Why do we celebrate Dussehra?

दशहरा कब मनाया जाता है

Hindu calendar में month Ashvin की दशमी तिथि (शुक्ल पक्ष) को Dussehra मनाया जाता है। जिस प्रकार नवरात्र में Devi (Durga) के नौ रूपों ने लगातार नौ दिन तक भीषण युद्ध लड़कर दसवें दिन संसार को असुरों से मुक्ति दिलाई थी उसी प्रकार vijaya dashami के दिन प्रभु श्री राम ने रावण का अंत कर बुराई को जड़ से समाप्त कर दिया था। इसलिए चाहे इस पर्व को राम द्वारा रावण का वध किये जाने के रूप में मनाया जाए या फिर दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार किये जाने के रूप में दोनों ही तरह से यह बुराई पर अच्छाई की विजय है और उत्सव मनाये जाने की प्रमुख वजह भी। दशहरा संस्कृत भाषा का एक शब्द है जिसका तात्पर्य है सभी 10 पापों को मिटाना क्योंकि रावण के दस सिर 10 पापों का प्रतीक है जिसका सर्वनाश श्री राम ने किया था। [1

आइये जानते हैं Vijayadashmi Dashara ki kahani

सर्वप्रथम तो Vijayadashami durga puja के अंत की सूचक है क्योंकि इस दिन ब्रह्मा-विष्णु-महेश की मिश्रित शक्ति से बनी navarathri goddess देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी वहीँ विजयदशमी को जब दशहरा के नाम से बुलाया जाता है तब इसे राम द्वारा रावण के वध किये जाने से जोड़कर देखा जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने लगातार 9 दिनों तक लंका में रहकर रावण से युद्ध किया और फिर 10वें दिन यानी विजयदशमी के ही दिन श्री राम ने रावण की नाभ‍ी में तीर मारकर युद्ध पर पूर्णविराम लगाया था।

रावण का वध किये जाने के पीछे एक कहानी यह भी प्रचलित है कि भगवान श्री राम ने दुर्गा मां की निरंतर नौ दिनों तक उपासना की थी। देवी ने भगवान श्री राम की परीक्षा लेते हुए उनकी पूजा में रखे गए कमल के पुष्पों में से एक पुष्प गायब कर दिया था जब पूजा में एक फूल कम पड़ा तो राम ने अपने कमल नयन देवी को अर्पित करने की ठान ली। राम की सच्ची श्रद्धा देख देवी प्रसन्न हुई और उन्होंने प्रभु श्री राम को रावण का वध किये जाने का वरदान दिया तब जाकर श्री राम दशानन रावण का खात्मा करने में सक्षम हो पाए।

इसे मनाये जाने का तीसरा कारण महाभारत से जुड़ा हुआ है दरअसल महाभारत में पांडवों ने अपने शस्त्रों को शमी नामक वृक्ष पर ही छिपाया था और उन्हीं हथियारों के जरिये कौरवों को रणभूमि में मात दी थी यही वजह है कि इस दिन क्षत्रिय समाज के लोग शस्त्रों की पूजा-अर्चना करते हैं। [2]

विजयादशमी क्यों मनाई जाती है?

Dussehra मनाये जाने की पौराणिक कथा के अलावा इसके पीछे सांस्कृतिक कारण भी हैं जिसके अभाव में इस पर्व के महत्व को समझना बहुत कठिन है। दशहरे के सांस्कृतिक पहलू की बात करें तो कृषि प्रधान भारत में जब किसान खेत में फसल उगाकर अन्न अपने घर लेकर आता है तो उस वक़्त किसान की ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता। इसी ख़ुशी के मौके पर वह भगवान का पूजन करता है और अपना हर्ष व्यक्त करता है। इसी के साथ आपको यह भी बताते चलें कि पूरे भारत में vijayadashmi अलग अलग तरीके से मनाई जाती है। उदहारणस्वरुप महाराष्ट्र में इस मौके पर ‘सिलंगण’ के नाम से उत्सव मनाये जाने का प्रचलन है। [3]

मात्र एक त्यौहार नहीं दशहरा

दशहरा केवल एक पर्व नहीं है बल्कि समाज को शिक्षा देने का पौराणिक माध्यम है जिससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं जैसे बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी सच्चाई का साथ देना, मित्रता को बनाये रखने और संबंधों को निभाने की कला सीखना, निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता करना आदि। इन सभी विशेषताओं को यदि एक लाइन में समाहित किया जाए तो यह आतंक पर आदर्शवाद की विजय तथा क्रूरता पर अनुशासन की जीत है।

