हनुमान जी ने स्वयं आकर अपने भक्तों के सारे संकट दूर किए।

तमिलनाडु के दाम में बिरजू नाम का व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहा करता था। मैं काफी गरीब था। उसके पास खाने के लिए भी पैसे नहीं थे व कार्यकर्ता पर वह इतना पैसे कभी नहीं जुटा पाता था कि वह अपने सारी जरूरतें पूरी कर सके। उसकी पत्नी हमेशा उसे ताने मार कर नीचा दिखाया करती थी। बिरजू हनुमान जी का सीन भक्त था। वे दिन-रात हनुमान जी की पूजा पाठ किया करता। वहां से प्रार्थना करता कि भगवान सारा संसार सुखी रहें एवं मेरा घर चल सके।

मुझे बस इतना धन दे दीजिए, परंतु उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती थी। इस वजह से उसकी पत्नी अक्सर उससे कहा करती थी कि तुम दिन भर भगवान की पूजा करते हो। पर भगवान अगर होते तो तुम्हारी सुन लेते। इस संसार में भगवान नाम की कोई चीज है ही नहीं, परंतु बिरजू का विश्वास था कि भगवान है और उसकी एक न एक दिन जरूर सुनेंगे।  बिरजू एक दिन उठकर सुबह मंदिर गया तो उसने देखा मंदिर काफी गंदा हो रहा है। उसमें झाड़ू उठाई और मंदिर को साफ करना शुरू कर दिया।

तभी मैं एक वृद्ध व्यक्ति आया और सीढ़ियों पर आकर बैठ गया। उस वृद्ध व्यक्ति से बिरजू ने पूछा कि  आप बहुत परेशान लग रहे हैं, कोई तकलीफ है क्या अगर है तो मुझे बताइए शायद मैं आपकी मदद कर सकूं। वृद्ध व्यक्ति बोला, मैंने 2 दिन से कुछ भी नहीं खाया है। मुझे बहुत कमजोरी हो रही है और मैं बहुत थका हुआ हूं। यह सुनकर बिरजू को दया आ गई। बिरजू ने कहा कि चलिए मैं आपको भोजन कर आता हूं और बिरजू उस व्यक्ति को अपने घर ले गया बिरजू की पत्नी उस समय घर में भोजन हीं पका रही थी।

कुछ देर बाद बिरजू की पत्नी भोजन लेकर आई। दोनों ने साथ में भोजन किया। तब बिरजू ने कहा कि आप थके हुए एक काम कीजिए। आप मेरे साथ यहीं पर कुछ देर आराम कर लीजिए। वह दोनों सो गए। कुछ देर बाद जब बिरजू उठा तो उसने देखा कि वृद्ध व्यक्ति वहां पर नहीं है। उसने अपनी पत्नी को बुलाकर पूछा कि वह व्यक्ति कहां गए तब उसकी पत्नी बोली नहीं।

मुझे नहीं मालूम कहां गए तब उसने देखा जिस स्थान पर वृद्ध व्यक्ति सो रहा था, वहां पर एक थैला रखा हुआ है। उसने उसको खोला तो उसमें बहुत सारे सोने के सिक्के से उन सिक्कों को देखकर उसने अपनी पत्नी से कहा कि अगर वह व्यक्ति इतना अमीर था तो उसने मुझसे झूठ क्यों बोला। उन दोनों को कुछ समझ नहीं आया। तब ने निर्णय किया कि यही तो यूं ही रहने देते हैं कि जब आएगा तब ले जाएगा। उसने एक सिक्का भी नहीं निकाला। कुछ देर बाद रात हो गई तब रात में बिरजू को एक सपना आया।

हनुमान जी ने आकर कहा कि मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं और तुम्हारी तकलीफ देखी नहीं गई। वह थैली रखलो इससे तुम्हारे लिए तुम्हारी जिंदगी की सारी तकलीफ दूर हो सकती हैं और बिरजू की आंख खुल गई उसने सारी बात अपनी पत्नी को बताई तभी  पत्नी को अपने आप से घृणा होने लगी कि मैं आपके विश्वास को झूठा  कहती थी व अंधविश्वास बताती थी, परंतु संसार में भगवान है l दोनों ने मिलकर हनुमान जी के आगे हाथ जोड़कर उनका शुक्रिया किया। वह बिरजू के साथ आप उसकी पत्नी भी हनुमान जी की आराधना में लग गई। 

खेत से निकला शिवलिंग और शिवजी ने अपने भक्तों को आत्महत्या करने से रोका।

गांव में गरीब किसान रहा करता था जिसका नाम था साधु , साधु अपने खेत में दिन रात मेहनत करता परंतु मेहनत अनुसार उसे उसका फल कभी नहीं मिलता था। कभी बारिश ना होने के कारण कभी धूप तेज होने के कारण कभी कोई परेशानी हो जाने के कारण उसको उसकी फसल का सही मूल्य नहीं मिल पाता था। एक बार गांव में बिल्कुल भी बारिश ना हुई। सूखा पड़ने के कारण खेत में फसल हुई नहीं थी जिससे परेशान होकर साधु है। आत्महत्या करने का निर्णय लिया । अगले दिन जब साधु अपने खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि उसने देखा कि खेत के बीचो-बीच कोई चीज पड़ी हुई है जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ रहा है और वह बहुत चमक रही है। वह खेत में बीच गया तो उसने देखा एक बहुत छोटा सा शिवलिंग वहां पर पड़ा हुआ था।

