सप्त बद्री (Sapt Badri) : जानिये भगवान् विष्णु के सात पवित्र धाम की कहानी

सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार के नाम से प्रसिद्ध भगवान् विष्णु पहले भूमि, दूसरे अंतरिक्ष और तीसरे द्युलोक इन तीनों लोकों में वास करते हैं।  ‘विष्णु’ शब्द में विस् का अर्थ है उपस्थित होना। संसार की हर वस्तु हर कण में भगवान् विष्णु का वास है। भारत में भगवान् विष्णु को समर्पित प्रमुख सात स्थान है जिन्हें सप्तबद्री (Sapt Badri) के नाम से जाना जाता हैं।

ये सभी मंदिर अलकनंदा नदी घाटी में बद्रीनाथ से करीब 24 किलोमीटर दूर दक्षिण में नंदप्रयाग तक फैले है जिसे बद्रीक्षेत्र के नाम से जाना जाता है। बता दें सप्त बद्री (Sapt Badri) में कुल 7 मंदिर शामिल है। ये हैं – आदि बद्री (Adi Badri), योगध्यान बद्री (Yogdhyan Badri), भविष्य बद्री (Bhavishya Badri), ध्यान बद्री (Dhyan Badri), वृद्ध बद्री (Vridh Badri), नरसिंह बद्री (Narsingh Badri) और विशाल बद्री (Vishal Badri)। आइये जानते हैं सप्त बद्री नाम से प्रसिद्ध उन सात मंदिरों के बारे में :  

1. आदि बद्री  ( Adi Badri )

आदि बद्री उत्तराखंड में हल्द्वानी मार्ग पर कर्णप्रयाग से करीब 17 किलोमीटर की दूरी पर तथा चांदपुर से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडवो द्वारा किया गया था। 

यह भगवान् विष्णु का प्रथम तीर्थ माना जाता है जिसके बारे में मान्यता है कि यहाँ भगवान विष्णु शुरुआत में पूजे जाते थे। ‘आदि’ का अर्थ होता है शुरुआत। भगवान विष्णु यहाँ तीन युग जिनमें सतयुग, त्रेता युग और द्वापर युग शामिल हैं तक ही रहे थे। इसके बाद वे बद्रीनाथ में पूजे जाने लगे।  

2. योगध्यान बद्री ( Yogdhyan Badri )

यह उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्ग बद्रीनाथ – ऋषिकेश पर पांडुकेश्वर में स्थित है। महाभारत के महाराजा पाण्डु एक बार अपनी दोनों पत्नी कुंती और माद्री के साथ आखेट के लिए गए थे। शिकार करने के दौरान उन्होंने प्रेम में मग्न मृग के जोड़े पर अपना तीर चलाया। दरअसल मृग जोड़े का रूप धारण किये वे ऋषि और उनकी पत्नी थे।

अपनी मृत्यु के अंतिम क्षणों में उन्होंने पाण्डु को शाप दिया कि जैसे वे अपनी पत्नी से प्रेम करेंगे उनकी मृत्यु हो जाएगी। अपने इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए पाण्डु ने यहां योगध्यान बद्री में भगवान् विष्णु की कठोर तपस्या की थी। इसके बावजूद वे स्वयं को ऋषि के श्राप से बचा नहीं पाए।  

इससे संबंधित एक और  कहानी प्रचलित है। कहा जाता है कि अर्जुन ने इसी स्थान पर भगवान् विष्णु की तपस्या की थी उस दौरान अर्जुन की तपस्या भंग करने के लिए इंद्रदेव ने एक परी को यहाँ भेजा था। फिर भी इंद्रदेव अर्जुन की तपस्या में खलल डालने में असमर्थ रहे थे।  अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर इंद्र ने अर्जुन को भगवान् विष्णु की एक प्रतिमा प्रदान की थी। वही प्रतिमा यहाँ भगवान् विष्णु के दूसरे तीर्थ योगध्यान में स्थापित है।  

3. भविष्य बद्री ( Bhavishya Badri )

यह जोशीमठ से करीब 17 किलोमीटर की दूरी पर तपोवन से दूसरी तरफ अवस्थित है। भगवान् विष्णु का तीसरा तीर्थ जिसे भविष्य बद्री कहते हैं वह स्थान है जहाँ भविष्यकाल में भगवान् विष्णु पूजे जाएंगे। ऐसी मान्यता है कि जब नरसिंह मंदिर में रखी प्रतिमा किसी तरह खंडित हो जाएगी तब बद्रीनाथ का मंदिर नहीं रहेगा। इसके बाद भगवान् विष्णु भविष्य बद्री में निवास करने लगेंगे।  