Maa Mahagauri- 8th Day of Navratri

Maa Mahagauri: देवी महागौरी

Durga ashtami के दिन देवी महागौरी की आराधना की जाती है। Nauratri की आठवीं देवी महागौरी के स्वरुप की बाते करें तो देवी की चार भुजाएं हैं, जिसमें से एक भुजा में उन्होंने त्रिशूल लिया हुआ है वहीँ एक हाथ में उनके डमरू विराजमान है। हाथ में भोलेनाथ का डमरू होने के कारण ही उन्हें शिव के नाम से भी पुकारा जाता है। ये दोनों ही शिव -शक्ति का प्रतीक है यानी शिव महागौरी के बगैर अधूरे है। देवी की शक्ति अमोघ और अधिक फलदायी है। 

Sharada Navaratri का आठवां दिन विवाहित स्त्रियों के बहुत महत्व रखता है, सुहागिने इस दिन अपने सुहाग की मंगलकामना के लिए देवी को चुनरी भेंट करती हैं। [1]

इस तरह पड़ा Navarathri Goddess का नाम महागौरी

महागौरी के नाम और उनकी सवारी के पीछे पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं जिनका उल्लेख नीचे किया गया है :

पहली कथा के मुताबिक एक बार भगवान शिव देवी पार्वती को जाने अनजाने में कुछ कह देते है देवी पार्वती अपने पति की इस बात से नाराज़ होकर तपस्या में लीन हो जाती हैं। कई सालों तक जब पार्वती नहीं लौटती तो भोलेनाथ देवी को खोजते हुए उनके पास पहुंचते हैं। तपस्या के स्थान पर पहुंचकर भगवान शिव जब देवी की ओर निहारते हैं तो उनका ओजपूर्ण रंग देख आश्चर्यचकित हो जाते हैं, पार्वती के इसी ओजस्वी रूप देखकर उन्हें गौर वर्ण का वरदान भगवान शिव से प्राप्त होता है।

दूसरी कहानी के अनुसार कथाओं में पहले से ही इस बात का ज़िक्र किया गया है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति स्वरुप पाने दूसरी कहानी का संबंध भी देवी की तपस्या से ही जुड़ा हुआ है। कथाओं में पहले से ही इस बात का ज़िक्र किया गया है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति स्वरुप पाने के लिए कठोर तपस्या की थी जिस कारण उनका शरीर एक दम काला पड़ गया था। जब भोलेनाथ उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करते हैं तो वे उनकी काली पड़ी देह को देखकर चौंक जाते हैं। जैसे ही महादेव उनकी देह को गंगा जल से साफ़ करते है तो देवी चमकीले गौर वर्ण में तब्दील हो जाती है। यही वजह है कि माता को महागौरी नाम दिया गया है।

महागौरी की सवारी सिंह होने के पीछे एक कहानी प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार जब महागौरी तपस्या में लीन थी उस समय भूख महागौरी की सवारी सिंह होने के पीछे एक कहानी प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार जब महागौरी तपस्या में लीन थी उस समय भूख से व्याकुल एक शेर जंगल में विचरण कर रहा था और तपस्या कर रही देवी को देखकर शेर विचलित हो उठा लेकिन उसने देवी की तपस्या खत्म हो जाने तक वहीँ बैठकर इंतज़ार किया। प्रतीक्षा करते-करते शेर का शरीर लगभग क्षीण ही हो चुका था शेर का धैर्य देखकर माता ने उसे अपनी सवारी बना लिया। इस प्रकार देवी की सवारी बैल और सिंह दोनों ही है। [2]

Mahagauri ki puja vidhi

हिन्दू परंपरा में कुछ लोग durga ashtami के दिन कन्याओं को भोजन कराते हैं तो कहीं नवमी के दिन कन्या पूजन का विधान है। दोनों में से navratri day 8 कन्या पूजन को अधिक शुभ माना गया है।

1. प्रातःकाल देवी की प्रतिमा या तस्वीर को चौकी पर श्वेत वस्त्र बिछाकर रखें।  

2. इसके पश्चात माता के समक्ष सफ़ेद फूल अर्पित करें तथा धूप जलाएं।  

3. दूध से बने नैवैद्य अर्पित करने के बाद हाथ में फूल लेकर माता का सच्चे मन से ध्यान करें।  

