Dhruv Tara story : भगवान विष्णु के भक्त ध्रुव के ध्रुव तारा बनने की कहानी

ध्रुव का जन्म कैसे हुआ? ( Dhruv ka Janam kaise hua? )

एक बालक के दृढ संकल्प के बल पर श्री हरि का बैकुंठ धाम मन्त्रों के उच्चारण से गूँज उठा था, श्री विष्णु अपनी योग निद्रा तक से जाग उठे थे और जानने के लिए व्याकुल थे कि आखिर कौन है ये बालक जिसके तप का तेज तीनों लोकों तक में फ़ैल चुका है। आज हम उसी नन्हें बालक ध्रुव की कहानी जानेंगे। आइये जानते हैं ध्रुव की कथा ( Dhruv ki katha ) और कैसे वह भगवान की भक्ति के मार्ग पर आगे चल पड़ा :

ध्रुव की कहानी ( Dhruv ki Kahani ) जानने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि ध्रुव का जन्म कहाँ और कैसे हुआ? बता दें कि स्वयंभुव मनु और शतरूपा के दो पुत्र थे प्रियवत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की दो पत्नियां थीं सुनीति और सुरुचि। राजा उत्तानपाद को सुनीति से ध्रुव और अपनी दूसरी पत्नी सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र था। दोनों ही पत्नियों में सुनीति बड़ी रानी होने के बावजूद उत्तानपाद का प्रेम और झुकाव सुरुचि के प्रति अधिक रहता था। एक बार जब ध्रुव अपने पिता उत्तानपाद की गोद में खेल रहा था तभी वहां सुरुचि आ गई।

Dhruv Tara Story आगे इस प्रकार है कि जब सुरुचि ने ध्रुव को उत्तानपाद की गोद में देखा वह गुस्से से लाल हो उठी। अब वहां खड़े हुए मन ही मन ईर्ष्या का भाव सुरुचि के मन में बढ़ने लगा। उसने फिर अपने पुत्र उत्तम को लिया और ध्रुव को उतारकर राजा की गोद में बिठा दिया। सुरुचि ने ध्रुव से कहा कि राजा की गोद में वही पुत्र बैठ सकता है जो मेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ है अन्य कोई नहीं।

तू मेरे गर्भ से उत्पन्न नहीं हुआ है इसलिए तुझे राजा की गोद या इस सिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं। उस समय ध्रुव पांच वर्ष का था। सुरुचि जो कह रही थी के उसे भली भांति समझ आ रहा था। उसे अपनी सौतेली मां की बात पर बहुत क्रोध आया। Dhruv वहां से भागते हुए अपनी मां सुनीति के पास गया और अपनी सौतेली मां का व्यवहार और सब बात बताई। सुनीति ने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा कि तेरी सोतैली मां सुरुचि के प्रति तेरे पिता का अधिक झुकाव होने के कारण हम से वे दूर हो गए हैं। इन सब बातों को छोड़ो और ईश्वर की भक्ति करो, यही एकमात्र रास्ता है।

ध्रुव तारे की कहानी क्या है? ( Dhruv Tara story in hindi )

ध्रुव तारा की कहानी ( Dhruv Tara ki kahani ) यहीं से शुरू होती है क्योंकि अपनी माता के मुख से ये बातें सुन ध्रुव को ऐसा लगा जैसे उसे ज्ञान प्राप्त हो गया है। इस तरह ध्रुव अपने पिता के घर को छोड़कर ईश्वर की भक्ति करने के लिए निकल पड़ा। अब भक्त ध्रुव की कथा में ईश्वर की भक्ति के लिए जाते समय bhakt dhruv को रास्ते में देवर्षि नारद मिले उन्होंने बालक को खूब समझाया पर ध्रुव अपनी हठ के आगे हारने को तैयार नहीं था। देवर्षि नारद ने जब देखा कि ध्रुव दृढ़ संकल्प लिए हुए है तो उन्होंने भक्त ध्रुव को मंत्र की दीक्षा दी और फिर वे राजा उत्तानपाद के पास पहुंचे।

राजा उत्तानपाद ध्रुव के चले जाने से बहुत दुःखी थे। नारद जी को अपने महल में आते देख उन्होंने आदर सत्कार किया। देवर्षि नारद ने राजा से कहा कि चिंता की कोई बात नहीं भगवान अपने ध्रुव के रक्षक हैं। भविष्य में आगे चलकर वे संसार में कीर्ति फैलाएंगे। नारद जी के मुख से इन बातों को सुनकर राजा को थोड़ा संतोष हुआ।