उसे समझ ना आया कि यह शिवलिंग यहां कैसे आया। उसने उस शिवलिंग को बड़े आदर के साथ उठाया और खेत के पास ही एक पेड़ के नीचे रख दिया। वह शिवलिंग बहुत गंदा हो रहा था तो पास ही से एक पात्र में जल लाया और उस शिवलिंग को स्नान कराने लगा। स्नान कराते समय संयोग मात्र से शिव लिंग से पानी उसकी खेत में चला गया। कुछ देर बाद वहां से साधु अपने घर चला गया। यह सोच कर कि धूप बहुत है और मैं इस धूप में कार्य नहीं कर सकता। सारा दिन घर पर भी सोचता रहा कि मैं ऐसा क्या करूं कि मेरे खेत में फसल हो जाए और अगर कुछ नहीं हुआ तो जो पैसा ब्याज पर लिया है वह मैं कैसे लौट आऊंगा?

परंतु जब उसे कोई उपाय नहीं मिला तो उसने हाथ जोड़े पर शिवजी को याद कर कहा हे महादेव, अब आप ही कोई रास्ता दिखाओ। अन्यथा मेरे पास एक ही उपाय है कि मैं आत्महत्या कर हर चीज से दूर हो जाऊं l यह सब सोचते सोचते साधु बिना कुछ खाए पिए सो गया। जब वे सुबह उठा तो उसने देखा कि गांव में बहुत तेज वर्षा हुई है। वह भागा भागा अपने खेत की ओर गया कि खेत में कहीं जल तो नहीं भर गया। अगर ज्यादा जल भर गया। तुम्हें जो मैंने बीज खेत में डाले हैं वह सब खराब हो जाएंगे। परंतु जब वह खेत पहुंचा तो उसने देखा कि बीज अंकुरित हो चुके हैं और उनमें छोटे-छोटे पौधे निकल आए हैं।

यह देख साधु की खुशी का ठिकाना ना रहा l परन्तु उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि 1 दिन में इतना सब कैसे हो गया तब उसकी नजर उस शिवलिंग पर पड़ी जिसकी स्थापना साधु ने पेड़ के नीचे की थी। उस शिवलिंग से अभी बूंद-बूंद जल साधु के खेत में बहता हुआ आ रहा था। साधु को ज्ञात हुआ कि यह कुछ और नहीं यह महादेव की महिमा है जिसने मेरे सारे संकट दूर किए हैं और मैं कितना मूर्ख था। मैं आत्महत्या करने की कोशिश कर रहा था।

साधु शिवलिंग के पास गया उस पर जल डालकर उसको फिर से स्नान कराया और शिव जी से माफी मांग कर कहा कि प्रभु आप मेरे साथ हैं और मैं इतना अंधा हो चुका था कि आत्महत्या करने चला था। प्रभु मुझे क्षमा कर दें। प्रकार महादेव ने खुद शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों के सारे संकट दूर किए और आत्महत्या करने से रोका। 

जब भक्त के साथ गुजरात की ओर चल पड़े भगवान्

यूं तो हमने भगवान व उनके भक्तों से जुड़े कई चमत्कार देखे और सुने हैं। परंतु आज हम आपको ऐसे चमत्कार के बारे में बताने जा रहे है जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे l बहुत समय पहले एक महिला गुजरात से वृंदावन श्री बांके बिहारी जी के दर्शन करने आई हुई थी, वह महिला श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में पहुंची पर हाथ जोड़कर उनके दर्शन करने लगी। दर्शन करते हुए उस महिला को बांके बिहारी जी
की प्रतिमा इतनी प्यारी लग गई कि उनसे वहीं खड़े खड़े उस महिला को लगाव सा हो गया और वह महिला बिहारी जी कहने लगी : लाला तू कितना सुन्दर है तेरी आँखे कितनी प्यारी है मै यहाँ से वापस चली जाऊंगी तो कहाँ मैं तुझे देख पाऊँगी लाला तू मेरे साथ ही चल तू मेरे साथ रहे जिससे मैं तेरे दर्शन रोज पाऊँ ।

ऐसा निवेदन उस महिला ने श्री बांके बिहारी जी से किया और बांके बिहारी जी इस निवेदन को ठुकरा ना पाये एवं बाल रूप में प्रकट होकर उस महिला के साथ चलने लगे यह देख सब लोग हैरान थे मंदिर में सारे भक्तजन दंग रह गये पुजारी जी चिन्ता के आ गये कि बांके बिहारी जी यहां से चले गए तो मंदिर का क्या होगा। वृंदावन का क्या होगा ?