4. महागौरी मंत्र का 108 बार उच्चारण करने से देवी प्रसन्न होती हैं।

Mahagauri Stuti Mantra: महागौरी स्तुति मंत्र

माहेश्वरी वृष आरूढ़ कौमारी शिखिवाहना

श्वेत रूप धरा देवी ईश्वरी वृष वाहना।

Gauri Mata Mantra: गौरी माता प्रार्थना मंत्र

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। 

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

Mahagauri jaap mantra: महागौरी जाप मंत्र

ओम देवी महागौर्यै नमः

Mahagauri beej mantra: महागौरी बीज मंत्र

श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:

Mahagauri ki aarti: महागौरी की आरती

जय महागौरी जगत की माया ।

जया उमा भवानी जय महामाया ।।

हरिद्वार कनखल के पासा ।

महागौरी तेरा वहां निवासा ।।

चंद्रकली ओर ममता अंबे ।

जय शक्ति जय जय मां जगदंबे ।।

भीमा देवी विमला माता ।

कौशिकी देवी जग विख्याता ।।

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा ।

महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा ।।

सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया ।

उसी धुएं ने रूप काली बनाया ।।

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया ।

तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया ।।

तभी मां ने महागौरी नाम पाया ।

शरण आनेवाले का संकट मिटाया ।।

शनिवार को तेरी पूजा जो करता ।

मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता ।।

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो ।

महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो ।। [3]

महागौरी माता मंदिर : सिद्ध SHAKTI PITHAS

पुराणों के अनुसार जहां-जहां देवी parvati के अंग, वस्त्र, गहनों के टुकड़े गिरे वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए और सदियों से यहाँ माता को पूजा जाने की परम्परा चली आ रही है। Navarathri में शक्तिपीठों का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आपको बता दें कि वैसे तो ब्रह्माण्ड पुराण में देवी के कुल 64 shakti pithas का वर्णन किया गया है लेकिन देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का ही जिक्र है जो पूरे भारत में फैले हुए है। इनमें से एक है सिद्ध शक्तिपीठ महागौरी मंदिर जो शिमलापुरी, लुधिआना में अवस्थित है।  [4]

कड़वे संबंधों को मधुर करने की प्रेरणा देतीं देवी महागौरी

दुर्गा का महागौरी रूप आज के बनते बिगड़ते संबंधों को मजबूती प्रदान करने के लिए सीख देता है क्योंकि आदि शक्ति का संगम एक सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक है। लोग देवी को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानकर रिश्तों की खटास को कम करने का प्रयास कर सकते हैं जो जीवन में सुखी रहने की एक आवश्यक शर्त भी है।

Maa Siddhidatri- 9th Day of Navratri

Mahanavami पर्व

हिन्दू धर्म में महानवमी का पर्व ख़ासा महत्व रखता है। इस दिन navarathri goddess देवी पार्वती के नौंवे अवतार सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।  यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर मनाया जाता है। भारत के कई राज्यों बिहार, बंगाल, उड़ीसा, असम में दुर्गा पूजा बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है। यहाँ navratri day 9 को दुर्गा उत्सव, शरदोत्सब, अकालबोधन, महापूजो जैसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। वहीँ Sharada Navaratri के दौरान बंगाल में मनाया जाने वाले महापूजों के दिन दुर्गा मां की विदाई विसर्जन स्वरुप की जाती है। [1

देवी Siddhidhatri

Hindu calendar के अनुसार Sharada Navaratri के 9th day of navratri में दुर्गा मां के सिद्धिदात्री अवतार की पूजा की जाती है। सिद्धि प्रदान करने वाली देवी ही सिद्धिदात्री के नाम से प्रचलित है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के शरीर का आधा भाग सिद्धिदात्री का है। वैदिक पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने देवी सिद्धिदात्री की आराधना कर ही सिद्धि प्राप्त की थी जिसके बाद से महादेव का आधा हिस्सा देवी के रूप में बन गया।

siddhidhatri और शिव के संगम को अर्द्धनारीश्वर की संज्ञा दी गई है जो आधुनिक समाज की लैंगिक समानता का सटीक उदाहरण पेश करता है यानी वैदिक काल से आधुनिक विचारधाराएं प्रचलन में है। 

siddhidatri mata ki katha सिद्धिदात्री माता की कथा

देवी की चार भुजाएं हैं और इन चारों भुजाओं में चक्र, गदा, कमल और शंख रहता है। देवी कमलपुष्प और सिंह दोनों पर ही विराजमान रहती हैं।

