तुलसी माला के इस तरह जाप करने से भगवान विष्णु होते हैं प्रसन्न

हिंदू धर्म में tulsi के पौधे को अधिक शुभ माना गया है। कई पूजा-पाठ और अनुष्ठान में तो इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। वैसे तो तुलसी हर हिन्दू घर में मिलेगी लेकिन खासतौर पर वैष्णव परंपरा का पालन करने वालों के घर में तुलसी का पौधा होना उतना ही जरूरी है जितना जरूरी शैव पंथ के लोगों के लिए बेलपत्र है। वैदिक ग्रंथों में तुलसी के महत्व का वर्णन भी देखने को मिलता है। [1]

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तुलसी

वैज्ञानिक भाषा में Ocimum tenuiflorum के नाम से जाना जाने वाला तुलसी का पौधा एक झाड़ के रूप में उगता है इसके पत्ते 2 से 4 cm लम्बे होते हैं, इस पौधे की प्रधान प्रजाति ऑसीमम सैक्टम है और यह भी दो मुख्य उप- प्रजातियों में विभाजित है, रामा तुलसी जिसके पत्ते हरे होते है और दूसरी श्यामा तुलसी जिसके पत्तों का रंग थोड़ा बैंगनी होता है और दोनों ही अपने-अपने औषधीय गुण से लैस व्यक्ति को कई बिमारियों से निजात दिलाते हैं। [2]

सांस्कृतिक और पारम्परिक दृष्टिकोण से तुलसी

Tulsi का भारतीय संस्कृति में बहुत अधिक महत्व है जब घर में तुलसी का पौधा रखने से घर के सभी वास्तु दोष समाप्त हो जाते है तो सोचिये तुलसी माला को यदि धारण कर लिया जाए तो यह हमें शरीर के कितने ही विकारों से छुटकारा दिला सकती है।

TULSI MALA FOR WHICH GOD

तुलसी की माला का जाप अधिकतर वैष्णव धर्म से सम्बन्ध रखने वाले लोग करते है क्योंकि तुलसी का संबंध भगवान विष्णु से है। तो चलिए आपको बताते हैं गरुड़ पुराण में उल्लेखित तुलसी माला के लाभ के बारे में-

Tulsi mala benefits in hindi/तुलसी की माला के लाभ

  • माला धारण करने से मन मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और तनाव से मुक्त करता है जो सुखी जीवन की पहली शर्त है।
  • Tulsi एक रामबाण औषधि है इसलिए माला पहनने से शरीर को बहुत विकारों जैसे – पाचन में गड़बड़ी, संक्रमण से जुड़ी बीमारियां, हृदय और किडनी से संबंधित रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • माला पहनने से शरीर में विद्युत् ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और यह हमारे ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रण रखने में सहायक है।
  • भगवान विष्णु के निकट जाने का एक रास्ता tulsi से होकर गुज़रता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि श्री हरि को tulsi बहुत अधिक प्रिय है।
  • Tulsi mala benefits astrology – ज्योतिषों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति तुलसी माला धारण करता है तो इससे बुध और गुरु ग्रह को काफी बल मिलता है जो सुख समृद्धि का सूचक है।
  • यह घर में मौजूद सभी वास्तु दोषों को समाप्त कर देता है।

Black tulsi mala benefits

  • काले रंग की tulsi माला की सबसे बड़ी खासियत है कि यह व्यक्ति को सभी नकारात्मक ऊर्जा से दूर रखती है और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है।
  • इसका दूसरा फायदा है कि यह व्यक्ति के तनाव को कम करने और मानसिक स्थिरता को बनाये रखने में सहायक है।
  • सभी बुरी शक्तियों को शरीर से दूर रखने में काफी लाभकारी है।

तुलसी माला जपने के नियम

  • Tulsi माला पहनने का सबसे पहला नियम है इसे गंगाजल से धोकर जाप करना।
  • माला जाप करने वालों को सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए और तामसिक भोजन लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा से सख्त परहेज करना चाहिए।
  • गृहस्थ लोगों को माला जाप नहीं करना चाहिए क्योंकि माला जाप से वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है।

कैसे बनती है शुद्ध तुलसी की माला

हाथ से निर्मित Tulsi ki mala बहुत प्रभावकारी है, इसे बनाने के लिए तुलसी की लकड़ी को छीलें और उनके कुल 108 टुकड़े तैयार करें।  इसके बाद उन टुकड़ों में छोटा सा छेद कर उसे धागे में पिरोदें। इस प्रकार घर पर ही तुलसी की माला तैयार की जा सकती है। इस माला को भगवान के समक्ष अर्पित कर सर्वप्रथम आराधना करें और फिर प्रयोग में लाएं।

