Karmayog : आइये जानें आखिर कर्म का सिद्धांत क्या कहता है और अच्छे कर्म कैसे बनते हैं?

कर्म क्या है? ( Karam kya hai? )

सनातन धर्म में कर्म ( Karma ) कार्य कारण के सिद्धांत  ( cause and effect theory ) से जुड़ा हुआ है। कर्म का अर्थ ( karmic meanाing ) है कोई कार्य या क्रिया जिसके आधार पर अन्य प्रतिक्रियाएं या परिणाम निकलते है। मनुष्य के अच्छे कर्म का अच्छा प्रभाव और उसके बुरे कर्म का बुरा प्रभाव देते हुए पूर्व जन्मों का एक चक्र बन जाता है क्योंकि कुछ कर्म ऐसे होते हैं जिनका भुगतान उस जन्म में नहीं होता। इस तरह इस चक्र में अगले जन्म में उन कर्मों का फल ( karma ka fal ) भुगतना ही होता है।

वहीँ कार्य कारण सिद्धांत का संबंध न केवल भौतिक युग से होता है बल्कि हमारे द्वारा किये जा रहे कार्यों, सोचे जा रहे विचारों, कहे जा रहे शब्दों तक पर यह लागू होता है। कई बार हम कुछ ऐसे कार्य करते हैं जो हम करना नहीं चाहते पर वह पूर्व जन्म के कर्म के आधार पर निश्चित होते है जिस कारणवश वह कार्य किसी न किसी माध्यम से पूर्ण हो ही जाता है।

जैसे ही पूर्व जन्म का हमारा चक्र समाप्त हो जाता है व्यक्ति को उसी समय मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। हमारे शास्त्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि 84 लाख योनियों के बाद मनुष्य का जन्म प्राप्त होता है। साथ ही यह भी विशेष रूप से वर्णित किया गया है कि केवल मनुष्य योनि में ही जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाई जा सकती है। 

कर्म कितने प्रकार के हैं? ( Kinds of Karma )

1. नित्य कर्म
2. नैमित्य कर्म
3. काम्य कर्म
4. निष्काम्य कर्म
5. संचित कर्म
6. निषिद्ध कर्म

मनुष्य के कर्मों का फल कैसे मिलता है? ( karam ka fal kaise milta hai? )

मनुष्य के कर्म का फल ( Karm ka fal ) उसकी परिस्थिति और दैवीय शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि अच्छे कर्म बुरे कर्म की तुलना में अधिक हैं तो बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में और अच्छे कर्मों का फल ( karmo ka fal ) अगले जन्म में मिलना निर्धारित होगा।  इसी तरह यदि मनुष्य द्वारा किये गए कर्म में बुरे कर्म अच्छे कर्मों की तुलना में अधिक हैं तो इस जन्म में अच्छे कर्म भोगने होंगे जबकि बुरे कर्मों को भोगने के लिए अगला जन्म निर्धारित होगा।   

मनुष्य को कौन कौन से कर्म करने चाहिए? ( Manusya ko kaun-kaun se karm karne Chahiye? )

1. मनुष्य को अपने घर परिवार की आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए। अधिक पैसा होने के बावजूद जरूरत पड़ने पर उसे संभाले रखना भी बुरा कर्म बताया गया है। उस धन का इस्तेमाल मुसीबत के समय अवश्य करें। धन बचाने के लालच में न पड़ें।  

2. अपनी आय से अधिक खर्च न करें और अपने सामर्थ्य के अनुसार ही दान-पुण्य करें। अपनी क्षमता से अधिक दान-पुण्य और खर्च आपको पाप का भोगी बना सकता है।  

3. हमेशा अच्छे लोगों की में संगत में रहें और दुष्ट, छल-कपटी की संगति से खुद को बचाकर रखें। बुरी संगति हमें अक्सर बुरे परिणाम ही देती है।  

4. कभी भी खुद के स्वार्थ के लिए दूसरों का अहित करने का न सोचें। शास्त्रों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि जो जैसा बोता है उसे वैसा ही आगे चलकर काटना भी पड़ता है।  

5. कभी किसी व्यक्ति से कुछ छल से छीनने का प्रयास न करें। इसे किये गए सभी पुण्य ( Punya ) नष्ट हो जाते हैं और आप पाप के भागीदार बन जाते हैं।  

