों का निवारक भी है।

इसके उच्चारण से जो ध्वनि निकलती है, वह आभामंडल में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाती है। इस शब्द को सुनने से शरीर और अंतर्मन आनंदमय हो जाता है।  

ॐ शब्द के उच्चारण के लाभ : 

1. यह तनाव को कम करता है।  
2. एकग्रता शक्ति को बढ़ाने में लाभदायक।  
3. ह्रदय स्वस्थ रहता है। 
4. नकारात्मक स्थिति से उबरने में सहायक।  
5. भावनाओं को नियंत्रण में रखता है।  [1]

स्वस्तिक का महत्व : 

इसका प्रयोग लगभग हर पूजा में किया जाता है। इसके संबंध में कहा जाता है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’। अर्थात् ‘कल्याण का प्रतीक स्वस्तिक है। ऋग्वेद में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक बताया गया है। उसकी आकृति में शामिल चार भुजाओं को चार दिशाएं बताया गया है। वहीँ सिद्धान्त सार ग्रन्थ में स्वस्तिक विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।

त्रिशक्ति सम्मिश्रण के चमत्कारी लाभ

Shivyog Trishakti में त्रिशूल, ॐ और स्वस्तिक से व्यक्ति तीनों शक्तियों का लाभ मिलता है। इन फायदों जरिये वह हर मार्ग पर अकेले चलकर कई बड़े मुकाम पा सकता है।

ऐसे करें दक्षिणवर्ती शंख को घर में स्थापित, वास्तु दोषों और बुरी शक्तियों का होगा नाश

What is Dakshinavarti Shankh?

शंख की कई श्रेणियां है जिनमें से एक श्रेणी है Dakshinavarti Shankh। बात करें कि Dakshinavarti Shankh kaisa hota hai तो इसका दक्षिणवर्ती नाम इसलिए है क्योंकि जहाँ बाकी सभी शंख का पेट बाई ओर खुलता है वहीँ दक्षिणवर्ती शंख दाईं ओर खुलता है। 

विश्वामित्र सहिंता और गोरक्षा संहिता में दक्षिणवर्ती शंख को घर में खुशहाली और धन-वैभव का प्रतीक है। असली दक्षिणवर्ती शंख हिन्द महासागर के आस-पास श्री लंका और म्यांमार में पाए जाते हैं। बता दें कि भारत में इस शंख के तीन मुख्य क्षेत्र हैं ; राम सेतु, श्रीलंका, रामीश्वरम।

इसे बेहद शुभ माना जाता है। बताते चलें कि यह उन 14 रत्नों में से एक है जो समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी के साथ निकले थे। शंख को माता लक्ष्मी का भ्राता भी कहा जाता है।  [1]

दक्षिणावर्ती शंख के फायदे

(Dakshinavarti Shankh Benefits in hindi) 

1. Dakshinavarti Shankh ke labh में एक लाभ यह है कि इसे घर में रखने से खुशहाली आती है।  

2. घर में लक्ष्मी का वास होता है और धन-संपत्ति में बढ़ोतरी होती है।   

3. इस शंख के घर में रहने से समस्त प्रकार के रोगों का खात्मा होता है।  

4. यह सकारात्मक ऊर्जा को अपनी ओर आकर्षित करता है और नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है। 

5. शंख को घर रखने से बुरे सपनों से मुक्ति मिलती है।  

6. घर से काले जादू की समाप्ति करना Dakshinavarti Shankh Benefits में से एक है।    

7. ऑफिस में या व्यापार स्थल पर रखने से धन में वृद्धि होती है।   [2]

दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना विधि (Dakshinavarti Shankh Sthapit karne ki Vidhi) 

इस शंख को पूरे विधि विधान से स्थापित करने से घर की दरिद्रता समाप्त होती है। साथ ही घर के वास्तु दोष खत्म हो जाते है। आज हम आपको बताएंगे how to establish dakshinavarti shankh. 

1. शंख स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम शंख शुद्धिकरण किया जाना आवश्यक है। 

2. शुद्धिकरण के लिए बुध या बृहपतिवार के दिन पंचामृत और गंगाजल में स्नान कराएं।

2. उसके बाद एक लाल कपड़ा लेकर उसमें शंख को रखें । 

3. बताते चलें कि शंख का खुला भाग आकाश की तरफ और मुख अपनी ओर रखें।

4. साथ ही अक्षत और रोली से इस शंख को भर स्वस्तिक बनायें।

5. इस तरह शुद्धिकरण करने के बाद मां लक्ष्मी के बीज मंत्र का जाप करते हुए इसे स्थापित करें।  [3]

Dakshinavarti Shankh Puja Vidhi 

अभी तक हमने जाना कि दक्षिणवर्ती शंख को स्थापित कैसे करें अब यह जान लेना भी बेहद आवश्यक है कि इसे स्थापित करने के बाद Dakshinavarti Shankh puja कैसे की जाए।  

1. इसे शंख के अत्यधिक प्रभाव प्राप्त करने के लिए माता लक्ष्मी की उपासना की जानी चाहिए।  

2. स्थापना के पश्चात माता लक्ष्मी की प्रतिमा के आगे घी का दीपक जलाएं।   

3. साथ ही आरती या चालीसा का पाठ किया जाना चाहिए।   

4. महालक्ष्मी और दक्षिणवर्ती मंत्र का 108 बार जाप करें।  

ॐ श्री लक्ष्मी सहोदराय नम:’

5. इस विधि का पालन करने से माता लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहेगी और शंख के अच्छे प्रभाव भी देखने को मिलेंगे।  

Dakshinavarti Shankh Mantra

ह्रीं श्रीं नमः श्रीधर कारस्थय पयोनिधि जटायन लक्ष्मी सहोदरय फाल प्रदया फल प्रदया श्रीदक्षिणावर्त शंखय श्री ह्रीं नमः

सकारात्मक प्रभाव जान लेने के बाद कोई भी व्यक्ति इसका प्रयोग किये बिना नहीं रह पाएगा। यदि आप यह खरदीने के इच्छुक है तो यह शंख हमारे पास prabhubhakti.in पर Dakshinavarti Shankh Online उपलब्ध है।

दक्षिणावर्ती शंख की पहचान कैसे करें (How to identify original Dakshinavarti Shankh)

असली दक्षिणावर्ती शंख की पहचान के दो ही तरीके है : 

1. दक्षिणवर्ती शंख की पहचान करने का सबसे प्रचलित तरीका है इसके पेट की दिशा देखना। दाईं तरफ पेट होने के कारण इसे दक्षिणवर्ती कहा गया है।   

2. दूसरा तरीका है इसे कान पर लगाकर सुनना। इस प्रकार के शंख में से ध्वनि सुनाई देती है।   

दक्षिणावर्ती शंख रखने का तरीका (How to Keep Dakshinavarti Shankh)

आपको बताएंगे कि How to place Dakshinavarti Shankh in pooja room. शंख को एक श्वेत कपड़े में लपेटकर मंदिर में या घर के किसी स्थान पर रखा जाना चाहिए। 

In house Where to Keep Dakshinavarti Shankh


1. यदि इसे बैडरूम में रखा जाए तो मन शांत एवं स्थिर रहता है।  

2. तिजोरी में रखने से घर में बरकत बनी रहती है। 

3. अन्न वाली जगह पर इसे रखा जाए तो कभी भी अन्न की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।  

 What is Dakshinavarti Shankh Direction? 

दक्षिणवर्ती शंख को दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखा जाना चाहिए। दक्षिण-पश्चिम में रखे जाने से इसके प्रभाव बहुत सकारात्मक होते है जबकि इसकी विपरीत दिशा में रखने से इसके प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल सकते है।  

How to Worship Dakshinavarti Shankh? 