पुजारी जी ने बांके बिहारी को रोकने का काफी प्रयास किया, परंतु बिहारी जी को भी मना ना पाए। तब पुजारी ने उन महिला से कहा कि माता बांके बिहारी से मना कर दो। अगर यहां से चले गए तो अनर्थ हो जाएगा। बिहारी जी यही रहे उसी में सब की भलाई है। माता उनसे बोल दीजिए यहीं रह जाएं। पुजारी जी ने बहुत देर तक महिला को मनाया। तब जाकर में महिला मान गई और बिहारी जी से वृंदावन में ही रुकने को कहा, तब से लेकर आज तक बिहारी जी को कोई एक टक से दर्शन नहीं कर सकता। माना जाता है कि बिहारी जी प्रार्थना और निवेदन है, उसे बहुत जल्दी आकर्षित हो जाते और भक्तों के साथ चलने लग देते हैं। तब से लेकर आज तक बिहारी जी पर
पर्दा चलता रहता है। पर्दा आज भी रुकता नहीं है।

महिला की ऐसी भक्ति को देख सभी की आँखे फटी रह गयी ,आज भी पूरे वृन्दावन में उस महिला की भक्ति की मिसाल दी जाती है।

जब भक्त की रक्षा के लिए आग में कूद पड़े हनुमान जी

बिहार के एक गांव में छोटू नाम के व्यक्ति रहता था जो कि कुम्हार था। वह दिनभर मटके बनाते और खाली समय में हनुमान जी की भक्ति में लीन रहता। छोटू की आस्था कुछ इस प्रकार थी कि हनुमानजी हमेशा मेरे साथ है , मेरी संकट की घड़ी में कोई मेरा साथ दे ना दे हनुमान जी मेरा साथ अवश्य देगे l वह गांव के हर मंदिर में हनुमान जी की पूजा पाठ करता मंगलवार का व्रत रखता जब वह किसी परेशानी में होता तो
हनुमान जी की प्रतिमा के सामने बैठकर उनसे बात किया करता है कि जैसे हनुमान जी उसकी सारी बात सुन रहे हैं।

आसपास के लोग जब छोटू को प्रतिमा से बात करता हुआ देखते तो लोग उसे पागल कहने लगे थे परन्तु उसकी आस्था थी कि हनुमान जी उत्तर दे या न दें परन्तु मेरी बात सुन तो रहे है । एक दिन छोटू ने हनुमान जी की मिट्टी की प्रतिमा तैयार की और अपने घर के बाहर पेड़ के नीचे उसकी स्थापना की। वह बड़ी सेवा भाव से उसकी पूजा पाठ करता है। श्रंगार करता और रोज भोग लगाया करता था।जिस लकड़ी की झोपड़ी में छोटू मिट्टी के बर्तन बनाया करता था, एक दिन वहां पर आग लग गयी वह उस झोपडी में फंस गया छोटू ने बाहर निकलने का प्रयास किया परन्तु आग अधिक होने के कारण वह बाहर निकलने मे असमर्थ था तब छोटू ने हनुमान जी से प्राण रक्षा की गुहार लगायी।

आग के भय के कारण छोटू आंखे बंद हो गई। तब उसे  कुछ इस प्रकार प्रतीत हुआ कि उसे किसी ने गोद में उठा लिया हो lदेखते ही देखते वह जलती हुई झोपड़ी से बाहर आ गया। छोटू को इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ कि न जाने कैसे वह झोपड़ी के बाहर आ गया। वह कौन था जिसने उसे गोद में उठाया उसे वहां कोई देख भी नहीं रहा था वह  बहुत आश्चर्य में था। कुछ देर बाद छोटू जब  अपने घर पहुंचा।
उसने देखा जिस मूर्ति कि उसने स्थापना की थी, वह काली पढ़ चुकी थी जैसे कि उसे किसी ने जला दिया हो।

वह समझ गया कि जलती हुई आग से जिसने उसकी रक्षा करी है, वह कोई और नहीं हनुमानजी हैं। हनुमान जी ने खुद जलकर मेरी जान बचाई यह सोच वह भावुक हो गया।गांव वालों को जब इस पूरी घटना के बारे में पता चला सारे लोग आश्चर्य में थे। वह मान गए कि छोटू  की भक्ति साधारण नहीं है। छोटू की भक्ति  हनुमान जी के प्रति प्रेम उसका कोई दिखावा नहीं है। बल्कि सत्यता है कि वह हनुमान जी से प्रेम करता है, हनुमान जी को अपने परिवार का सदस्य मानता है। उसकी भक्ति गंगा जल जैसी पवित्र है।