मार्कण्डेयपुराण के अनुसार siddhidhatri की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे 8 प्रकार की सिद्धियों पर अपना प्रभाव रखती हैं जिनमें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्वये शामिल हैं। भगवान शिव ने देवी की आराधना कर इन्हीं सिद्धियों की प्राप्ति की थी जिसके बाद उनका आधा शरीर सिद्धिदात्री जैसा बन गया था।  [2]

महिषासुर वध की कथा

महिषासुर कौन था

पौराणिक कथा के अनुसार असुरों के राजा रम्भ और जल में रहने वाली भैंस के संगम से महिषासुर का जन्म हुआ था जिस कारण वह कभी भी मनुष्य और कभी भी भैंसे का रूप ले लिया करता था।  महिषासुर ब्रह्मा जी का परम भक्त था।  ब्रह्मा जी ने महिषासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था कि न तो देवता और न ही कोई असुर महिषासुर को हरा सकते हैं।  ब्रह्मा जी  के इसी वरदान का फायदा उठाकर महिषासुर ने तीनों लोकों पर अपना कब्ज़ा जमाने की सोची और आतंक मचाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते दानव ने स्वर्ग और पृथ्वी लोक दोनों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। सभी देवताओं ने उसे हराने के लिए भीषण युद्ध किये लेकिन किसी को भी जीत हासिल न हो पाई।

महिषासुर के मचाये उत्पात से तंग आकर सभी देवता त्रिमूर्ति ब्रह्मा-विष्णु-महेश के पास पहुंचें। त्रिमूर्ति ने इसके समाधान स्वरुप अपनी तीनों की ही शक्तियों का समावेश कर शक्ति नामक देवी का निर्माण किया। देवी दुर्गा नाम से जानी जानें वाली शक्ति ने महिषासुर को परास्त करने के लिए पूरे नौ दिन तक भीषण युद्ध किया और अंत में जाकर महिषासुर की हार हुई। इस तरह Nauratam में पूजे जाने वाले देवी दुर्गा के नौ रूपों ने महिषासुर को हराया और बुराई पर अच्छाई ने विजय प्राप्त की। [3]

Durga Navami puja vidhi in hindi

1. Nauratam के आखिरी दिन देवी की प्रतिमा के सामने धूप और दीपक जलाकर देवी की आरती व हवन करना चाहिए। 

2. Navaratra के नौंवे दिन इनकी पूजा होने के कारण माँ दुर्गा का भोग  नौ प्रकार के फल, फूल, मिष्ठान और नैवैद्य के सम्मिश्रण वाला होना चाहिए। 

3. इस दिन सभी देवताओं के नाम की आहुति भी जानी चाहिए।  

4. जो भी भक्त पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से माता की उपासना करते हैं उनकी सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है।  

5. सिद्धि प्राप्ति के लिए देवी के जाप मंत्र का 108 बार उच्चारण करना चाहिए।

Maa Siddhidatri Mantra: सिद्धिदात्री माता का मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

Mata Siddhidatri Jaap Mantra: माता सिद्धिदात्री जाप मंत्र

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

Mata Siddhidatri प्रार्थना मंत्र

सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

Maa Siddhidatri beej mantra: मां सिद्धिदात्री बीज मंत्र

ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:

siddhidatri mata ki aartiनवरात्रि नौवें दिन की आरती

जय सिद्धिदात्री माँ तू सिद्धि की दाता। तु भक्तों की रक्षक तू दासों की माता॥

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि। तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि॥

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम। जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम॥

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है। तू जगदम्बें दाती तू सर्व सिद्धि है॥

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो। तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो॥

तू सब काज उसके करती है पूरे। कभी काम उसके रहे ना अधूरे॥

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया। रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया॥

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली। जो है तेरे दर का ही अम्बें सवाली॥

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा। महा नंदा मंदिर में है वास तेरा॥

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता। भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता॥ [4]

Siddhidhatri का दाता रूप हमें देता है दानदाता बनने की प्रेरणा

देवी के दात्री रूप की आराधना कर भक्त 8 प्रकार की सिद्धियों को वरदान में पा सकते हैं और इस सिद्धि का सीधा सरल मार्ग है ईश्वर की भक्ति। परंपरा की मानें तो दो ही प्रकार से ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है जिसमें से एक आसान मार्ग भक्ति है। नवरात्र के इन पावन दिनों में सच्ची भक्ति और योग साधना ही वह मार्ग है जो ईश्वर तक जाने का द्वार खोलता है। वहीँ व्यक्ति भी माता के इस रूप से दानदाता बनने की एक सीख लेकर अपने व्यक्तिगत लाभ को एक तरफ रखकर समाज में अपना योगदान दे सकता है।  