इस शंख की पूजा श्वेत चीजों जैसे चावल, दूध से की जाती है। आपको बता दें कि यह शंख अत्यंत दुर्लभ है और अधिकतर श्वेत रंग में ही पाया जाता है।  

इस तरह सूर्य कवच का पाठ करने से मिलते हैं अद्भुत फायदे, जानकार हो जाएंगे हैरान

सूर्य कवच क्या है? ( What is Surya Kavach? )

हिन्दू धर्म में कई तरीकों से ईश्वर को प्रसन्न करने के आख्यान है। इन आख्यानों में Surya Kavach का भी ज़िक्र है। कवच का वैसे तो अर्थ रक्षा करना है। लेकिन जब इसमें किसी देवता का नाम जुड़ता है तो उसकी विशेषताएं भी बदल जाती है। यह बदलता रुख व्यक्ति की अलग परेशानियों की ओर इशारा करती है। साथ ही समाधान प्रस्तुत करती हैं। आज हम उन्हीं परेशानियों का समाधान सूर्य कवच के प्रयोग के रूप में लाएं हैं। सूर्य कवच व्यक्ति को कई सारे बुरे प्रभावों से बचाने में सहायक है। सूर्य कवच का काम व्यक्ति को सभी रोगों से मुक्ति दिलाना है। साथ ही शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाना भी है। सूर्य कवच के बारे में याज्ञवल्क्य का उवाच कुछ इस प्रकार है :

श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।
शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।1

इससे तात्पर्य है कि इसके प्रयोग से व्यक्ति को सौभाग्य मिलता है। हर कार्य में सफलता पाने में लाभकारी है। अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाने में Surya kavach Locket सहायक है। क्योंकि सूर्य एकमात्र ऐसे देवता हैं जो प्रत्यक्ष रूप से हमारे बीच मौजूद है।

सूर्य कवच के फायदे ( Surya kavach benefits in hindi )

All Surya Kavach Benefits :

1. Surya kavach locket जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है जो शरीर की रक्षा करता है।

2. समाज में सम्मान-प्रतिष्ठा पाने और कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए लाभदायक है।

3. यह दिव्यता और सौभाग्य के साथ- साथ यश और पराक्रम भी प्रदान करता है।

4. जीवन की आपदाओं से हमारी रक्षा करता है फिर चाहे वो भौतिक हो या आंतरिक।

5. हर रविवार को surya raksha kavach का पाठ करना बहुत ही लाभकारी रहता है।

सूर्य कवच का प्रयोग कब और कैसे करें? ( When and how to use Surya Kavach? )

1. Surya kavach pendant को पहनने के लिए प्रातः काल स्नान कर सूर्य देवता को जल चढ़ाएं।

2. नीचे दिए गए सूर्य कवच का पाठ कर या सूर्य मंत्र का उच्चारण कर इसे धारण कर सकते है।

3. जल चढ़ाने के बाद सूर्य वैदिक मंत्र 108 बार दोहराएं फिर लॉकेट धारण करें।

4. ध्यान देने योग्य बात यह कि बिना पूजा विधि के इसे न पहनें।

5. पूजा विधि के बिना इसके प्रयोग से प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते है।

SURYA KAVACHAM

हिन्दू धर्म में सूर्य की भूमिका ( Significance of Lord Surya in hindi )

भगवान सूर्य का नाम अनंतकाल तक चलता रहेगा। कई बार व्यक्ति भागदौड़ में उलझ कर सभी बातों को दरकिनार कर देता है। इसलिए आज हम आपको सूर्य से जुड़े कुछ अहम तथ्यों के बारे में भी बताएंगे। साथ ही सूर्य देवता को प्रसन्न करने के तरीकों का भी उल्लेख करेंगे।

उपनिषदों और वेदों में तो सूर्य देवता की भूमिका का कई तरीके से बखान किया गया है। सूर्योपनिषद में सूर्य को सम्पूर्ण सृष्टि के होने का एक कारण बताया गया है।

वहीँ वेदों में से ऋग्वेद में सूर्य का सभी देवताओं में महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने “चक्षो सूर्यो जायत” कह कर सूर्य को भगवान की आँख माना है। ब्रह्मवैर्वत पुराण में सूर्य को परमात्मा माना गया है। साथ ही सूर्योपनिषद में सूर्य को सम्पूर्ण सृष्टि के उद्भव का कारण तक बताया गया है। 

पुराणों में यह ज़िक्र मिलता है कि श्री कृष्ण के बेटे साम्ब कुष्ठ रोग से ग्रस्त थे। दरअसल उन्हें ऋषि दुर्वासा ने कुष्ठ रोग का शाप दिया था। साम्ब ने सूर्य की उपासना कर ही उस रोग से छुटकारा पाया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि सनातन धर्म सूर्य को सर्वोच्च स्थान देता है।[2]

वैज्ञानिक और चिकित्सक दृष्टिकोण से सूर्य का महत्व ( Health benefits of Sun in hindi )

सूर्य की किरणें व्यक्ति को कई रोगों से मुक्ति दिलाती है। इस बात पर मेडिकल साइंस भी पूर्णतः विश्वास करती है। सूर्य की किरणों से मिलने वाला सर्वश्रेष्ठ लाभ विटामिन-डी है। इसके अभाव में भारत के लोग कई प्रकार के रोगों से ग्रस्त हैं। जैसे-ऑस्टियोमलेशिया, ऑस्टियोपोरोसिस, रिकेट्स आदि।[3

ऐसा कहा जाता है कि जहां तक सूरज की किरणें पहुँचती हैं, वहां कीटाणु मर जाते हैं। इस तरह किसी रोग का जन्म से पहले ही खात्मा हो जाता है।

सूर्य सौरमंडल के बिल्कुल केंद्र में स्थित एक तारा है ।  इसके इर्द-गिर्द अन्य सभी ग्रह परिक्रमा करते हैं। ऊर्जा के इस स्त्रोत में मुख्यतः हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का समावेश है। 

परमाणु विलय की प्रक्रिया से सूर्य अपने केंद्र यानी मध्य में ऊर्जा निर्मित करता है। इसी ऊर्जा का छोटा सा भाग किरणों के रूप में पृथ्वी तक पहुँचता है। 

इस प्रकार सूर्य का दूसरा वैज्ञानिक महत्व है कि सूर्य के होने से संसार गतिमान है। क्योंकि रोशनी के बिना किसी काम को करने की कल्पना तक नहीं की जा सकती है।[4

सूर्य भगवान की कथा ( Surya bhagwan ki katha )

सूर्य की उत्पत्ति कैसे हुई? ( How was Lord Surya born? ) :

ज्योतिष शास्त्र में तो नवग्रहो में सूर्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वहीँ सूर्य देवता के जन्म की बात करें तो इसके पीछे दो कहानियां जुड़ी हुई है। सूर्य देव की कथा के बारे में बात करें तो सबसे पहली कहानी मार्कण्डेय पुराण से है। जिसके अनुसार शुरुआत में यह संसार प्रकाश के बिना गतिमान था।

उस समय ब्रह्मा जी पृथ्वी पर आये। फिर उन्होंने मुख से ॐ का उच्चारण किया जो सूर्य तेज का सूक्ष्म आकार था। इसी प्रकार उनके चार मुखों से निकले ॐ शब्द से चार वेद बने। जो ॐ के तेज से एक आकार हो और सूर्य का जन्म हुआ।
इसी तरह सृष्टि के निर्माण के वक़्त ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि थे। जिनके भी पुत्र ऋषि कश्यप की शादी अदिति से हुई थी। अदिति ने भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप और उपवास किये थे।  जिसके चलते भगवान सूर्य ने सुषमा नामक एक किरण बन अदिति के गर्भ में स्थान लिया। 

गर्भवती होने के बावजूद अदिति अपनी कठोर तपस्या को लगातार जारी रखती रही। जिसपर ऋषि ने अदिति से क्रोध में कहा कि इस तरह  की कठोर तपस्या करना शिशु के लिए ठीक नहीं। क्या तुम गर्भस्थ शिशु को मारना चाहती हो?
यह सुन अदिति ने उस गर्भस्थ शिशु को अपने गर्भ से अलग कर दिया। इसी दौरान भगवान सूर्य उस शिशु के रूप में प्रकट हुए। यही शिशु आगे चलकर मार्तण्ड नाम से जाना गया।

सूर्य भगवान की पूजा कैसे करें? ( How to do Lord Surya Puja? )

Learn how to worship lord Surya :

1. सूर्य देवता की पूजा करने के लिए सर्वप्रथम प्रातःकाल उठकर स्नान करें और सूर्योदय के समय अर्घ्य दें।   
2. अर्घ्य देते समय दिए गए सूर्य भगवान नमस्कार मंत्र में से किसी एक का जाप करना अनिवार्य है।  
3. विशेष दिन यदि सूर्य देव की उपासना कर रहे हैं तो जाप 108 बार करने से अत्यधिक लाभ मिलेगा।

अब आपको बतातें हैं कि सूर्य को जल कैसे दे?(How to offer water to lord surya)

सूर्य को जल देने का तरीका :
1. सूर्य देवता को जल चढ़ाते वक़्त यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि जितनी जल्दी हो सके जल चढ़ाएं। सूर्योदय के समय ही जल देना सही है, ऐसा करना शुभ माना जाता है।

2. अर्घ्य देते समय एक नियम यह भी है कि मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

3. जल चढ़ाने के पश्चात अगरबत्ती भी जलानी चाहिए। जल देते समय मंत्र का एक बार तो जाप करना ही चाहिए।