4. ध्यान बद्री ( Dhyan Badri )

इस स्थान पर महाभारत के महान योद्धा पुरुजन्य ने तपस्या की थी। पांडव राजा पुरुजन्य के ही वंशज माने जाते हैं।  यहाँ पर भगवान् विष्णु की जो मूर्ति विराजमान है वह काले पत्थरों से निर्मित है और ध्यान मुद्रा में स्थापित है। ध्यान मुद्रा में होने के चलते ही इस स्थान को ध्यान बद्री का नाम दिया गया है।    

5. वृद्ध बद्री ( Vridh Badri )

वृद्ध बद्री से जुड़ी कहानी के अनुसार इस स्थान पर देवऋषि नारद ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से अत्यधिक प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने देवऋषि नारद को इसी स्थान पर वृद्ध रूप में अपने दर्शन दिए थे। इसी कारण इस जगह को वृद्ध बद्री के नाम से जाना जाता है।  

6. नरसिंह बद्री ( Narsingh Badri )

नरसिंह बद्री के बारे में कहा जाता है कि इसी जगह सर्वप्रथम आदि शंकराचार्य आये थे। यही वह जगह है जहाँ पर उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। इसे जोशीमठ या ज्योतिर्मठ भी कहा जाता है। आदि शंकराचार्य की तपस्या से खुश होकर भगवान् विष्णु ने यहाँ उन्हें नरसिंह अवतार में दर्शन दिए थे इसलिए इस स्थान को नरसिंह बद्री कहा जाता है।  

इस स्थान के बारे में जो कहानी सबसे लोकप्रिय है उसके मुताबिक यहाँ नरसिंह की जो मूर्ति स्थापित है उसका हाथ खुद ब खुद पतला होता जा रहा है। जिस दिन नरसिंह का यह हाथ प्रतिमा से पृथक हो जाएगा उस दिन बदरीनाथ का अस्तित्व सदैव के लिए समाप्त हो जाएगाह। इसी के साथ इस कलयुग का अंत भी इसी हाथ के पृथक होने पर निर्भर है। जिस दिन यह प्रतिमा से अलग हुआ उस दिन कलयुग का अंत हो जाएगा।   

7. बद्री विशाल ( Badri Vishal )

एक बार की बात है भगवान् शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ हिमालय पर विचरण कर रहे थे। विचरण करने के दौरान उन्हें एक नन्हे बालक के रोने की आवाजें सुनाई दी। आवाज को सुनकर भगवान् शिव और पार्वती उसके समीप पहुंचे और माता पार्वती ने उस बालक को अपनी गोद में ले लिया। 

गोद में लेते ही उस बालक ने भगवान् विष्णु का रूप धारण कर लिया। दोनों के समक्ष प्रकट होकर भगवान् विष्णु ने शिव और पार्वती से आग्रह किया कि इस स्थान पर उन्हें भी जगह प्रदान करें। इस तरह से हिमालय का कुछ भाग उन्होंने विष्णु को दे दिया।   

दूसरी कहानी के अनुसार एक बार बद्रिकाश्रम क्षेत्र में भगवान् विष्णु तपस्या कर रहे थे। उस समय वहां हिमपात होने लगा और बर्फ से भगवान् विष्णु ढकने लगे। भगवान् विष्णु की रक्षा के लिए देवी लक्ष्मी ने बद्री के वृक्ष का रूप धारण कर लिया। इस तरह उस हिमपात से उन्होंने भगवान् विष्णु की सहायता की और खुद हिमपात अपने ऊपर सहती रहीं।

जब विष्णु ने अपनी तपस्या पूर्ण की तो उन्होंने देवी लक्ष्मी को वृक्ष के रूप में देखा। देवी लक्ष्मी के द्वारा की गई सेवा और समपर्ण का भाव देखकर वे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि आज से इसी स्थान पर देवी लक्ष्मी के साथ उनकी पूजा की जाएगी। तभी से इस जगह को बद्री विशाल के नाम से जाना जाने लगा।  

(यदि आप भगवान् विष्णु की कृपा पाना चाहते हैं तो Tulsi Mala को धारण करें। तुलसी भगवान् विष्णु की सबसे प्रिय मानी जाती हैं।)  

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