बाढ़ के तेज बहाव से भक्त की जान बचने आये बजरंगबली

जब कोई साथ न दे ,हर तरफ से संकट व्यक्ति को घेर ले , जीवन समस्याओं से भर जाए उस समय सिर्फ व्यक्ति को भगवान् ही याद आते है , और भगवान् भी अपने सच्चे भक्त क सहयता जरूर ही करते है।  ऐसा ही एक चमत्कार हुआ देव नाम के दिल्ली में रहने वाले बालक के साथ।  देव के माता पिता ने उसे बचपन से ही रामयण सुनाई व दिखाई और हनुमान जी के किए बड़े बड़े चमत्कारों के बारे में भी बताया जिसके कारण देव हनुमान जी के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुआ और हनुमान जी की पूजा पाठ एवं आराधना में लग गया। परन्तु बजरंगबली के ऐसे असीम भक्त पर कुछ ऐसा संकट आने वाला था जो कोई सोच भी नहीं सकता था।

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 देव ने हाल ही में अपनी 12वी की परीक्षा की और अपने दोस्तों के साथ उत्तराखंड घूमने के लिए चला गया। उत्तराखंड जाकर देव व उसके दोस्तों ने सबसे पहले हरिद्वार के दर्शन किये ऋषिकेश में भी अच्छे से गुमकर  लक्मण झूला और भी कई स्थानों पर भ्रमण  किया।  तब किसी ने उन सभी को बताया यहाँ से कुछ ही दूर चमोली गांव है , जो घूमने के लिए उत्तम स्थान है।  चमोली में एक अलग ही कुदरत का करिश्मा है और वह से ऋषिगंगा निकलती है और वह बेहद ही अतभुद है।

  देव और उसके साथी यह सब सुन अतिउत्सुक होकर अगले ही दिन चमोली के लिए निकल गए।  पर वह सभी आने वाले खतरे से अनजान थे।  उन सभी ने चमोली में सारे पर्यटन स्थलों का भ्रमण  किया और सबसे आखिर में ऋषिगंगा के तट पर पहुंचे , पानी का भहाव बहुत तेज था नदी खतरे के निशान से  ऊपर बह रही थी देव व उसके कुछ साथियों ने और आगे जाने से मन किया परन्तु कुछ साथी कहने लगे की कुछ नहीं होगा डरने की कोई आवशयक्ता नहीं है।

 सभी ने उनकी बात मान ली और गंगा के पास जा पहुंचे।  कुछ देर बाद ऋषिगंगा के पीछे से तेज भहाव के साथ बढ़ आ गयी सभी वहाँ से अपनी अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए परन्तु देव बाढ़ की चपेट में आकर पानी के साथ बहने लगा।  कुछ ही पलो में सारा चमोली गांव में से भर गया और देव पानी के साथ बहता  हुआ आगे चला जा रहा था उसके दोस्तों ने उसे बचने का प्रयास करना तो चाहा परन्तु कोई रस्सी या संसाधन न होने के कारण वह कुछ कर न सके।

 देव ने बहते  हुए चिल्ला चिल्ला कर मदद की गुहार लगाई परन्तु कोई नहीं आया तभी  पेड़ से एक वानर पानी में खुद गया और अपने दाँतों से देव की शर्ट को पकड़ उसे खींचने लगा देव को नहीं समज आया ये क्या हो रहा है।  और देखते ही देखते वह वानर पानी के इतने तेज़ बहाव  के अंदर से सारे गांव  वालो के सामने से देव को पानी से बहार ले आया और उसे एक बड़े से ऊँचे चबूतरे के पास लेकर  छोड़ दिया साथ ही  पलक  झपकते ही वहाँ से गायब भी हो गया।  एक वानर का ऐसा चमत्कार देख सभी हैरान रह गए।  तब देव और उसके साथियों को ज्ञात हुआ की हनुमान जी वानर रूप में आकर देव के प्राणो रक्षा की है। 

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भारत के इस राज्य में साक्षात प्रकट हुए बजरंगबली , और फिर जो हुआ

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। यह चौपाई तो सबने हनुमान चालीसा में पढ़ी व सुनी ही है , जिसका अर्थ है की ,
मन में मात्र बजरंगबली को याद करने से ही हर संकट और परेशानी दूर हो जाती है ,वह सदा ही अपने भक्तो के साथ रहते है।  इस चोपाई का जिवंत उद्धरण देखने को मिलता है हमें इस घटना को जानकार।  

यह घटना है राजस्थान के उदयपुर  शहर की , जहाँ सुमित नाम के बजरंगबली के असीम भक्त रहते है। सुमित का विवाह 8 वर्ष पूर्व हुआ था ,  सुमित के बहुत से प्रयत्नों के बाद भी उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हुई थी।  सुमित  और उसकी पत्नी ने कई बड़े बड़े डॉक्टरों से परामर्श किया , मंदिर में मन्नत भी मांगी परन्तु कुछ नहीं हुआ।  अथक प्रयासों के बाद भी कुछ नहीं हुआ तब दोनों ने हार मान कर संतान प्राप्ति की उम्मीद ही छोड़ दी।

 दोनों निराश रहने लगे।  तब एक दिन  जब वह मंदिर से लौट रहे थे तब सुमित  और उनकी पत्नी को एक साधु से मार्ग में मिले जिन्हे दोनों  ने अपनी समस्या बताई जिस पर साधु ने समाधान  दिया की २१ मंगलवार का उपवास करो और बजरंगबली को सिन्दूर को चोला चढ़ा कर हनुमान जी की उपासना करो तुम्हे संतान प्राप्ति हो जाएगी।