4. अर्घ्य देते समय दोनों हाथ सिर से ऊपर होने चाहिए। इसके पीछे का वैज्ञानिक तर्क है कि इससे किरणें शरीर तक पूरी तरह पहुँचती है।

5. ज्योतिष शास्त्र में तो वैसे सूर्य सभी नवग्रहों का राजा है। इस तरह सभी नियमों का पालन करने से नवग्रहों से जुड़ी समस्या समाप्त हो जाएंगी।

सूर्य भगवान को जल चढ़ाने के फायदे

1. हर रोज़ सुबह सूर्य को जल चढ़ाने से आँखें अच्छी रहती है तथा नेत्र से संबंधित रोग नहीं होते।
2. जल चढ़ाने से नौकरी प्राप्त करने में खूब लाभ होता है और आत्मविश्वास बना रहता है।
3. ह्रदय को स्वस्थ रखने के लिए जल अर्पित करना चाहिए। व्यक्ति ह्रदय संबंधित बिमारियों से दूर रहता है।
4. पिता से संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद और ख़राब संबंधों को ठीक करता है।
5. त्वचा से जुड़े सभी रोगों से छुटकारा मिलता है।

सूर्य ग्रह के कमजोर होने के संकेत

कमजोर सूर्य होने से व्यक्ति को जीवन में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जिसके लिए कई तरह के उपाय किये जाते हैं। उपायों को जानने से पहले यह जान ले कि सूर्य के कुंडली में कमजोर होनी की क्या निशानियां हैं।  जब गुरु यानी शिक्षक, पिता या कोई देवता आपसे नाराज़ हो जाएँ तो सूर्य अपनी कमजोर स्थिति में होता है। 

इसी के साथ और भी कई संकेत है जिनसे यह पता लगाया जा सकता है । जैसे- घर के नज़दीक किसी नौकरी जाना या आभूषणों का खो जाना, ह्रदय, आंख और पेट से संबंधित रोग आदि । ये सभी संकेत है कि सूर्य कुंडली में कमजोर है। जिसका उपाय किया जाना बेहद जरूरी है। 

सूर्य ग्रह को मजबूत करने के उपाय

1. हर रविवार सूर्य देव की पूजा कर सूर्य देवता को अर्घ्य देना चाहिए।  
2. सूर्य अर्घ्य मंत्र का 108 बार जाप करने से भी कमजोर सूर्य की स्थिति ठीक की जा सकती है।  
3. घर के वास्तुशास्त्र को ठीक करने से भी यह समस्या हल हो जाती है।  
4. घर के सभी बड़ों का सम्मान करने से भी सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं।  
5. प्रातःकाल जल्दी उठकर सूर्य नमस्कार करने से सूर्य देव की असीम कृपा बरसती है।

सूर्य देवता के महत्वपूर्ण मंत्र और स्तोत्र आदि कुछ इस प्रकार हैं

भगवान सूर्य नमस्कार मंत्र

श्री सूर्य नमन मंत्र का उच्चारण करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। सूर्य मंत्र जाप इस प्रकार है:

भगवान सूर्य देव चालीसा

श्री सूर्य बीज मंत्र

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:।

 सूर्य नमस्कार श्लोक

ॐ ध्येयः सदा सवितृ-मण्डल-मध्यवर्ती,

नारायण: सरसिजासन-सन्निविष्टः।

केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी,

हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ॥

सूर्य भगवान की आरती

सूर्य भगवान के 108 नाम (108 names of lord surya)

Who is the charioteer of Lord Surya?


वाल्मीकि पुराण के अनुसार भगवान सूर्य का सारथी अरुण(Aruna) को बताया गया है। इसी तरह जब भी बात की जाती है कि Who is the sarathi of Lord Surya? तो सारथी ‘अरुण’ का नाम आता है। दिलचस्प बात यह है कि अरुण भगवान विष्णु के सारथी गरुड़ के बड़े भाई हैं।

Who is the Father of Lord Surya?


पुराणों के अनुसार भगवान सूर्य देवता के पिता का नाम महर्षि कश्यप है जो ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि के भी पुत्र हैं। ज्ञात हो कि कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्त मनु थे। विवस्वान को ही सूर्य कहा जाता है।

Who is the Mother of Lord Surya?


Surya Dev की माता का नाम अदिति है। बताते चलें कि अदिति के पुत्रों को आदित्य नाम से संबोधन किया जाता है क्योंकि 33 देवताओं में अदिति के 12 पुत्र हैं जिनमें से एक सूर्य है। 

Who are the Sons of Lord Surya?


पौराणिक कथाओं के अनुसार मनु, यम, कर्ण, सुग्रीव भगवान सूर्य के पुत्र हैं। 

सूर्य नमस्कार के लाभ क्या हैं?


सूर्य नमस्कार के फायदे कुछ इस प्रकार है-

1. सूर्य नमस्कार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे व्यक्ति की छठी इंद्री सक्रिय होती है।  

2. तनाव को दूर भागता है सूर्य नमस्कार।  

3. अनिद्रा की स्थिति को ठीक करता है।  

4. इससे शरीर में विटामिन डी की कमी पूरी होती है।  

5. शरीर का पोस्चर लचीला बनाता है।  

6. पाचन क्रिया को बेहतर कर यह वजन कम करने में भी सहायक है।  

7. त्वचा से जुड़ी सारी समस्या से निजात दिलाता है।  

8. मासिक धर्म की अनियमितता को फिर से ठीक करने में लाभदायक है।  

9. शरीर में रक्त संचार में वृद्धि करता है सूर्य नमस्कार।

सूर्य मंदिर कहां स्थित है?


सर्वप्रसिद्ध कोर्णाक मंदिर ओडिशा राज्य के कोर्णाक नामक शहर में स्थित है। यही वह स्थान जहां सूर्य मंदिर स्थित है, यह जगन्नाथ पूरी से कुछ ही किलोमीटर दूरी पर अवस्थित है। ख़ास बात यह है कि इस मंदिर की गिनती कुछ प्रसिद्ध मंदिरों में होती है। बता दें कि इस मंदिर को साल 1984 में UNESCO ने अपनी विश्व धरोहर में शामिल किया था।[5]

सूर्य मंदिर का इतिहास


Surya Temple का इतिहास भी कई मायनों में दिलचस्प है। प्राचीन समय में इस मंदिर को ‘बिरंचि नारायण’ कहा करते थे। इसी कारण उस इलाके को अर्क कहा जाता था जिसका तात्पर्य होता है ‘सूर्य’. एक कहानी के मुताबिक श्री कृष्णा के पुत्र साम्बा को एक शाप के चलते कुष्ठ रोग हो गया था जिससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने इसी मंदिर में तकरीबन 12 वर्षों तक तपस्या कर भगवान सूर्य को खुश किया था। तभी से इस मंदिर की खूब मान्यता है। 

वहीँ ऐतिहासिक पन्नों की तरफ गौर करें तो यह मंदिर लाल रंग के बलुआ पत्थरों से निर्मित किया गया है। साथ ही इसमें काले रंग के ग्रेनाइट का प्रयोग हुआ है। इस मंदिर को वर्ष 1236-1264 इसे ईसा पूर्व गंगवंश के सामंत राजा नरसिंहदेव द्वारा बनाया बनवाया गया था। 

इसकी शैली कलिंग है जिसमें सूर्य देवता को एक रथ पर विराजमान दिखाया गया है। बताते चलें कि इस पर पत्थरों से बनी नक्काशी उभरी हुई है। वैसे तो अभी इसमें केवल एक ही घोड़ा है लेकिन सम्पूर्ण मन्दिर स्थल को कुल 12 जोड़ी चक्रों के साथ 7 घोड़ों से खींचते बनाया गया है।[6]  

Importance And Benefits Of Maha Mrityunjay Kavach

महामृत्युंज कवच क्या है? ( What is Maha Mrityunjay Kavach? )

महामृत्युंज अमोघ शिव कवच सभी बुरी शक्तियों से रक्षा करने वाला एक यन्त्र स्वरुप है। हिन्दू धर्म में अपनी परपंरा, रीति-रिवाज़ों, नियम, तौर तरीके और ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग का लेखाजोखा कई तरीके से व्यक्त किया गया है कभी श्लोकों के माध्यम से, कभी स्तुति के जरिये तो कभी मंत्र के जाप से व्यक्ति भगवान से वार्ता करने का एक मार्ग खोज लेता है। इसी क्रम में कवच का प्रयोग व्यक्ति आत्मरक्षा के लिए करता है। 

Maha Mrityunjay Kavach की विशेषताओं को जानने के बाद यह जान लेना भी बेहद आवश्यक है कि महामृत्युंजय जाप क्या होता है और किस प्रकार यह हमारे जीवन पर प्रभाव डालता है।  