Kalratri Mata-7th day of Navratri

Devi Kalaratri: माता कालरात्रि

navarathri goddess मां दुर्गा की सप्त शक्ति का नाम देवी कालरात्रि है। इनके नाम से साफ़ झलकता है काल की रात। saptami के दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में अवस्थित होता है इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति को संसार  की सारी सिद्धि और निधि (विद्या, धन, शक्ति) प्राप्त होती है।

Devi (Durga) के अनेक नाम है जैसे भद्रकाली, महाकाली, भैरवी, चामुंडा और चंडी आदि। इन्हें ही देवी काली की संज्ञा दी है कालरात्रि और महाकाली दोनों ही नाम एक दूसरे के पूरक है। इनकी पूजा से भूत, पिशाच और सभी नकारात्मक बुरी शक्तियां नष्ट हो जाती है और व्यक्ति सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता है। देवी के रूप को देखें तो यह बहुत भयानक प्रतीत होता है लेकिन सच्चे मन से भक्ति करने पर माता शुभ फल देती हैं इसलिए इन्हें शुभंकरी के नाम से भी पुकारा जाता है। देवी कालरात्रि की उपासना करने से जीव-जंतु भय, अग्नि भय, जल भय, रात्रि भय और भूत पिशाच भय कभी नहीं होते।  [1]

कालरात्रि की पौराणिक कथा

navratri day 7 देवी कालरात्रि से जुड़ी एक कथा के अनुसार एक रक्तबीज नामक राक्षस था जिससे सभी देवता परेशान थे और देवताओं की परेशानी की जड़ थी रक्तबीज का रक्त। दरअसल राक्षस का रक्त जिस भी स्थान पर गिरता था वहां बिल्कुल रक्तबीज जैसा नया दानव बन जाता था। सभी देवता परेशान होकर भगवान शिव के पास पहुंचे।  भगवान शिव ने समाधान स्वरुप देवी पार्वती का नाम लिया और कहा कि केवल देवी पार्वती ही इस दानव का वध कर सकती हैं। पार्वती ने रक्तबीज के खात्मे के लिए ही कालरात्रि रूप का सृजन किया था। कालरात्रि ने जब दानव का वध किया तो उसका रक्त धरती पर गिरने के बजाय अपने मुख में भर लिया और सभी देवताओं की चिंता का हल निकाल लिया। [2]

महाभारत के अंत में क्यों प्रकट हुई थी मां कालरात्रि

जब महाभारत में कौरवों की सेना हार के चरम पर थी उस वक़्त अश्वतथामा ने अपने पिता द्रोणाचार्य की मौत का बदला लेने के लिए आक्रोश में आकर दृष्टद्युम्न समेत पाडंवों के पाँचों पुत्र की हत्या कर दी थी। युद्ध में की गई बेईमानी को देखकर ही देवी कालरात्रि वहां प्रकट हुई थी।

Maa kalratri puja vidhi in hindi: पूजा विधि

1. देवी मां की तस्वीर या प्रतिमा पर प्रातःकाल गंगाजल छिड़कें।  

2. इसके पश्चात navratri 7th day colour तथा देवी का प्रिय लाल रंग का वस्त्र चढ़ाएं और सिन्दूर अर्पित करें।   

3. मिष्ठान, पंच मेवा, पंच फल और पंचामृत वाला नैवैद्य अर्पित करें।  

4.  इन सब क्रिया के बाद 108 बार मंत्र का जाप करें इससे माता रानी की कृपा भक्तों पर अवश्य बनी रहेगी।  

Kaal ratri mantra: कालरात्रि मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

Kalratri Mata प्रार्थना मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥

Kalratri Mata जाप मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः।। [3]

ईमानदारी की राह पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं देवी कालरात्रि

Durgaspatashati के दिन पूजी जाने वाली माता कालरात्रि व्यक्ति को ईमानदारी की राह पर जाने के लिए प्रेरित करती है और ऐसा नहीं होने पर वे भक्तों को संकेत भी दिया करती हैं। सही राह पर चलने का उदाहरण महाभारत के प्रसंग से लिया जा सकता है. सच्चे मन से देवी की आराधना करने वह व्यक्ति संसार के सभी भय से मुक्त हो जाता है और सच्चाई के रास्ते पर अग्रसर होता है। 

