मीनाक्षी मंदिर (Meenakshi Temple): माता पार्वती को समर्पित इस मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा

मीनाक्षी मंदिर (Meenakshi Mandir) को मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर और अम्मां मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान् शिव और उनकी पत्नी पार्वती को समर्पित है जो देवी पार्वती के सबसे पवित्र में से एक है। इस मंदिर के आसपास ही मदुरई नामक शहर बसा हुआ है, यह भारत के सबसे प्राचीन शहरों की सूची में शामिल है।

इतिहासकारों का तो यह भी मानना है कि इस शहर के व्यापारिक सम्पर्क प्राचीन यूनान और एथेंस की सभ्यताओं तक थे। जिनके बारे में संस्कृत भाषा में कुछ इस प्रकार उल्लेख किया गया है :

।। कांची तु कामाक्षी,

मदुरै मिनाक्षी,

   दक्षिणे कन्याकुमारी ममः

   शक्ति रूपेण भगवती,

   नमो नमः नमो नमः।।

मीनाक्षी मंदिर के पीछे पौराणिक कथा ( Mythical story of Meenakshi Temple ) 

ऐसी रानी जो दक्षिण भारत के मदुरै से उत्तर भारत में कैलाश पर्वत तक अपना दूल्हा खोजने गई थी। यही रानी मीनाक्षी नाम से आगे प्रसिद्ध हुई क्योंकि उनकी आंखे मछली की आकृति के जैसी सुन्दर है।  

मदुरै के राजा पांड्य को कोई संतान नहीं थी पूजा-पाठ करने के बाद देवताओं ने प्रसन्न होकर निःसंतान राजा को एक पुत्री दी।  उस पुत्री को विभिन्न कलाओं और विज्ञानों के प्रशिक्षण दिया गया। राजा ने अपनी पुत्री को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। रानी ने अपने पिता द्वारा दी जा रही जिम्मेदारी को सँभालते हुए विश्व पर विजय पाने का निश्चय किया।

अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रानी ने उत्तर दिशा की ओर रुख किया और वहां सभी देवताओं, शिव गणों और नंदी बैल तक को मात दे दी। सबसे आखिर में उसे एक युवा व्यक्ति ने हराया जो वैरागी का भेष धारण किये स्वयं भगवान् शिव ही थे। जब भगवान् शिव और रानी मीनाक्षी ने एक दूसरे को देखा तो रानी को आभास हुआ कि वह तो पिछले जन्म में देवी पार्वती थीं। इस जन्म में देवी ने मीनाक्षी के रूप में जन्म लिया है।  

अपनी यह सच्चाई से अवगत हो जाने के बाद वह रानी वैरागी युवा और सभी देवताओं के साथ मदुरै की ओर निकल पड़ी ताकि वे भगवान् शिव रूपी सुंदरेश्वर से विवाह कर पाए। मदुरै में जाने के बाद दोनों का विवाह हुआ उस समय पूरी पृथ्वी के लोग एकत्रित हुए थे। इसे एक बहुत बड़ी घटना के रूप में देखा जाता है।  

भगवान् विष्णु इस विवाह का संचालन के लिए अपने बैकुंठ धाम निकले थे पर उन्हें इंद्र के कारण देरी हो गई। जिसके चलते विवाह का संचालन स्थानीय देवता कूडल अझघ्अर द्वारा किया गया। इस बात से भगवान् विष्णु क्रोधित हो गए और उन्होंने मदुरई में कभी ना आने की कसम खाई। बाद में विष्णु को अन्य देवताओं द्वारा खूब मनाया गया तब जाकर उन्होंने मीनाक्षी-सुन्दरेश्वर का पाणिग्रहण सम्पन्न कराया।

मीनाक्षी मंदिर का इतिहास ( History of Meenakshi Temple )

इस मंदिर के निर्माण के संबंध में ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण इंद्र देव ने करवाया था, जब वे अपने द्वारा किये गए कुकर्मों का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा पर निकले थे। उस दौरान मदुरै लिंगम की चमत्कारी शक्तियां देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए और उन्होंने वहां मंदिर का निर्माण करवाने का निश्चय किया।    

इतिहासकार कहते हैं कि इस मंदिर को मालिक काफूर नामक मुस्लिम आक्रमणकारी ने साल 1310 में ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद नायक वंश से संबंध रखने वाले अरण्यनाथ मुदलियार की निगरानी में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया।  

मीनाक्षी मंदिर की वास्तुकला ( Architecture of Meenakshi Temple )

यह द्रविड़ शैली में निर्मित मंदिर का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जिसके परिसर को उच्च चिनाई वाली दीवारों में द्वारा चतुष्कोणीय बाड़ों में बांटा गया है। इस प्रत्येक बाड़े को कम्पास के चार बिंदुओं पर चार मामूली टावरों द्वारा संरक्षित किया गया है।

इस मंदिर में भगवान् गणेश की सुन्दर मूर्ति है जो एकल पत्थर से निर्मित है। मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मंदिर में एक विशाल मंडप है जिसे 100 स्तम्भों का हाल भी कहा जाता है।  

मीनाक्षी मंदिर में मनाया जाने वाला ख़ास त्यौहार

मदुरै में रहने वाले लोग यहाँ मंदिर में हो रहे भजन की आध्यात्मिक ध्वनि से अपनी नींद से जागते हैं। यहाँ अप्रैल से मई के महीने में मीनाक्षी और सुन्दरेश्वरर के विवाह को लेकर कित्तिरई नामक प्रसिद्ध त्यौहार मनाया जाता है।

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