Maha Mrityunjaya Kavach in hindi (महामृत्युंजय कवच इन हिंदी) : 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ||

अर्थ : इस मंत्र का तात्पर्य है कि हम तीन नेत्र वाले रूद्र की आराधना करते हैं, जो सुगन्धित है, जो हमारा पालन-पोषण है, जिस प्रकार एक फल वृक्ष की शाखा से पृथक होकर मुक्त हो जाता है ठीक उसी प्रकार हम भी मृत्यु के चक्र से, नश्वरता से मुक्त हो जाएं। [1]

महामृत्युंजय कवच के लाभ ( Maha Mrityunjaya Kavach benefits )

1. महामृत्युंजय कवच ( Maha Mrityunjaya Kavach ) जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है सरंक्षित करने वाला एक प्रकार का यन्त्र। 

2. इस कवच को धारण किये जाने से यह हमारे शरीर के आस पास एक कवच रुपी आभामंडल निर्मित कर देता है जो हमें सभी बाहरी बुरी शक्तियों से सरंक्षित करता है।  

3. सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाने में सहायता प्रदान करता है। 

4. Maha Mrityunjaya Kavach शरीर को सभी रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायक है। जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने में हिम्मत प्रदान करता है।  

कवच की विशेषताओं को जानने के बाद यह जान लेना भी बेहद आवश्यक है कि महामृत्युंजय मंत्र क्या होता है और किस प्रकार इसका जाप हमारे जीवन पर प्रभाव डालता है।  

महा मृत्युंजय मंत्र क्या है? ( What is Maha Mrityunjaya Mantra? )

महामृत्युंजय मंत्र ( Maha Mrityunjaya Mantra ) का शाब्दिक अर्थ है ऐसा मंत्र जिसके माध्यम से मृत्यु पर जीत पाई जाती है। इस मंत्र को रूद्र मंत्र, त्रयंबकम मंत्र और संजीवनी मंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में इस शिव रक्षा कवच मंत्र का उल्लेख किया गया है। 

इसकी ख़ास बात यह है कि इस Maha Mrityunjaya Mantra की शक्ति गायत्री मंत्र के बराबर की मानी जाती है। वहीँ शिव की तीन आँखों की तरफ इशारा करते हुए इसे त्रयंबकम कहा गया है। इस मंत्र के महत्व का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जाता है कि ऋषि मुनियों ने महामृत्युंजय मंत्र को वेदों के ह्रदय की संज्ञा दी है। [2]

महा मृत्युंजय मंत्र कितना शक्तिशाली है? ( How powerful is Maha Mrityunjaya Mantra? )

शुरुआत में ही शिव कवच रहस्य के बारे में बताया जा चुका है, इसके नाम में ही इसका सम्पूर्ण भावार्थ छिपा हुआ है यानी यह अकाल मृत्यु तक के भय को समाप्त कर सकता है फिर जीवन की छोटी-मोटी परेशानियां से छुटकारा पाना तो इसके माध्यम से बहुत ही आसान है। यदि कोई जातक इस मंत्र का प्रतिदिन जाप कर पाने में असंभव है तो वह इसका अमोघ शिव कवच प्रयोग कर अपनी इस समस्या का हल निकाल सकता है।

महा मृत्युंजय मंत्र का क्या प्रभाव है? ( What is the effect of Maha Mrityunjaya Mantra? )

Mahamrityunjay jaap ईश्वर से बातचीत और अपनी परेशानी उस तक पहुँचाने का एक रास्ता है जिसपर चलकर भक्त अकाल मृत्यु, कष्टदायी बिमारियों और जीवन-मृत्यु चक्र से मुक्ति पाकर शिव की शरण में पहुंचता है।

कोई भी व्यक्ति जो किसी बीमारी से जूझ रहा है, मृत्यु जिसके द्वार पर खड़ी है, जीवन में कोई परेशानी का सामना कर रहा है, बार-बार हार का मुख देखना पड़ रहा है; इन सभी प्रतिकूल परिस्थतियों में इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को शान्ति मिलती है। कवच का प्रभाव एक दम से तो नहीं मालूम पड़ता है पर शास्त्रों की मानें तो जीवन में इसका प्रभाव पड़ता जरूर है। 

कवच व्यक्ति के भटकते क़दमों को सही रास्ते पर लाने का काम करता है। ऐसा कहा जाता है कि गायत्री मंत्र पूरे ब्रह्माण्ड का बखान करता है तो वहीँ महामृत्युंजय मंत्र पूरे ब्रह्माण्ड से मुक्ति दिलाने का प्रतीक है। [3]

महा मृत्युंजय जाप से जुड़ी पौराणिक कथा ( Mythological Story Behind Mahamrityunjay jaap )

एक मृकण्डु नामक साधू धर्मपत्नी मृदुमति के साथ रहता था जिनका कोई पुत्र नहीं था और वे अपनी इस इच्छा की पूर्ति के लिए भगवान शिव के समक्ष कठोर तपस्या करने का निश्चय करते है। अपने इस दृढ निश्चय के साथ की गई तपस्या के माध्यम से दंपत्ति भगवान शिव को महा मृत्युंजय जाप के माध्यम से प्रसन्न करने में सफल हो जाते है। 

भगवान शिव ( Bhagwan Shiv ) दंपत्ति से प्रसन्न होकर उनकी एक इच्छा पूर्ण करने का वरदान देते हैं लेकिन साथ ही शर्त भी लगा देते हैं। शर्त के अनुसार भगवान शिव दंपत्ति को 2 प्रकार के पुत्र में से किसी एक का चुनाव करने के लिए कहते हैं या तो वे अल्पायु (16 वर्ष) के बुद्धिमान पुत्र को चुन सकते हैं और या फिर दीर्घायु के बुद्धिहीन पुत्र को। मृकण्डु एक ऋषि थे जिस कारण उन्होंने अल्पायु के बुद्धिमान पुत्र का चुनाव किया।

अपने इस पुत्र का नाम ऋषि ने मार्कण्डेय रखा। समय बीतता गया और मार्केण्डय की उम्र अब 16 वर्ष हो चुकी थी। अपने पुत्र की बढ़ती उम्र से चिंतित दंपत्ति के दुःख का कोई ठिकाना नहीं था क्योंकि उन्हें बार बार उस वरदान का स्मरण हो रहा था।  

यह सब देख एक दिन मार्केण्डय अपने पिता से इस दुःख का कारण पूछते है और वजह जानने पर वह भी अपने माता पिता की तरह दृढ निश्चय के साथ तपस्या करना आरम्भ कर देता हैं। मृत्यु का समय समीप आ रहा था और मार्कण्डेय अपनी तपस्या में लीन महामृत्युंजय का जाप जारी रखता है।

16 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद जब मार्कण्डेय के प्राण लेने के लिए यमराज आये उस वक़्त मार्कण्डेय शिव की तपस्या में लीन थे। यह दृश्य देखकर जब व्याकुल यमराज ने जब अपना पाश जब मार्कण्डेय पर फेंका तब बालक मार्कण्डेय ने अपने दोनों हाथों से शिवलिंग को कसकर पकड़ लिया जिस कारण मार्केण्डय पर फेंका गया पाश शिवलिंग पर जा गिरा। 

यमराज की इस हरकत पर भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए और अपनी रक्षा के लिए प्रकट हुए और उसी समय उन्होंने यमराज को मार दिया। शिव और यमराज के बीच हुए इस प्रसंग को सुनकर सभी देवता शिव जी के समंक्ष पहुंचे और यमराज को जीवित करने की अपील की। 

उस समय शिव जी ने यमराज को इस शर्त पर नया जीवन प्रदान किया कि वे मार्केंडय को अपने साथ नहीं ले जाएंगे और इस तरह से मार्केंडय को नया जीवनदान मिला।  यह सभी केवल महा मृत्युंजय जाप के कारण ही संभव हो पाया। [4]

प्रभावशाली महामृत्युंजय जाप : 

Maha Mrityunjaya Jaap किसी भी व्यक्ति को मौत के मुँह से वापस लाने में बहुत प्रभावशाली है, साथ ही इसके अनेक फायदों के बारे में ऊपर उल्लेख किया गया है। यदि सच्चे मन से ईश्वर का ध्यान कर इसे प्रयोग में लाया जाए तो व्यक्ति सही मायने में सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

महा मृत्युंजय मंत्र का जाप कब करें? ( When to chant Maha Mrityunjaya Mantra? )