Maa Chandraghanta – 3rd Day of Navratri

Maa Chandraghanta: माता चंद्रघंटा

नवरात्रि के शुरुआत के दो दिन पार्वती के कन्या रूप की पूजा की जाती है वहीँ तीसरे दिन उनके विवाहित रूप की आराधना होती है जो देवी चंद्रघंटा के नाम से प्रचलित हैं। यह देवी पार्वती का वैवाहिक रूप है जिसमें वे भगवान शिव के साथ शादी हो जाने के बाद आधे चंद्र को अपने माथे पर धारण करती हैं। navratri 3rd day पूजे जानी वाली माता चंद्रघंटा का शरीर सोने की भांति चमकीला होता है। मां सिंह पर सवारी करती हैं उनके 10 हाथ है जो कि अस्त्र-शस्त्र जैसे खड्ग, गदा, त्रिशूल, चक्र और धनुष से सदैव सुशोभित रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवी चंद्रघंटा की सच्चे मन से पूजा करने से विवाहित लोगों के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं। यह भी बताते चलें कि माता हमेशा युद्ध की मुद्रा में ही रहती है। शिव पुराण के अनुसार देवी चंद्रघंटा शिव का आधा भाग हैं यही वजह है कि भगवान शिव को अर्धनारीश्वर कहा जाता है यानी बिना शक्ति के शिव अधूरे हैं।  [1]

Maa Chandraghanta ki katha: पौराणिक कथा

मां चंद्रघंटा अस्त्रों-शस्त्रों से सुशोभित रहती है उनके इस रूप से ही यह ज्ञात हो जाता है कि उनका अस्तित्व असुरों की समाप्ति करना है। माता के इस रूप की chandraghanta story की बात करें तो उन्होंने राक्षस महिषासुर का खात्मा कर तीनों लोकों को अन्याय और क्रूरता से छुटकारा दिलाया था।

महिषासुर ब्रह्मा जी का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपनी कठोर तपस्या के माध्यम से ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और वरदान मांगा कि कोई भी देव, दानव या धरती पर रहने वाला उसे मार न सके। यह वरदान मिलने के बाद महिषासुर आतंकित हो गया और उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य जमाने के मकसद से क्रूरता करनी आरम्भ कर दी। जब ब्रह्मा विष्णु और महेश के साम-दाम-दंड-भेद काम नहीं आये तब तीनों ने मिलकर शक्ति के रूप में देवी शक्ति को जन्म दिया। देवी चंद्रघंटा ने ही राक्षस का संहार किया था।  [2]

maan chandraghanta kee pooja vidhi

Maan Chandraghanta Kee Pooja Vidhiमां चंद्रघंटा की पूजा विधि

1. navarathri goddess चंद्रघंटा को केसर और केवड़े के जल से स्नान करना चाहिए।  

2. उसके बाद उन्हें सुनहरे रंग का कपड़ा चढ़ाकर लाल या फिर चमेली का फूल अर्पित करें तो देवी प्रसन्न होगी क्योंकि ये फूल उन्हें काफी प्रिय हैं।  

3. माता को मिश्री, मिठाई और पंचामृत का भोग लगाएं। उसके बाद साधना में लीन होकर नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करें। 

Chandraghanta Mantra: चंद्रघंटा मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

Chandraghanta Praarthana Mantra: चंद्रघंटा प्रार्थना मंत्र

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

Maa Chandraghanta beej mantra: मां चंद्रघंटा बीज मंत्र

‘ऐं श्रीं शक्तयै नम:’

Chandraghanta Jaap Mantra: चंद्रघंटा जाप मंत्र :

ॐ देवी चंद्रघण्टायै नम: [3]

बुराई से लड़ने की प्रेरणा देती हैं chandraghanta devi

मां दुर्गा का यह तीसरा रूप बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। माता की अराधना से व्यक्ति अपने भीतर बुराई से लड़ने की असीम शक्ति प्राप्त कर सकता है और जीवन में इस ऊर्जा का उपयोग हर पड़ाव पर कर सकता है। व्यक्ति को निर्भीक होकर कार्य करते रहने की प्रेरणा भी हमें देवी की पूजा अर्चना से प्राप्त होती है। 

Ashwin Month Navratri: Why is navratri celebrated?