 यह सुन कर सुमित  व उसकी पत्नी में एक नयी आशा का संचार हुआ एवं सुमित  ने साधु  द्वारा बताये उपाय अनुसार पूजा विधि शुरू कर दी।  धीरे धीरे समय गुज़रता गया और २१ वे मँगवालवार को ही सुमित  की पत्नी गर्ववती हो गयी दोनों ही बेहद खुश थे , प्रतिदिन हनुमान जी की उपासना उनका नियम बन गया।  9 माह बाद उन्हें एक बड़ी सुन्दर पुत्री की प्राप्ति हुई पूरे परिवार के बीच ख़ुशी की लहर दौड़ गयी।

सुमित  व उसकी पत्नी ने हनुमान जी को बहुत धन्यवाद  अर्पित कर भव्य राम कथा का भी आयोजन  करवाया।  सभी परिवारजन उस बच्ची के साथ दिन भर खेला करते थे सब कुछ  सुखमय व्यतीत  हो रहा था। तब एक दिन सुमित  की माँ अपनी पोत्री  को घर की बालकनी में खिलाने लेजा रही थी परन्तु वहाँ पड़े पानी पर उनकी नज़र नहीं पढ़ी और उनका पैर पानी पर पड़ा जिसके कारण बची गोद से छटक कर पहली  मंजिल से नीचे गिर गयी , बच्ची के गिरते ही केशव की माँ मुँह से आवाज निकली बजरंगबली रक्षा करो।

बच्ची  नीचे गिरते हुए बिजली के तारो से टकरा कर नीचे ज़मीन पर जा गिर गयी।  दौड़े दौड़े सभी बच्ची को देखने नीचे पहुंचे तो सभी ने देखा की बच्ची ज़मीन पर लेटी हुई ऐसे खेल रही थी जैसे वह कठोर ज़मीन पर नहीं किसी मखमल के बिस्तर पर गिरी हो बच्ची को किसी प्रकार की कोई चोट नहीं आयी।  यह घटना देख आस पास मौजूद सभी लोग दंग रह गए। परन्तु सभी का एक ही सवाल था बच्ची को कुछ नहीं हुआ ऐसा नहीं हुआ यह कैसे हो सकता है , इस पर सुमित  की माँ ने कहा की इस बच्ची के माता पिता व बच्ची तीनो पर बजरंग बलि की असीम कृपा है और बजरंगबली ने ही इस बच्ची की प्राण रक्षा की है और इसके ऊपर से सारे संकट दूर किये है।  इस घटना के बाद बच्ची के माता पिता और सभी का विश्वास बजरंगबली के प्रति अटूट हो गया।   

जब शेषनाग ने अंध शिव भक्त के पाँव से लिपट कर बचायी उसकी जान

भगवान को लेकर सभी की आस्था और विश्वास भिन्न भिन्न होता है , कोई भगवान् को पिता के रूप में देख , खुद को उसकी संतान बताता है तो कोई भगवान् को मित्र ही बताता है। और भगवान् के भक्त कुछ है ही इस प्रकार के की अपने भक्ति की सहारे से ही आत्मा का परमात्मा से मिलान करवा ही लेते है।

तो यह कहानी है ऐसे ही काशी के गंगा घाट पर रहने वाले अन्ध शिव भक्त की जिनका नाम भोला था ।भोला जन्म से अंधा था और माता
पिता को ही बचपन में खो दिया था तो क्रूर संसार में जब भोला अकेला था तो उसने भगवान शिव का हाथ थामा। भोला प्रात
उठकर रोज गंगा नदी में स्नान करने जाता तो लोग कहा करते थे कि मत जा भोला, तुझे दिखता तो है नहीं किसी दिन डूब
जाएगा, तो भोला कहता मुझे नहीं दिखता तो क्या हुआ भोलेनाथ को तो दिखता है ना वह बचा लेंगे। भोला का भाव महादेर के प्रति कुछ अलग ही था। दिन भर शिव का नाम लेकर उन्हें याद करता। परंतु जब कुछ गलत होता तो शिव का नाम लेकर उन पर चिल्लाता उन्हें डांट
देता।

भोला के भाव व भक्ति शिव के प्रति कुछ भिन्न ही थी। इस कारण लोगों से पागल भी कहने लगे थे। पर भोला ने कभी इन बातों
पर ना ध्यान दिया ना दिल में रखकर बुरा लगाया । वह खुद में और शिव की भक्ति में खुश था। एक रोज जब भोला पूजा कर घर
की ओर लौट रहा था तब भोला को पता चला कि शहर से बाहर आज शाम शिव सत्संग है, तो भोला ने सोच लिया कि वह आज
सत्संग में जाएगा।