Maha Mrityunjaya Mantra का सम्पूर्ण फायदा उठाने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि किसी शांत स्थान की तलाश करें जहां पर पूजा में किसी तरह की कोई अड़चन न आए और मन एकाग्र होकर ईश्वर का ध्यान कर सके क्योंकि किसी भी काम को अधूरे मन से करना उस काम को न करने के बराबर है फिर ये तो ईश्वर की भक्ति का कार्य है।

किसी दूसरे व्यक्ति के लिए महा मृत्युंजय मंत्र कैसे करें? ( How to chant Maha Mrityunjaya Mantra for Someone else? )


जिस भी रोगी के लिए इस मंत्र का जाप करना हो उसके लिए सर्वप्रथम “ॐ सर्वं विष्णुमयं जगत ” का उच्चारण करें और उस व्यक्ति के नाम व गोत्र का नाम लेकर ”ममाभिष्ट शुभफल प्राप्त्यर्थं श्री महामृत्युंजय रुद्र देवता प्रीत्यर्थं महामृत्युंजय मंत्र जपं करिष्ये।’’ उच्चारण करते हुए अंजलि में भरा हुआ जल छोड़ें। इस प्रकार किसी रोगी के लिए जाप किया जाता है।

घर पर महा मृत्युंजय मंत्र कैसे करें? ( How to do Maha Mrityunjaya Jaap at home? )


1. Maha Mrityunjaya Mantra का संबंध भगवान शिव से है इसलिए इस मंत्र के जाप के लिए यदि सोमवार का दिन तय किया जाए तो इससे शिव की कृपा बरसेगी।  

2. प्रातःकाल स्नान करने के पश्चात शिव की प्रतिमा पर गंगाजल छिड़कें।  

3. घी का दीया और धूप जलाएं और 108 बार मंत्र का जाप करें। 

महा मृत्युंजय मंत्र का जाप कौन कर सकता है? ( Who can chant Maha Mrityunjaya Mantra? )


1. यदि जन्म, मास, गोचर, दशा, अन्तर्दशा आदि में ग्रहपीड़ा योग हो उस समय Mahamrityunjay jaap किया जाता है।  

2. किसी बड़ी और गंभीर बीमारी, तनाव की स्थिति में इसका जाप कर सकते हैं।  

3. आर्थिक संकट की और धन की बार-बार हानि की स्थिति में Maha Mrityunjaya Jaap करना चाहिए।  

4. रोज-रोज के गृह कलेश से छुटकारा पाने के लिए मंत्र उपयोग किया जा सकता है। 

ज्ञान और यादाश्त बढ़ाने के लिए ऐसे करें देवी सरस्वती की उपासना

क्या है देवी Saraswati के Kavach और Yantra का महत्व

Saraswati Kavach और Yantra में मां सरस्वती के सभी गुणों का सम्मिश्रण होता है जिसकी कामना हर महत्वकांक्षी व्यक्ति को होती है। वैदिक साहित्य में goddess saraswati ज्ञान का आधार बताई गई हैं।  जहां भी ज्ञान, कला, कौशल विद्यमान है वहां देवी सरस्वती का वास होने से ही यह सब संभव हो पाया है। 

देवी सरस्वती के इन सभी गुणों को अपने भीतर जागृत करने के लिए सरस्वती कवच का प्रयोग किया जाता है। सरस्वती कवच और Yantra के महत्व और इसके प्रयोग के बारे में जानने से पहले हम आपको बताएंगे कि आखिर माता सरस्वती का जन्म कैसे हुआ और किस प्रकार वे विद्या की देवी के रूप में जानी गई। 

किसी बालक के जन्म लेने से ही उसके सीखने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है।  विद्यालय में जाते ही उसे सर्वप्रथम saraswati vandana ही सिखाई जाती है ताकि छात्र माता सरस्वती के महत्व को समझ सके।

आइये अब आपको बताते हैं saraswati mata के उद्भव की कहानी

मां सरस्वती साहित्य, कला और संगीत की देवी हैं। saraswati symbol की बात करें तो इनके हाथ में जो वीणा (Musical instrument) है वह संगीत, पुस्तक साहित्य की और हंस कला का प्रतीक है। मां सरस्वती नाम से दो देवियां हिन्दू धर्म में जानी जाती है एक तो ब्रह्मा जी की पत्नी सरस्वती और दूसरी ब्रह्मा जी की पुत्री और विष्णु जी की पत्नी देवी सरस्वती।

ब्रह्मा जी की पत्नी तो तीन प्रमुख त्रिदेवियों में से एक हैं जबकि ब्रह्मा जी की पुत्री और विष्णु जी की पत्नी का जन्म ब्रह्मा जी की जिव्ह से हुआ था। शास्त्रों की मानें तो दोनों ही देवियों का स्वरुप, प्रकृति और विद्या एक जैसी ही मानी गई है इसलिए दोनों की ही पूजा लगभग एकसमान है।[1]

जब भी यह सवाल उठाया जाता है कि who is the father of maa saraswati तो इसका जवाब है ब्रह्मा जी जिनकी जीवा से वे जन्मी थीं। इसी तरह is saraswati married? सवाल का यही जवाब है कि ब्रह्मा जी की जीवा से जन्मी सरस्वती देवी का विवाह भगवान विष्णु से हुआ था। देवी के अनेकों नाम है जैसे- शुक्लवर्ण, शारदा, वाणी, हंसवाहिनी, वागीश्वरी, बुद्धिदात्री, भुवनेश्वरी और चंद्रकांति।

ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।

भावार्थ:- इस saraswati shloka का भावार्थ यह है कि देवी सरस्वती परम चेतना हैं। सरस्वती रूप में ये हमारी बुद्धि और मनोवृत्तियों की रक्षा करने वाली हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अत्यधिक है।

पुराणो में भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर कहा था कि उनकी बसंत पंचमी के दिन पूजा करने वालों के ज्ञान में वृद्धि होगी। यही वजह है कि आज तक वसंत पंचमी के दिन सभी लोग देवी सरस्वती की आराधना करते हैं। अपनी पाठ्यपुस्तक और अन्य ज्ञान अर्जित करने वाली सामग्री को पूजते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी सरस्वती की उपासना से मूर्ख व्यक्ति भी विद्वान हो जाता है।

अब आपको बताएंगे कि सरस्वती कवच के क्या फायदे हैं और इसका प्रयोग कैसे किया जाता है-

सरस्वती कवच क्या है?

सरस्वती कवच व्यक्ति के भीतर इस भावना को जागृत करता है और शिक्षा ग्रहण की दिलचस्पी को बढ़ाता है। वहीँ अगर बात करें कि सरस्वती कवच किस दिन पहना चाहिए तो सरस्वती कवच को पहनने के लिए सबसे शुभ दिन तो basant panchami बताया गया है लेकिन इसे बृहस्पतिवार को भी धारण किया जा सकता है। बात करें what is the effect of saraswati kavach तो कवच का पाठ किये जाने से देवी सरस्वती की साधक पर कृपा बनी रहती है।

सरस्वती कवच के लाभ

  • सरस्वती कवच व्यक्ति को मानसिक तौर पर मजबूती प्रदान करता है।
  • मान्यता है कि इस कवच का 5 लाख बार उच्चारण करने से व्यक्ति बृहस्पति के समान बुद्धिमान हो जाता है।
  • इस कवच का पाठ करने से व्यक्ति संगीत, कला और ज्ञान के क्षेत्र में खूब तरक्की हासिल कर सकता है।
  • यह याददाश्त को तेज करने में भी काफी लाभकारी है।

प्रयोग करने की विधि

  • Kavach का पाठ करने की भी प्रक्रिया है जिसके द्वारा ही जातक कवच का पाठ कर आशीर्वाद पा सकते है।
  • पाठ को शुरू करने से पहले प्रातः काल स्नान करें और श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें।
  • उसके बाद सरस्वती मां की प्रतिमा रखे और सच्चे भाव से दिए गए mantra का जाप करें। यह प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही कवच को धारण किया जा सकता है।

॥ब्रह्मोवाच॥
श्रृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्।
श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्॥
उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वमे।
रासेश्वरेण विभुना वै रासमण्डले॥

  • यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि बिना किसी विधि के इस कवच को धारण नहीं करना चाहिए।

What is Saraswati Yantra?

व्यक्ति सफलता प्राप्ति के लिए भरसक प्रयास करता है और जब वे सभी प्रयास भी व्यक्ति को  उसके इच्छा के मुताबिक फल नहीं दे पाते हैं तो वह अपनी उन सभी महत्वकांक्षाओं की पूर्ती के लिए दुसरे तरह के टोटके अपनाना आरम्भ कर देता है। इन्हीं दूसरे तरीके या टोटके में से एक है saraswati yantra.