नवऱात्रि मनाये जाने का महत्व

नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ तो नौ रातें हैं लेकिन गहराई में उतरे तो ज्ञात होता है वह नौ रातें जो दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित हों।  यह नौ पवित्र दिन शक्ति पूजा के लिए है, योग साधना के लिए हैं, मां को प्रसन्न करने के लिए हैं। मनुष्य के शरीर में नौ छिद्र है दो आँख, दो कान, दो नाक, दो गुप्तांग और एक मुँह। इन पवित्र दिनों में व्यक्ति इन्हीं छिद्रों का शुद्धिकरण कर छठी इंद्री को जगाने का प्रयास करता है। 

हिन्दू पांचांग के अनुसार तो साल में चार बार नवरात्रि आते हैं लेकिन साल में दो ही बार इसे मनाये जाने की परंपरा  है। एक तो चैत्र नवरात्रि के रूप में और दूसरी अश्विनी नवरात्रि के रूप में। दोनों ही नवरात्रों का अपना अलग ख़ास महत्व है और आज हम 7 अक्टूबर को पड़ने वाले शारदीय नवरात्री के बारे में बात करेंगे। अश्विनी मास के शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाले शारदीय नवरात्रि का नाम शारद ऋतू के चलते शारदीय पड़ा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि दो तिथियां एक साथ पड़ने के कारण इस बार आठ ही दिन तक पूजन किया जाएगा। [1]

How to do puja at home

नवरात्रि में दुर्गा मां को प्रसन्न करने  का सबसे सरल उपाय है दुर्गा सप्तशती का पाठ करना। दुर्गा सप्तशती महर्षि व्यास ने मार्कण्डेय पुराण से ली है इसमें 700 श्लोकों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती कहा गया है। सप्तशती का पाठ करने से व्यक्ति के सारे दुःख और परशानी दूर हो जाती है।

आखिर क्यों जलाई जाती है अखंड जोत

नवरात्रि में अखंड जोत जलाये जाने के पीछे महत्व यह है कि पूरे नौ दिन अखंड जोत जलाने से प्रकृति के सभी अवरोध समाप्त हो जाते हैं वातावरण शुद्ध हो जाता है और सारी नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती है।

पौराणिक कथा

नवरात्र से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं प्रचलन में है। जिसमें से एक का जिक्र तो हिंदी साहित्य के बड़े साहित्यकार निराला जी ने अपनी कविता राम की शक्ति पूजा में किया है। जबकि दूसरी कहानी टेलीविज़न पर कई बार प्रदर्शित की जाती है जिसमें से महिषासुर नामक एक राक्षस होता है जिसका वध करने के लिए देवी का जन्म हुआ था।

ऐसा माना जाता है कि रावण को हराने के लिए प्रभु श्री राम ने लगातार नौ दिन रामेश्वरम में शक्ति पूजा की थी और दुर्गा मां से वरदान मिलने के पश्चात ही श्री राम रावण का वध कर पाने में सक्षम हो पाए थे।

वहीँ दूसरी कथा महिषासुर राक्षस के वध से जुड़ी है। महिषासुर नामक एक राक्षस था। वह ब्रह्मा जी का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपनी कठोर तपस्या के माध्यम से ब्रह्माजी को खुश किया और वरदान प्राप्त कर मांगा कि कोई भी देव, दानव या धरती पर रहने वाला कोई भी व्यक्ति उसे मार नहीं पाएगा। यह वरदान मिलने के बाद महिषासुर क्रूर हो गया और उसने तीनो लोको में आतंक मचाना प्रारंभ कर दिया। इस बात से तंग होकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव ने मिलकर मां शक्ति के रूप में दुर्गा को जन्म दिया। दुर्गा माता के साथ राक्षस के नौ दिनों तक चले भीषण युद्ध में अंततः दुर्गा मां की जीत हुई और महिषासुर मारा गया जिसके बाद से यह दिन बुराई पर अच्छे की जीत की नाम से मनाया जाता है। रोचक तथ्य यह है कि दुर्गा मां के कात्यायिनी स्वरुप ने राक्षस महिषासुर का वध किया था इसलिए उन्हें महिषासुरमर्दिनि के नाम से पुकारा जाता है। 

इन ३ देवियों का नवरात्रि में होता है खाश महत्व

नवरात्रि में देवियों को पूजने की मान्यता है लेकिन इसी के साथ ही देवियों के दिन को तीन भागों में भी विभाजित किया गया है।