घर पहुंचकर अपना थैला जिसमें शिवजी की एक तस्वीर और कुछ फल थे व अपनी लाठी उठाई और चल दिया सत्संग के लिए । शहर से बाहर था एक रेलवे फाटक भोला उसे पार करने लगा। पर वह इस बात से अनजान था कि दूसरी ओर से तेजी से बढ़ती हुई ट्रेन भोला की तरफ चली आ रही है। आसपास के लोगों ने चिल्लाकर भोला को पीछे हटने को कहा पर भोला ट्रेन की आवाज में कुछ सुनने में असमर्थ था। भरी भीड़ में से किसी ने कहा देखो एक साँप उसकी ओर तेजी से बढ़ रहा है l आसपास की भीड़ ने मान लिया कि आज भोला की जान नहीं बचेगी एक ओर से ट्रेन दूसरी ओर से साँप । और फिर लोगों ने कुछ ऐसा देखा जिसे देखकर भी माना ना जा सके।

भोला के दोनों पैरों में रस्सी की तरह लिपट गया और जब भोला ने आगे कदम बढ़ाया तो वह गिर गया और ट्रेन भोला के बगल से निकल गई। ट्रेन के निकलते ही सांप भी भोला के पैरों से अलग होकर कहीं दूर निकल गया तो यह देखकर सभी मौजूद लोग अचंभित रह गए। यह उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। जब लोगों ने बोला, वो सब बताया तो वह मुस्कुराया और बोला मेरी रक्षा किसी और ने नहीं भगवान शिव व उनके भेजे शेषनाग ने की है।हां, यह सत्य है। मैं जन्म से अंधा हूं। मैं कुछ देख नहीं पाता परंतु शिव तो सब देखता है,मेरा सुख-दुख सब मैं अपनी रक्षा क्या करूंगा। शिव है ना मेरी रक्षा करने वाले और जय महादेव बोल कर वहां से निकल गया , भोला की भक्ति और महादेव के प्रति आस्था व विश्वास को देख सभी हैरानी में पड़ गए।

जब एक मुस्लिम ने तोडा शिवलिंग ,और फिर जो हुआ उसे देख गांव में आज तक है डर का माहौल

झारखंड के एक गांव के पास जंगल था। वही जंगल से लगकर एक शिवलिंग स्थित था , किसी को यह नहीं पता की वह शिवलिंग वह कहा से या , गांव के बड़े बुजुर्ग बताते है की बहुत सालो पहले ज़मीन फाड़ कर ही यह शिवलिंग बहार आया था और तभी से यह इसी स्थान पर स्थापित है । लोगों की आस्था और विश्वास कुछ इस प्रकार का था कि वह शिवलिंग में साक्षात शिव का वास है। प्रातः काल से ही वहाँ शिव भक्तों की भीड़ लगा करती थी। आसपास के लोग वहां शिव कीर्तन जैसे प्रसंगों का आयोजन करते थे।

लोग बताते हैं जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा से जो मांगे से उसकी हर मनोकामना को पूरा करते हैं। वहां के सभी छोटे बड़े किसान मौसम की पहली फसल शिवलिंग पर चढ़ाया करते कोई व्यक्ति नया वाहन खरीदे या किसी का विवाह समारोह किसी भी प्रकार का शुभ कार्य क्यों ना हो। शिव मंदिर से ही उसका प्रारंभ किया जाता। शिवरात्रि पर तो यहाँ भव्य कार्यक्र्म का आयोजन किया जाता है , मेला लगता है और कई लोग तो दुसरे गांव से भी यहाँ महादेव के दर्शन करने आते है।
सारागांव खुशी व श्रद्धा भाव से अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। पर उसके बाद जो हुआ उसने सभी को झंकझोर कर रख दिया। परन्तु आगे बढ़ने से पहले आगे बढ़ने से पहले यदि आप हमारे चैनल पर नए है तो चैनल को सब्सक्राइब अवश्य कर दे और साथ ही नीचे दिए गए घंटी के बटन को दबाना ना भूले।

कुछ दिन बाद ही उस गांव में एक इमरान नाम का मुस्लिम व्यक्ति रहने आया। उसने गांव में रहने वाले लोगों से शिव की अनेक कहानियां और चमत्कारों के किस्से सुने। उसे किसी भी बात पर एक ही ना हुआ। आमिर ने लोगों की आस्था व श्रद्धा को अंधविश्वास का नाम तक दे दिया। इमरान धीरे धीरे लोगो की श्रद्धा और आस्था से ईर्ष्या भाव करने लगा था। इस कारन से इमरान ने सोचा की जब सारा गांव सो जायेगा तब मैं इस शिवलिंग को तोड़ दूंगा।

और फिर एक दिन मध्यरात्रि के समय सारागांव जब सो गया तब इमरान शिवलिंग के पास एक लोहे की बड़ी सरिया लेकर पहुंचा और प्रण लेते हुए कहता है की आज मैं इस शिवलिंग को तोड दूंगा। और फिर महादेव को चुनौती देकर चिल्लाते हुए बोलता है की मैं भी देखता हूं , कौन सा चमत्कार और महादेव मुझे रोक पाता है।