शास्त्रों की मानें तो शिक्षा प्राप्ति के लिए यन्त्र का प्रयोग करने से कई तरह के लाभ व्यक्ति को हासिल होते है, जिनका उल्लेख आज हम करने वाले हैं : 

Saraswati Yantra Benefits

  • बौद्धिक क्षमता और एकाग्रता शक्ति को बढ़ाने के लिए saraswati mata yantra काफी लाभकारी है ।
  • maa saraswati yantra कमजोर यादाश्त और परीक्षा के भय को समाप्त करता है ।
  • जिस भी छात्र का मन पढाई में कम लगता है, उसका ध्यान बढ़ाने के लिए इसे प्रयोग में लाया जा सकता है ।
  • कुंडली में मौजूद वो सभी दोष जो व्यक्ति को सफल होने से रोक रहें हैं उन सभी को दूर करने में यह shree saraswati yantra अत्यधिक लाभकारी है ।
  • साथ ही प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्र, कला, साहित्य क्षेत्र में कार्यरत और शोधकर्ताओं के लिए यन्त्र एक अहम भुमका निभा सकता है।
  • बताते चलें कि यन्त्र या सरस्वती यंत्र लॉकेट (saraswati yantra locket) या saraswati yantra pendant में से किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है। दोनों के ही समान लाभ व्यक्ति को मिलेंगे।

How to make Saraswati Yantra

जानें क्या है सरस्वती यंत्र बनाने की विधि:-

saraswati mata yantra की सबसे ख़ास बात यह है कि यदि कोई इसे अपने हाथो से बनाएगा तो उसका अधिक लाभ उस व्यक्ति को प्राप्त होगा क्योंकि हाथ से बना हुआ यन्त्र काफी शुभ माना जाता है। सरस्वती यंत्र बनाने की विधि में अनार की कलम या अष्टगंध की स्याही से भोजपत्र पर बना इसकी स्वयं पूजा करने से बहुत लाभ मिलता है।

ध्यान देने योग्य बात यह कि सरस्वती यंत्र की स्थापना करते समय सरस्वती चालीसा व “ऊं ग्रां ग्रीं ग्रों स: गुरूवे: नम:” जाप करना चाहिए क्योंकि इसका सच्चे मन से जाप करने से अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है।

saraswati vidya yantra बनाने के लिए सर्वप्रथम एक सफ़ेद पन्ने पर 7 बिंदु बनायें उसी श्रृंखला में नीचे सात बिंदुओं के बीच में आठ बिंदु बनायें । इसके पश्चात फिर से ऊपर की बिंदुओं के मध्य में नीचे सात बिंदु बनायें इसी तरह नीचे के क्रम में 6 और फिर नीचे के क्रम में आते-आते एक बिंदु कम करते जाएँ।

ध्यान रहे कि यह बिंदु 2 पर समाप्त होना चाहिए। सर्वप्रथम बनाये गए सात बिंदुओं पर 9 के आकर बनायें और नीचे के बिंदुओं को तिरछी रेखा में जोड़ दें। इस तरह से saraswati yantra symbol अपने हाथ से बना जा सकता है।

सिद्ध अष्ट सरस्वती यंत्र

जानें क्या है ashta saraswati yantra

शास्त्रों के मुताबिक सिद्ध अष्ट सरस्वती यंत्र का प्रयोग करने वाला छात्र तेजस्वी और बुद्धिमान होता है इसलिए जिन विद्यार्थियों का पढाई में मन नहीं लगता है, उन्हें अष्ट सरस्वती यंत्र को छात्र को गले में पहनने की सलाह दी जाती है। 

How Saraswati Yantra Works

यन्त्र एक प्रकार की ज्यामितिक रचना होती है जिसमें कोई आकृति या चिन्ह आदि बने होते है। इस पर बनी आकृतियां विशेष तरह की होती हैं जिसका निर्माण विशेष नक्षत्रों में किया जाता है। अतः सरस्वती यन्त्र के बिल्कुल मध्य में ध्यान केंद्रित करने से ब्रह्माण्ड में मौजूद शक्तियां और ऊर्जा व्यक्ति के मस्तिष्क तक पहुँचती है और ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

ये सभी ऊर्जा व्यक्ति के सभी बुरे दोषों और नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर देती हैं। saraswati yantra education स्तर में वृद्धि के लिए बहुत फायदेमंद है इसलिए इसका प्रयोग ख़ासकर छात्र करते हैं. ध्यान रहे कि इस यन्त्र का प्रभाव 4 वर्ष और 4 माह तक ही रहता है।

सरस्वती माता के अति विशेष मन्त्र

सरस्वती माता मंत्र:

ओम ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

विद्या प्राप्ति मंत्र

अधिकतर छात्र माता सरस्वती की आराधना विद्या प्राप्ति के लिए करते है इसलिए आज हम विद्या प्राप्ति के लिए सरस्वती मंत्र बताएंगे जिसके माध्यम से ज्ञान वृद्धि की जा सकती है।

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति:।।

भावार्थ: इस श्लोक के माध्यम से देवी के व्यापक स्वरुप की व्याख्या की गई है और कहा गया है कि हे देवी समस्त स्त्रियों में और पूरे जगत में तुम्हारा वास है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने वाले उन सभी पदार्थों से बिल्कुल परे हो।

सरस्वती गायत्री मंत्र

सरस्वती ध्यान मंत्र

Saraswati Chalisa

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥

जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी॥

रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

जग में पाप बुद्धि जब होती।तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥

तब ही मातु का निज अवतारी।पाप हीन करती महतारी॥

भावार्थ : सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान और बुद्धि बल रखने वाली हे देवी सरस्वती आपकी जय हो। सब कुछ जानने वाली, कभी न नष्ट होने वाली मां सरस्वती आपकी जय हो। हाथ में वीणा धारण कर हंस की सवारी करने वाली देवी सरस्वती आपकी जय हो। हे देवी आपका चार भुजाओं का रुप पूरे संसार में  विख्यात है। जब-जब इस दुनिया में विनाशकारी बुद्धि बढ़ती है, हे मां तब आप अवतार लेती हैं व इस धरती को पाप से मुक्ति दिलाती हैं।

वाल्मीकिजी थे हत्यारा।तव प्रसाद जानै संसारा॥

रामचरित जो रचे बनाई।आदि कवि की पदवी पाई॥

कालिदास जो भये विख्याता।तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

तुलसी सूर आदि विद्वाना।भये और जो ज्ञानी नाना॥

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा।केव कृपा आपकी अम्बा॥

भावार्थ : जिन वाल्मीकि जी को हत्यारा कहा जाता था । उनको आपके द्वारा मिले प्रसाद के कारण सारा संसार जानता है, उन्होंने रामचरितमानस बनाई और वे विख्यात कवि के नाम से जाने गए। इसी तरह कालिदास, तुलसीदास भी आपकी कृपा दृष्टि से ऐसे ही विख्यात हुए।

करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥

पुत्र करहिं अपराध बहूता। तेहि न धरई चित माता॥

राखु लाज जननि अब मेरी। विनय करउं भांति बहु तेरी॥

मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥

भावार्थ : हे माता भवानी ! मुझ जैसे दीन दुखी को अपना दास समझकर मुझपर अपनी कृपा बरसाओ। पुत्र तो कई अपराध करते हैं आप उन्हें चित में धारण न करें अर्थात मेरी गलतियों को माफ़ करें। हे मां मैं आपकी प्रार्थना करता हूं, मेरी लाज रखना। हे मां मुझ जैसे अनाथ को बस आपका ही सहारा है। मां जगदंबा दया करना, आपकी जय हो।

मधुकैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥

समर हजार पाँच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

चंड मुण्ड जो थे विख्याता। क्षण महु संहारे उन माता॥

रक्त बीज से समरथ पापी। सुरमुनि हदय धरा सब काँपी॥

काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा। बारबार बिन वउं जगदंबा॥

जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा। क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥

भावार्थ : जब मधुकैटभ नामक दानव से भगवान विष्णु ने युद्ध किया तो वे पांच हजार साल तक युद्ध करने के बाद भी उसे हराने में नाकाम रहे। हे मां तब तुमने ही उसकी बुद्धि को विपरीत कर दिया तब राक्षस का वध हुआ। मां मेरी भी मनोकामना पूरी करो। चण्डमुण्ड का वध भी आपने कुछ ही पलों में कर दिया और रक्तबीज जैसे पापी जिससे सब देवता कांपते थे, उसका संहार भी क्षणभर में ही कर दिया। हे! मां मैं आपकी प्रार्थना करता हूँ, आपको नमन करता हूँ, मेरा भी उद्धार करो। 

भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई। रामचन्द्र बनवास कराई॥

एहिविधि रावण वध तू कीन्हा। सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥

को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥

विष्णु रुद्र जस कहिन मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥

भावार्थ : हे मां सरस्वती, आप ही थीं जिसने भरत की मां केकैयी की बुद्धि फेरी और प्रभु श्री राम को वनवास करवाया। इसी तरह रावण का संहार करने वाली भी आप ही हैं। देवताओं, मनुष्यों, ऋषि-मुनियों सभी को सुख-शांति प्रदान की। आपकी जीत की गाथाएं तो अनादि काल से चली आ रही हैं जो कि अनंत हैं। जिनकी संरंक्षिका आप हैं उन्हें स्वयं भगवान विष्णु या शिव भी नहीं मार सकते। रक्त दंतिका, शताक्षी, दानव भक्षी आपके अनेकों नाम प्रचलित हैं।

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

नृप कोपित को मारन चाहे। कानन में घेरे मृग नाहे॥

सागर मध्य पोत के भंजे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥

नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करई न कोई॥

भावार्थ : हे सरस्वती मां दुर्गम कार्यों को करने के कारण समस्त संसार ने आपको दुर्गा रूप की संज्ञा दी है। आप कष्टों को हरने वाली हैं, आप जब भी हम पर कृपा बरसाती हैं तो सुख की प्राप्ती होती है। जब राजा गुस्से में मरना चाहता हो, या फिर जंगल में खूंखार जानवरों से घिर गए हों, या समंदर के बीचों बीच फंस जाए और तूफ़ान आ जाये, भूत पिशाच सता रहे हों या निर्धनता का कष्ट सता रहा हो। हे मां केवल सरस्वती नाम जपते ही सब कुछ फिर से सामान्य हो जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है कि आपका नाम मात्र जपने से ही सभी बड़े संकट भी टल जाते है।

पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥

करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥

भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥

बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥रामसागर बाँधि हेतु भवानी।कीजै कृपा दास निज जानी॥[2]

भावार्थ :जिनके कोई संतान नहीं हैं, वे आपकी पूजा करें और प्रतिदिन इस चालीसा का पाठ करें, तो उन्हें प्रतिभाशाली संतान की अवश्य ही प्राप्ति होगी। इसी के साथ मां के समक्ष धूप और नैवेद्य अर्पित करने से सभी संकट मिट जाते हैं। जो भी माता की सच्चे मन से भक्ति करता है, वे सभी तरह के कष्ट से दूर रहता है    और जो भी सौ बार इसका ह्रदय से पाठ करता है, उसके सभी बंदी पाश दूर हो जाते हैं। हे मां भवानी आप सदा  मुझे दास समझ, अपनी कृपा बरसायें।

Saraswati Stotram

सरस्वती स्तोत्र कुछ इस प्रकार है

Neel Saraswati Stotram

Vishwavijay Saraswati Kavach

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार विश्वविजय सरस्वती कवच का प्रतिदिन पाठ करने से चमत्कारी शक्तियां प्राप्त होती है। पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि देवी सरस्वती के इस विश्वविजय कवच को धारण कर ही महर्षि वेदव्यास, ऋष्यश्रृंग, भारद्वाज, देवल तथा जैगीषव्य ऋषियों ने सिद्धि प्राप्त की थी।

विश्वविजय सरस्वती कवच

What is Basant Panchami?


Basant Panchmi वर्षों से देवी सरस्वती की उपासना करने के लिए मनाया जाने वाला एक पर्व है। इस दिन हिन्दू धर्म से संबंध रखने वाले सभी लोग अपने शैक्षिक सामग्री की पूजा अर्चना कर मां का आशीर्वाद पाने की कामना करते है ताकि वे अपने अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सके।

सरस्वती पूजा को भारत के पूर्वोत्तर भाग, पश्चिम बंगाल, असम में बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है। साथ ही पड़ोसी राज्यों बांग्लादेश और नेपाल में भी इस पूजा को मनाया जाता है।

वहीँ बात करें कि what to do on basant panchami तो इस दिन देवी सरस्वती कीपूरे विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है और सभी स्कूलों, शिक्षण संस्थानों, विश्विद्यालयों आदि में देवी की आराधना भव्य रूप में की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पढाई नहीं कीजाती बल्कि उन किताबों को देवी के समक्ष रख पूजा की जाती है।

Why we celebrate Basant Panchami?

इस पूजा को मनाये जाने के पीछे के महत्व पर चर्चा करें तो इसकी एक पौराणिक कथा भगवान श्री कृष्ण और देवी सरस्वती की वार्ता से जुड़ी है जिसमें  भगवान श्री कृष्ण ने देवी सरस्वती को वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन हर साल तुम्हारी उपासना की जाएगी जिस कारण हर वर्ष बसंत पंचमी मनाई जाती है। जबकि दूसरी कहानी ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना से जुड़ी हुई है।

उपनिषदों के अनुसार जब भगवान शिव की आज्ञा का पालन कर ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया तो उन्हें उस वक़्त कुछ कमी सी महसूस हुई और इस कमी को पूरा करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल लेकर भगवान विष्णु की स्तुति करते हुए नवदुर्गा का निर्माण किया।

दुर्गा के निर्माण के इसी समय दुर्गा के शरीर से एक श्वेत रंग के वस्त्र धारण करते हुए एक चार भुजाओं वाली सुन्दर स्त्री का जन्म भी हुआ जिन्होंने हाथ में वीणा और पुस्तक ली हुई थी और इस तरह देवी सरस्वती अवतरित हुई।

देवी सरस्वती के इस रूप को देखकर दुर्गा मां ने ब्रह्मा जी से कहा कि जिस प्रकार भगवान विष्णु की शक्ति देवी लक्ष्मी है। महादेव की शक्ति देवी पार्वती है, उसी प्रकार श्वेत वस्त्र धारण की हुई देवी सरस्वती आपकी शक्ति बनेंगी।

कैसे करें Saraswati Puja?


1. सर्वप्रथम प्रातःकाल स्नान कर saraswati mata की प्रतिमा को अपने चौकी पर रखें।  

2. माता के समक्ष केसरियां फूल चढ़ाएं और घी का दीपक जलाएं।  

3. अन्य शृंगार सामग्री भी अर्पित करें।  

4. माता को श्वेत वस्त्र पहनाएं क्योंकि यह रंग उन्हें अत्यधिक प्रिय है।  

5. भोग में उन्हें खीर अर्पित करें।  

6. इसके पश्चात दिए गए सरस्वती ध्यान मंत्र का जाप 108 बार करें।   

Which day is for Saraswati Mata?


सरस्वती मां की उपासना के लिए सबसे शुभ दिन बृहस्पतिवार का होता है। हर गुरूवार को देवी की उपासना करने से साधक पर माता की कृपा बनी रहती है। 

How to make Saraswati Maa happy?


प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर सरस्वती मां का ध्यान करने और मंत्र जाप करने से देवी सरस्वती को प्रसन्न किया जा सकता है। देवी को श्वेत सामग्री अर्पित करने से भी माँ प्रसन्न होती हैं क्योंकि यह रंग उनका प्रिय है।

Who Wrote Saraswati Stotram?


शास्त्रों की मानें तो मां सरस्वती स्तोत्र महर्षि पुलस्त्य ऋषि के बेटे महर्षि अगस्त्य द्वारा लिखी गया है। महर्षि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा थीं जिन्हें वैदिक काल की विदुषियों में एक गिना जाता है। इनके ऊपर मां सरस्वती की अति कृपा थी।[4]

Saraswati Temple

देवी सरस्वती के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है शारदा पीठ मंदिर। यह देवी सरस्वती का एक प्राचीन मंदिर है और पाक अधिकृत कश्मीर यानी pok में अवस्थित है। आपको बता दें कि यह 18 शक्ति पीठों में से एक है जिसकी हिन्दू धर्म में अत्यधिक मान्यता है। [5]

तुलसी माला के इस तरह जाप करने से भगवान विष्णु होते हैं प्रसन्न

हिंदू धर्म में tulsi के पौधे को अधिक शुभ माना गया है। कई पूजा-पाठ और अनुष्ठान में तो इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। वैसे तो तुलसी हर हिन्दू घर में मिलेगी लेकिन खासतौर पर वैष्णव परंपरा का पालन करने वालों के घर में तुलसी का पौधा होना उतना ही जरूरी है जितना जरूरी शैव पंथ के लोगों के लिए बेलपत्र है। वैदिक ग्रंथों में तुलसी के महत्व का वर्णन भी देखने को मिलता है। [1]