बताते चलें कि शुरुआत के तीन दिन देवी पार्वती को समर्पित जिसमें से पहले दिन देवी को कन्या के रूप में पूजा जाता है दूसरे दिन युवा स्त्री के रूप में देवी को पूजा जाता है वहीँ तीसरे दिन एक परिपक्व स्त्री के रूप में पार्वती का पूजन होता है।  

मध्य के तीन दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित हैं क्योंकि मां लक्ष्मी धन, वैभव और सौभाग्य की देवी हैं इसलिए इन तीन दिनों में मन के सभी विकार जैसे लोभ, ईर्ष्या, वासना, क्रोध, घृणा से मुक्ति पाकर और शून्यता के स्तर तक पहुंचकर ही व्यक्ति लक्ष्मी मां को प्रसन्न कर सकता है।

आखिरी के तीन दिन देवी सरस्वती की अराधना के लिए है इन तीन दिनों में बौद्धिक और कौशल क्षमता के विकास के लिए देवी की पूजा की जाती है। अंत में नौंवे दिन दुर्गा अष्टमी होती है जिस दिन दुर्गा मां को बड़ी ही धूमधाम से विदा किया जाता है। [2]

नवरात्रि मनाये जाने के पीछे वैज्ञानिक तर्क

नवरात्रि मनाने के पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि दोनों ही नवरात्रे  ऐसे मौसम में आते हैं जब न तो ज्यादा गर्मी होती है न ही ज्यादा सर्दी ऐसे में व्यक्ति को अपने शरीर का ख़ास ध्यान रखने की आवश्यकता होती है इसलिए इस दौरान या तो व्यक्ति को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए या फिर व्रत रखना चाहिए।

Navratri Calender 2021

  • (पहला दिन) 7 अक्टूबर-  मां शैलपुत्री 
  • (दूसरा दिन) 8 अक्टूबर – मां ब्रह्मचारिणी
  • (तीसरा दिन) 9 अक्टूबर – मां चंद्रघंटा और मां कुष्मांडा
  • (चौथा दिन)10 अक्टूबर- मां स्कंदमाता
  • (पांचवा दिन)11 अक्टूबर- मां कात्यायनी
  • (छठां दिन)12 अक्टूबर- मां कालरात्रि
  • (सातवां दिन)13 अक्टूबर-मां महागौरी
  • (आठवां दिन)14 अक्टूबर- मां सिद्धिदात्री
  • (नौंवा दिन)15 अक्टूबर- विजय दशमी[3]
How long is Navratri?

हिंदु पंचांग के मुताबिक शारदीय नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021 से होगी और 15 अक्टूबर 2021 को समाप्त होगी और गुरुवार, 7 अक्टूबर को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर कलश स्थापना की जाएगी। अश्विनी मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नवरात्री का प्रारम्भ होता है, सनातन धर्म में अश्विनी मास का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि इस महीने में पितृ और देव दोनों की कृपा भक्तों पर बरसती है।

Nav Durga Name

1. देवी शैलपुत्री : पहाड़ों की बेटी।  
2. देवी ब्रह्मचारिणी : तपस्या की देवी। 
3. देवी चंद्रघंटा : चंद्रमा की भांति चमक रखने वाली।  
4. देवी कुष्मांडा : पूरे लोक को अपने चरणों में रखने वाली।  
5 .देवी स्कंदमाता : कार्तिक स्वामी की देवी।  
6. देवी कात्यायनी : कात्यायन आश्रम में जन्म लेने वाली।  
7. देवी कालरात्रि : काल का सर्वनाश करने वाली।  
8. देवी महागौरी : श्वेत रंग वाली देवी।  
9. देवी सिद्धिदात्री : सिद्धि प्रदान करने वाली।  

Why onion and garlic are not eaten in Navratri?

नवरात्रि के दौरान तामसिक भोजन वर्जित है क्योंकि शक्ति पूजा के लिए सात्विक रहना अनिवार्य है। ऐसा माना जाता है कि सात्विक भोजन ग्रहण करने से व्यक्ति का मस्तिष्क और मन पवित्र व शांत रहता है। लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा सभी तामसिक भोजन में गिने जाते है और यह सभी आहार राक्षसी प्रवृति के लोगों का भोजन होता है इन्हें ग्रहण करने से व्यक्ति में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। जबकि आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति के लिए सकारात्मक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 

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