6. गरुड़ पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि किसी भी मनुष्य द्वारा किये गए बुरे कर्मों का परिणाम उसके जन्म से लेकर मृत्यु और उसके बाद तक दुखों का कारण बनता है। वह अपनी हर अवस्था में दुःख भोगता है।

अच्छे कर्म कैसे बनते हैं? ( Achhe karm kaise bante hai? )

अच्छे कर्म के बनने से पहले हमें इसपर ध्यान देने की जरूरत है कि आखिर अच्छे कर्मों बनने का सबसे पहला पड़ाव क्या है? मनुष्य के द्वारा किये जाने वाले सभी कर्म उसके विचारों से निर्मित होते है। हमारी सकारात्मक या नकारात्मक सोच विचारों को जन्म देती है और वही विचार कर्म बनते हैं। इस तरह सोच सकारात्मक होने पर ही अच्छे कर्मों का निर्धारण हो सकता है।

अच्छे कर्म को करने के लिए हमारे आस-पास का वातावरण बहुत अधिक जिम्मेदार होता है। कहा भी जाता है कि जैसा वातावरण वैसे हम, इसलिए कोशिश करें कि अपने घर का वातावरण और शरीर का आभामंडल सकरात्मक बनाये रखें। इसके लिए अपने घर में पारद शिवलिंग ( Original Parad Shivling ) को रखें। पारद शिवलिंग में समाहित सकरात्मक ऊर्जा घर और व्यक्ति दोनों को सकारात्मक बनाये रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है। बस ध्यान रहे कि इसे पूजा विधि के द्वारा घर में स्थापित करें और नियमित तौर पर पूजा-अर्चना करते रहें।

प्रारब्ध क्या है? ( Prarabdha kya hai? Or What is Destiny? )

प्रारबध का अर्थ है अपने पूर्व जन्मों में किये गए अच्छे या बुरे कर्मों को वर्तमान में भोगना। मृत्यु के पश्चात हमारे भीतर संग्रहित हुए कुछ कर्म अगले जन्म में चले आते हैं उसे ही प्रारब्ध कहते हैं।

प्रारब्ध कितने प्रकार के होते हैं? ( Prarabdha kitne prakar ke hote hain? Or Kinds of Destiny ) 

सनातन धर्म में तीन प्रकार के प्रारब्ध का उल्लेख किया गया है :
1. मंद प्रारब्ध जिसे वैदिक पुरुषार्थ के द्वारा बदला जा सकता है।  
2. तीव्र प्रारब्ध हमारे पुरुषार्थ और संतों के पुरुषार्थ से बदल सकता है।  
3. तरतीव्र प्रारब्ध अपरिवर्तनीय है क्योंकि इसमें जो होना है वो होकर ही रहेगा।  

पाप का फल कब मिलता है? ( Paap ka fal kab milta hai? )

पाप का फल ( Paap ka fal ) किये गए कर्म पर निर्भर करता है यदि आपके द्वारा किये गए कार्य बुरे हैं और वो अच्छे कर्मों की तुलना में अधिक है तो इसका फल आपको अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। यदि बुरे कर्म कम है तो इसका भुगतान आपको इसी जन्म में करना होगा।  इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है।  

संसार में सबसे बड़ा पाप क्या है? ( Sansar me sabse bada paap kya hai? )

संसार में सबसे बड़ा पाप इस स्त्री का अपमान करना बताया गया है। स्त्री को सृजनकर्ता का दर्जा दिया गया है और यदि स्त्री का अपमान किया जाएगा तो वह व्यक्ति सबसे बड़े पाप का भोगी माना जाता है। श्रीमद्भागवत गीता में द्रौपदी का अपमान ही महाभारत जैसे युद्ध का कारण बना था।

पाप क्या है और पुण्य क्या है? ( Paap kya hai aur Punya kya hai? )

पुण्य किसी के द्वारा निस्वार्थ भाव से की गई सहायता, सकरात्मक विचार, द्वेष भावना, लोभ, लालच और अहंकार को अपने ऊपर हावी न होने देना है जबकि पाप में इन सभी के द्वारा किये गए कर्मों का परिणाम शामिल है।

Shweta Chauhan
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