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तुलसी

वैज्ञानिक भाषा में Ocimum tenuiflorum के नाम से जाना जाने वाला तुलसी का पौधा एक झाड़ के रूप में उगता है इसके पत्ते 2 से 4 cm लम्बे होते हैं, इस पौधे की प्रधान प्रजाति ऑसीमम सैक्टम है और यह भी दो मुख्य उप- प्रजातियों में विभाजित है, रामा तुलसी जिसके पत्ते हरे होते है और दूसरी श्यामा तुलसी जिसके पत्तों का रंग थोड़ा बैंगनी होता है और दोनों ही अपने-अपने औषधीय गुण से लैस व्यक्ति को कई बिमारियों से निजात दिलाते हैं। [2]

सांस्कृतिक और पारम्परिक दृष्टिकोण से तुलसी

Tulsi का भारतीय संस्कृति में बहुत अधिक महत्व है जब घर में तुलसी का पौधा रखने से घर के सभी वास्तु दोष समाप्त हो जाते है तो सोचिये तुलसी माला को यदि धारण कर लिया जाए तो यह हमें शरीर के कितने ही विकारों से छुटकारा दिला सकती है।

TULSI MALA FOR WHICH GOD

तुलसी की माला का जाप अधिकतर वैष्णव धर्म से सम्बन्ध रखने वाले लोग करते है क्योंकि तुलसी का संबंध भगवान विष्णु से है। तो चलिए आपको बताते हैं गरुड़ पुराण में उल्लेखित तुलसी माला के लाभ के बारे में-

Tulsi mala benefits in hindi/तुलसी की माला के लाभ

  • माला धारण करने से मन मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और तनाव से मुक्त करता है जो सुखी जीवन की पहली शर्त है।
  • Tulsi एक रामबाण औषधि है इसलिए माला पहनने से शरीर को बहुत विकारों जैसे – पाचन में गड़बड़ी, संक्रमण से जुड़ी बीमारियां, हृदय और किडनी से संबंधित रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • माला पहनने से शरीर में विद्युत् ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और यह हमारे ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रण रखने में सहायक है।
  • भगवान विष्णु के निकट जाने का एक रास्ता tulsi से होकर गुज़रता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि श्री हरि को tulsi बहुत अधिक प्रिय है।
  • Tulsi mala benefits astrology – ज्योतिषों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति तुलसी माला धारण करता है तो इससे बुध और गुरु ग्रह को काफी बल मिलता है जो सुख समृद्धि का सूचक है।
  • यह घर में मौजूद सभी वास्तु दोषों को समाप्त कर देता है।

Black tulsi mala benefits

  • काले रंग की tulsi माला की सबसे बड़ी खासियत है कि यह व्यक्ति को सभी नकारात्मक ऊर्जा से दूर रखती है और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है।
  • इसका दूसरा फायदा है कि यह व्यक्ति के तनाव को कम करने और मानसिक स्थिरता को बनाये रखने में सहायक है।
  • सभी बुरी शक्तियों को शरीर से दूर रखने में काफी लाभकारी है।

तुलसी माला जपने के नियम

  • Tulsi माला पहनने का सबसे पहला नियम है इसे गंगाजल से धोकर जाप करना।
  • माला जाप करने वालों को सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए और तामसिक भोजन लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा से सख्त परहेज करना चाहिए।
  • गृहस्थ लोगों को माला जाप नहीं करना चाहिए क्योंकि माला जाप से वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है।

कैसे बनती है शुद्ध तुलसी की माला

हाथ से निर्मित Tulsi ki mala बहुत प्रभावकारी है, इसे बनाने के लिए तुलसी की लकड़ी को छीलें और उनके कुल 108 टुकड़े तैयार करें।  इसके बाद उन टुकड़ों में छोटा सा छेद कर उसे धागे में पिरोदें। इस प्रकार घर पर ही तुलसी की माला तैयार की जा सकती है। इस माला को भगवान के समक्ष अर्पित कर सर्वप्रथम आराधना करें और फिर प्रयोग में लाएं।

How to Identify Original Tulsi Mala/तुलसी की माला की पहचान कैसे करें

असली तुलसी माला की पहचान करने सबसे सरल और एकमात्र उपाय है कि बाज़ार से खरीदी हुई माला को पानी में रख दें यदि वह अपना रंग छोड़ने लगे तो वह माला असली नहीं है। इस तरह से माला की पहचान की जा सकती है। 

Vishnu Bhagwan aur Tulsi Mata ki kahani

इस पौराणिक कहानी को जानने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर वृंदा कौन थी ? और, जलंधर राक्षस कौन था ? आपको बता दें कि वृंदा जलंधर नामक राक्षस की पत्नी थी। भगवान विष्णु और वृंदा माता से जुड़ी कहानी की शुरुआत एक जलंधर नामक वीर और पराक्रमी राक्षस से होती है,जालंधर की उत्पत्ति भगवान शिव के तेज से हुई थी, जिसने पृथ्वी लोक पर उपद्रव मचाकर रखा हुआ था।

जलंधर राक्षस की वीरता का रहस्य वृंदा के पतिव्रता होने से संबंधित है। वहीँ जलंधर का आतंक दिन पर दिन बढ़ता ही चल जा रहा था, देवगणों को समझ में नहीं आ रहा था कि इस उपद्रव से छुटकारा कैसे पाया जाए। अतः सभी देवता इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु के समक्ष पहुँचते हैं। 

जालंधर का वध कैसे हुआ ?

सभी देवताओं की बात सुनने के बाद श्री हरि उनकी इस परेशानी का हल निकाल लेते हैं और वृंदा के पतिव्रता को भंग करने का फैसला करते हुए जलंधर का भेष धारण कर वृंदा के निकट पहुंचकर स्पर्श कर देते हैं जिससे वृंदा का सतीत्व नष्ट हो जाता है और युद्ध में देवगणों से लड़ रहा राक्षस जलंधर उसी वक़्त मारा जाता है।

जलंधर का सर धड़ से अलग होकर वृंदा के आंगन में आ गिरता है। यह दृश्य देख वृंदा को ज्ञात हो जाता है कि किसी ने भेष धारण उसे स्पर्श किया है वह क्रोधित हो उठती है। ठीक उसी क्षण विष्णु भगवान वृंदा के सामने प्रकट हो जाते हैं।

क्रोधित वृंदा ने उस समय भगवान विष्णु को यह शाप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे छल के सहारे स्पर्श करके मुझे पति वियोग दिया है , ठीक उसी प्रकार तुम्हें भी पत्नी वियोग सहना होगा और तुम उसके लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे। वृंदा के इसी शाप के कारण भगवान विष्णु ने अयोध्या में श्री राम बनकर जन्म लिया था और उन्हें अपनी पत्नी सीता का वियोग सहन करना पड़ा।

वहीँ दूसरी कथा की शुरुआत भी इसी कहानी के मध्य से हुई है जब वृंदा ने भगवान विष्णु को यह शाप दिया कि मेरा सतीत्व भंग करने के कारण तुम पत्थर बन जाओगे। यही पत्थर शालीग्राम के नाम से जाना गया। तब विष्णु भगवान ने वृंदा से कहा कि ‘मैं तुम्हारे सतीत्व का बहुत आदर करता हूँ अतः जो भी व्यक्ति कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी को तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी’। [4]

इस तरह होता तुलसी-शालिग्राम विवाह, जानिये पूजा विधि

भगवान विष्णु को तुलसी अधिक प्रिय है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि श्री हरि के किसी भी अनुष्ठान या पूजा में तुलसी के पत्तों का होना अनिवार्य है इसके बगैर श्री हरि की आराधना अधूरी मानी जाती है। इसी प्रकार तुलसी की पूजा में भी शालिग्राम का होना उतना ही अनिवार्य है।  

तुलसी विवाह के दौरान की जाने वाली पूजा अर्चना की बात करें, तो इस दिन तुलसी और विष्णु भगवान को पीले वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। तुलसी के पौधे के आसपास मंडप बनाकर तुलसी का सोलह श्रृंगार किया जाता है। इसके पश्चात शालिग्राम को हाथ में लेकर तुलसी के पौधे की परिक्रमा सात बार की जाती है और इस तरह तुलसी-शालिग्राम विवाह संपन्न होता है। [5]

इस प्रकार तुलसी के पौधे का आध्यात्मिक, आयुर्वेदिक, वैज्ञानिक तीनों ही तरह से महत्व है यदि कोई व्यक्ति धार्मिक नहीं है और आध्यात्मिकता की  ओर बढ़ना नहीं चाहता तो भी वह इसके आयुर्वेदिक फायदे जानकर इसका प्रयोग करने से रह नहीं पाएगा। 

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