इमरान ने अपने सारे बल के साथ उस लोहे की सरिया से शिवलिंग पर वार किया परन्तु शिवलिंग को कुछ असर भजि नहीं पड़ता । जैसे ही इमरान ने दूसरा प्रहार किया तभी आसमान में बिजली कडक उठी और शिवलिंग के पास एक सर्प निकल कर आया जो शिवलिंग के पास अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया। देखते ही देखते वहां कई सर्प और आ गए।

इमरान ने सर्पो को अपनी ओर बढ़ते हुए देखा। यह देख उसके हाथों में लोहे की सरिया छूट गई। आकाश मे कड़कती बिजली उस सरिया पर आ कर गिरी पड़ी जिससे उस सरिया के दो भाग हो गए। यह सारे प्रकरण को देखकर आमिर बहुत डर गया और वहां से भाग खड़ा हुआ , और वापस कभी गांव मैं तो क्या आसपास के इलाको मैं भी नज़र नहीं आया। अगली सुबह गांव वालों ने सारी घटना को देखा , सर्पो का झुण्ड एवं लोहे की सरिया के हुए दोनों टुकड़े वही मौजूद थे ,और यह सा देख सभी को ज्ञात हुआ कि कोई शिवलिंग तोड़ने आया था। सभी कहने लगे , महादेव ने उन सर्पो को भेज कर स्वयं की रक्षा स्वयं की है। ऐसे चमत्कार को देख सभी हैरान रह गए और फिर सभी ने हाथ उठाकर हर महादेव का जयकारा लगाया। जल्द ही यह बात आस पास के गांव में भी फ़ैल गयी दूर दूर से लोग महादेव के दर्शन के लिए आने लग गए। गांव शिव भक्तो से भर गया , लोगो की आस्था भी महादेव के प्रति और दृढ हो गयी।

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महादेव के असीम भक्त के सामने आये जंगली भेड़िये और सर्पो का झुण्ड

श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था की भगवान् हर स्थान पर है , मुझमें आप में , जल में थल में , आकाश में वायु में , कण कण में भगवान् है , बस देखने की दृष्टि होनी चाहिए।

ऐसे ही भगवान् जो हम सभी में है उसकी एक सत्य घटना आज हम आप सभी के सामने प्रस्तुत करने जा रहे है।
बिहार के एक छोटे से गांव में अभय नाम का एक नवयुवक रहा करता था , वह महादेव का असीम भक्त था। अभय रोज़ सुबह मंदिर जाकर पूरे श्रद्धा भाव से पूजा पाठ किया करता , साथ ही हर सोमवार का व्रत किया करता था। अभय अपने माता पिता का इकलौता पुत्र था , वह अपने माता पिता की बड़ी इज़्ज़त किया करता था।

अभय एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था , वह दिन रात मन लगा कर पढाई किया करता था। उसके जीवन में किसी भी प्रकार की कोई भी समस्या आती तो वह उसे बिना किसी से साझा किये सिर्फ महदेव के ऊपर सब छोड़ दिया करता था , उसका प्रबल विश्वास था की महादेव उसके सभी संकट अवश्य ही दूर करेंगे। अभय कभी किसी के लिए कुछ गलत नहीं किया करता था।

अभय को परीक्षा की तैयारी करते हुए काफी समय हो गया था। एक दिन उसके प्रतियोगी परीक्षा की तिथि भी निश्चित हो गयी थी , उसे परीक्षा के लिए पास ही के दुसरे शहर जाना था। कुछ दिन बाद अभय परीक्षा के लिए दुसरे शहर को निकल गया। परीक्षा स्थल पर पहुँच कर अभय ने परीक्षा दी। अभय को पूर्ण उम्मीद थी की उसका परिणाम भी बेहद अच्छा आएगा।

वह ख़ुशी ख़ुशी वापस अपने घर की और रवाना ही गया , परन्तु लौटते हुए उसे रात बहुत हो गयी थी। वह बीच जंगल से गुज़र रहा था तभी उसे आस पास से कुछ बड़ी अजीब सी आवाजें आने लगी , जिन से अभय थोड़ा चौंक गया परन्तु वह बिना रुके आगे की ओर बढ़ रहा था।
अचानक से झाड़ियों के बीच से कुछ जंगली भेडियो ने अभय को चारो ओर से घेर लिया , जिन्हे देख अभय बहुत अधिक भयभीत हो गया।

अभय इस समय अपने स्थान से हिल भी नहीं पा रहा था क्युकी भेड़िये उसे चारो ओर से घेर चुके थे , सभी भेड़िये धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ने लगे , जब अभय को कोई मार्ग प्रतीत ना हुआ तो उसने महादेव को याद किया ओर साहयता की गुहार लगायी। तभी फिर जो हुआ उसे देख अभय के होश भी उड़ गए। अचानक से वहाँ कुछ सांपो का झुण्ड आ गया और भेडियो के पैरो से लिपट गए। भेड़िये वहाँ से डर कर भाग गए । अभय को कुछ समज नहीं आ रहा था की इतने सारे सांप आये कहाँ से। कुछ देर बाद उसे समज आया की यह चमत्कार महादेव को स्मरण करने मात्र से हुआ है, महादेव ने ही सांपो को भेज कर मेरी रक्षा की है। घर पर सबको पता चला तो सभी ने मिलकर महादेव को धन्यवाद किया , इसके बाद अभय की आस्था महादेव को लेकर और प्रबल हो गयी।