वहीं दूसरी तरफ ध्रुव बालक यमुना नदी के तट पर पहुंच चुके थे। उन्होंने वहां बैठकर दिए गए मंत्र से भगवान की तपस्या करनी शुरू की। तपस्या के दौरान कई प्रकार के संकट आए पर ध्रुव के दृढ़ संकल्प ने उन्हें आसानी से पार कर लिया। अब धीरे धीरे ध्रुव के तप का तेज तीनों लोकों में फैलने लगा।

ध्रुव द्वारा किए जा रहे मंत्र उच्चारण ”ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अब बैकुंठ धाम तक पहुंच चुका था। मंत्रों की गूंज को सुनकर भगवान विष्णु भी अपनी योग निद्रा से जागे। उन्होंने देखा कि एक छोटा सा बालक उनकी तपस्या कर रहा है। यह दृश्य देख भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने ध्रुव को दर्शन दिए।

भगवान विष्णु बोले, हे भक्त ध्रुव! तुम्हारी समस्त इच्छाएं पूर्ण होंगी। तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यधिक प्रसन्न हूं इसलिए मैं तुम्हें एक ऐसा लोक प्रदान कर रहा हूं, जिसके चारों ओर ज्योतिष चक्र परिक्रमा करता है और उसी के आधार पर सब ग्रह नक्षत्र घूमा करते हैं। भगवान विष्णु ने आगे कहा कि यह एक ऐसा लोक होगा जिसका प्रलयकाल में भी कभी नाश नहीं हो सकेगा और सप्तऋषि भी नक्षत्रों के साथ उस लोक की प्रदक्षिणा करते हैं। यह लोक तुम्हारे नाम से यानी ध्रुव लोक ( Dhruva Star ) कहलाएगा।

प्रभु बोले कि इस लोक में छत्तीस सहस्र वर्ष तक तुम पृथ्वी पर शासन करोगे। इन समस्त प्रकार के ऐश्वर्य भोग कर सबसे अंत में तुम मेरे लोक बैकुंठ धाम को प्राप्त होंगे। तपस्वी बालक ध्रुव को वरदान देने के पश्चात भगवान विष्णु लौट गए। भगवान विष्णु से मिले वरदान के कारण ही ध्रुव आगे चलकर ध्रुव तारा ( Dhruva Tara ) बन गए। 

श्री हरि की भक्ति करने के लिए तुलसी माला का प्रयोग सबसे उत्तम माना जाता है। कहते हैं कि श्री हरि को तुलसी सबसे प्रिय है यदि भक्त भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए Original Tulsi Mala से उनके मन्त्रों का उच्चारण करते हैं तो वे शीघ्र ही अपने प्रभु को प्रसन्न कर सकते हैं। 

ध्रुव तारे को कैसे पहचाने? ( Dhruv Tare ko kaise pehchane? )

सप्तर्षि के नाम से लोकप्रिय सात तारों की माद से ध्रुवतारा को पहचाना जा सकता है। जब आगे के दो ऋषियों की सीधी रेखा में उत्तर की तरफ देखा जाए तो जो तारा सबसे चमकता हुआ नजर आये वही ध्रुवतारा है जिसे हम अंग्रेजी भाषा में पोल स्टार कहते हैं। ध्रुव तारे की पृथ्वी से दूरी 390 प्रकाशवर्ष है।

ध्रुव तारे से कौन सी दिशा का ज्ञान होता है? ( Dhruv Tare se kaun si disha ka gyan hota hai? )

ध्रुव तारे से हमें उत्तर दिशा का ज्ञान होता है क्योंकि यह तारा उत्तरी ध्रुव के बिल्कुल सीध में मौजूद है।  

ध्रुव तारा की ओर कौन सा नक्षत्र तारे सीधे जाते हैं?

ध्रुव तारे को फाल्गुन-चैत्र माह से श्रावण-भाद्र माह तक सात तारों के एक समूह के रूप में देखा जा सकता है। सात तारों में चार तारे चौकोर और तीन तारे तिरछी रेखा में दिखते हैं। सात तारों का नाम प्राचीन काल के सात ऋषियों के नाम पर रखा गया है। जिनमें क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरस, वाशिष्ठ तथा मारीचि शामिल हैं। इसे गौर से देखें तो यह एक पतंग के आकार का दिखता है जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ती हुई प्रतीत होती है। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली पंक्ति को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।

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