How to Identify Original Tulsi Mala/तुलसी की माला की पहचान कैसे करें

असली तुलसी माला की पहचान करने सबसे सरल और एकमात्र उपाय है कि बाज़ार से खरीदी हुई माला को पानी में रख दें यदि वह अपना रंग छोड़ने लगे तो वह माला असली नहीं है। इस तरह से माला की पहचान की जा सकती है। 

Vishnu Bhagwan aur Tulsi Mata ki kahani

इस पौराणिक कहानी को जानने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर वृंदा कौन थी ? और, जलंधर राक्षस कौन था ? आपको बता दें कि वृंदा जलंधर नामक राक्षस की पत्नी थी। भगवान विष्णु और वृंदा माता से जुड़ी कहानी की शुरुआत एक जलंधर नामक वीर और पराक्रमी राक्षस से होती है,जालंधर की उत्पत्ति भगवान शिव के तेज से हुई थी, जिसने पृथ्वी लोक पर उपद्रव मचाकर रखा हुआ था।

जलंधर राक्षस की वीरता का रहस्य वृंदा के पतिव्रता होने से संबंधित है। वहीँ जलंधर का आतंक दिन पर दिन बढ़ता ही चल जा रहा था, देवगणों को समझ में नहीं आ रहा था कि इस उपद्रव से छुटकारा कैसे पाया जाए। अतः सभी देवता इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु के समक्ष पहुँचते हैं। 

जालंधर का वध कैसे हुआ ?

सभी देवताओं की बात सुनने के बाद श्री हरि उनकी इस परेशानी का हल निकाल लेते हैं और वृंदा के पतिव्रता को भंग करने का फैसला करते हुए जलंधर का भेष धारण कर वृंदा के निकट पहुंचकर स्पर्श कर देते हैं जिससे वृंदा का सतीत्व नष्ट हो जाता है और युद्ध में देवगणों से लड़ रहा राक्षस जलंधर उसी वक़्त मारा जाता है।

जलंधर का सर धड़ से अलग होकर वृंदा के आंगन में आ गिरता है। यह दृश्य देख वृंदा को ज्ञात हो जाता है कि किसी ने भेष धारण उसे स्पर्श किया है वह क्रोधित हो उठती है। ठीक उसी क्षण विष्णु भगवान वृंदा के सामने प्रकट हो जाते हैं।

क्रोधित वृंदा ने उस समय भगवान विष्णु को यह शाप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे छल के सहारे स्पर्श करके मुझे पति वियोग दिया है , ठीक उसी प्रकार तुम्हें भी पत्नी वियोग सहना होगा और तुम उसके लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे। वृंदा के इसी शाप के कारण भगवान विष्णु ने अयोध्या में श्री राम बनकर जन्म लिया था और उन्हें अपनी पत्नी सीता का वियोग सहन करना पड़ा।

वहीँ दूसरी कथा की शुरुआत भी इसी कहानी के मध्य से हुई है जब वृंदा ने भगवान विष्णु को यह शाप दिया कि मेरा सतीत्व भंग करने के कारण तुम पत्थर बन जाओगे। यही पत्थर शालीग्राम के नाम से जाना गया। तब विष्णु भगवान ने वृंदा से कहा कि ‘मैं तुम्हारे सतीत्व का बहुत आदर करता हूँ अतः जो भी व्यक्ति कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी को तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी’। [4]

इस तरह होता तुलसी-शालिग्राम विवाह, जानिये पूजा विधि

भगवान विष्णु को तुलसी अधिक प्रिय है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि श्री हरि के किसी भी अनुष्ठान या पूजा में तुलसी के पत्तों का होना अनिवार्य है इसके बगैर श्री हरि की आराधना अधूरी मानी जाती है। इसी प्रकार तुलसी की पूजा में भी शालिग्राम का होना उतना ही अनिवार्य है।  

तुलसी विवाह के दौरान की जाने वाली पूजा अर्चना की बात करें, तो इस दिन तुलसी और विष्णु भगवान को पीले वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। तुलसी के पौधे के आसपास मंडप बनाकर तुलसी का सोलह श्रृंगार किया जाता है। इसके पश्चात शालिग्राम को हाथ में लेकर तुलसी के पौधे की परिक्रमा सात बार की जाती है और इस तरह तुलसी-शालिग्राम विवाह संपन्न होता है। [5]

इस प्रकार तुलसी के पौधे का आध्यात्मिक, आयुर्वेदिक, वैज्ञानिक तीनों ही तरह से महत्व है यदि कोई व्यक्ति धार्मिक नहीं है और आध्यात्मिकता की  ओर बढ़ना नहीं चाहता तो भी वह इसके आयुर्वेदिक फायदे जानकर इसका प्रयोग करने से रह नहीं पाएगा। 

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