अभय के संकट की घडी मे सापों के एक झुण्ड ने उसकी प्राण रक्षा की।

जब हज़ार फुट ऊँची पहाड़ी से नीचे गिरी बस , और फिर जो हुआ

जाको राखे साइयाँ मार सके ना कोई। अर्थात जिसके साथ भगवान् है , उसका तो क्रूर कालचक्र भी कुछ बिगड़ नहीं सकता। ऐसी ही एक कहानी एक बारे में हम आज आपको बताने जा रहे है , जो हमें भेजी है , जम्मू में रहने वाले पंडित शिवरतन जी ने।

पंडित शिवरतन जी लांदेर , जम्मू के निवासी है जिनकी आयु इस समय 81 वर्ष है। शिवरतन जी एक लम्बे समय से माँ दुर्गा के उपासक है , वह प्रतिदिन नियमबद्ध रूप से माता की पूजा अर्चना किया करते है। शिवरतन जी अपने बच्चो व पौत्र पौत्री के साथ रहते है। एवं उनके परिवार में सभी माँ दुर्गा के प्रति सच्ची निष्ठा व आस्था रखते है ।

सब कुछ सुखमय रूप से व्यतीत हो रहा था , इसी वर्ष जुलाई माह में शिवरतन जी की इच्छा हुई की वह अपने पूरे परिवार के साथ , लांदेर से कुछ 300 किलोमीटर दूर मचैल माता के दर्शन करके आये। उन्होंने अपने घर में सभी के साथ योजना बनाई।
वह सभी कुल 20 से 22 लोग थे। सभी ने मिलकर एक छोटी बस का इंतज़ाम किया और 3 जुलाई को यात्रा के लिए निकल गए।

सभी लोग माता मचैल की भक्ति में लीन होकर भजन गाते गाते आगे बढ़ रहे थे , बड़ा ही भक्तिपूर्ण माहौल बना हुआ था। परन्तु आगे जो संकट आने वाला था उससे सभी अनजान थे। कुछ ऐसा होने वाला था जो किसी ने सोचा भी ना था। कुछ दस से बारह घंटे का सफर पूर्ण करने के बाद शिवरतन जी अपने पुअर परिवार सहित मचैल माता के मठ जा पहुंचे। सभी ने वहाँ अच्छे से दर्शन झांकी की , और माँ का आशीर्वाद लेकर वापस लांदेर के लिए निकल गए।

लांदेर लौटते हुए बीच मार्ग में शिवरतन जी की बस एक ऊँची चढ़ाई चढ़ रही थी , और उसी वक्त बस खराब होकर बंद हो गयी डाइवर की लाख कोशिशों के बाद भी बस चालू नहीं हो रही थी। बस ऊँची चढाई से पीछे की तरफ लुढ़कने लगी , ड्राइवर पीछे जाती बस को रोकने के लिए ब्रेक लगा रहा था परन्तु ब्रेक भी काम नहीं कर रहे थे , और पीछे खाई को देख बस में मौजूद शीरतन जी व उनके सभी परिवारजन सभी बड़े ही भयभीत हो गए।

बस को जब ड्राइवर की लाख कोशिशों के बाद भी रोंका ना जा सका और किसी को कोई और मार्ग दिखाई नहीं दिया , तब शिवरतन जी ने माता मचैल को याद करते हुए कहा की , हे माँ मुझे अपने प्राणो की कोई परवाह नहीं है परन्तु यहाँ उपस्थित मेरे बच्चो और पौत्र एवं पौत्री की रक्षा कीजिये वार्ना अनर्थ हो जायेगा।

उसके बाद जो हुआ उसे देख सभी के होश उड़ गए। तेज रफ़्तार से खाई की और लुढ़कती हुई बस अचानक से बीच मार्ग मे कुछ इस प्रकार से रुक गयी जैसे किसी ने उसे पकड़ लिया हो , ड्राइवर चिल्ला कर कहने लगा की मैंने तो ब्रेक लगाए नहीं फिर यह बस कैसे रुकी , किसी को समज नहीं आ रहा था की यह हुआ है और कैसे , परन्तु शिवरतन जी समज चुके थे की जो उन्होंने प्रार्थना माता मचैल से की थी वह उन्होंने सुन ली है और उन्ही ने सभी की प्राण रक्षा की है।

वहाँ मौजूद किसी भी व्यक्ति को अपनी आँखों पर यकीन ना था , परन्तु सत्य तो यही है की शिवरतन जी के माँ मचैल पर अटूट विश्वास एवं निस्स्वार्थ भाव से की गयी विनती को माँ ने सुना और अपने भक्त की प्राण रक्षा की।

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